उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा 23-24 जुलाई 2015 को वाराणसी में आयोजित राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में ‘समाचार पत्र और साहित्य : बदलते आयाम ’ संगोष्ठी में ब्लागर हरिराम पाण्डेय( ऊपर वाले चित्र में दायें से दूसरे), विख्यात कवि एवं उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के अध्यक्ष डा. उदय प्रताप सिंह, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के निदेशक एवं कवि डा. सुधाकर अदीब, तिब्ब्ती विश्वविद्यालय सारनाथ के कुलपति प्रो एल एन शास्त्री एवं अन्य।
Sunday, July 26, 2015
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा 23-24 जुलाई 2015 को वाराणसी में आयोजित राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में ‘समाचार पत्र और साहित्य : बदलते आयाम ’ संगोष्ठी में ब्लागर हरिराम पाण्डेय( ऊपर वाले चित्र में दायें से दूसरे), विख्यात कवि एवं उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के अध्यक्ष डा. उदय प्रताप सिंह, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के निदेशक एवं कवि डा. सुधाकर अदीब, तिब्ब्ती विश्वविद्यालय सारनाथ के कुलपति प्रो एल एन शास्त्री एवं अन्य।
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Sunday, June 21, 2015
Saturday, May 2, 2015
मतदाता बना अन्नदाता की खुदकुशी
भारत गांवों का देश है। यहां फौज के जवानों की अगर इज्जत है तो गांवों में अन्न उपजाने वाले किसानों की भी बराबर प्रतिष्ठा है। इसी कारण लाल बहादुर शास्त्री ने नारा दिया था‘जय जवान , जय किसान।’ यही नहीं जवानों और किसानों की तुलना करते हुये पेशे से सख्त पुलिस अफसर और दिल से बेहद कोमल कवि एवं गायक मृत्युंजय कुमार सिंह ने लिखा :
तोहsरो बलम कप्तान सुनs सजनी
हमsरो बलमुआ किसान, हो सजनी,
तोहsरो बलsमुआ के मथवा पs टोपिया
करेले ऊ खूनsवा के दान
तs हमsरो बलsमुआ के माथे रे पगड़िया
करे ले ऊ अनsवा के दान सुन सजनी
इस बेहद संवेदनशील गीत में जो सामाजिक सामंजस्य है वह अब खत्म होता जा रहा है या कहें खत्म हो गया। अब सियासत ने अन्नदाता को मतदाता बना दिया तथा मत ले कर उनसे अन्न छीनने के बाद उनके ऋण माफ कर स्वयं का जय-घोष करने वाले क्या अब कुछ मानवीय होंगे? किसान की आत्म हत्या हमारी संवेदना की मौत का दृश्य है । सूखे, फटे, उजड़े, खेतों के किसी अनजान कोने में वह मर जाने वाले उस किसान की पीड़ा से राष्ट्र अनजान ही रहता है। उसके खाली बर्तनों में अन्न नहीं है। कुचले डिब्बों में दाना नहीं, फटे कुर्ते में सिक्के नहीं। वह क्या करेगा। राजधानी के मध्य में बदलाव लाने का दावा करने वाली सरकार की सभा में एक किसान की खुदकुशी चाहे जितने कानूनी और सियासी पहलुओं के दरवाजे खोलती है लेकिन इसका सबसे बड़ा पक्ष है कि अब तक जिन किसानों को सरकारें इस्तेमाल करती रही हैं ये मौतें उनका पीछा करेंगी। किसानों की आमदनी के स्रोत राजनीतिज्ञों की बनायी नीतियों ने सोख लिया अब किसान विवश हैं। दिल्ली में जो आत्महत्या हुई है वह इसी विवशता का प्रतिबिम्ब है। वह प्रयास बना जीवन से मुंह मोड़ने का। वह प्रथम रहा जो हजारों किसानों को जिंदा जता गया कि जितने भी उन्हें इकट्ठे कर जोड़ने का जतन दिखा रहे हैं, वे उन्हें तोड़ने का तांडव कर रहे हैं। किसान जुड़ जाएंगे तो खेतों में पसीना बहाकर सोना निकालेंगे। रैलियों में क्यों जाएंगे? दिल्ली एक किसान मरता रहा और और मुख्यमंत्री भाषण देते रहे। गुरूवार को संसद में शोर मचा यानी मौत भी उनके लिये अवसर बन गयी है।
मृत्युंजय अपने धुन में गाते हैं
तोहsरो बलsमुआ के छाती पs के तsकमा में
चमsकेला देसवा के सान
तs हमsरो बलsमुआ के गेहूँआ के बलिया में
दमsकेला धरsती के जान सुनs सजनी
लेकिन सुनता कौन है। जिसे सुनना है वह तो मौके की तलाश में है। जिन देशवासियों ने रात को समाचार देखे-सुने, उन्हें भरोसा नहीं हुआ कि नेता, हर एक पार्टी के नेता, ‘किसान आत्महत्या क्यों करते हैं’ पर भयानक आरोप-प्रत्यारोप में लीन थे।
जंतर मंतर पर हजारों लोगों की भीड़ के सामने पेड़ से लटक कर खुदकुशी कर लेने वाले राजस्थान के किसान गजेंद्र सिंह की मौत अपने पीछे कई सवाल भी छोड़ गई है । ये सवाल एक तरफ जहां आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं के रवैये को लेकर हैं, तो दूसरी तरफ पुलिस प्रशासन और व्यवस्था संभाल रहे लोगों के साथ-साथ आसपास मौजूद अन्य लोग भी सवालों के घेरे में हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जब गजेंद्र फांसी लगा रहे थे, तब किसी ने उन्हें रोकने की कोशिश क्यों नहीं की? ऐसा कैसे हुआ कि हजारों लोगों की भीड़ के बीच पेड़ पर चढ़े एक शख्स ने खुदकुशी कर ली और करीब 15-20 मिनट तक किसी का उस तरफ ध्यान ही नहीं दिया। कहते हैं कि, अपनों के मरने पर जानवर तक दुखी हो जाते हैं लेकिन ये दुखी नहीं हुये , कौन सी प्रजाति के जानवर हैं ये। जय-जवान, जय-किसान का देश हमेशा याद रखेगा। जिस राष्ट्र का किसान हताश, वहां हर तरक्की बिखरते परिवारों को रौंदकर होगी।
तोहsरो बलम कप्तान सुनs सजनी
हमsरो बलमुआ किसान, हो सजनी,
तोहsरो बलsमुआ के मथवा पs टोपिया
करेले ऊ खूनsवा के दान
तs हमsरो बलsमुआ के माथे रे पगड़िया
करे ले ऊ अनsवा के दान सुन सजनी
इस बेहद संवेदनशील गीत में जो सामाजिक सामंजस्य है वह अब खत्म होता जा रहा है या कहें खत्म हो गया। अब सियासत ने अन्नदाता को मतदाता बना दिया तथा मत ले कर उनसे अन्न छीनने के बाद उनके ऋण माफ कर स्वयं का जय-घोष करने वाले क्या अब कुछ मानवीय होंगे? किसान की आत्म हत्या हमारी संवेदना की मौत का दृश्य है । सूखे, फटे, उजड़े, खेतों के किसी अनजान कोने में वह मर जाने वाले उस किसान की पीड़ा से राष्ट्र अनजान ही रहता है। उसके खाली बर्तनों में अन्न नहीं है। कुचले डिब्बों में दाना नहीं, फटे कुर्ते में सिक्के नहीं। वह क्या करेगा। राजधानी के मध्य में बदलाव लाने का दावा करने वाली सरकार की सभा में एक किसान की खुदकुशी चाहे जितने कानूनी और सियासी पहलुओं के दरवाजे खोलती है लेकिन इसका सबसे बड़ा पक्ष है कि अब तक जिन किसानों को सरकारें इस्तेमाल करती रही हैं ये मौतें उनका पीछा करेंगी। किसानों की आमदनी के स्रोत राजनीतिज्ञों की बनायी नीतियों ने सोख लिया अब किसान विवश हैं। दिल्ली में जो आत्महत्या हुई है वह इसी विवशता का प्रतिबिम्ब है। वह प्रयास बना जीवन से मुंह मोड़ने का। वह प्रथम रहा जो हजारों किसानों को जिंदा जता गया कि जितने भी उन्हें इकट्ठे कर जोड़ने का जतन दिखा रहे हैं, वे उन्हें तोड़ने का तांडव कर रहे हैं। किसान जुड़ जाएंगे तो खेतों में पसीना बहाकर सोना निकालेंगे। रैलियों में क्यों जाएंगे? दिल्ली एक किसान मरता रहा और और मुख्यमंत्री भाषण देते रहे। गुरूवार को संसद में शोर मचा यानी मौत भी उनके लिये अवसर बन गयी है।
मृत्युंजय अपने धुन में गाते हैं
तोहsरो बलsमुआ के छाती पs के तsकमा में
चमsकेला देसवा के सान
तs हमsरो बलsमुआ के गेहूँआ के बलिया में
दमsकेला धरsती के जान सुनs सजनी
लेकिन सुनता कौन है। जिसे सुनना है वह तो मौके की तलाश में है। जिन देशवासियों ने रात को समाचार देखे-सुने, उन्हें भरोसा नहीं हुआ कि नेता, हर एक पार्टी के नेता, ‘किसान आत्महत्या क्यों करते हैं’ पर भयानक आरोप-प्रत्यारोप में लीन थे।
जंतर मंतर पर हजारों लोगों की भीड़ के सामने पेड़ से लटक कर खुदकुशी कर लेने वाले राजस्थान के किसान गजेंद्र सिंह की मौत अपने पीछे कई सवाल भी छोड़ गई है । ये सवाल एक तरफ जहां आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं के रवैये को लेकर हैं, तो दूसरी तरफ पुलिस प्रशासन और व्यवस्था संभाल रहे लोगों के साथ-साथ आसपास मौजूद अन्य लोग भी सवालों के घेरे में हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जब गजेंद्र फांसी लगा रहे थे, तब किसी ने उन्हें रोकने की कोशिश क्यों नहीं की? ऐसा कैसे हुआ कि हजारों लोगों की भीड़ के बीच पेड़ पर चढ़े एक शख्स ने खुदकुशी कर ली और करीब 15-20 मिनट तक किसी का उस तरफ ध्यान ही नहीं दिया। कहते हैं कि, अपनों के मरने पर जानवर तक दुखी हो जाते हैं लेकिन ये दुखी नहीं हुये , कौन सी प्रजाति के जानवर हैं ये। जय-जवान, जय-किसान का देश हमेशा याद रखेगा। जिस राष्ट्र का किसान हताश, वहां हर तरक्की बिखरते परिवारों को रौंदकर होगी।
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Saturday, December 6, 2014
हम हंसना भूलते जा रहे हैं
आजादी के 67 वर्षों बाद भी हमारा समाज धर्म, क्षेत्रीयता और जातीयता के आधार पर बंटा हुआ है। यह एक सामूहिक विफलता है और इसके लिए केवल वे लोग नहीं जिम्मेदार हैं जो धर्म की राजनीति करते हैं बल्कि वे लोग भी हैं जो सेकुलरिटी की आंच पर अपनी रोटी सेंक रहे हैं। ये खोटे सिक्के के दो पहलू हैं। हमारा देश चाहे जितनी तरक्की कर जाये लेकिन वह तरक्की बेमानी होगी। राजनीतिज्ञ बांटने की राजनीति कर रहे हैं और हम उसे लेकर लगातार बंटते जा रहे हैं। यही नहीं इसके लिए हमारा मीडिया भी दोषी है। एक अशालीन बात ममता जी ने एक जनसभा में कह दी और उसे अंग्रेजी मीडिया ने उछालना शुरू कर दिया। उन्होंने यह बात बंगला में कही थी और उसे अंग्रेजी या हिंदी में समझाने की कोशिश की जा रही है। जब अटल बिहारी वाजपेयी 13 दिनों के लिये प्रधानमंत्री बनने के बाद कोलकाता आये थे तब उन्होंने स्थानीय प्रेस क्लब में 'मीट द प्रेसÓ कार्यक्रम में एक जुमला कहा था, 'घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाये क्या।Ó अंग्रेजी और बंगला में इसका अनुवाद हुआ और पूरे मुहावरे का मजा खराब हो गया। उन्होंने अपनी मूढ़ता पर परदा डालने के लिए बात का बतंगड़ बना दिया। क्या यही निष्पक्षता है मीडिया की। हम तो इतने सैडेस्टिक हो गये हैं कि बात का मजा भी नहीं ले पाते। जहां तक ममता जी की 'बांसÓ वाली बात है वह एक स्थानीय जुमला है। लोकभाषा में इसका इस्तेमाल बहुत गलत नहीं माना जाता है। अलबत्ता इसमें कुलीनता का अभाव है और भदेसपना है। लेकिन यह भाषा का सौंदर्य भी है। गुरुवार को एक बड़े अंग्रेजी अखबार ने इसी बात की हंसी उड़ाने के लिए इसे मुख्य खबर बनायी है। हमारा मीडिया 'ठस्स पनÓ का शिकार होता जा रहा है। इसका कारण है मीडिया का अपना कामकाजी वातावरण। आज राजनीति की खबर बनाने का वातावरण स्वस्थ नहीं है। जाहिर है कि पत्रकार अपनी बोर परिस्थतियों के शिकार हो रहे हैं , हंसी के सहज प्रसंगों पर हंसने की क्षमता तक खोते जा रहे हैं। वे ममता बनर्जी की व्यंग्यात्मक गुगली को नहीं समझ सके। इस व्यंग्य में जबर्दस्त ताकत है। पत्रकारों के ऐसे ठस्स पन के कई कारण कहे जा सकते हैं। पहला कारण शायद यही है कि पत्रकार जिस माहौल में काम करते हैं उसमें हंसी-मजाक की जगह शायद बची नहीं है। हर आदमी तनाव में रहता है। शायद काम की बदहवासी उसे हंसने का अवकाश नहीं देती। उनके काम करने की जगह में हंसना शायद मना है। उनकी ट्रेनिंग में तो हंसना होता ही नहीं है। उन्हें अपने कामकाज में हंसने की फुर्सत नहीं मिलती है। कामकाज की जगह में अतिरिक्त तनाव है, कंपटीशन से ज्यादा बदलाखोरी, एकदूसरे की टांग खिचाई है। ऐसे में जब हंसने की बात होगी तो हंसा न जा सकेगा। एक मजाक, एक मुहावरा, एक कटाक्ष लंबे-उबाऊ भाषण से कहीं अधिक संवाद पैदा करता है क्योंकि उसका चुटीलापन सबके आनंद का विषय बनता है। कटाक्षभरी आलोचना घोर विपक्षी के लिए भी सहने की जगह बनाती है। सहनशीलता में दीक्षित करती है। इससे संवाद और बढ़ता है। यह अंग्रेजी में उस तरह से संभव नहीं, लेकिन उसे देसी भाषा में तो होना चाहिए। क्योंकि वह लोकजीवन से उद्भूत भाषा है। लोकभाषा का अपना मिजाज है, जहां हंस कर, उपहास कर, तंजकर, व्यंग्य करके अपनी बात कही जाती है। राजनीतिक विमर्श में ऐसी मजेदार भाषा का इस्तेमाल सबसे पहले लोहिया ने शुरू किया था। इसी जमीन पर अटल जी बोला करते थे और इसी जमीन पर लालू ने राजनीति की टीआरपी इतने दिन बटोरी। इसी राजनीतिक देसी स्कूल के शरद यादव हैं और वे जब बोलते हैं तब बेलौस और दोटूक बातें करने के आदी हैं और जरूरत पडऩे पर व्यंग्य कर बात को इस कदर चुटीली बनाकर पेश करते हैं कि आप हंसते-हंसते लोटपोट हो जाएं। 'पाकिस्तान रंडुआ है और हम रंडुए के चाचाÓ जरा इस मुहावरे पर गौर तो करिए कि शरद यादव कह क्या रहे थे? और इसे सुनकर राम गोपाल यादव जैसे सांसद हंसी से लोटपोट क्यों हुए होंगे? इस मार को वही समझ सकता है जो मुहावरे जानता है, देसी भाषा की कीमियागीरी जानता है। इस पदावली को सुनकर स्त्रीत्ववादी आरोप लगा सकते हैं कि शरद का उक्त कथन 'मर्दवादीÓ पदावली है और इसमें 'रिवर्स सेक्सिज्मÓ की बू आती है! हंसी की भाषा अलग होती है। वह पत्रकारिता में नहीं सिखाई जाती। जिसके पास हंसी की भाषा ही नहीं वह उसे पहचाने कैसे! अंग्रेजी की हंसी हमारी लोकभाषा की हंसी से अलग होती है, इसलिए लोकभाषा में या हिंदी में कहे वाक्य का हास्य अंग्रेजी में समझा भी कैसे जा सकता है। हंसी की कमी का एक कारण शायद हमारे राजनीतिक विमर्श की बदलाखोर भाषा है जो हल्के- फुल्के क्षणों को बनने ही नहीं देती। हमारी भाषा सपाट, कड़वी और कटखनी बन चली है। ममता जी ने जो कहा ऐसे सबाल्टर्न कटाक्ष भरे मुहावरे अनंत अर्थो की तरंगें देर तक पैदा किया करते हैं। अंग्रेजी वाले लाख अनुवाद करके भी इस मुहावरे का मजा नहीं ले सकते। अफसोस यही हाल हमारे हिंदी वाले रिपोर्टरों का भी है। इसी के कारण चारों तरफ बड़ी गलत फहमियां पैदा हो रहीं हैं। समाज को स्वस्थ सूचना देना पत्रकारिता का धर्म है पर शुष्क सूचना देकर समाज को मानसिक तौर पर बीमार करना कलम का धर्म नहीं है।
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बांस तो शाश्वत है भाई
लस्टम पस्टम
इन दिनों बांस चर्चा में है। बांस पहले भी चर्चा में हुआ करता था पर आज जैसी उसकी शोहरत नहीं थी। वरना हमारे एक मित्र हैं
अक्सर मंचों पर कविता पढ़ते समय एक खास कविता सुनाते हैं:'बांस के व्यापारी हईं, बांस देहब जी...Ó। यही नहीं , वकीली महकमे में एक मसल तो बेहद मशहूर है कि 'एक बार एक वकील एक केस की बहस कर रहा था। जज साहेब अंग्रेज थे। वकील ने कहा, मी लॉर्ड, देयर वाज ए खूंटा। अब जज साहेब खूंटा पर अटक गये। पूछा , वॉट इज खंटा? वकील ने कहा, मी लार्ड, इट इज ए पीस ऑफ बंबू , हाफ भीतर हाफ बाहर।Ó या फिर आपने सुना होगा कि 'उल्टे बांस बरेली को।Ó या, फिर बंगला की वह मशहूर कविता- 'बांस तुमी केनो झाड़े...Ó। यानी बांस हमारे लोकजीवन में अरसे से है पर आज कल इस पर ज्यादा दबाव है। अरे भाई, हमारे एक कवि मित्र ने हाल के बांस विमर्श पर टिप्पणी की कि बांस उतनी बुरी चीज नहीं है अगर बुरी होती तो कोलकाता के एक आयकर कार्यालय का नाम 'बम्बू विलाÓ क्यों होता। अपने बांस से परेशान एक दूसरे दोस्त ने फरमाया, भाई वहां उस विला में केवल बम्बू है , छोटे बड़े सब वेराइटी के और उसे आयकर विभाग वाले यत्र तत्र डालते हैं। अब कौन उस विला की हेठी करे।
प्रश्न है कि , बांस किसे कहते हैं? भाई मेरे , जिसे देख कर भूत भागते हैं, जिसके इशारे पर शेर नाचते हैं। जिससे बंद सीवर खोले जाते हैं। छोटा दीखता है, कुछ चिकना होता है, किंतु मारक होता है। वार कहीं करता है, घाव कहीं होता है। बांस ना हो तो बांसुरी ना बजे और बजे तो बेसुरी बजे। ... और मजे की बात है कि बांस यदि बॉस के हाथ में हो तो कितना कुछ होता है यह तो बॉसत्व के मारे लोग अच्छी तरह जानते होंगे। कहते भी हैं कि बांस नहीं तो बॉस नहीं। सच बात है। बांस रखना और बांसुरी बजाना बॉस का धर्म है। घनिष्ठ इस संबंध के अतिरिक्त बॉस और बांस के मध्य कुछ समानता भी हैं। मसलन, बॉस और बांस दोनों गांठ -गठीले होते है। प्रत्येक गांठ कुछ शंका, कुछ आशंकाओं, कुछ प्रश्न और कुछ रहस्यों से भरी होती हैं। एक गांठ का रहस्य सुलझाने का प्रयास करोगे, दूसरी गांठ पहली से ज्यादा मजबूत नजर आएगी। गांठें कच्चे धागे की गांठ के समान होती हैं, जो कभी खुलती ही नहीं हैं, प्रयास करने पर उलझती ही चली जाती हैं।
बॉस का और बांस का मुसकराना यदा-कदा ही होता है। सदियों में जाकर कभी बांस पर फूल खिलते हैं और जब खिलते हैं, तो अकाल साथ लेकर आते हैं। बॉस कभी मुस्कराते नहीं है और जब कभी मुस्कराते हैं तो किसी के लिए संकट के बादल लेकर आते हैं। ऐसी ही कुछ समानताओं के कारण बॉस और बांस कभी-कभी एक दूसरे के पर्यायवाची से लगते हैं। अंग्रेज बॉस और बांस के पारस्परिक संबंधों से भीलीभांति परिचित थे, इसलिए वे और उनके अधिकारी हाथ में सदैव बांस रखते थे। उनके लिए बांस बॉसिज्म का प्रतीक था, जिसे वे रूल कहते थे। उस रूल के ही सहारे रूलिंग चलती थी। रूल के सामने शेष सभी 'रूलÓ व्यर्थ थे। बांस के सहारे ही वे 150 वर्ष तक भारत के शानदार बॉस बने रहे। बांस रूपी रूल का ही कमाल था कि उनके राज्य में कभी सूरज डूबा ही नहीं। बांस कमजोर हुआ तो सूरज ऐसा डूबा की अब ब्रिटेन में भी उगने का नाम भी नहीं ले रहा है।
विश्व की समूची राजनीति के दो ही आधार हैं, बॉसिज्म और बांसिज्म। नटनी के समान विश्व राजनीति भी बांस के सहारे ही तो पतली रस्सी पर चल कर अपना सफर पूरा करती है। हो भी क्यों ना राजनीति और नटनी सगी बहने ही तो हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा, प्रयास करने पर पता किया जा सकता है, मगर राजनीति और नटनी कब किस करवट लुढ़क जाएं किसे पता है। 'उसका बांस मेरे बांस से लंबा क्यों?Ó बांसिज्म के इसी दर्शन पर विश्व की राजनीति टिकी है। समस्या बंगाल की हो या कश्मीर की हो या अफगान की अथवा इराक की, जड़ में सभी के बांस है। अमरीका आज अमरीका न होता यदि उसके हाथ में बांस न होता। आई एस आई एस इसलिये इतना कत्ले आम कर रहा है कि उसका बांस दूसरे से लम्बा हो जाय। झगड़ा बांस का ही है भाई। मेरे बांस से उसका बांस लंबा क्यों? आज बंगाल की समस्या भी यही है कि दिल्ली का बांस कोलकाता के बांस से लम्बा क्यों है? हमारा मानना है कि तृतीय विश्वयुद्ध यदि कभी होगा भी तो, न तेल के लिए होगा और न ही पानी के लिए। होगा तो केवल बांस के लिए होगा, क्योंकि युद्ध जब कभी भी हुए हैं, बॉसिज्म और बांसिज्म को लेकर ही हुए हैं। मजबूत बांस वाला ही युद्ध में विजयी होगा और वही विश्व-बॉस कहलाएगा।
इन दिनों बांस चर्चा में है। बांस पहले भी चर्चा में हुआ करता था पर आज जैसी उसकी शोहरत नहीं थी। वरना हमारे एक मित्र हैं
अक्सर मंचों पर कविता पढ़ते समय एक खास कविता सुनाते हैं:'बांस के व्यापारी हईं, बांस देहब जी...Ó। यही नहीं , वकीली महकमे में एक मसल तो बेहद मशहूर है कि 'एक बार एक वकील एक केस की बहस कर रहा था। जज साहेब अंग्रेज थे। वकील ने कहा, मी लॉर्ड, देयर वाज ए खूंटा। अब जज साहेब खूंटा पर अटक गये। पूछा , वॉट इज खंटा? वकील ने कहा, मी लार्ड, इट इज ए पीस ऑफ बंबू , हाफ भीतर हाफ बाहर।Ó या फिर आपने सुना होगा कि 'उल्टे बांस बरेली को।Ó या, फिर बंगला की वह मशहूर कविता- 'बांस तुमी केनो झाड़े...Ó। यानी बांस हमारे लोकजीवन में अरसे से है पर आज कल इस पर ज्यादा दबाव है। अरे भाई, हमारे एक कवि मित्र ने हाल के बांस विमर्श पर टिप्पणी की कि बांस उतनी बुरी चीज नहीं है अगर बुरी होती तो कोलकाता के एक आयकर कार्यालय का नाम 'बम्बू विलाÓ क्यों होता। अपने बांस से परेशान एक दूसरे दोस्त ने फरमाया, भाई वहां उस विला में केवल बम्बू है , छोटे बड़े सब वेराइटी के और उसे आयकर विभाग वाले यत्र तत्र डालते हैं। अब कौन उस विला की हेठी करे।
प्रश्न है कि , बांस किसे कहते हैं? भाई मेरे , जिसे देख कर भूत भागते हैं, जिसके इशारे पर शेर नाचते हैं। जिससे बंद सीवर खोले जाते हैं। छोटा दीखता है, कुछ चिकना होता है, किंतु मारक होता है। वार कहीं करता है, घाव कहीं होता है। बांस ना हो तो बांसुरी ना बजे और बजे तो बेसुरी बजे। ... और मजे की बात है कि बांस यदि बॉस के हाथ में हो तो कितना कुछ होता है यह तो बॉसत्व के मारे लोग अच्छी तरह जानते होंगे। कहते भी हैं कि बांस नहीं तो बॉस नहीं। सच बात है। बांस रखना और बांसुरी बजाना बॉस का धर्म है। घनिष्ठ इस संबंध के अतिरिक्त बॉस और बांस के मध्य कुछ समानता भी हैं। मसलन, बॉस और बांस दोनों गांठ -गठीले होते है। प्रत्येक गांठ कुछ शंका, कुछ आशंकाओं, कुछ प्रश्न और कुछ रहस्यों से भरी होती हैं। एक गांठ का रहस्य सुलझाने का प्रयास करोगे, दूसरी गांठ पहली से ज्यादा मजबूत नजर आएगी। गांठें कच्चे धागे की गांठ के समान होती हैं, जो कभी खुलती ही नहीं हैं, प्रयास करने पर उलझती ही चली जाती हैं।
बॉस का और बांस का मुसकराना यदा-कदा ही होता है। सदियों में जाकर कभी बांस पर फूल खिलते हैं और जब खिलते हैं, तो अकाल साथ लेकर आते हैं। बॉस कभी मुस्कराते नहीं है और जब कभी मुस्कराते हैं तो किसी के लिए संकट के बादल लेकर आते हैं। ऐसी ही कुछ समानताओं के कारण बॉस और बांस कभी-कभी एक दूसरे के पर्यायवाची से लगते हैं। अंग्रेज बॉस और बांस के पारस्परिक संबंधों से भीलीभांति परिचित थे, इसलिए वे और उनके अधिकारी हाथ में सदैव बांस रखते थे। उनके लिए बांस बॉसिज्म का प्रतीक था, जिसे वे रूल कहते थे। उस रूल के ही सहारे रूलिंग चलती थी। रूल के सामने शेष सभी 'रूलÓ व्यर्थ थे। बांस के सहारे ही वे 150 वर्ष तक भारत के शानदार बॉस बने रहे। बांस रूपी रूल का ही कमाल था कि उनके राज्य में कभी सूरज डूबा ही नहीं। बांस कमजोर हुआ तो सूरज ऐसा डूबा की अब ब्रिटेन में भी उगने का नाम भी नहीं ले रहा है।
विश्व की समूची राजनीति के दो ही आधार हैं, बॉसिज्म और बांसिज्म। नटनी के समान विश्व राजनीति भी बांस के सहारे ही तो पतली रस्सी पर चल कर अपना सफर पूरा करती है। हो भी क्यों ना राजनीति और नटनी सगी बहने ही तो हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा, प्रयास करने पर पता किया जा सकता है, मगर राजनीति और नटनी कब किस करवट लुढ़क जाएं किसे पता है। 'उसका बांस मेरे बांस से लंबा क्यों?Ó बांसिज्म के इसी दर्शन पर विश्व की राजनीति टिकी है। समस्या बंगाल की हो या कश्मीर की हो या अफगान की अथवा इराक की, जड़ में सभी के बांस है। अमरीका आज अमरीका न होता यदि उसके हाथ में बांस न होता। आई एस आई एस इसलिये इतना कत्ले आम कर रहा है कि उसका बांस दूसरे से लम्बा हो जाय। झगड़ा बांस का ही है भाई। मेरे बांस से उसका बांस लंबा क्यों? आज बंगाल की समस्या भी यही है कि दिल्ली का बांस कोलकाता के बांस से लम्बा क्यों है? हमारा मानना है कि तृतीय विश्वयुद्ध यदि कभी होगा भी तो, न तेल के लिए होगा और न ही पानी के लिए। होगा तो केवल बांस के लिए होगा, क्योंकि युद्ध जब कभी भी हुए हैं, बॉसिज्म और बांसिज्म को लेकर ही हुए हैं। मजबूत बांस वाला ही युद्ध में विजयी होगा और वही विश्व-बॉस कहलाएगा।
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जनता 'परिवारÓ का अब भार मुलायम पर
आपने सुना है न कि नयी बोतल में पुरानी शराब। या नयी पैकिंग में पुराना माल। वही हाल हमारे देश की राजनीति का है। चाहे वह भगवा पार्टी हो या तिरंगा या कोई और सभी दल बार-बार खुद को नये ढंग से लांच करते हैं। हमारे देश की राजनीति में नरेंद्र मोदी एक नई विभाजक रेखा के रूप में उभरे हैं। जो भी हो रहा है या तो इनके साथ आने के लिए हो रहा है या फिर इनके विरुद्ध खड़े होने के लिए। अगर मोदी न होते तो मुलायम सिंह यादव के घर छह राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि जमा नहीं होते। समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव, जनता दल युनाइटेड के नीतीश कुमार, शरद यादव, जनता दल सेकुलर से एचडी देवगौड़ा, आरजेडी से लालू प्रसाद यादव, इंडियन नेशनल लोकदल के दुष्यंत चौटाला , समाजवादी जनता पार्टी के कमल मोरारका ने अपनी संख्या को सहेजने का प्रयास किया। जिस वर्तमान परिस्थिति के कारण ये कभी अलग हुए होते हैं उसी वर्तमान परिस्थिति के नाम पर एक भी हो जाते हैं। बदली हुई परिस्थिति राजनीति की वो स्थिति है जो कभी भी किसी को भी बदलने की सहज अनुमति देती है। जेडीयू के नेता नीतीश कुमार ने कहा कि जो पुराने जनता परिवार के घटक हैं वो संसद में और बाहर भी विभिन्न मुद्दों पर मिलकर खड़े होंगे। इसके लिए 'जनता परिवारÓ 22 दिसंबर को दिल्ली में धरना प्रदर्शन का एक साझा कार्यक्रम करेगा। जिसमे यह सवाल उठेगा कि बीजेपी ने किसानों से वादा किया था कि पचास फीसदी मुनाफे की गारंटी के साथ न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाएगा। उसका क्या हुआ? इन छह नेताओं ने मुलायम सिंह यादव को जिम्मेदारी दी है कि वे इन सबको मिलाकर एक दल बनने की प्रक्रिया की देखरेख करें। नीतीश कुमार ने भी कहा है कि कंफ्यूजऩ न हो इसके लिए जरूरी है कि एक पार्टी बने। यहां यह बात गौर करने वाली है कि जनता परिवार चाहे जितनी बार बिखरा हो या अप्रासंगिक हो गया हो, लेकिन भारतीय राजनीति में कांग्रेस के वर्चस्व को तोडऩे में इनकी भूमिका बीजेपी से कम नहीं है बल्कि बीजेपी को भी सहारा इसी परिवार से मिला है। आज यह परिवार बीजेपी के वर्चस्व से मुकाबले के लिए एकजुट हो रहा है तो स्थितियां वैसी नहीं हैं जैसी सत्तर के दशक में थीं। आज जो हालात हैं उसमें क्या लोग लालू-नीतीश-मुलायम के नेतृत्व पर भरोसा कर सकेंगे। हमारी राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका का ठीक से मूल्यांकन नहीं हुआ। जबकि कई बार ये दल काम के आधार पर दोबारा भी चुन कर आते रहे फिर भी इनकी छवि 'बैड ब्वायÓ की ही है। बिहार में नीतीश कुमार और लालू यादव साथ आने पर आज भी मजबूत ताकत हैं, यह जाहिर हो चुका है। किंतु नई पार्टी के गठन से उत्तरप्रदेश, हरियाणा और कर्नाटक में सामाजिक समीकरण का क्या लाभ होगा, कहना फिलहाल मुश्किल है। बहरहाल, ये छोटे मुद्दे हैं। असली सवाल है कि नई पार्टी जनता के सामने वास्तव में क्या नया विकल्प पेश करेगी? इन पार्टियों ने संसद में समन्वय के जो मुद्दे चुने, उन पर (भूमि अधिग्रहण कानून, मनरेगा, बीमा विधेयक आदि से संबंधित सरकारी कदमों का) विरोध करना था। ऐसे में यह सोचना निराधार नहीं है कि 'जनता परिवारÓ नकारात्मक एजेंडे पर एकजुट हो रहा है। यही इस राजनीतिक घटनाक्रम का सबसे बड़ा पेंच है। अक्तूबर 2013 और फरवरी 2014 में चार वाम दलों और एआईडीएमके, जेडीयू, सपा, एजीपी, जेडीएस और बीजेडी की बैठक हुई थी। लेकिन चुनाव आते आते तीसरे मोर्चा की चर्चा भी समाप्त हो गई। तब अरुण जेटली ने कहा था कि तीसरे मोर्चे को लेकर बीच-बीच में जो प्रयोग होते रहते हैं वो कभी सफल नहीं हुए हैं। थोड़े दिनों के बाद यह मोर्चा समाप्त हो जाता है। कई हारे हुए दलों के साथ गठबंधन बनाने का फार्मूला सफल नहीं हो सकता। लेकिन चुनाव के तुरंत बाद बिहार में जब उप-चुनाव हुए तो जेडीयू, आर जे डी ने कांग्रेस से मिलकर बीजेपी से थोड़ी बढ़त बना ली। समाजवादी पार्टी ने भी यू पी में सीटें जीत लीं। इसके बावजूद आप इस प्रयोग को फिलहाल गेम चेंजर नहीं कह सकते।
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Thursday, December 4, 2014
रामलला के बहाने
सिर्फ दो दिन बाद अयोध्या विवादास्पद ढांचा को ढहाये जाने की बरसी है। मुस्लिम समुदाय के सियासतदां इसे बाबरी मस्जिद ढाहने का काल दिवस कहते हैं और हिंदू राजनीतिक नेता इसे राममंदिर निर्माण की दिशा में उठाया गया कदम बताते हैं। दो दशक पहले अयोध्या के बहाने पूरे देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया गया था। लेकिन उस हवा में बहने से तब भी अयोध्या ने इनकार किया था। देश के अनेक हिस्सों में टकराव हुए, खूनखराबे तक की नौबत आई, पर अयोध्या का माहौल नहीं बिगड़ा। मंदिरों की घंटियां पहले की तरह ही बजती रहीं, मस्जिदों में अजान होती रही। रोजी-रोजगार और सारा कारोबार उसी तरह चलता रहा। सुख-दु:ख में एक-दूसरे का हाथ लोग उसी तरह थामे रहे, जिस तरह सदियों से थामते आए थे। इंसानियत की ऊष्मा थोड़ी भी कम नहीं हुई। सदियों से चले आ रहे भाइचारे में रत्ती भर फर्क नहीं पड़ा। लेकिन अब भी जोशीले भाषणों से वहां का और उसकी आड़ में देश भर का माहौल गरमाने का प्रयास चल रहा है। राम मंदिर बनेगा या नहीं पर इस दिशा में दोनों समुदाय के कुछ अगुआ सकारात्मक कदम उठा रहे हैं तथा प्रयास कर रहे हैं कि मामला सुसंगत तौर पर सुलझ जाय। बाबरी मस्जिद मुकदमे के पैरोकार और मुद्दई हाशिम अंसारी ने बुधवार को घोषणा कर सबको चौंका दिया कि वे अब केस की पैरवी नहीं करेंगे। उन्होंने मंगलवार को यह कहते हुए सबको चौंका दिया कि वे रामलला को आजाद देखना चाहते हैं। हाशिम ने यह भी साफ कर दिया कि वह छह दिसंबर को मुस्लिम संगठनों द्वारा आयोजित यौमे गम (शोक दिवस) में भी शामिल नहीं होंगे। वह छह दिसंबर को दरवाजा बंद कर घर में रहेंगे। कुछ ही दिन पहले कोलकाता में अयोध्या की हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञानदास से मुलाकात हुई थी। उन्होंने बताया कि उन्होंने हाशिम अंसारी को लेकर पूरी कोशिश की थी कि हिंदुओं और मुस्लिमों को इक_ा करके मामले को सुलझाया जाय। पर उस समय हिंदू समुदाय का संगठन सुप्रीम कोर्ट चला गया। नवम्बर के आखिरी हफ्ते में गोरखनाथ पीठ के महंत योगी आदित्य नाथ ने भी कोलकाता में एक खास मुलाकात में बताया था कि एक वर्ष के भीतर राम मंदिर निर्माण की रूपरेखा तैयार हो जायेगी और यह तैयारी संविधान के दायरे में होगी। राममंदिर को लेकर सुसंगत ढंग से सोचने वाले इन तीन रहनुमाओं की बातों से लगता है कि एक बड़ी आबादी देश की एकता, अखंडता और सामाजिक सौहार्द की समर्थक है। हाशिम अंसारी ने तो साफ कहा कि 'बाबरी मस्जिद पर हो रही सियासत से वे दु:खी हैं। रामलला तिरपाल में रह रहे हैं और उनके नाम की राजनीति करने वाले महलों में। लोग लड्डू खाएं और रामलला इलायची दाना ,यह नहीं हो सकता...।Ó हाशिम ने कहा, 'बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमिटी बनी थी मुकदमे की पैरवी के लिए। आजम खां तब साथ थे, अब वे सियासी फायदा उठाने के लिए मुलायम के साथ चल रहे हैं। मुकदमा हम लड़ें और फायदा आजम उठाएं!Ó यही नहीं, चौरासी कोसी परिक्रमा के पहले उस पर सवाल उठाया था और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने ट्विट किया था कि 'अयोध्या का मैच फिक्स है।Ó इस पर हिंदू महासभा और बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटि ने काफी बवाल मचाया था। हालांकि उस परिक्रमा पर शास्त्रज्ञों और पंडितों ने भी सवाल उठाये थे। पंडितों ने तो तमाम धर्मशास्त्रीय स्रोतों के आधार पर इसे गलत ठहराया। उन्होंने दलील दी कि चातुर्मास यानी वर्षा ऋतु के चार महीनों में हिंदू शास्त्रों के मुताबिक कोई शुभ काम नहीं होता, क्योंकि मान्यता है कि इस समय देवता सोने चले जाते हैं। रामायण में प्रसंग है कि भगवान राम ने भी इस काल में अपनी यात्रा स्थगित कर दी थी। ऐसे में यह यात्रा ही सनातन परंपरा के विरुद्ध है। कई आचार्यों ने यह भी कहा कि अयोध्या के चौरासी कोस की परिक्रमा की परंपरा न तो प्राचीन है, न ही शास्त्रसम्मत। अंसारी से मुस्लिम पक्ष को सीख लेनी चाहिए। अंसारी का बयान तब आया है जब बाबरी ऐक्शन कमिटी छह दिसंबर को काला दिवस मनाने जा रही है। अंसारी के इस कार्य का यह संदेश पूरे देश को समझना चाहिए। पूरे देश के लोगों को धर्म और धर्म की राजनीति के बीच अपनी समझ साफ रखनी चहिए।
Posted by pandeyhariram at 3:35 AM 0 comments
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