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Wednesday, June 1, 2011

शिक्षा का क्षेत्र बंगाल के पुन: नवजागरण का जरिया


हरिराम पाण्डेय
30.5.2011
रविवार को कोलकाता विश्वविद्यालय में गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर और आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय पर माध्यमिक शिक्षक संघ ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। इसमें शरीक वक्ताओं में लगभग सभी शिक्षण कर्म से जुड़े थे। इसमें जो सबसे महत्वपूर्ण बात सामने आयी वह थी कि बंगाल सर्वदा से प्रतिभा का धनी रहा है और इस समाज में विगत शताब्दियों से अब तक प्रतिभा का अभाव नहीं रहा। इस आयोजन के कुछ ही घंटों के बाद मुख्य मंत्री ममता बनर्जी ने राज्य को आर्थिक दुरवस्था से निकालने के लिये केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी से मुलाकात की। जैसा कि होता है केंद्र ने हर संभव मदद का आश्वासन दिया। लेकिन यह मदद कब तक मिलेगी और कितनी बार मांगी जायेगी। राज्य को आर्थिक रूप से सम्पन्न बनाने का उपक्रम तो करना ही पड़ेगा। तो क्यों नहीं राज्य के नेता यहां की प्रतिभा का इस्तेमाल कर इसे शिक्षा का मक्का बनाने का प्रयास करते। कला, विज्ञान और साहित्य में अपनी विलक्षण प्रतिभा के लिये बंगाली देश भर में मशहूर रहे हैं। अब हालात कुछ ऐसे बने कि विगत सात दशकों से बंगाल अपनी समृद्धि खो बैठा। उसके कारणों की पड़ताल करना यहां मकसद नहीं है, यहां इरादा है कि बंगाली प्रतिभा को उसकी क्षमताओं का स्मरण दिलाना। अर्थ व्यवस्था के चार बड़े क्षेत्र हैं जिनमें एक कृषि में बंगाल ने बहुत अच्छा किया है। जहां तक औद्योगिक उत्पादन का क्षेत्र है उसमें पूंजी बहुत लगती है और उसके लिये उपयुक्त ढांचा भी जरूरी है। यह अत्यंत जटिल स्थिति है। अब विगत वर्षों के 'लाल सलामÓ को देखते हुए पूंजी को यहां लाना बड़ा कठिन कार्य है। यही नहीं हिंदू उद्योगपति खुल कर तो नहीं बोलते पर यहां देसी और विदेशी मुसलमानों की बाढ़ से सब भीतर ही भीतर चिंतित हैं और इसलिये पूंजी निवेश से हिचक रहे हैं। जहां तक यहां के हिंदू बंगाली समुदाय का सवाल है उसकी निगाह में बंगाल पहले है और धर्म बाद में। कोलकाता या बंगाल का हिंदू न तो 1946 का कत्ल- ए- आम भूला है और ना ही उसे बंगलादेश से हिंदुओं को खदेड़े जाने की परवाह है। उसके लिये बंगाल सबसे महत्वपूर्ण है। अब बच गया तीसरा क्षेत्र। वह है सेवा क्षेत्र। यहां बंगाली नौजवान खुद को प्रमाणित कर सकते हैं और करते भी हैं। लेकिन इनमें जो सबसे ज्यादा कारगर क्षेत्र है वह है इन्फारमेशन टेक्नोलॉजी का। इसमें दक्षिण भारतीय नौजवानों ने खुद को स्थापित कर लिया है। अब इसके बाद जरूरी है कि नौजवान यह स्वीकार करें कि पढ़ाना यानी शिक्षण सबसे कारगर आर्थिक क्षेत्र है। यह केवल समाज सेवा ही नहीं बल्कि एक बेहतर आर्थिक गतिविधि भी है। सब समझते हैं कि व्यक्तिगत विकास के लिये पढऩा जरूरी है। देश में कहीं भी बेहतर शिक्षण सुविधाएं नहीं हैं , सब जगह यहां तक कि बंगलादेश और नेपाल में भी अच्छी और विश्वसनीय शिक्षण संस्थाओं का अभाव है। क्यों नहीं यहां सरकार निजी अस्पतालों के संचालकों को प्रोत्साहित करे कि वे मेडिकल कॉलेज खोलें और निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों की स्थापना करें। यहां वकीलों और बैरिस्टरों की तंगी नहीं है पर बमुश्किल कोई राष्टï्रीय स्तरीय लॉ कालेज है। यही नहीं कृषि विश्वविद्यालय और कृषि संस्थान नगण्य हैं। स्कूल कॉलेज को विकसित करना सरल है और इसमें जो सबसे सहज है वह कि शुरू होते ही आमदनी भी शुरू हो जायेगी और यह कार्य यहां बंगाली भावनात्मकता के अनुरूप भी है। यह बंगाल के आर्थिक विकास के लिये मुफीद भी होगा। ... र्और इसे बंगाल का पुनर्नवजागरण भी कहा जा सकता है।

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