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Wednesday, December 3, 2014

11 कुख्यात आतंकी छिपे हैं कोलकाता और आसपास के इलाकों में

20.11.2014
बंगाल, बिहार और झारखंड के प्रमुख धर्मस्थलों को उड़ाने की योजना
 हरि राम पाण्डेय
कोलकाता : बर्दवान कांड का कुख्यात सरगना शेख रहमतुल्ला साजिद दरअसल बंगलादेश के नारायणगंज का एक मामूली गुंडा है और उसका असली नाम मासूम मियां है। मासूम चोरी एवं लूट की साधारण घटनाओं में सन् 2005 और सन् 2012 में गिरफ्तार भी हो चुका है और उसका छोटा भाई अभी भी जेल में है। बंगलादेश के उच्च पदस्थ खुफिया सूत्रों ने 'सन्मार्गÓ को बताया कि  'बंगाल में जमायत-उल-मुजाहिदीन का सरगना सलाहुद्दीन सालेहीन उर्फ सनी और बम तथा अन्य विस्फोटक बनाने की ट्रेनिंग का प्रमुख जहिदुल इस्लाम उर्फ बोमा मिजान है।Ó ये दोनों मैमन सिंह के त्रिशला घटना के प्रमुख अभियुक्त हैं और बंगलादेश से भागकर पश्चिम बंगाल पहुंच गये हैं। बंगलादेशी सूत्रों के मुताबिक ढाका से नेशनल सिक्योरिटी इंटेलिजेंस के अफसरों का एक दल इनकी पड़ताल में जल्दी ही कोलकाता आने वाला है।
सूत्रों के मुताबिक बर्दवान कांड की जांच कर रही नेशनल इंवेस्टिगेटिंग एजेंसी के प्रमुख शरद कुमार ने मंगलवार को ढाका के मेट्रोपोलिटन पुलिस के खुफिया प्रमुख मोनिरुल इस्लाम से लंबी वार्ता की और बताया जाता है कि मोनिरुल इस्लाम ने उन्हें 11 ऐसे आतंकियों की सूची सौंपी है, जो जमायत- उल-मुजाहिदीन के आतंकी हैं तथा कोलकाता और आसपास के इलाकों में छिपे हुए हैं। उस सूची में जिनके नाम हैं, उनमें शामिल हैं; सोहैल इस्लाम, अनवारिल इस्लाम फारूक उर्फ जमाई फारूक, जहिदुल इस्लाम उर्फ बोमा मिजान, सलाहुद्दीन सालेहीन उर्फ सनी, शरीकुल इस्लाम, मौलाना ताज और मौलाना याह्यïा। बंगलादेश में गिरफ्तार जमायत के कुछ सदस्यों की दी गयी सूचनाओं के हवाले से सूत्रों ने बताया कि भारत में घुसे इन आतंकियों की योजना पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड में प्रमुख हिंदू धार्मिक स्थलों को उड़ा देने की है ताकि देश का सांप्रदायिक माहौल खराब हो जाय और अंतरराष्टï्रीय स्तर पर मुस्लिम एकजुटता का दबाव बढ़े। इस दबाव के कारण बंगलादेश में आतंकी संगठनों के प्रति सरकार थोड़ी ढीली हो सकती है। सूत्रों ने भारतीय मीडिया में आयी उस खबर का पूरी तरह खंडन किया, जिसमें कहा गया था कि 'बर्दवान में तैयार किये जाने वाले विस्फोटकों और टें्रड किये जा रहे लोगों का उपयोग बंगलादेश में किया जाना था।Ó सूत्रों ने इस तथ्य को स्पष्टï तौर पर मनगढं़त बताया, जिसमें यह दावा किया गया था कि बंगाल के एक चिट फंड का रुपया जमायत ए इस्लामी और इस्लामी बैंकों के माध्यम से जमायत- उल- मुजाहिदीन को मिला था। बंगाल में उन आतंकियों को एक राजनीतिक दल की मदद के सवाल पर सूत्रों ने कहा कि उनकी जांच में ऐसा अब तक साफ तौर पर मालूम नहीं हो सका है। सूत्रों के मुताबिक बंगाल के सीमावर्ती गांवों में बंगलादेशी कट्टïरपंथी तत्वों का उस समय से अड्डïा है, जबसे ढाका पाकिस्तान के अधीन था। बंगलादेश उप उच्चायोग के अत्यंत उच्च पदस्थ सूत्रों ने बुधवार को 'सन्मार्गÓ को बताया कि ढाका पुलिस ने भारतीय एनआईए के प्रमुख शरद कुमार को 41 कुख्यात गुंडों के नामों की एक सूची भी दी है, जिनके बंगाल में छिपे होने की आशंका है। सूत्रों ने कहा कि हो सकता है, उन्होंने अपने हिंदू नाम रख लिये हों और इससे उनकी शिनाख्त गुम हो गयी हो। सूत्रों के अनुसार ये उन आतंकियों से ज्यादा खतरनाक लोग हैं, जो बंगलादेश से भागकर बंगाल में छिपे हैं। 

एक अच्छा फैसला

3.12.2014
पुरानी कहानी है कि भारत की 111 पट्टिïयां करीब 17160 एकड़ जमीन बंगलादेश के कब्जे में हैं और 51 बंगलादेशी पट्टिïयां लगभग 7110 एकड़ जमीन  भारतीय कब्जे में हैं। जमीन के ये टुकड़े कूच बिहार के राजा और रंगपुर के फौजदार में चौसर की बाजी में लिये- दिये गये। पहले जुआ या चौसर में जमीनों का लेनदेन हुआ करता था ऐसे सबूत हैं। इधर, आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि यह अग्रेजों की देन है। यह तब हुआ था जब भारत और पाकिस्तान  का ताबड़तोड़ बंटवारा हुआ। कुछ घिरे - सकपकाये लोगों को ऐसी जगह डाल दिया गया जो दूसरे देश के कब्जे में चला गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन क्षेत्रों की अदला बदली का जो प्रस्ताव रखा है वह परिपक्व राजनीतिक सोच का सबूत है। हालांकि ऐसा किया जाना  भारतीय जनता पार्टी के पूर्ववर्ती रुख के विलोम है , लेकिन वह सोच नक्शे के आधार पर तैयार किया गया था न कि राजनीतिक सामाजिक अनिवार्यताओं और आवश्यकताओं के आधार पर। इस अदला- बदली के लिये 2011 में यू पी ए सरकार और बंगलादेश  में समझौता हुआ था। इससे पहले 1971 में इंदिरा - मुजीब भूमि समझौते में कुछ ऐसा ही हुआ था। पर कुछ काम नहीं हो सका क्योंकि इसकी अभिपुष्टिï नहीं की जा सकी थी क्योंकि इसके लिये संसद से मंजूरी लेनी पड़ती है। लेकिन अब इसके लिये राह खुल चुकी है। 31 सदस्यीय संसदीय समिति ने मंजूरी दे दी है। इस समिति के अध्यक्ष कांग्रेस के नेता शशि थरूर हैं और उनका मानना है कि ऐसा किया जाना देश हित के लिये जरूरी है। क्योंकि इससे भारत - बंगलादेश सीमा समस्या स्थाई तौर पर सुलझ जायेगी। पूर्व विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर की अगुवाई वाली समिति ने दोनों देशों के बीच सीमा तय करने के लिए 119वें संविधान संशोधन विधेयक को अपनी कुछ सिफारिशों के साथ मंजूरी दे दी है। समिति ने केंद्र और राज्य सरकारों को इसके क्रियान्वयन में मानवीय पक्ष का ध्यान रखने तथा पुनर्वास पैकेज को लागू करने की प्रक्रिया पर भी स्पष्टता बनाने को कहा है। समिति ने सीमा निर्धारण पर अमल से पहले राज्यों व केंद्र के बीच बेहतर तालमेल व उच्च राजनीतिक स्तर पर मशविरे पर जोर दिया। पूर्व विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर की अगुवाई वाली समिति ने दोनों देशों के बीच सीमा तय करने के लिए 119वें संविधान संशोधन विधेयक को अपनी कुछ सिफारिशों के साथ मंजूरी दे दी है। समिति ने केंद्र और राज्य सरकारों को इसके क्रियान्वयन में मानवीय पक्ष का ध्यान रखने तथा पुनर्वास पैकेज को लागू करने की प्रक्रिया पर भी स्पष्टता बनाने को कहा है। समिति ने सीमा निर्धारण पर अमल से पहले राज्यों व केंद्र के बीच बेहतर तालमेल व उच्च राजनीतिक स्तर पर मशविरे पर जोर दिया। मोदी ने यहां भाजपा कार्यकर्ताओं की रैली को संबोधित करते हुए कहा, मैं इस तरह के बंदोबस्त करूंगा, जिसके बाद रोज-रोज असम आने वाले और उसे तबाह करने वाले बंगलादेशियों के लिए सभी रास्तों को बंद कर दिया जाएगा। मेरी बात का भरोसा कीजिए कि असम की इस समस्या के स्थाई समाधान के लिए भूमि हस्तांतरण समझौता किया जाएगा। यह समझौता दोनों देशों के बीच भूमि सीमा सहमति के तहत सीमा के निर्धारण से संबंधित है। मोदी ने यह आश्वासन ऐसे समय में दिया है जब भाजपा की प्रदेश इकाई और असम गण परिषद ने इस आधार पर समझौते का विरोध किया है कि जमीनों की अदला-बदली में असम को बंगलादेश की तुलना में अधिक क्षेत्र गंवाना पड़ेगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि केवल असम की जनता और सीमा की सुरक्षा के लिए जमीन का  हस्तांतरण किया जाएगा और राज्य को किसी तरह के नुकसान के लिए यह कदम नहीं उठाया जाएगा। उन्होंने कहा, मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ यह बात कह रहा हूं। मोदी ने कहा कि भूमि के आदान-प्रदान से जुड़े समझौते के संबंध में वह राज्य की जनता की भावनाओं को समझते हैं और असम की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे। यही नहीं इस अदला बदली में भारत को कानूनी तौर पर 2777 एकड़ जमीन प्राप्त होगी। यह जमीन दरअसल भारत की है पर शासन बंगलादेश का चलता है, यही नहीं इसी तरह बंगलादेश की 2267 एकड़ जमीन बंगलादेश को प्राप्त होगी। यह एक परिपक्व समझौता है जो दो मित्र राष्टï्रों के बीच सीमा के अनबन को खत्म कर देगा। भारत एक बड़ा लोकतांत्रिक देश है और अपनी गरिमा को देखते हुए इस अदलाबदली को शालीनता से स्वीकार कर लेना चाहिये। 2013 में असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने सार्वजनिक तौर पर ऐसी अदलाबदली की वकालत की थी और कहा था कि इससे असम को प्रत्यक्ष लाभ होगा। अतीत में तृणमूल कांग्रेस ने इसका विरोध किया था पर वर्तमान में इसके एक नेता सौगत बोस 31 सदस्यीय कमिटी में हैं और उन्होंने इस समझौते को मंजूरी दी है। इससे भारत को चीन से सीमा वार्ता करने में सहूलियत मिलेगी। 

Monday, December 1, 2014

अब अगले छ: महीने और


1.12.2014
नरेंद्र मोदी ने अपने शासन काल के छह महीने पूरे कर लिये। हालांकि उन्होंने कई काम करने के लिए 100 दिनों का वादा किया था पर क्या वे वायदे पूरे हुए। उन्होंने  जिन अच्छे दिनों का वायदा किया था, क्या वे आए हैं, या वे बस आने ही वाले हैं? या इन वायदों के पूरे होने की कोई उम्मीद  नहीं है। क्या मोदी भी उन नेताओं की तरह हैं, जो चुनावों से पहले तो वायदे करते हैं, लेकिन बाद में कुछ नहीं करतेे? इन छह महीनों में मोदी ने भारत को कितना बदला है? इस छ: महीने के काल को प्रशासन के लिहाज से अगर देखें तो कुछ भी नहीं बदला है। दूर दूर तक नीतिगत बदलाव नजर नहीं आ रहे हैं। हां अगर दलीलों की मानें तो सरकार को कुशलता से चलाने की कोशिश की गयी है। वह कोशिश कितनी कारगर हुई यह तो भगवान ही जानते हैं।
वैचारिक रूप से, भारतीय राष्टï्रवाद की परिभाषा बदली है और राष्ट्रवाद को क्षेत्रीय आधार पर परिभाषित करने के बजाय अब हम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को सरकारी स्तर पर बढ़ावा देते देख रहे हैं। भाजपा नेताओं ने  हिंदू संस्कृति को बढ़ावा देने का प्रयास करते हुए यह समझाना चाहा है कि इस संस्कृति में  तमाम चीजों की व्याख्या निहित है। कुछ सप्ताह पहले नरेंद्र मोदी ने यह दावा किया था कि आधुनिक विज्ञान और पुनर्जागरण से बहुत पहले प्राचीन भारत में जेनेटिक इंजीनियरिंग और प्लास्टिक सर्जरी का चलन था। पिछले पखवाड़े राजनाथ सिंह ने यह दावा कर श्रोताओं को चौंका दिया कि वॉर्नर हेजेनवर्ग का 'अनिश्चितता का सिद्धांतÓ वेदों पर आधारित था। यह अतीत का पुनराविष्कार है। किसी संस्कृति के लिये यह अच्छी चीज है पर विश्व को देखने का यह तरीका विवेकपूर्ण नहीं है जिसमें कहा जाता हो कि  आधुनिकता का हर पहलू हिंदू अतीत से जुड़ा है। इससे वैश्विक पटल पर हम भारतीय हंसी के पात्र बन रहे हैं। मोदी के कार्यकाल के छह महीने का यही सबसे बड़ा असर है। भारत के हिंदू अतीत को लगातार सामने रखना दरअसल अपनी  मिली-जुली संस्कृति को खारिज करना  है। यह विचार एक समुदाय को दूसरे समुदाय के खिलाफ खतरनाक ढंग से खड़ा कर देगा। संघ परिवार के नेता या तो बारह सौ वर्ष की गुलामी की बात कर रहे हैं या इस पर अभिमान कि आठ सौ वर्ष बाद देश की सत्ता में एक हिंदू सरकार आई है। नरेंद्र मोदी बनारस की गंगा-जमनी तहजीब की बात तो करते हैं, लेकिन इस बहुलतावादी संस्कृति को आगे बढ़ाने में अभी तक उन्होंने कुछ खास नहीं किया है। उन्हें बनारस की मिली-जुली संस्कृति और वहां पैदा हुईं दोनों समुदायों की अनेक महान विभूतियों के बारे में सोचना चाहिये जिन्होंने बनारस के रस को तैयार कर इसे  विशिष्ट पहचान दी। मोदी सरकार को एक ऐसी सामाजिक नीति लेकर आना होगा, जिसमें समाज के सभी वर्गों की बेहतरी का आश्वासन हो।  आप गौर करेंगे तो पता चलेगा कि  धार्मिक विवाद और सामाजिक अलगाव के हर अवसर पर प्रधानमंत्री और उनके मंत्रियों ने चुप्पी साधी है। ओबामा की 26 जनवरी की यात्रा को काफी बड़ा करके भुनाने की कोशिश की जा रही है जबकि यह तो कूटनीति और राजनय का हिस्सा है। मोदी सरकार का संसद में बहुमत है, लिहाजा अमरीका अपने कारोबारी हितों के लिए इस सरकार से बेहतर रिश्ता बनाए रखना चाहेगा ही। सरकार ने अगले छह महीने में कई और मोर्चे पर बेहतर काम करने का वायदा किया है, जिन्हें पूरा करना होगा। अगर इसमें सुस्ती दिखी, तो आगे का रास्ता उतना आसान नहीं भी हो सकता है।

पुलिस 'स्मार्ट बने , पर कैसे


30.11.2014
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुलिस को 'स्मार्टÓ बनने की सलाह दी है। रविवार को गुवाहाटी में सभी प्रांतों के पुलिस महानिदेशकों और अन्य केंद्रीय पुलिस एजेंसियों के प्रमुखों की एक बैठक को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि पुलिस को सही अर्थों में 'स्मार्टÓ होना चाहिये। उन्होंने 'स्मार्ट यानी एस एम ए आर टीÓ की व्याख्या की और बताया कि एस से तात्पर्य है स्ट्रिक्ट कठोर लेकिन संवेदनशील, 'एमÓ से तात्पर्य मॉडर्न यानी आधुनिक एवं सचल, 'एÓ से तात्पर्य अलर्ट यानी सतर्क और जवाबदेह, 'आरÓ से तात्पर्य रिलायबल यानी विश्वसनीय एवं प्रतिक्रियावादी तथा 'टीÓ से तात्पर्य टैक्नो सेवी यानी प्रौद्योगिकी का जानकार और दक्ष है।Ó उन्होंने कहा कि पुलिस को अपने कर्मचारियों को बेहतर माहौल देने, अपनी छवि सुधारने और अच्छी सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए इन मूल्यों को अपनाना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने आजाद भारत में शहीद हुए 33000 पुलिसकर्मियों को सम्मान देने के लिए भी अनूठे तरीके बताए। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता के बाद अब तक देश के लिए शहीद हुए करीब 33000 पुलिस कर्मचारियों को सम्मान दिलाने के लिए जोर दिया। इसके लिए उन्होंने राज्यों के पुलिस अधिकारियों से कहा कि वो इन शहीद हुए पुलिस कर्मियों का ब्यौरा तैयार करें कि कौन-किस परिस्थिति में शहीद हुआ और देश के लिए उसका योगदान क्या है। उन्होंने कहा कि देश के लिए शहीद हुए सभी पुलिसकर्मियों का एक-एक फोटोग्राफ और उनके बलिदान से जुड़ी जानकारियां जुटाई जाएं। इन जानकारियों को एकत्र करके एक पुस्तक तैयार की जाए जिससे कि आने वाले नई पीढ़ी को जवानों की शहादत और शौर्य के बारे में जानकारी मिल सके। प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि यह भी सुनिश्चित किया जाए कि शहीदों पर बनने वाली किताब राष्ट्रीय भाषा के साथ क्षेत्रीय भाषा में भी होनी चाहिए। इतना ही नहीं, उन्होंने इस आइडिया को कामयाब बनाने  के लिए सुझाव दिया कि पुलिस में भर्ती होने वाले जवानों को इस तैयार होने वाली किताब पर एक परीक्षा भी आयोजित की जाए जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग इस किताब को पढ़ सकें। उन्होंने कहा कि एक कारगर खुफिया नेटवर्क वाले देश को सरकार चलाने के लिए किसी हथियार और गोला-बारूद की जरूरत नहीं है। मोदी ने कहा कि हथियारों पर बहुत ज्यादा निर्भर हुए बिना एक प्रभावी खुफिया नेटवर्क के माध्यम से देश चलाया जा सकता है।
प्रधानमंत्री ने कहा, 'जिस देश में उच्च श्रेणी का खुफिया नेटवर्क हो, उसे किसी हथियार और गोलाबारूद की जरूरत नहीं होती। इसलिए बहुत ही उच्च श्रेणी का खुफिया नेटवर्क होना जरूरी है।Ó मोदी ने कहा कि देश में हालांकि बहुत सारी अच्छी चीजें हो रही हैं ऐसे में सकारात्मक खबरों का समुचित तरीके से प्रकाशन होना चाहिए ताकि लोगों को इसके बारे में पता चल सके। प्रधानमंत्री ने कहा कि पुलिस कल्याण एक और मुद्दा है जिसे महत्व दिए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा, 'एक अधिकारी भले ही बहुत अच्छा हो, पर यह महत्वपूर्ण है कि उसके परिवार को अच्छे से रखा जाए।Ó
यह सब आदर्श की बातें हैं और बातों से कुछ होता नहीं है। पुलिस में जो सुधार जरूरी है वह जबतक नहीं होगा तबतक कुछ नहीं हो सकता है।  भारत में समाज से बड़ा संकट अपनी व्यवस्था और पुलिस का है। दुनिया के सभ्य समाजों में पुलिस सभ्य है जबकि अपने यहां पुलिस बीमार है। ध्यान रहे समाज व्यवस्था से नहीं बनता मगर व्यवस्था से पुलिस बनती है। इसलिए पुलिस को सुधार नहीं सकना, उसे सभ्य नहीं बना सकना भारत राष्ट्र-राज्य की सबसे बड़ी असफलता है। तभी आंदोलन इस बात पर होना चाहिए कि पुलिस को सुधारो। जिस तरह की बातें मोदी जी ने की हैं वैसे आदर्श अक्सर सुनने में आते हैं नेताओं के मुंह से। लेकिन कभी किसी ने सुधार की पहल की है। कैसे करेंगे ये लोग सुधार जब खुद ही इसका गलत इस्तेमाल करते हैं। लंबे अरसे से पुलिस को बेहतर प्रशिक्षण देने, उन्हें संवेदनशील बनाने, शिक्षा का स्तर बढ़ाने, नैतिकता की शिक्षा देने, पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ाने जैसे अनगिनत सुझावों की चर्चा होती है, लेकिन इनमें से किसी पर अमल नहीं होता है। आम आदमी के लिए व्यवस्था की पहली कड़ी पुलिस है और यही सबसे कमजोर कड़ी है।  पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए इसमें सुधार सबसे पहली जरूरत है। लेकिन इस भाषण के बाद शायद ही कुछ हो पायेगा। अगर अगले लोकसभा चुनाव तक भी इसमें कुछ हो जाय तो शुक्र है।


सरल नहीं है सुधार


29.11.2014
इन दिनों आर्थिक सुधारों की दूसरी पीढ़ी की चर्चा चल रही है। इस पर आगे बातें करने से बेहतर है कि हम इसके बारे में थोड़ी जानकारी दे दें ताकि समझने में ज्यादा ऊर्जा न लगे। सबसे खास बात है कि हमें यह नहीं मालूम कि हमें करना क्या है। लम्बी अवधि के बाद हमारे देश को राजनीतिक स्थायित्व मिला तो क्या हमारा पहला उद्देश्य होगा कि उस स्थायित्व को बनाये रखें। दूसरी समस्या है महंगाई। अभी हम इससे लगातार जूझ रहे हैं और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भी  इसी कश्मकश में लगा है। तीसरी समस्या है तेजी से बदल रहीं अंतरराष्टï्रीय परिस्थितियां। बात यहीं खत्म नहीं हो जाती है। इससे ढेर सारी स्थितियां परिस्थितियां जुड़ी हैं और हम सिर्फ ऊपर ही ऊपर तैर रहे हैं बुनियादी सवालों को समझने और उनके उत्तर खोजने की कोशिश ही नहीं की। सोचिये कि भूमि संबंधी अड़चनों के कारण थम रहे निवेश, खनन क्षेत्र और प्राकृतिक सम्पद जैसे क्षेत्रों में लाल फीतों से जकड़े कायदे - कानून। इस बारे में कभी सोचा गया। इससे विकास को कितना अवरोध पहुंचता है। पहली पीढ़ी के सुधारों में भी इस पर निगाह नहीं डाली गयी। बेशक अर्थ व्यवस्था में थोड़ा बहुत विवाद होता है और उसे नहीं मिटाया जा सकता। लेकिन अपने देश में सबसे बुनियादी समस्या है मूल्य नीति। एक देश में एक साथ सरकार नियंत्रित मूल्य नीति है और साथ ही बाजार नियंत्रित नीति भी है। दिलचस्प बात है कि दोनों नीतियां भरोसेमंद नहीं हैं। दूसरी पीढ़ी की चर्चा है लेकिन ये समस्याएं नजरों की ओट हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आस्ट्रेलिया में सही कहा था कि 'किसी तथ्य को छिपा कर सुधार नहीं किया जा सकता है। इससे बात नहीं बनेगी। ... और अगर बात बिगड़ेगी तो कोयला घोटाले की तरह का नतीजा सामने आयेगा।Ó अपने देश में कानूनों में सुधार का नतीजा उसमें कुछ नये छद्मों के लिए जगह बनाने के रूप में सामने आता है। अब जैसे कोयला घोटाले की ही बात करें। इस सम्बंध में मसला यह नहीं है कि किसने इसे जारी किया बल्कि इसका प्रभाव फेडरल प्रणाली पर सवाल उठाता है और दूसरा सवाल है कि इसे जारी कौन कर सकता है। हम इस तथ्य से आंखें मूंदे हैं। यही बात स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी है। शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के नाम पर शिक्षा का अधिकार दिया गया लेकिन इसमें सबसे बड़ी चूक हो गयी कि निजी और सरकारी शिक्षण संस्थाओं में भेद नहीं किया गया। अब जैसे-जैसे इसे सुधारने की कोशिश होती है वैसे- वैसे इसमें जटिलता बढ़ती जाती है। वही हाल स्वास्थ्य क्षेत्र का भी है। इसमें एक तरफ खुली बाजार व्यवस्था है तो दूसरी तरफ अधकचरे नियम- कायदे। इसमें बढ़ती कीमतों को रोकने की कोई व्यवस्था नहीं है और इससे पूरा देश प्रभावित हो रहा है।  यही नहीं उत्पादनों की मूल्य नीति और बैंकिंग प्रणाली जैसी बातों पर भी ध्यान देना होगा। सुधार के लिए सबसे महत्वपूर्ण है 'चलेगा या चलता हैÓ जैसी प्रवृति के विरुद्ध जंग। सरकार जिस तथ्य को बहुत कम कर के आंक रही है वह है अफसरशाही। एक आई ए एस अधिकारी सरकार को अदालत के पचड़े से बचाने में भारी सहायक होता है लेकिन आज आई एस अधिकारी का अधिकार इतना संकुचित और अचिन्हित हो गया है कि वह अपना काम नहीं कर पाता। दूसरी बात है कि जो भी मामले उभरते हैं पहले तो सरकार उसे समझ नहीं पाती और यह बताती है कि उसने समझा है इसे पूरी तरह और मामले को सुलझाने का प्रयास कर रही है। यही नहीं , सरकार टैक्स हटाने की बात कर रही है लेकिन वित्त मंत्री कठोर वित्तीय अनुशासन की बात कर रहे हैं। दूसरी तरफ, ढांचागत सुधार और ढांचा निर्माण के प्रधानमंत्री के सपनों का क्या होगा।  अगर निवेश नहीं होगा तो विकास कैसे होगा और निवेश होगा कैसे। सुधार के लिए समस्या को जानना जरूरी है। ऐसी व्यवस्था में सुधार बड़ा कठिन है जिसमें आपने कुछ किया तब भी आलोचना और नहीं किया तब भी निंदा। इसलिये सुधारों पर सरकार खुलकर कुछ ईमानदारी से कह नहीं पा रही है। हम संभवत: दूसरी पीढ़ी के सुधारों की बात करें बल्कि पहली पीढ़ी से भी पहले की बात करें तो बेहतर है।

Wednesday, November 5, 2014

An article published in Amar Ujala on 31st Oct.2014


Monday, March 31, 2014

Article published in Hindustan editorial page 0n 28 March 2014 in All editions