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Thursday, March 9, 2017

गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

 अभी हाल में गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि ‘हर आदमी को आजादी है पर इसका मतलब नहीं है कि वे देश को कमजोर करने के लिये नारे लगाते फिरें।’ अभी कुछ दिन पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में हुआ अगर उसका मनोविज्ञान देखें तो वह फकत आदर्श ओर पहचान का झगड़ा था साथ ही यह मसला यह भी बताता हे कि भारत का भाव अथवा अवधारणा इतनी विवादास्पद कभी नहीं रही जितनी आज है। हमारे रोजाना के काम काज या टी वी के प्रसारण या सड़क पर तनी हुई मुट्ठियां इन दिनों कुछ रचनात्मक करने में नाकाम हो रहीं हैं। आपसी स्पर्द्धा का कोई रचनात्मक नतीजा नहीं हासिल हो पा रहा है।

 

कैसे कैसे मंजर सामने आने लगे हैं

गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

 

कुछ लोग इसे कट्टर हिंदू राष्ट्रवाद का नतीजा भी बता सकते हैं ओर ऐसा कह देना सरल भी है पर सच तो यह है कि भारत में हिंदू राष्ट्रवाद की तरह कई अत्याचारी प्रकल्प हैं मसलन वामपंथी अधिनायकवाद , इस्लामी हथियारबंद कट्टरवाद , परम्परा के नाम पर पारिवारिक अत्याचार इत्यादि। हमारे लोकतंत्र की जब सुबह हुई थी तो भारतीय प्रभु वर्ग ने अभिव्यक्ति की आजादी को बड़ी संदेह की निगाह से देखा था। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ,जिनमें आपस में नहीं पटती थी , कम्युनिस्ट और हिंदू रगष्ट्रवादी मीडिया पर पाबंदी के लिये तैयार हो गये थे। संविधान में पहला संशोधन बोलने की आाजादी पर ‘उचित प्रतिबंध’ के नाम पर ही हुआ। दूसरे देशों में ,चाहे वह यूरोप के मुल्क हों या अमरीकी , जब भी ऐसी कोशिशें हुईं उनका विरोध हुआ और आजादी कायम हुई। लेकिन भारत में ऐसा नहीं हो सका। इंदिरा गांदा की सरकार द्वारा लगायी गयी इमरजेंसी ने भारतीयों को सत्ता के बड़ते हाथ के प्रति संदेहास्पद बना दिया। यहां राजनीतिक दलों द्वारा जो सबसे बड़ी चाल चली गयी वह थी लोकतंत्र की रक्षा की बातों का प्रसार और उसे लोगों के जहन में बैठा देने की कोशिश। किसी ने यह नहीं कोशिश की कि हम एक ऐसी संस्कृति तैयार करें जो लोकतां​त्रिक हो। अभी भी आपात काल के विरोधी सांस्कृतिक प्रतिक्रियाएं जाहिर करते देखे जाते हैं।

गजब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते

वो सब के सब परीशां हैं वहां पर क्या हुआ होगा

 

लोक संस्कृति के स्तर पर विचारों की भिन्नता के मामले बहुत कम प्रदर्शित होते हैं। आप सिनेमा या टी वी कार्यक्रम या इसी तरह के अन्य प्रोग्राम देख लें , जहां धर्म या समप्रदाय के विवादास्पद मसायल होंगे वहां सब एक ही तरीके से बोलते नजर आयेंगे। लोक संस्कृति में बहुत कम ऐसे समुदाय जो तीव्र मतभेदों पर बातें करते हैं। हम वर्षों से एक ऐसी संस्कृति में रहते आये हैं जहां बोलने की आजादी का मतलब ऊंची आवाज में गुस्सा जाहिर करना होता है। यहां बोलने की आाजादी का मतलब संयत स्वर में तर्कपूर्ण बात कहना नहीं है। भाजपा के सांसद साक्षी महाराज मुस्लिमों के शवदाह की बात  करते हैं क्योंकि देश में उनहें दफनाने के लिये जमीन नहीं है। कर्नाटक ने गृहमंत्री चीखते हैं कि लड़कियों पर हमले के कारण उनके पश्चिमी लिबास हैं। ऐसे उदाहरण देश के हर कोने में मिल जायेंगे। अन्य लोकतंत्र के तजुर्बे हमें बताते हें कि इस तरह के शोर कोई अपवाद नहीं हैं। इतिहासकार एंड्रू हार्टमन के मुताबिक ‘1960 तक अमरीकियों में बुद्धिजीवियों , कलाकारों, ओर राजनीतिज्ञों के छोटे समूहों की बात अमरीकियों पर असर नहीं करती थी। वे अपने देश को सर्वोच्च मानने और दौलत कमाने में लगे थे।’ जब वाहां वियतनाम के युद्दा में शहीद मध्य वर्गीय अमरीकियों के संतानों के कौफीन आने लगे तब उनकी आंखें खुलीं कि यह सब क्या है, अमरीकी होने का क्या यही अर्थ है? 1970 से वहां दक्षिणपंथियों का उभार शुरू हुआ, जिसपर 1979 तक सरकार की निगाह नहीं पड़ी या सरकार ने उसपर निगाह डालना जरूरी नहीं समझा। जब 1979 में ​जेरी फालवेल ने घोषणा की कि यह परिवार की रक्षा के लिये ‘धर्मयुद्ध ’ है तब कहीं जाकर सरकार ने इसपर सोचना शुरू किया। आज हमारे देश में भी कुछ वैसा ही चल रहा है। यहां बोलने की आजादी का मतलब अनर्गल प्रलाप की छूट और उस छूट को रोकने का अर्थ है आजादी पर पाबंदी।

 

किसी भी कौम की तारीख के उजाले में

तंम्हारे दिन हैं किसी रात की नकल लोगों

 

राष्ट्र राज्य की अवधारणा पर तर्कपूर्ण विमर्श तक तो सही है पर उसके बाद लेकिन उसके बाद विरोध की आवाज जब गालियों ओर शोर में बदलने लगे तो क्या हो या क्या किया जाय इसका जवाब वही दें जो इसके पैरोकार हैं। आजदेश अजीब सी हालत में फंसा हुआ हे। लोग बोलते बोलते चिललाने लगते हैं और असे ही अपनी पहचान बना लेते हैं। दोनों तरफ मुट्ठियां तनी हुईं हैं। इसके समाधान की बात कोई नहीं करता। कोई सुनने को तैयार नहीं है।

 

आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है

पत्थरों में चीख हर्गिज कारगर होगी नहीं  

गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

 अभी हाल में गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि ‘हर आदमी को आजादी है पर इसका मतलब नहीं है कि वे देश को कमजोर करने के लिये नारे लगाते फिरें।’ अभी कुछ दिन पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में हुआ अगर उसका मनोविज्ञान देखें तो वह फकत आदर्श ओर पहचान का झगड़ा था साथ ही यह मसला यह भी बताता हे कि भारत का भाव अथवा अवधारणा इतनी विवादास्पद कभी नहीं रही जितनी आज है। हमारे रोजाना के काम काज या टी वी के प्रसारण या सड़क पर तनी हुई मुट्ठियां इन दिनों कुछ रचनात्मक करने में नाकाम हो रहीं हैं। आपसी स्पर्द्धा का कोई रचनात्मक नतीजा नहीं हासिल हो पा रहा है।

 

कैसे कैसे मंजर सामने आने लगे हैं

गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

 

कुछ लोग इसे कट्टर हिंदू राष्ट्रवाद का नतीजा भी बता सकते हैं ओर ऐसा कह देना सरल भी है पर सच तो यह है कि भारत में हिंदू राष्ट्रवाद की तरह कई अत्याचारी प्रकल्प हैं मसलन वामपंथी अधिनायकवाद , इस्लामी हथियारबंद कट्टरवाद , परम्परा के नाम पर पारिवारिक अत्याचार इत्यादि। हमारे लोकतंत्र की जब सुबह हुई थी तो भारतीय प्रभु वर्ग ने अभिव्यक्ति की आजादी को बड़ी संदेह की निगाह से देखा था। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ,जिनमें आपस में नहीं पटती थी , कम्युनिस्ट और हिंदू रगष्ट्रवादी मीडिया पर पाबंदी के लिये तैयार हो गये थे। संविधान में पहला संशोधन बोलने की आाजादी पर ‘उचित प्रतिबंध’ के नाम पर ही हुआ। दूसरे देशों में ,चाहे वह यूरोप के मुल्क हों या अमरीकी , जब भी ऐसी कोशिशें हुईं उनका विरोध हुआ और आजादी कायम हुई। लेकिन भारत में ऐसा नहीं हो सका। इंदिरा गांदा की सरकार द्वारा लगायी गयी इमरजेंसी ने भारतीयों को सत्ता के बड़ते हाथ के प्रति संदेहास्पद बना दिया। यहां राजनीतिक दलों द्वारा जो सबसे बड़ी चाल चली गयी वह थी लोकतंत्र की रक्षा की बातों का प्रसार और उसे लोगों के जहन में बैठा देने की कोशिश। किसी ने यह नहीं कोशिश की कि हम एक ऐसी संस्कृति तैयार करें जो लोकतां​त्रिक हो। अभी भी आपात काल के विरोधी सांस्कृतिक प्रतिक्रियाएं जाहिर करते देखे जाते हैं।

गजब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते

वो सब के सब परीशां हैं वहां पर क्या हुआ होगा

 

लोक संस्कृति के स्तर पर विचारों की भिन्नता के मामले बहुत कम प्रदर्शित होते हैं। आप सिनेमा या टी वी कार्यक्रम या इसी तरह के अन्य प्रोग्राम देख लें , जहां धर्म या समप्रदाय के विवादास्पद मसायल होंगे वहां सब एक ही तरीके से बोलते नजर आयेंगे। लोक संस्कृति में बहुत कम ऐसे समुदाय जो तीव्र मतभेदों पर बातें करते हैं। हम वर्षों से एक ऐसी संस्कृति में रहते आये हैं जहां बोलने की आजादी का मतलब ऊंची आवाज में गुस्सा जाहिर करना होता है। यहां बोलने की आाजादी का मतलब संयत स्वर में तर्कपूर्ण बात कहना नहीं है। भाजपा के सांसद साक्षी महाराज मुस्लिमों के शवदाह की बात  करते हैं क्योंकि देश में उनहें दफनाने के लिये जमीन नहीं है। कर्नाटक ने गृहमंत्री चीखते हैं कि लड़कियों पर हमले के कारण उनके पश्चिमी लिबास हैं। ऐसे उदाहरण देश के हर कोने में मिल जायेंगे। अन्य लोकतंत्र के तजुर्बे हमें बताते हें कि इस तरह के शोर कोई अपवाद नहीं हैं। इतिहासकार एंड्रू हार्टमन के मुताबिक ‘1960 तक अमरीकियों में बुद्धिजीवियों , कलाकारों, ओर राजनीतिज्ञों के छोटे समूहों की बात अमरीकियों पर असर नहीं करती थी। वे अपने देश को सर्वोच्च मानने और दौलत कमाने में लगे थे।’ जब वाहां वियतनाम के युद्दा में शहीद मध्य वर्गीय अमरीकियों के संतानों के कौफीन आने लगे तब उनकी आंखें खुलीं कि यह सब क्या है, अमरीकी होने का क्या यही अर्थ है? 1970 से वहां दक्षिणपंथियों का उभार शुरू हुआ, जिसपर 1979 तक सरकार की निगाह नहीं पड़ी या सरकार ने उसपर निगाह डालना जरूरी नहीं समझा। जब 1979 में ​जेरी फालवेल ने घोषणा की कि यह परिवार की रक्षा के लिये ‘धर्मयुद्ध ’ है तब कहीं जाकर सरकार ने इसपर सोचना शुरू किया। आज हमारे देश में भी कुछ वैसा ही चल रहा है। यहां बोलने की आजादी का मतलब अनर्गल प्रलाप की छूट और उस छूट को रोकने का अर्थ है आजादी पर पाबंदी।

 

किसी भी कौम की तारीख के उजाले में

तंम्हारे दिन हैं किसी रात की नकल लोगों

 

राष्ट्र राज्य की अवधारणा पर तर्कपूर्ण विमर्श तक तो सही है पर उसके बाद लेकिन उसके बाद विरोध की आवाज जब गालियों ओर शोर में बदलने लगे तो क्या हो या क्या किया जाय इसका जवाब वही दें जो इसके पैरोकार हैं। आजदेश अजीब सी हालत में फंसा हुआ हे। लोग बोलते बोलते चिललाने लगते हैं और असे ही अपनी पहचान बना लेते हैं। दोनों तरफ मुट्ठियां तनी हुईं हैं। इसके समाधान की बात कोई नहीं करता। कोई सुनने को तैयार नहीं है।

 

आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है

पत्थरों में चीख हर्गिज कारगर होगी नहीं  

Wednesday, March 8, 2017

जीते चाहे जो , हारेगा उत्तर प्रदेश ही

जीते चाहे जो ,हारेगा उत्तर प्रदेश ही
उत्तर प्रदेश के हाई वोल्टेज चुनाव का नतीजा दो दिन बाद यानी 11 मार्च को आह जायेगा। इस चुनाव में कोई ना कोई दल जीतेगा और किसी ना किसी की सरकार बनेगी ही पर यह तय है कि उत्तर प्रदेश हार जायेगा। राजनीतिक दलो द्वारा किये गये हजारों वायदों और लाखों आश्वासनों के बावजूद वहां की जनता को वही ​मिलेगा जो आज तक मिलता आया है वह है बेकार शाहन और उसका निम्न स्तरीय कामकाज। कई सरकारें आयीं ले​किन आज भी उत्तर प्रदेश बिजली के अभाव , खराब सड़क और कानून तथा व्यवस्था की खराब स्थिति से जूझ रहा है और शायद कल भी उसकी वही हालत रहेगी। दुनिया कई देश आबदी के मामले में यू पी से पीछे हैं। अगर हम रिकार्ड देखें तो पायेगे कि इस विश्व में फकत 5 देश ऐसे हैं जिनकी आबादी यू पी से ज्यादा है बाकी सभी देशों की आबादी वहां से कम है। 20 करोड़ आबादी वाला वह प्रांत भारत की कुल आबादी का 16 प्रतिशत है और विडम्बना देखिये कि देश के कुल जी डी पी में अवदान का उसका हिस्सा महज 8.5 प्रतिशत है। इससे साफ जाहिर है कि देश की कमाई को यू पी कैसे ‘भकोस’ रहा है। दरअसल राज्य का सियासती आचरण कुछ ऐसा है कि हर राजनीतिज्ञ या राजनीतिक दल अब्पनी पहचान और वर्चसव की आपाधापी में लगा है ओर इससे विकास प्रभावित हो रहा है। हर चुनाव में राजनीति की​ भाषा, मुहावरे और जुमले बदल जाते हें पर हालात नहीं बदलते। भारत में नौजवानों की संख्या सबसे ज्यादा है उत्तर प्रदेश भी मिं पीछे नहीं हे। पर इन नौजवानों का उपयोग तब होता जब उनकी शिक्षा, उचित तथा सार्थक रोजगार , उद्यमिता और अनुसंधान में उन्हें लगाया जाता। रोजगार का अर्थ है राज्य में उद्योग का विकास। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार यू पी में व्यवसाय की सुविधा के मामले में 2015 में उसका स्थान 10 वीं पायदान पर था जो 2016 में ​खिसक कर 14 वीं पायदान पर आ गया। कानून व्यवस्था की ारी स्थिति के कारण वहां उद्यमी पूंजी लगाने में हिचकते हैं। अगर राज्य में उद्योग –धंदो नहीं होंगे तो नौजवान रोजगार की तलाश में वहां से बाहर निकलेंगे। इसके लिये उनहें सही ीशक्षा और उचित कौशल चाहिये लेकिन यू पी में यह भी हासिल नहीं हो पाता। शिक्षा की ह्थिति पर वार्षिक रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि यू पी के पांचवीं कक्षा के 35 प्रतिशत बच्चे दूसरी क्लास की हिन्दी की किताबें ठीक से नहीं पढ़ सकते। राज्य में इंजीनियरिंग कॉलेजों में 50 प्रमितशत सीटें खाली जा रहीं हैं क्योंकि वहां से पास करने के बाद रोजगार सही मिलता नहीं है। विकास के लिये जरूरी है अबाध बिजली आपूर्ति ओर वह भी सही मात्रा में। अगर थोड़ी बहुत बिजली मिलती भी है तो उसका वोल्टेज सही नहीं होता। राज्य विद्युत बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक यू पी 50 हजार मेगावाट बिजली की आपूर्ति के कनेक्शन हैं पर कई दशक से 24घंटे बिजली मिलती नहीं है अतएव मालूम नहीं सही जरूरत कितनी है। अन्य आंकड़े बताते हें कि यूपी में 25 हजार मेगावाट बिजली की जरूरत है पर उत्पादन 2500 मेगावाट से ज्यादा नहीं हो पाता। दूसरे राज्यों से बिजली खरीदी जाती है पर तब भी 5000 से 9000 मेगावाट का अभाव रहता है। दुर्भाग्य है कि अब तक की सरकारों ने इस अभाव की पूर्ति के लिये कुछ तनहीं किया उल्टे वोट मिलने वाले क्षेत्रों में कितनी बिजली मिलती है इसके आंकड़े जरूर तैयार किये गये। अगर वहां ग्रामीण चिकित्सा की बात आती है तो सबसे पहले डाक्टरों की हत्या या उनहें मिलती धमकियों की बात दिमाग में घूमने लगती है। एन सी आर बी के आंकड़े बताते हैं कि अपराध के मामले में विशेषकर महिलाओंकि विरुद्दा अपरग्ध में यू पी का स्थान पहला है। अखिलेश यादव ने दावा किया था कि यूपी में महिलाओं के लिये 1090 हेल्प लाइन तैयार की गयी है पर बदाऊं, बुलंदशहर तथा बरेली में बलात्कार की ह्रदय द्रावक घटनाओं ने इस दावे की ​खिल्ली उड़ा दी। कानून और व्यवस्था की खराब ​स्थिति के कारण वहां व्यवसाय प्रभावित हो रहा है। अखिलेश यादव ने अपने चुनाव प्रचार में आगर – लखनऊ एक्सप्रेस वे और लखनऊ मेट्रो को निदाॡ्रित समय में पूरा करने का दावा किया था जबकि 9 फरवरी 2017 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने केवल इसलिये मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी को डांट लगायी थी कि वे झूठे दावे ना करें क्योंकि ये परियोजनाएं अभी पूरी नहीं हुईं हैं। खराब शासन और निमन स्तरीय विकास के कारण ही यू पी को ‘बीमारू’ राज्यों में अभी भी शामिल है जबकि मध्यप्रदेश और राजस्थान इस अपमानजनक विशेषण से सबक सीख चुके हैं और विकास की ओर बढ़ रहे हैं। 11 मार्च को चुनाव परिणाम आयेगा और लोग इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कोन जीतेगा। पर इससे होगा क्या। जीते चाहे जो फिर हारेगा यू पी ही।      

Tuesday, March 7, 2017

आज महिला दिवस

आज महिला दिवस है

तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही खूब है लेकिन
तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था 

आज महिला दिवस है।परंपरा के मुताबिक महिलायों की दशा पर विमर्श होंगे,कुछ सभाएं और गोष्ठियाँ होंगी ,कुछ संकल्प किये जायेंगे और फिर सब कुछ पूर्ववत रह जायेगा। क्यों? यहाँ एक मनोवैज्ञानिक समस्या है। वह यह कि हम सोचते हैं कि महिलाओं की समस्या सरकार हल कर सकती है समाज केवल हालात का रोना रो सकता है और हम वही करते हैं । हम सोचते हैं कि महिलाएं ऐतिहासिक काल से ही पिछड़ी हैं और हमारा विमर्श उसी पर केंद्रित रहता है। हमने यह सोचा ही नहीं कि पौराणिक और प्रागैतिहासिक काल से  आज तक हमारे देश सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा से लेकर, वैदिक काल की अपाला,घोषा, सावित्री और सूर्या जैसी ऋषिकायें, उपनिषद काल की गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियाँ , मध्यकाल और पूर्व-आधुनिक काल की अहिल्या बाई, रज़िया सुल्तान, लक्ष्मी बाई और चाँद बीबी जैसी शासक सम्पूर्ण नारी शक्ति को बेहद सुन्दर और सशक्त रूप से परिभाषित करती रही हैं फिर इतने गौरवान्वित इतिहास वाली नारी उन्नीसवीं सदी के आते आते इतनी अधिकारविहीन और निर्भर कैसे हो गयी ? आखिर नारीवाद के तहत नारियों के उत्थान की आवश्यकता क्यों हुई ? दरअसल यह सब वक़्ते निज़ाम की साजिशों का नतीजा है।विदेशी हमलावरों ने भारतीय समाज का बहुत बारीक विश्लेषण किया। उन्होंने यह ताड़ लिया कि अगर भारत पर हुकूमत करनी है तो सबसे पहले भारतीय समाज की जिजीविषा को स्पन्दनहीन बना दो। भारतीय समाज में शक्ति का स्रोत यहां की नारियां थीं। यही कारण है कि हमारी शक्ति की आराध्या दुर्गा हैं।हुकूमतों ने ऐसी साज़िश की कि हम दुर्गा को तो पूजते रहे पर उसके जीवंत स्वरुप को परदे की ओट में भेज दिए। इतिहास अपनी रफ़्तार से चलता रहा और नारियां उसी तेजी से पिछड़ती रहीं । बाल विवाह,बेमेल विवाह ,पर्दा प्रथा ,नारी शिक्षा पर प्रतिबन्ध आदि समाज के लिए कलंक स्वरूप कुप्रथाओं को निरंतर  बढावा मिला। अभी एक दासता हमारे गौरवमय अतीत को कलंकित करने के लिए पर्याप्त नहीं रही और हमारा देश ब्रिटिश आधीनता को भुगतने को विवश हुआ। हर क्षेत्र में शोषित रहते हुए भी अंग्रेजी शासन में कुछ  महान समाज सुधारकों स्वामी दयानन्द ,स्वामी श्रद्धानन्द,ईश्वरचन्द्र विद्यासागर,राजा राम मोहन राय ,स्वामी विवेकानन्द,महात्मा गांधी,भगिनी निवेदिता, सरोजिनी नायडू आदि के प्रयासों से इन कुप्रथाओं पर कुछ पाबन्दी लगी। 
स्वाधीनता  के बाद  संविधान ने सबको लिंग भेद के बिना  समानाधिकार दिए।  सबको समान अवसर प्रदान किये गये  ,बालिकाओं की शिक्षा की समुचित व्यवस्था की गयी ,कामकाजी  महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश की तथा शिशु देखभाल के लिए अवकाश की  व्यवस्था की गयी। गर्भ के समय लिंग परीक्षण दंडनीय अपराध बना दिया गया।  महिलाओं के लिए पंचायतों में स्थान आरक्षित किये गए। स्त्री –पुरुष को नौकरी में समान अधिकार दिए गए।  महिलाओं के लिए विशेष आयोग का गठन किया गया।  नीति निर्माण में उनकी भूमिका तय करने के लिए महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की गयी। आज हर क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों की बराबरी करती नजर आ रहीं हैं। कई क्षेत्रों में तो वह एक कदम आगे भी है।

"एक नहीं दो दो मात्राएँ नर से बढ़कर नारी",

लेकिन आंकड़ों और भाषणों के उस पार एक भयावह दुनिया भी है।उस दुनिया में भी झांकना ज़रूरी है।आज भी लिंग परीक्षण होते हैं और गर्भ में ही लड़कियां मार दी जाती हैं।एक सम्पूर्ण सृष्टि की संभावनाओं को ख़त्म करना कितना शर्मनाक है इसका अंदाज़ा नहीं लगाया न सकता है।  स्वामी विवेकानन्द ने एक बार  कहा था-‘‘कि पहले अपनी स्त्रियों को शिक्षित करो। तब वे आपको बतायेंगी कि उनके लिये कौन से सुधार आवश्यक हैं। ’’ 
यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक हैं जितना पहले था।  यूनेस्को की महिला शिक्षा पर  रिपोर्ट  में बंगलादेश हमसे आगे निकल गया है। हमे इस पर गम्भीरता से विचार कर आवश्यक कदम उठाने होंगे। 

आओ मिलकर इंक़लाब ताज़ा तरीन पैदा करें
दार पर इस कदर छा जाएँ कि सब देखा करें

लेकिन विचारणीय यह भी है कि कुछ निहित स्वार्थी समुदाय या समूह नारी स्वतंत्रता को नारी स्वच्छंदता में बदल रहे हैं। स्वछंदता दुर्गुण बढ़ाती है। अधिकार से कर्त्तव्य जुड़े होते हैं। शिक्षा इसीलिए जरूरी है कि हम अपने कर्त्तव्य को समझें। मनुस्मृति में कहा गया है 

यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवताः 
यत्र नार्युस्तु न पूजयन्ते तत्र सर्वा क्रिया अफलाः भवति। 



Monday, March 6, 2017

आई एस को हथियार बनाने के कई सामान कोलकाता से सप्लाई होते हैं

आई एस को हथियार बनाने के कई सामान कोलकाता से सप्लाई होते हैं

 

सीरिया के विभाजन की आशंका, दक्षिण एशिया पर भी खतरा बढ़ा

 

हरिराम पाण्डेय

कोलकाता : विस्फोटक सामग्री बनाने के लिये इस्लामिक स्टेट को साजो सामान मुहय्या कराने का सबसे बड़ा सेंटर हमारा ‘सिटी ऑफ जॉय’ है। देश की 6 कम्पनियां उसे साजो सामान सप्लाई करतीं हैं जिनमें चार कोलकाता से जुड़ी हैं हालांकि इनके मुख्यालय अन्य राज्यों में हैं। व्यापारिक सामानों में गिने जाने इन सामानों के निर्यात पर ज्यादा जांच पड़ताल नहीं होती। सन्मार्ग ने अपनी लम्बी जांच के बाद आई इस को आई ई डी के कम्पोनेंट्स सप्लाई की जाने वाली श्रृंखला की तलाश की और यह पता लगाया कि केसे ये वस्तुएं उस तक पहुंचतीं हैं। प्रमाणिक आंकड़ों और युद्ध विशेषज्ञों की रपटों से पता चलता है कि आई एस अपने युद्ध क्षेत्र में देसी विस्फोटकों (आई ई डी) का बड़े पैमाने पर  उत्पादन करता है तथा उसका उपयोग करता है। आई ई डी में लगने वाले सामान व्यापारिक सामान हैं और असके निर्यात के लिये ज्यादा जांच पड़ताल नहीं होती। इसमें जिन सामानों का उपयोग होता है वे केमिकल प्रीकर्सर, डिटोनेटिंग कॉर्ड, डिटोनेटर्स, केबल तार और अन्य इलेक्ट्रानिक सामान। आई ई डी बनाने में आई एस लगभग 700 वस्तुओं का उपयोग करता है। भारत के अलावा लगभग 19 देशों की 51 कम्पनियां उनहें किसी ना किसी रास्ते से ये वस्तुएं सप्लाई करतीं हैं। जहां तक पता चला है कि भारत की कम्पनियां डेटोनेटर्स, डेटोनोटिंग कॉर्ड ओर सेफ्टी फ्यूज बनाती हैं और इनके निर्यात के लिये लाइसेंस लेना होता है। भारत से ये सामान कानूनी तौर पर लेबनान ओर तुर्की भेजे जाते हैं। यहां ये खुले बाजार में बिकते हैं ओर आई इस के हाथों में आराम से पहुंच जाते हैं। भारत में डेटोनेटिंग कार्ड का उपयोग खानों में होता है। इस में सबसे चौंका देने वाला तथ्य है निर्यात की मात्रा। यह सुनकर हैरत होती है कि कोलकाता की इक कम्पनी ने सीरिया की मेकेनिकल कंस्ट्रक्शन को 2009 और 2010 में 60 लाख मीटर डेटोनेटिंग कॉर्ड का निर्यात किया था। आई ई डी , देसी रॉकेट ओर रॉकेट की सहायता से चलने वाले मोर्टार बनाने में आई एस इलेक्ट्रीक और नन इलेक्ट्रीक डेटोनेटर्स का इस्तेमाल करता है। यह मालूम नहीं हो सका कि इसके भारतीय सप्लायरों को यह मालूम है कि नहीं कि ये सामान आई एस तक पहुंच रहे हैं।

खुफिया एजेंसियों और पश्चिमी कूटनीतिक सर्किल में चर्चा गरम है कि सीरिया का विभाजन होने वाला है। इधर सऊदी अरब के सहयोग से आई एस इराक और सीरिया के सांस्कृतिक और पुरातात्विक सम्पदा को नेस्तनाबूद करने में जुटा है। प्रसंग से अलग एक दिलचस्प बात यह है कि स्थानीय भाषा में इराक को कुरू ओर सीरिया को सूर्य कहते हैं। सऊदी अरब और असके सभी वहाबी सहयोगी तथा कुछ पश्चिमी देश आई एस की मदद कर रहे हैं ,जिसका खुलास भविष्य में किया जायेगा। इस दुरभिसंधि से आने वाले दिनों में विश्व सभ्यता को भारी खतरा है। मध्य पूर्व से यह संगठन धीरे धीरे दक्षिण एशिया में भी फेलने लगा हे। भारत , चीन , पाकिस्तान , अफगानिस्तान और बंगलादेश में इसकी मौजूदगी के संकेत मिलने लगे हैं।