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Thursday, December 14, 2017

भूखे पेट विकास का सपना

भूखे पेट विकास का सपना

अर्थ शास्त्र का साधारण नियम है कि खपत का सीधा सम्बंध उत्पादन से है। भोजन के लिये खाद्यान्न की अपलब्धता का सम्बंध भी उत्पादन से है। अनाज का उत्पादन कम होने के कारण भोजन की समस्या बड़ती जा रही है। पर यह एक गलत ख्याल है। यह सच्चाई पर पर्दा डालने की तरह है। खाद्यान्न का सम्बंध उत्पादन से नहीं उसके वितरण से है। इंटरनेशन फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीच्यूट के एक सर्वे के अनुसार भूख के आंकड़ों में 119 देशों में भारत का स्थान 100वां है। इस सर्वे से नीति आयोग के सदस्य बेहद नाराज हैं ओर यह आंकड़ा गलत है। हमारा स्थान 77 के आस पास होनी चाहिये। जीएचआई की यह रिपोर्ट 2015-16 में किए गए नेशनल हेल्थ सर्वे के आधार पर बनाई गई है जिसमें इसके तीन कारण बताए गए हैं। पहला कारण है कि  भारत में खाघ पदार्थों  और महिलाओं के द्वारा स्तनपान कराने वाले दूध में आने वाली कमी को बताया गया  है, जिसकी वजह से 5 साल के उम्र से कम 35.7 प्रतिशत बच्चों का वजन ​नि​िश्चत​ से कम पाया गया है। तीसरा कारण देश में शौचालयों की समस्या को बताया गया है। भारत में 48.4 प्रतिशत ऐसे घर हैं जहां साफ और ढंग के शौचालयों की कमी है। लेकिन भूख और शौचालय का सीधा सम्बंध नहीं है। यह स्वास्थ्य का मसला है और भूख उत्पादन और वितरण में सामंजस्य मामला है। भारत का जीएचआई स्कोर 1992 में 46.2 था वो 2017 में घटकर 31.4 हो गया है। नेपाल, पाकिस्तान के अलावा भारत इस मामले में सभी ब्रिक्स देशों में सबसे नीचे स्थान पर है। यह आंकड़े चिंताजनक है और जरूरी है कि भारत की सरकार को इस पर ध्यान दे।भूख पर इस रिपोर्ट से साफ है कि तमाम योजनाओं के एलान के बावजूद अगर देश में भूख व कुपोषण के शिकार लोगों की आबादी बढ़ रही है तो योजनाओं को लागू करने में कहीं न कहीं भारी गड़बड़ियां और अनियमितताएं हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और मिड डे मील जैसे कार्यक्रमों के बावजूद न तो भूख मिट रही है और न ही कुपोषण पर अंकुश लगाने में कामयाबी मिल सकी है। समाजशास्त्रियों का कहना है कि इस मोर्चे पर लगातार बदतर होती तस्वीर को सुधारने की लिए भूख व कुपोषण के खिलाफ कई मोर्चों पर लड़ाई करनी होगी। सबसे पहली बात पोषण का सीधा सम्बंध भोजन से नहीं है। यह कई बातों पर निर्भर है। जैसे जिनेटिक, पर्यावरण और भोजन का सदुपयोग इत्यादि। इनमें पीडीएस के तहत पर्याप्त गेहूं व चावल मुहैया कराने के अलावा बच्चों व माताओं के लिए पोषण पर आधारित योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन, पीने का साफ पानी, शौचालय की सुविधा और स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच सुनिश्चित करना शामिल है। एक समाजशास्त्री के अनुसार "प्रगति व विकास के तमाम दावों के बावजूद भूख के मुद्दे पर होने वाले ऐसे खुलासों से अंतरराष्ट्रीय पटल पर देश की छवि को धक्का लगता है। ऐसे में केंद्र व राज्य सरकारों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने पर जोर देना चाहिए ताकि भूख व कुपोषण जैसी गंभीर समसियाओं पर प्रभावी तरीके से अंकुश लगाया जा सके।"सभी योजनाओं की नये सिरे से समीक्षा करने के साथ ही देश के माथे पर लगे इन धब्बों को धोने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति भी जरूरी है। लेकिन सवाल है कि क्या सभी राजनीतिक दलों में इसके लिए सहमति बन सकेगी। शायद नहीं क्योंकि विरोधी इसे उछाल कर सियासत की रोटी सेंकते हैं। सरकार का यह कहना सही नहीं है कि अनाज के उत्पादन में कमी के कारण यह ​िस्थति आ रही है। लेकिन बात यह नहीं है। ज्यादा दोष वितरण में समरूपता के अभाव का है। आज हालत यह है कि भूख के विमर्श को छोड़ बात हो रही है देश की, सियासत की और विकास की।  इन दिनों सामाजिक विपर्यय का एक कारण भूख भी है। आजादी के 70 साल के बाद भी हमारे समाज में भूख से मौतें हो रहीं है। झारखंड का वह वाकया सबको याद होगा ​जिसमें हाल ही में एक बच्ची ने भूख से दम तोड़ दिया।  विकास का सपना तबतक पूरा नहीं हो सकता जबतक भूख की हकीकतें होंगी। पहले भूख की आग को बुझाना जरूरी है।  

  

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