आखिर ऐसी भी क्या जल्दी थी
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कालाधन को खत्म करने की गरज से 8 नवम्बर की रात एक हजार और 5 सौ के नोटों का चलन रद्द कर देने की घोषणा की। इससे सारा देश हैरत में डूब गया। विरोध के स्वर को दबाने के लिये कहा जाने लगा कि कालाधन मिटाने की नीति की ऐसी ही घोषणा जरूरी थी। कालधन मिटाने का वादा करके यानी अर्थ व्यवस्था में स्वच्छता का वादा करके सरकार में आयी भाजपा या यूं कहें कि एन डी ए ने काला धन मिटाने का जो नारा चलाया और जो स्पेशल टास्क फोर्स का गठन किया और जो नोटबंदी की उन्होंने घोषणा की उसके एक सपताह बाद तक के समन्वित सरकारी आंकड़े बताते र्हैं कि नतीजा बहुत अच्छा नहीं हुआ है। सरकारी रपट के मुताबिक इस एक् हफ्ते में यानी 9 नवम्बर से 14 नवम्बर के बीच बैंकिंग सिस्टम में कुल मिला कर 1.1 लाख करोड़ रुपया सामने आया है। मोदी सरकार ने काले धन को जुर्माने के साथ सफेद बनाने की वीडीआईएस स्कीम शुरू की जिसके तहत 65,250 करोड़ की रकम सामने आई। इसके अलावा वित्त राज्य मंत्री संतोष गंगवार ने 12 अगस्त को लोकसभा को जानकारी दी कि 2014 से 2016 के बीच 21,354 करोड़ रुपये की अघोषित आय सामने आई। इस दौरान 22,475 करोड़ की रक़म पकड़ी भी गई। साथ ही 1474 करोड़ रुपये ज़ब्त किए गए। यानी 2014 से 2016 के बीच 1.1 लाख करोड़ से ऊपर का काला धन सामने आया। इसके अलावा नोटबंदी के बाद से पहले चार दिनों में 3 लाख करोड़ रुपया बैंकों में जमा हुआ है। अभी 30 दिसमबर तक समय है देखना है कि कितनी रकम सामने आती है। जबकि वित्त मंत्रालय की ही रिपोर्ट के मुताबिक मनमोहन सिंह के काल में या यों कह लें कि यू पी ए – 2 के काल में यूपीए-2 के समय अप्रैल 2009 से दिसंबर 2012 तक 39,500 करोड़ से ज्यादा की अघोषित आय सामने आई। इस दौरान करीब चार साल में 25,500 करोड़ से ज्यादा की अघोषित आय पकड़ी गई। करीब 3,000 करोड़ रुपये के बराबर की संपत्ति जब्त की गई। यानी कुल करीब 68,000 करोड़ की रकम यूपीए-2 के समय सामने आई। यद्यपि सरकार का यह कदम या साहस तारीफ के काबिल है पर अगर इसके लिये समुचित तैयारियां कर ली गयीं होती हैं तो इतनी आलोचना नहीं होती। खबर है कि इसके लिये 6 महीने से तैयारी चल रही थी पर उस तैयारी का नतीजा तो नहीं दिख रहा है। जो दिख रहा है तो केवल बेचैनी, अव्यवस्था और असुविधा है। आंकड़ों के मुताबिक देश में विबिन्न बैंकों की 1 लाख 32 हजार 587 शाखायें हैं। बैंकों में कुल जितने खाते हैं उनके आधार पर औसतन 9500 नागरिकों पर एक शाखा है। लेकिन यह सामान्य औसत है। क्योंकि 250 जिलों में केवल सौ शाखायें हैं और गावों में कुल मिला कर 49902 शाखायें हैं जबकि देश की 69 प्रतिशत आबादी गावों में बसती है। बड़े शहरों में जहां कैशलेस लेन देन के कई तरीके हैं गांवों के लाग पूरी तरह नगदी लेन देन पर निर्भर हैं। दूर दराज के इलाकों में बैंकों में भरने के लिये नगदी पहुंचाने के लिये समुचित सुरक्षा व्यवस्था चाहिये वह अलग। यही नहीं सरकार की घोषणाओं को लेकर भारी विभ्रम भी फैल गया है। सरकार ने कहा कि अघोषित सम्पति पर टैक्स के अलावा 200 प्रतिशत पेनल्टी लगेगी। अब इसे लेकर आयकर विभाग में भारी कन्फ्यूजन है। किस कानून के तहत दो सौ प्रतिशत टैक्स अपने आप लगया जायेगा। यही नहीं सरकार ने कहा है कि शक होने पर 1947 से रिकार्ड खंगाले जायेंगे जबकि आयकर विभाग की हकीकत यह है कि दो लाख से ऊपर वालों की गणना करने के लिये उनके पास आदमी नहीं हैं। रुपया देने के लिये एटीएम बने हैं पर छोटे नोटों के कारण एटीएम जल्दी ही खाली हो जा रहे हैं। संकट बना हुआ है। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक देश भर में 2 लाख 1 हजार 867 एटीएम हैं जिनमें 70 प्रतिशत मुख्यत: शहरी इलाकों में हैं। इससे लोगों की तकलीफें बढ़ी हैं। प्रधानमंत्री ने इस कदम को भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ एक 'जिहाद' की तरह से जनता के सामने पेश किया है। जनता परेशान जरूर है लेकिन इस एक्शन के खिलाफ नजर नहीं आती। सोमवार को गाजीपुर में एक सभा को सम्बोधित करते हुये प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया कि पांच सौ और एक हजार रुपए के पुराने नोट को बदल कर नए नोटों के लाने के फैसले से आम लोगों को कष्ट हो रहा है इससे किसी को इनकार नहीं, पर 50 दिनों के बाद लोगों की तकलीफें दूर हो जाएंगी। उन्होंने कहा, "केवल वो लोग परेशान हैं, जो बेईमान हैं। लेकिन उनके लिए कोई और चारा भी नहीं है ।" प्रधानमंत्री की इस बात का असर पड़ता दिख रहा है। इस सम्बंध में विपक्ष की भूमिका से निराशा हो रही है। सरकार को कटघरे में खाड़ा करने का यह अच्छा अवसर था जिसे विपक्ष ने गवां दिया। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह विपक्ष की खिल्ली उड़ा रहे हैं, कह रहे हैं कि मायावती और मुलायम के चेहरे से चमक गायब हो गई है। विपक्ष चुप है। बेशक विपक्ष के बड़े नेताओं के बयान जरूर आ रहे हैं। लेकिन एक्शन गायब है। अरविंद केजरीवाल का विरोध सोशल मीडिया से आगे कभी नहीं बढ़ पाया है। बुधवार से संसद का नया सत्र शुरू हो रहा है। सरकार को कई अहम बिल पारित कराने हैं जिसके लिए मोदी सरकार को विपक्ष की ज़रुरत पड़ेगी जबकि राज्य सभा में भाजपा को बहुमत प्राप्त नहीं है। अब यह स्थिति दिलचस्प होगी कि इस सत्र में विपक्ष नोटों की वापसी के मुद्दे पर सरकार को कितना झुका सकती है। प्रधानमंत्री के अब तक के सार्वजनिक भाषणों से ऐसा लगता है कि सरकार झुकने वाली नहीं है।
Thursday, November 17, 2016
आखिर ऐसी भी क्या जल्दी थी
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नोटबंदी से कुछ खास सुधार होने की संभावना नहीं
नोटबंदी से कुछ खास सुधार होने की संभावना नहीं
विगत दस दिनों से नोट बंदी और नोट बदली को लेकर देश में जोरदार बहस चल रही है. कुछ लोग तो यह भी कहते सुने जेया रहे हैं कि कश्मीर में शांति इसलिए है कि सारे उपद्रवी नोट बदलवाने में लग गये हैं. वित्ता मंत्री कह रहे हैं कि यह अफ़रा तफ़री लगभग एक महीने तक चलेगी. हालाँकि यह ज़्यादा दिन चलेगी. अगर उनकी ही बात मानलि जाय तब भी करोड़ो लोग महीने भर तक इसी काम में लगे रहेंगे. मीडीया भी कुछ और ना करके केवल साकार के काम में मीन मेख निकालने के चक्कर मे रहेगी. अफवाहों और खबरों का लगातार उत्पादन होता रहेगा. प्रधान मंत्री ने अपने भाषण में एकाधिक बार कहा कि इससे कला धन का ख़ात्मा हो जाएगा. लेकिन किस तरह कालाढान ख़त्म होगा यह बात स्मझ में नहीं आ रही नहीं है. बेरोज़गारों को खड़ा करवा के लोग नोट ना बदलवा लें इसलिय नोट बदलवाने वालों की उंगलियों में काली स्याही के निशान लगाए जेया रहे हैं. लेकिन लोगों के पास इस निशान को मिटाने के उपाय भी हैं. एक हज़ार के नोट बंद करवाने के पीछे सरकार का तर्क था कि इससे काला धन ख़तम हो जाएगा. लेकिन सवाल तो यह गाई कि काला धन ख़तम हुआ कहाँ. यही नहीं सरकार को भी मालूम होगा कि अपने देश में काला धन नोटों के रूप में कितना रखा जाता होगा. इसका सबसे अच्छा तरीका तो ज़मीन और जेवर है. अर्थ शाश्त्र का नियम है कि अगर धन का वेग घटा दिया जाए तो वा अपना मूल्या खो देता है. यहाँ वेग से मतलब पैसे को बज़ार में घुमाने से है. वैसे हमारे देश के पैसे का मूल्य कम है. इसके अलावा काले धन को सफेद करने की योजनयों के ढेर लगे हैं. कोई भी थोड़ा सा दंड चुका कर जितना भी काला धन सफेद कर ले. वैसे भी टैक्स बचाने के तरीके तो रोज बढ़ रहे हैं. हाँ जाली नोटों पर इसका असर पड़ेगा यह अभी नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि जाली नोटों को लेने से बॅंक बस माना कर देते हैं. ऐसे में हर आँकड़ा ग़लत होगा. साथ ही आम नागरिक जाली नोट पहचानते नहीं और बॅंक लेंगे नहीं तो घटा उसे ही होगा जिसके पास वे नोट होंगे. अच्छा तो यह होता कि उन नोटों को बैंक जब्त कर लेते. यही नही 30 दिसमबार के बाद या कहें 31 मार्च के बाद पता चलेगा कि कितना असली था और कितना नकली. यह समय एक नये तरह के करप्शन को जानम देगा, देखना है सरकार इससे कैसे निपटती है. बदल दिए गये नोटों से सरकार को कितना लाभ होगा यह अभी कोई नहीं बता सकता, पर सरकार के विशेषज्या बताएँगे.काला धन को लेकर सरकार की फजीहत हो रही थी. इस कदम से प्रचार मे आसानी हो जाएगी. इससे करप्शन घटेगा नहीं, क्योंकि अटैची मे अब दोगुना नोट आयेगा.
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Tuesday, November 15, 2016
नोट बंदी का सामाजिक प्रभाव
नोटबंदी का सामाजिक प्रभाव
नोट बंदी के संदर्भ में सामाजिक प्रभाव की व्याख्या करने के पहले तीन बातों या तीन अवस्थाओं का जिक्र करना लाजिमी है। ये अवस्थाएं हैं हमारे प्रधानमंत्री जी के बॉडी लैंग्वेज की। जिस दिन रात में यानी आठ नवम्बर की रात में उन्होंने हजार और पांच सौ के नोटो का चलन बंद किये जाने की घोषणा की उस दिन वे काफी प्रतिबद्ध ओर साहसी दिख रहे थे। उन्होंने उत्साह और आत्मविश्वास से भर कर माइक्रोफोन की डंडी पकड़ ली थी। दूसरा दृश्य गोवा में सोमवार की शाम उनके भाषण का था। उनकी आंखें भर आयीं थीं और गला रुध गया था। वे अपने परिवार को त्यागने का हवाला दे रहे थे। ये इमोशनल क्षण उनके आत्मविश्वास के हतोत्साहित होने का प्रत्यक्ष क्षण था। तीसरा दृश्य था सोमवार की रात कैबिनेट मीटिंग का। जहां कैबिनेट ने लोगों की पीड़ा का जिक्र किया और प्रधानमंत्री मौन रहे। वित्तमंत्री अरूण जेटली बार बार कह रहे हैं कि दो तीन हफ्तों में सारी मुश्किलें खत्म हो जायेंगी। लेकिन सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि यह झूठा आश्वासन हैं और इस आश्वासन की हकीकत समझ कर ही मोदी जी हतोत्साहित महसूस कर रहे हैं। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक एक हजार और पांज सौ के नोट अर्थ व्यवस्था में 86 प्रतिशत थे। यानी सौ , पचास, दस और पांच के नोट महज 14 प्रतिशत हैं। अब आप ही कहिये कि 86 प्रीतिशत की अतिरिक्त कमी 14 प्रतिशत से कैसे खत्म होगी? जबकि उस चौदह प्रतिशत का चलन पहले से था। इसका साफ अर्थ है कि यह चौदह प्रतिशत अपना काम करते हुये बाकी के 86 प्रतिशत की कमी भी पूरी करेंगे। क्या यह संभव है? अब जरा इसका समाज वैज्ञानिक पक्ष देखें। कोलकाता के स्लम्स में या बंद हो गयी जूट मिलों के लाइनों में या फुटपाथों पर बसर करने वाले लागों में या छोटे छोटे रोजगार करने जैसे सब्जी बेचने वाले या हाथ रिक्शा खींचने वाले लोगों में आधे से ज्यादा के बैंक खाते नहीं हैं और वे क्या करेंगे यह बात समझ में नहीं आती। यही नहीं अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले कुल लोगों में से तीन चौथाई लोग फाइनेंशियल सिस्टम से नहीं जुड़े हैं। ऐसा नहीं कि उन्होंने जान बूझ कर ऐसा किया है बल्कि उनके पास इतना बचता ही नहीं कि वे इससे जुड़ पायेंगे। औरतों की छिपायी गयी रकम को छोड़ भी दें तब भी इसके तीन समाजवैज्ञानिक पहलू हैं। इस महान घटना की फितरत आर्थिक है और मध्यवर्ग जहां खड़ा होकर अपनी नैतिकता की दुहाई देता है यह फितरत उस आधार पर आघात करती है। फिजूलखर्चीं के इल्जाम, सार्वजनिक जीवन से अलग रहने के आरोप और अनुपाती न्याय के आदर्श के मुकाबले यह आर्थिक उद्धत राष्ट्रवाद (इकोनॉमिक जिंगोइज्म) तना हुआ है। आर्थिक तर्क तो यह कहते हैं कि जिस देश में आयकर छापों में कुल अघोषित सम्पति का केवल 6 प्रतिशत ही पाया जा सका और कालाधन उपार्जन की प्रक्रिया चालू है वहां इस तरह के महान कदम कुछ ज्यादा कर पायेंगे इसमें संदेह है। भारत में मध्यवर्ग का आविर्भाव एक बड़े सामाजिक परिवर्तन के फलस्वरूप हुआ। आज इसका एक नया स्वरूप बनता दिख रहा है। इसके तीन पहलू तो स्पष्ट हैं। इनमें पहला है कि समाज में गरीब विरोधी भाव उतपन्न हो रहा है। राजनीतिक आदर्श बाजारवाद का टहलुआ होता जा रहा है और जनता उपभोकग बनती जा रही है। ऐसे समीकरण में गरीबों और उनके दैनिक जीवन के प्रति एक अलगाव बोध सा बढ़ता दिख रहा है। इनपर आरोप है कि ये बिजली चुराते हैं, शहरी जमीन पर कब्जा जमा कर झोपड़ियां बनाते हैं और कारपोरेट क्षेत्र को अपने कारखाने लगाने या खान खोदने के जमीन देने से इंकार करते हैं। ये घटिया लोग हैं तथा इनकी पसलियों से निकला एक नैतिक मध्यवर्ग अपनी मेधा तथा कठोर परिश्र के बल पर इस समाज में जगह बनाता जा रहा है। दूसरी बात यह है कि हर बात का उत्तर तकनीक या टेक्नोलॉजी में देखा जा रहा है। शहरी समस्याओं को केवल स्मार्ट सिटी, कम्प्यूटर के जरिये ही हल किया जा सकता है। तकनीक स्वच्छता है और नैतिकता स्वच्छता में है। नोटों पर लिखा ‘स्वच्छ भारत की ओर’ इसी तकनीक की ओर संकेत है। तीसरा बदलाव जो दिख रहा हे वह है कि हिंसा की भाषा बदल रही है। राष्ट्रीय भावनात्मकता के गिलफ में लिपट कर वित्तव्यवस्था को युद्ध और मुद्रा को सैनिकीकरण के चश्मे से देखा और दिखाया जा रहा है। हिंसा की भाषा में राष्ट्रवाद का प्रक्षेपण नैतिक प्रक्रिया बनती जा रही है। ऐसा लगता है कि पहले हम भारतीय कायर थे और अब ज्हंसा के सामान्यीकरण में नये लोग बन गये हैं। कालाधन एक गंभीर प्रक्रिया का लक्षण है और यह जो नयी व्यवस्था हुई है वह सार्वजनिक हित के सिकुड़ते दायरे से नैतिकता को परिभाषित करने के गंभीर और आंतरिक गंदगी का बिम्ब है। यह व्यवस्था केवल पैसे से नहीं जुड़ी है। आज बंद हो गयी जूट मिलों से बेकार होने पर के सड़क पर सोने वाले लोग और घोड़ों की तरह जुत कर रिक्शा खींचने वालों की पीड़ा से बाहर का राष्ट्रीय अंतर आज नैतिकता का संदर्भ है। यह संदर्भ मानसिक रुग्णता की निशानी है और यह रुग्णता आज सामूहिक तौर पर देखी जा रही है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जो इसका विरोध किया वह बिल्कुल सही है। सियासत में आज एक आध्मी तो ऐसा है जो नैतिक अपराधबोध से ग्रस्त गरीब (अनैतिक )लोगों के पक्ष में खड़ा है।
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Sunday, November 13, 2016
अभी और कुछ होने वाला है
अभी और कुछ होने वाला है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को जापान के कोबे में भारतीय समुदाय को सम्बोधित करते हुये कहा कि 30 दिसम्बर के बाद अभी और कुछ होगा। उन्होंने यह नहीं बताया कि यह और कुछ क्या है पर इतना तो इशारा किया कि काला धन रखने वालों को ठिकाने लगा दिया जायेगा। बैंकों में जो लोग इस समय भारी धन जमा कर रहे हैं उनके रिकार्ड्स की 1947 के बाद से छानबीन की जायेगी। 8 नवम्बर के बाद से कुछ भी हुआ यह कोई नयी बात नहीं है ऐसा पहले भी हुआ है और बाद में भी होगा। सरकार के इन कदमों से आशा की जाती है एकबार ब्लैक मनी तो खत्म हो जायेगी पर उसके आने के रास्ते नहीं बंद होंगे। रास्तों को बंद करने के लिये दीर्घकालीन प्रक्रिया अपनानी होगी। अभी जो हुआ इससे होने वाले लाभ से इंकार नहीं किया जा सकता। इससे और नहीं तो राजनीतिक प्रक्रिया खास कर चुनाव इत्यादि में सफाई आयेगी और दिखावटी खर्चे तथा कुछ लोगों के भड़कीले रहन सहन के कारण आम आदमी जो हीन महसूस करता था उससे तो एक बार निजात मिलेगी। यही नहीं , कुछ दिनों के लिये जाली नोटों की आवक पर भी रोक लगेगी और इससे आतंकवाद तथा राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरों पर भी लगाम लगेगी। सन 1978 में भी कुछ बड़े नोटों का चलन बंद किया गया था और उस समय इससे जो लाभ हुआा था उससे कहीं ज्यादा लाभ इस बार होगा। विख्यात अर्थ शास्त्री गुनर मिरडल ने एक बार कहा था कि भारत ‘सॉफ्ट स्टेट’ है। उसकी यह बात कई बार साबित हो चुकी है। बढ़ता भ्रष्टाचार, बढ़ती काले दान की व्यवस्था और कालेदान के पैदा करने की राह। ये सब मिल कर भारत को सचमुच ‘साफ्ट स्टेट’ बना रहे थे। इस बार जो कदम उठाया गया है उसका लाभ उठा कर सरकार चाहे तो राष्ट्रीय आर्थिक आचरण में परिवर्तन ला सकती है। देश के दूर दराज के गावों की अभी भी बैंक तक पहुंच नहीं है। इससे रुपयों को दबा कर रहने की आदत और असके अवसरों को बढ़ावा मिलता है। मोदी जी ने देशहित में बड़ा कदम उठाया है और इसका श्रेय उन्हें मिलना ही चाहिये। प्रधानमंत्री के इस कदम का भारी राजनीतिक असर भी पड़ेगा। चर्चा है कि , कई राज्यों में चुनाव होने वाले हैं और इसमें कांग्रेस, सपा तथा बसपा काले धन पर ज्यादा निर्भर है। हालांकि यह केवल नकारात्मक अफवाह है पर ऐसा नहीं हो सकता है ऐसी बात नहीं है। हो भी सकता है। अगर यह अफवाह सच है तो मोदी ने मास्टर स्ट्रोक लगाया है। यहां यह जानना जरूरी है कि कालाधन कैसे तैयार होता है। केलकर समिति की रपट में कहा गया है कि वेतन भोगी या बड़े कारपोरेट क्षेत्र में कालाधन का सृजन नहीं होता। यह बीच के सतह में पैदा लेता हे। जैसे अकाउंटेंट, अफसर , डॉक्टर इत्यादि। कालेधन का ज्यादा उपयोग आभूषण खरीदने और रीयल इस्टेट में ज्यादा होता है। एक साधारण सी दलील है कि इनकम टैक्स ज्यादा लगता है और उसके नियम जटिल हैं इसलिये टैक्स से बचा जाता है और इसके फलस्वरूप काला धन पैदा होता है। अब सवाल यह उठता है कि देश में 14 लाख करोड़ के बड़े नोट चलन में थे। इनमें 7.85 लाख करोड़ के 500 के नोट थे और 6.33 लाख करोड़ के हजार के नोट थे। ये सारे वे हठात बंद हो गये। अब इसकी जगह 500 रपये और 2 हजार रुपये के नोट दिये जा रहे हैं। अभी थेड़ी समस्याह है उपलब्धता की पर वह जल्द ही हल हो जायेगी। बड़े नोटों को बंद करने के बाद एक नयी समस्या पैदा होने वाली है। वह है कि सस्ते नोट बंद हो गये और महंगे नोट चलन में हैं। बहुतों को शायद नहीं मालूम होगा कि हजार रुपये का नोट छापना सबसे सस्ता है। क्योंकि इसकी छपायी में इसके फेस वैल्यू से 0.32 प्रतिशत ही खर्च लगता है जबकि 100 का नोट छापने में 1.8 प्रतिशत, 50 के नोट पर 3.6 प्रतिशत और 10 के नोट पर 9.6 प्रतिशत खर्च लगता है। देश में 15.7 अरब 500 के नोट तथा 6.3 अरब एक हजार के नोट चलन में थे। ये लगभग 22 अरब नोट बंद हो गये। अब देश के कोने कोने में नोटों को पहुंचाने की समस्या बहुत कठिन है। इसका सामयिक असर पड़ेगा और अगर यह असर राजनीति में बदला तो थोड़ी कठिनायी पैदा हो सकती है। लेकिन कुल मिला कर यह एक सकारात्मक कदम है।
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Friday, November 11, 2016
सिमी काडरों का इन्काउंटर
सिमी काडरों का इन्काउंटर
अभी पिछले ह्फते भोपाल की जेल तोड़ कर सिमी के आठ आहतंकी भाग निकले और कुछ ही घंटों मे मध्य प्रदेश पुलिस ने उन्हें एक मुठभेड़ में मार गिराया। अब इस मुठभेड़ को लेकर ढेर सारे सवा उठ रहे हैं। किसी वीडियो के आधार पर कहा जा रहा है कि वह मुठभेड़ नकली थी। निहत्थे और आत्मसमर्पण करने को तैयार लोगों को मारा गया। कुछ लोग तो उनके जेल से भागने को भी नकली बता रहे हैं। सोशल मीडिया में मुठभेड़ को नकली और नाजायज बताने वालों की तीखी आलोचना हो रही है या यों कहें कि उन्हें गालियां दी जा रहीं हैं। आतंकियों को भागने के संबंध में जो सवाल उठाये जा रहे हैं उनमें से कुछ हैं , जब केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर पूरे देश में हाई अलर्ट रखे जाने की बात कही गयी थी, जिसमें दीपावली पर्व को लेकर स्पष्ट निर्देश थे तब राज्य सरकार ने उन निर्देशों की अनदेखी क्यों, किसलिए और किसके निर्देश पर की? जेल मैन्युअल के अनुसार किसी भी जेल में आठ से अधिक दुर्दांत अपराधियों को नहीं रखा जाना चाहिए, तो राजधानी की जेल में एक साथ 35 आतंकवादियों को क्यों रखा गया? कुछ वर्षों पूर्व सिमी आतंकवादियों के खंडवा जेल से फ़रार हो जाने की घटना से भी सरकार ने सबक क्यों नही लिया? हाई अलर्ट के दौरान 35 आतंकवादियों को रखे जाने वाली जेल की सुरक्षा मात्र 2 सिपाहियों के भरोसे क्यों, कैसे और किसलिए रखी गई?जेल से फरार होने के बाद आतंकवादियों ने 8 से 9 घंटे तक भोपाल के ही नजदीक रहने का निश्चय क्यों किया? प्रदेश की सीमा से बाहर भागने के लिए 8 से 9 घंटे पूर्णतः पर्याप्त होते हैं। फरार हुए लोगों को आधुनिकतम हथियार कहां से और किससे प्राप्त हुए? आईजी भोपाल का यह बयान कई रहस्य और आशंकाओं को जन्म दे रहा है। इस घटना और गहरे षड्यंत्र के नेपथ्य में कौन कौन सी आंतरिक शक्तियां शामिल हैं? मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस घटना की न्यायिक जांच के आदेश भी दिये हैं। इसबीच मध्य प्रदेश के आतंकवाद विरोधी दस्ता (ए टी एस ) के प्रमुख संजीव शामी ने जोर देकर कहा है कि ‘वे भगड़े अतने खतरनाक थे कि उन्हें मारना जरूरी था वरना वे वे देश के लिये खतरा बन जाते। उन्होंने कहा कि कई मामलों में पुलिस को चरम अधिकार दिखाने का हक है।’ शामी ने ही इस मुठभेड़ की अगुआई की थी। संयोगवश इन भगोड़ों में से तीन आतंकी –जाकिर हुसैन सादिक, शेख महबूब और अमजद खान – गत 1 अक्टूबर 2013 को खांडवा जिला जेल से भागे थे और वे इतने खतरनाक थे कि उनपर दस दस लाख रुपये के इनाम की घोषणा की गयी थी। उन्हे उड़ीसा के रूऊरकेला से 16 फरवरी 2016 को एन आई ए ने गिरफ्तार किया था। उसी दिन उसी जेल से 6 और सिमी के काडर तथा कुछ अन्य कैदी भाग निकले। इनमें से तीन को 23 दिसम्बर 2013 को पकड़ लिया गया और बाकी तीन को कर्नाटक नलगोंडा जिले के जानकी पुरम में 16 फरवरी 2016 को इन्काउंटर में मार डाला गया। ये लोग देश भर में कई आतंकी कांड कर चुके थे। जिसमें पुणे में विस्फोट, गुवाहटी – बंगलोर एक्सप्रेस मेंे विस्फोट और नलगोंडा बैक डकैती भी शामिल थे। सिमी का गठन अलीगढ़ में 25 फरवरी 1977 को हुआ थ। सरकारी रपट के मुताबिक ये लोग बेहद खतरनाक थे तथा लश्कर ए तैयबा जैसे खतरनाक संगठन से हाथ मिलाकर ये लोग आतंकी कार्रवाइयों को अंजाम देते थे। आंकड़े बताते हैं कि 11 मार्च 2000 से 6 नवम्बर 2016 के बीच 705 सिमी कार्यकर्त्ताओं को देशभर में 124 घटनाओं में गिरफ्तार किया गया। यह खबर नहीं है कि इन 705 में से अभी कितने जेल में हैं। 26 जून 2014 को मध्य प्रदेश के तत्कालीन आई जी ने सरकार को जेलों की हालत के बारे में लिखा था और इस पत्त को मध्य प्रेश के मुख्य सचिव एंथनी डेसा ने इस पत्र को सुरक्षा सलाहकार अजित डावाल और खुफिया ब्यूरो को भी भेज दिया था। लेकिन वहां जेलों की सुरक्षा की दिशा में कोई ठोस कार्रवाई हुई हो ऐसा नहीं दिखता। फिलहाल , वैश्विक जेहादी संगठन अल कायदा और आई एस भारत में भारतीय आतंकी या जिहादी संगठनों की मदद से अपनी पैठ बनाने की कोशिश में हैं ताकि अपने अजेंडे को अंजाम दिया जा सके। इसके लिये जरूरी है कि देसी आतंकी संगठनों को वे मजबूत बनायेंगे। ये संगठन सुरक्षा बलों की कार्रवाई के फलसरूप एक तरह से नेस्त नाबूद हो गये थे। सिमी के काडरो द्वारा जेल तोड़ृकर भागने की घटना सुरक्षा के लिये बेहद खतरनाक हो सकती थी। अतएव सरकार का कर्त्तव्य है कि वह देश के महत्वपूर्ण संस्थानों और इंसानी जान ओ माल की हिफाजत करे। 2014 के पहले आतंवाद उतार की दिशा में बढ़ रहा था लेकिन अचानक उसमें तेजी आ गयी। ऐसे में उन्हें मारा जाना अनुचित कैसे हो सकता है? जो लोग इसपर उंगली उठा रहे हैं वे राष्ट्र की कीमत पर सियासत कर रहे हैं।
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