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Friday, November 4, 2016

शव पर सियासत 

शव पर सियासत 
अभी दो दिन पहले की बात है ‘एक रैंक एक पेंशन’ मसले के हल में देरी से मायूस होकर इक पूर्व सैनिक 69 वर्षीय रामकिशन ग्रेवाल ने आत्महत्या कर ली। अब वह खुदकुशी क्या हुई कि यूं समझ लें कि मोदी सरकार और विपक्ष में सियासी हाथापाई शुरू हो गयी। वैसे सेना को लेकर सियासत तो पिछले कुछ महीनों चल रही थी। सोशल मीडिया से लेकर मेनस्ट्रीम मीडिया तक में यह साफ देखा जा सकता था था पर आत्महत्या का यह मामला तो बड़ी ही भद्दी राजनीती में बदल गया। एक रैंक एक पेंशन पर सरकार ने लम्बे लम्बे दावे किये हैं और इस अकेली आत्म हत्या ने न केवल उन दावों की पोल खोल दी बल्कि सरकार को भी शर्मसार कर दिया। यहां तक कि बुधवार को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने गोवा में कहा कि ‘विगत 46 वर्षो में किसी सरकार ने एक रैंक एक पेंशन को लेकर कुछ नहीं किया। हमारी सरकार ने इस मसले को हल कर दिया।’ रक्षा मंत्री ने यहां तक दावा किया कि इस मद में 5500 करोड़ रुपये दिये गये हैं। इससे 20लाख 69 हजार सैनिकों को लाभ पहुंचेगा। अगर यह सच है तो ग्रेवाल की खुदकुशी का क्या कारण हो सकता है। रामकिशन ग्रेवाल का पत्र जो इन दिनों सोशल मीडिया में वाइरल हुआ है उसमें लिखा है कि क्षेत्री सेना और सुरक्षा कोर में सेवाएं प्रदान करने के बाद भी उसे वन रैंक वन पेंशन का ला    भ तो मिल नहीं रहा है साथ ही ेंशन जो मिल रही है उसमें भी सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों का लाभ नहीं प्राप्त हो रहा है।

ग्रवाल की आत्महत्या की खबर सुनते ही राजनीतिक पार्टियों में इसे सरकार के खिलाफ भुनाने की होड़ मच गयी। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री रमेश सिसोदिया और कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ग्रेवाल के परिजनों से मिलने और सांत्वना देने के लिये राम मनोहर लोहिया अस्पताल चल पड़े। हालांकि इनका इरादा इस अवसर का राजनीतिक लाभ उठाना था। फौज की प्रशंसा में और उसके प्रति अपने दायित्व को लेकर महीने भर से ढोल पीट रहे मोदी सरकार को शर्मसार करन था। सेना ने नियंत्रण रेखा पर सर्जिकल हमला किया और इसकी घेषणा के तत्काल बाद से ही मोदी जी खुद और उनकी सरकार के अन्य नेता यहां तक कि भाजपाह के लीडरान भी लगे थे ताल ठोंकने। हर मंत्री या पार्टी का हर नेता इसका श्रेय लेना चाहता था। मोदी जी ने तो हिमाचल प्रदेश में एक सभा में अपने खास अंदाज में यहां तक कह दिया कि ‘आक्रमण के मामले में हमारी सेना इसरायली सेना के समतुल्य है।’ विपक्षी दलों ने सर्जिकल स्ट्राइक के की सफलता का जमकर विरोध नहीं किया। अरविंद केजरीवाल ने केवल इतना ही कहा कि ‘ हमले की हकीकत पर जो सवाल उठ रहे हैं मोदी जी उसका जवाब दें।’ राहुल गांधी ने तो इसे खून की दलाली की संज्ञा दी। दोनो पार्टियां इस मामले में सरकार के अभियान रथ के पहिये की हवा निकालने के लिये ब्याकुल थीं। वे अवसर की तलाश में थीं और ग्रवाल की आत्महत्या ने यह अवसर दे दिया। इसके बाद सरकार ने दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सोदिया ओर कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को मनोहर लोहिया अस्पताल जाने और ग्रवाल के परिजनों से मिलने से रोकने के लिये पुलिस बल का प्रयोग कर मामले को और जटिल बना दिया। जैसे ही उनके रोके जाने की खबर आयी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की। कांग्रेस ने मोदी के इस काम को अलोकतांत्रिक बताया। दूसरी तरफ पुलिस ने ग्रेवाल के परिवार वालों को यह कह कर रोक​ दिया तथा बाद में हिरासत में ले लिया कि वे राजनीतिक नेताओं से सम्पर्क कर रहे हैं। पुलिस की इस कार्रवाई ने मामला और बिगाड़ दिया। इसके विरोध में राजनीतिक दलों के कार्यकर्त्ताओं ने उस थाने का घेराव कर दिया जहां ग्रवाल के परिवार के गिरफ्तार लोग रखे गये थे। आत्महत्या की यह दुखद घटना आनन फानन में राजनीतिक हाथापाई में बदल गयी। सरकार का यह फैसला कि ग्रवाल के परिवार से मिलने जाने वाले राजनीतिक नेताओं को गिरफ्तार करने की सरकार की आत्ता ने विपक्ष को सरकार के खिलाफ एक हथियार दे दिया। 2011 में इसी तरह की गिरफ्तारियों ने लोकपाल आंदोलन की चिंगारी को आग के भड़कते बगूलों में बदल दिया था।क्या मोदी सरकार चाहती है कि फिर वैसा ही आंदोलन हो। 

Thursday, November 3, 2016

कश्मीरियों में बढ़ता अविश्वास


कश्मीरियों में बढ़ता अविश्वास

कश्मीर घाटी में हालात बेहद खराब हैं। खराब इसलिये नहीं कि वहां प्रदर्शन हो रहे हैं या पथराव हो रहे हैं या स्कूल वगैरह बंद हैं या नौजवानों की गिरफ्तारियां हो रहीं हैं। ऐसा तो पहले भी हुआ है, या यूं कहें कि कश्मीर में ऐसा अक्सर होता आया है।  इसबार कश्मीरी साइकी बेहद अवसाद ग्रस्त है ,  हालात इसीलिये खराब हैं। कश्मीरियों के जेहन में यह बात घर कर गयी है कि दुनिया में उनके लिये सोचने का वक्त किसी के पास नहीं है। दुनिया का ध्यान पश्चिम एशिया के इस्लामी विश्व की ओर है। वहां खतरा ज्यादा बढ़ गया है। सीरिया में अमरीका या रूस का मामूली गलत कदम व्यापक विपत्ति का कारण बन सकता है। इधर भारत का अमरीका से बढ़ता दोस्ताना और आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उसके विकास  के कारण दुनिया का हर देश चाहता है कि भारत हमारे साथ रहे। अतएव कोई भी उसे घरेलू झगड़े के लिये फटकारना नहीं चाहता है। उधर पाकिस्तान पूरी दुनिया में आतंकवाद के शरणस्थल के रूप में बदनाम हो चुका है अतएवगरत से जुड़े किसी भी ऐसे मामले में जहां पाकिस्तान की भूमिका दिखती है लोग उसी की तरफ उंगली उठा रहे हैं। हाल में उड़ी में पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद वादियों द्वारा उड़ी में हमले के बाद पाकिस्तान और कश्मीर को लेकदिनिया की निगाह में बचाखुचा जो भी था वह खत्म हो गया। भारत में कश्मीर के बारे में जब भी चर्चा होती है तो यही कहा जाता है कि वहां पाकिस्तान गड़बड़ी फैला रहा है और उदाहरण के लिये उड़ी हमले को सामने को सामने रख दिया जाता है। जब नरेंद्र मोदी सत्ता में आये तो कश्मीरियों के मन में आशा जगी कि वे कश्मीर के सम्बंध में अटल बिहारी वाजपेयी की दिशा में सोचेंगे। पर ऐसा हुआ नहीं। मोदी जी ने चाहे दुर्घटनावश हो या जानबूझ कर हो भारत को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये आकुल देश में बदल दिया। सब लोग उसी दिशा में सोचने लगे जिस दिशा में सरकार सोचने के लिये इशारा कर रही है। इस कारणवश कश्मीर एक राजनीतिक समस्या ना हो कर सुरक्षा के लिये समस्या बन गया। बचा खुचा जे कुछ भी था वह कश्मीर में भाजपा – पीडीपी की सरकार ने चौपट कर दिया। पीडीपी ने हिंदुत्व के आदर्श को लेकर भाजपा के शासन में शामिल होने को उचित बना दिया। अब स्थिति यह हुई कि भाजपा ने इसे हिंदू मुसलमतान समस्या के चश्मे से देखना शुरू कर दिया। लिहाजा वहां हिंदु बहुल जम्मू और मुस्लिम बहुल कश्मीर में रस्साकशी बढ़ गयी साथ ही हर बात के लिये यहां तक कि मामूली​ राजनीतिक झगड़े के लिये पाकिस्तान को दोषी बताने की प्रवृत्ति के कारण वहां कश्मीरियों में असंतोष बढ़ने लगा। दूसरी तरफ पाकिस्तान के प्रति भारत की समस्या और गहरी होती गयी और इस कारण देशवासियों के मन में यह बात आने लगी कि कश्मीर में कुछ भी हो सकता है और जो कुछ भी हो रहा है उसके लिये पाकिस्तान दोषी है। लोगों ने कश्मीरयों के असंतोष के बारे सोचना ही छोड़ दिया। नतीजा यह हुआ है कि विरोदा करने वाला हर कश्मीरी पाकिस्तान समर्थक दिखने लगा, भारत का दुश्मन दिखने लगा। अब ऐसी स्थिति में दुश्मन से चाहे गोली से निपटिये या पैलेट गन से या फिर अन्य तरीके से यह तो सेना या सुरक्षा बलों को तय करना था। मीडिया ने सरकार के इस संकुचित नजरिये को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। यहां संकुचित इसलिये कहा जा रहा है कि सरकार का नजरिया मामले का सही निदान नहीं कर पा रहा है। यही नहीं यह नजरिया सरकार के राजनीतिक हित को भी साध हा है। आजकल आप सोशल मीडिया देखें तो सरकार की आलोचना करने वाले हर आदमी से यही पूच जा रहा है कि ‘भारत समर्थक है या भारत विरोधी।’ कश्मीर और कश्मीर के लोगहों के बारे में यह जो सोच में बदलाव आया है वह चिंताजनक है। अब कश्मीरी यह सोचने लगे हैं कि भारत में कोई भी उनके लिये नहीं सोच रहा है। अब इस भावना के बढ़ने के फलस्वरूप उनका भारत के प्रति और ‘कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है’ वाले राजनीतिक जुमले के प्रति मोहभंग होने लगा है। अटल बिहारी वाजपेयी ने इसी श्रीनगर में नारा दिया था ‘इंसानियत और जम्हूरियत’ का और इसके बाद कई कदम उठाये थे उन्होंने जिससे विश्वास बढ़ने लगा था। आज स्थिति अचानक बदल गयी। सुरक्षा बलों का खौफ खत्म हो चुका है। सड़को पर खड़े हो कर वहां के बच्चे सुरक्षा बलों को ललकार रहे हैं कि आओ और हमें पैलेट गनों से अंधा कर दो। इस तरह ललकारने वाले वहां के बुर्जुग नहीं हैं, कश्मीर की किशोर पीढ़ी है। यह वह पीढ़ी है जिसके हाथ में कलम या लैपटॉप होना चाहिये था आज उनके हाथ में पत्थर है। भारत की जनता कहती है कि पत्थर से क्या होने वाला है? लेकिन उनका मानना है कि इस पत्थर बाजी ने कमसेकम पैलेट गन का सवाल संसद में उठा तो दिया। यहां ऐसे नेता दिख रहे हैं जो कश्मीरीयों से वार्ता करने के हामी हैं पर वार्ता की प्रक्रिया शुरू होती नहीं दिख रही है। इससे जो विलम्ब हो रहा है उसे लोग राजनीतिक स्वार्थ समझ रहे हैं। इससे अविश्वास बढ़ता जा रहा है समस्या गंभीर होती जा रही है। मोदी जी को इस दिशा में सोचना चाहिये। वे इतिहास गड़ने जा रहे हैं अगर उन्होंने कश्मीर की जनता में व्याप्त इस असंतोष का निराकरण कर देते हैं तो वे विश्व इतिहास में अमर हो जायेंगे।

Wednesday, November 2, 2016

मतभेद का लाभ

मतभेद का लाभ

उत्तरप्रदेश में चुनाव होने वाले हैं और सत्तारूढ़ दल में झगड़ा है कि  सुलझने का नाम नहीं ले रहा है/  किसी भी राजनीतिक संगठ की यह खूबी होती है कि अगर नेतृत्व का झगड़ा लम्बे समय तक चला तो खुद बखुद उसमें नेतृत्व और दिशा के लिए जगह बन जाती है/ नौजवान अखिलेश यादव 2012 में सत्ता में आये/ उनका आगमन इसलिए महत्त्वपूर्ण था कि उस समय राज्य में पार्टी की ऐसी छवि बन गयी थी मानो यह एक अकल्पनाशील और तरक्की में नाकामयाब एक बूढ़े के नेतृत्व वाली पार्टी है जिसकी लगाम परोक्ष रूप से गुंडों के हाथ में है/ इस छवि को भंग करने और पार्टी को लोकल पृष्ठपोषकों से मुक्त करना जरूरी था/ बदलते वक्त में परम्परागत वोट बैंक से आगे बढ़ने  के लिए यह सुधार ज़रूरी था/ अब यह ना दिखे कि पार्टी बूढ़े यादवों से नियंत्रित है इसलिए अखिलेश को सामने लाया गया/ उन्होंने कुछ बदलावों की शुरुवात की/ यह पार्टी के बुजुर्ग नेताओं को पसंद नहीं आयी/ खास कर शिवपाल यादव, रामगोपाल यादव और खुत मुलायाम सिंह यादव नहीं चाहते थे कि इनके पारंपरिक समर्थकों का आधार भंग हो और व्यावसायिक क्षेतों में जो पैठ है वह घटे/ समाजवादी पार्टी देश की क्षेत्रीय राजनीती में एक विचित्र संगठन है/ यह पार्टी कई गुटों में विभाजित है और सबमें विव्गाद चल रहे हैं/ इस विभाजित पार्टी में सबसे बड़ा गुट उसी परिवार का है जिसने इसे बनाया/ यह पार्टी एक परिवार की पार्टी है तथा टिकेट के बंटवारे, मंत्री पद के लिए नाम पर मुहर लगाने और अपने अपने दरबारियों को सार्वजानिक पद पट स्थापित करने के अधिकार के लिए परिवार में आपाधापी मची हुई है/ हल में जो मतभेद हुए उनके 4   प्रत्यक्ष तथा मुख्या  कारण हैं/  पहला , जब अखिलेश यादव को सी एम बनाया गया था तो यह सोचा गया था कि इनका कोई गुट नहीं होगा पर उन्होंने जल्दी ही परिवार के कुछ लोंगों को मिला कर अपने चों तरफ छोल्दारियाँ कड़ी कर दीं / यही नहीं उन्होंने चुनाव में उपयोग के लिए नौजवानों पूरी फौज बना ली/ ल्र्किन यह जमात स्थानीय सत्ता स्रोत अंग नहीं बन सका/ दूसरा कारण था कि अखिलेश यादव ने ऐसे समर्थकों कि एक बहुत बड़ी संख्या तैयार कर ली जो पहले पार्टी के साथ नहीं थे/ इससे परिवार में श्रम विभाजन को लेकर झगड़ा हो गया/ एक तरफ वो लोग खड़े हो गए जिनका कुनबे या अस्न्गाथान पर कंट्रोल था और एक तरफ अखिलेश जिनका पार्टी के समर्थकों पर  कब्ज़ा था/ सीसरा पहलू है इस मतभेद का कि झगड़ा क्षेत्रीय हो गया ताकि परिवार में एक दुसरे का प्रभाव क्षेत टकराए नहीं/ चौथा कि  पार्टी के चरम दो सतह के बीच भी टकराव शुरू हो गए/ अब इसके कारण पूरा ताना बाना अस्थिर हो गया/ सबसे बड़ा मतभेद तो यह था कि काम के बंटवारे की जो स्थापित परम्परा थी वह पार्टी में तो चल रही थी पर शाशन में अखिलेश ने नहीं चलने दी / अब पार्टी के नेता व्यापारियों का बचाव करते थे और शासन यह समझता था की वे प्रशाशनिक कार्यों में दखल दे रहे हैं और मुख्या मंत्री के काम में रोड़े अटका रहे हैं/ उधर अखिलेश केवल  वोट बटोरू हो कर नहीं रहना चाहते थे/ वे मानते थे कि मुलायम सिंग यादव का वारिस होने के लिए केवल वोट का जुगाड़ कर्मणा ज़रूरी नहीं है बल्कि वोट बैंक से बढ़कर राज्य की जनता की  उमीदों को पूरा करना भी ज़रूरी है/ इस झगडे का एक कारण यह भी है की शिवपाल सिंह यादव ने योग्यता, चुनाव नें टिकट बंटवारे में  ज्यादा अधिकार की मांग  स्थिति और बिगाड़ डी/ अभी जो मतभेद चल रहा है वह कई मामलों में अच्छा भी है/ हो सकता है निकट भविष्य में चुनाव में पराजय या कम सीट से इसकी कीमत चुकानी पड़े पर भविष्य में पार्टी में स्पष्ट नेतृत्व और दिशा के लिए अवसत मिलेगा/यू पी से बहार भी इसका असर पड़ेगा खास कर उन दलों पर जो व्यक्तित्व , जाती और वोट बैंक के आधार पर चल रहे हैं तथा सत्ता परिवर्तन फे सवाल उठ रहे हैं/

Tuesday, November 1, 2016

सेना के नैतिक बल में गिरावट का अंदेशा

सेना के नैतिक बल में भारी गिरावट का अंदेशा

एक तरफ सोशल मीडिया में जवानों को सलाम करने का अभियान चला हुआ है , कहा जा रहा है कि

“ ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आँख में भर लो पानी,

जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी ”

प्रधानमन्त्री जी दिवाली सैनिकों के साथ मना रहे हैं , चारों तरफ उनकी प्रशंशा में गीत गाये जा रहे हैं

 “ जब हम मना रहे थे दिवाली तो वे खेल रहे थे होली ,

 जब हम बैठे थे घरों में वे झेल रहे थे गोली ”  

सैनिकों के सम्मान में एक अभियान चला हुआ है/

रक्षा मंत्रालय में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर निहायत खुश नज़र आ रहे हैं/ वे हर जगह सर्जिकल हमले की तारीफ़ में पुल बांधते दिख रहे हैं/ उत्तरप्रदेश में चुनाव होने वाले हैं और ऐसा लगता है कि सर्जिकल हमले को चुनाव अभियान में शामिल कर लिया गया है/ लेकिन हकीकत तो यह है कि यह वर्ष सेना के लिए अत्यंत अवसादजनक रहा/ यह एक रैंक एक पेंशन के आन्दोलन से शुरू हुआ/ इस आन्दोलन में जो मांगें राखी गयीं थीं वे अभी तक पूरी तरह नहीं मानी गयी हैं/ उन्हें संतावें वेतन आयोग का लाभ भी नहीं मिल रहा है और अपंगता पेंशन में भी कटौती हो गयी/ अब साल के जाते- जाते सैनिकों के रैंक भी नीचे कर दिए गए/ 18 अक्टूबर को जारी एक आदेश में सेना के रैंक को घटा दिया गया है/ अब आप कैप्टेन रैंक के एक अफसर को ग्रेड बी के सरकारी कर्मचारी से कैसे तुलना कर सकते हैं/ आदेश में सेना के प्रिंसिपल दिरेक्टेर का पद जो ब्रिगेडीअर के समतुल्य था वह अब मेजर जनरल के बराबार दिया गया/ डाइरेक्टर रैंक जो पहले कर्नल रैंक के बराबर था उसे बाधा कर अब ब्रिगेडिअर के बराबर कर दिया गया/ ज्वाइंट डाइरेक्टर अब कर्नल के बराबर हो गाया जो पहले लेफ्टिनेंट कर्नल के समतुल्य था/ यानी, सेना के अफसरों की तुलना में सिविलियन अफसरों के पद बाधा दिए गए / हालाँकि 25 अक्टूबर को रक्षा मंत्री पर्रीकर ने एक प्रेस  कांफ्रेंस में कहा था कि सेना के रैंक को लेकर उनके अगर कोई असमानता होगी तो उसे हफ्ते भर ठीक कर लिया जाएगा/ हालाँकि इससे सेनाधिकरियाओं में बेहद असंतोष है और कई अफसर टॉप यह कहते सुने जा रहे हैं कि इससे सेना का नैतिक बल कम होगा/ कई अफसर तो यह कह रहे हैं कि अफसरशाही ने एक बार फिर उन्हें  नीचा दिखाया है/ अफसरशाही ने अक्सर ऐसा किया है/ ख़ास कर वेतन आयोग के लाभ को लेकर ऐसा हरदम होता आया है/ यह  इसी सरकार की बात नहीं है पहले भी ऐसा हुआ है/ आई ए एस अफसर बाजी मार लेते हैं और सेना की मांग पर कान तक नहीं दिया जाता/ यद्यपि फ़ौज की ओर से रक्षा मन्त्रालय में कोई बात नहीं कही गयी है/ लेकिन अफसरों के रैंक्स में इसे लेकर चर्चा है/ कहा जा रहा है कि इससे नए भारती होने वाले जवान हतोत्साहित हो जायेंगे और इससे आने वाले दिनों में सेना के मनोबल पर भी असर पड़ेगा/ सरकारी सूचना के अनुसार भारतीय सेना से हर दिन औसतन एक सैन्य अधिकारी नौकरी छोड़ रहा है/ यह पिछले तीन सालों  के दौरान तेजी से हुआ है/ नौकरी छोड़ने वालों में सबसे ज्यादा नौसेना के अफसर हैं/ हालांकि समय से पहले रिटारयमेंट (वीआरएस) लेने वाले अफसरों की संख्या में कमी आई है/ रक्षा मंत्री ने राज्य सभा में बताया कि सेना में11 हजार अफसरों की कमी है/ पर्रिकर ने बताया कि 2012 में564, 2013 में 448, 2014 में 319 और2015 में अब तक 97अफसरों ने वीआरएस ले चुके हैं/ रक्षा मंत्री ने लिखित जवाब में आर्मी में अफसरों के 9,642और अन्य रैंक्स के23,909 पद खाली बताए/ साथ ही नेवी में अफसरों के 1,179 और सेलर्स के 11,653 पद खाली हैं/ इसी तरह,एयर फोर्स में भी 6,664एयरमैन के पद पर नियुक्तियां की जानी हैं/ जानकारों का मानना है कि सेना में बेहतर मौकों की कमी के अलावा भी कुछ वजहों से अफसरों का सेना से मोह भंग हो रहा है/ कॉरपोरेट सेक्टर में उनके लिए कई बेहतर मौके होते हैं/ जहां तक 18 अक्टूबर वाले आदेश की बात है कुछ  अधिकारी तो यह उम्मीद कर रहे हैं कि वह  आदेश वापस ले लिया जाएगा/ उन्हें सरकार की सदाशयता पर भरोसा है/ लेकिन अधिकांश अधिकारी ऐसा नहीं मानते/ कुछ टिप्पणीकार तो यह कह रहे हैं कि सोशल मीडिया में जो उसके सेना का मुंह बंद करने की साजिश है लेकिन यह अतिश्योक्ति कही जायेगी/ हालांकि सरकार की ओर से इस आदेश का  कोई सपष्ट कारण नहीं बताया गया है/ रक्षा मंत्री ने जो हफ्ते भर का वक्त दिया था वह आज समाप्त हो जाएगा/ यदि फ़ौज के असंतोष का निराकरण नहीं हुआ तो आने वाले दिन कुछ दूसरा रंग  लायेंगे/ वैसे हमें सैनिकों की तरह सारकार की सदाशयता पर भरोसा रखना चाहिए/

भारत के लिये आई एस का नया अमीर

भारत के लिये आई एस का नया अमीर

सर्जिकल हमले के बदले के लिये कई संगठन एकजुट

लश्कर , जे एम बी और आई एस ने हाथ मिलाये

हरिराम पाण्डेय

कोलकाता :आई एस ने बंगाल हलके (भारत, बंगलादेश और म्यांमार) में आई एस की गतिविधयां तेज करने और ‘विधर्मियों’ को खत्म करने के लिये नये अमीर अबू इब्राहिम अल हनाफी को शपथ दिलायी है। सीरिया के बाहर यह पहला वाकया है। आई एस के इस नये अमीर के साथ बंगलादेश के जमायत-उल – मुजाहिदीन (जे एम बी)और पाकिस्तान का कुख्यात आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (एल इ टी) भी साथ है। बंगलादेश सरकार की कार्रवाई के कारण जे एम बी लगभग नेस्तनाबूद हो चुका है और वह नये ढंग से संगठित होने की कोशिश में है। इसका पूर्ववर्ती प्रमुख तमीम अहमद चौधरी मारा जा चुका है।  बंगलादेश की सुरक्षा एजेंसियों में ‘नियो जे एम बी’ के नाम से परिचित इस संगठन के प्रमुख की तलाश चल रही है। शक है कि हनाफी ही नियो या नव जे एम बी  का नया प्रमुख है। पिछले हफ्ते हनाफी ने आई एस के संगठन को मजबूत करने और लगभग हर बड़े शहर में स्लीपर सेल्स बनाने के लिये अपने कई नेताओं को भारत भेजा है। बंगलादेश के ‘काउंटर टेररिज्म एंड ट्रांस नेशनल क्राइम(सी टी टी सी)’ के एक बड़े अधिकारी ने सन्मार्ग को बताया , शक है कि सुहैल महफूज उर्फ हाथकटा महफूज, रिपोन, खालिद, बिग ब्रदर के नाम से कुख्यात जुनायद हसन खान, इकबाल , मानिक , मामून , अब्दुल क​बिराज और महिला नेता जेबुनहार शीला भारत पहुंच चुके  हैं।  यही नहीं सी टी टी सी को शक है कि जे एम बी के पुराने सरदार नुरुल इस्लाम मरजान, आई टी विशेषज्ञ बशरूज्जमां उर्फ अबुल बशर उर्फ चॉकलेट और ट्रेनर जहांगीर उर्फ राजीब गांधी भी भारत में पहले से हैं और नये दल से उनका सम्पर्क हो चुका है। वे बहुत तेजी से संगठन को फिर से खड़ा करने की कोशिश में हैं।

नयी रणनीति

इधर हनाफी ने बेहद खतरनाक रणनीति अपनायी​ है। उसका मानना है कि म्यांमार में बोद्धों और मुस्लिमों में चल रहे तनाव के कारण उसे वहां अपना आधार मजबूत करने में सहूलियत मिलेगी। साथ ही भारत में तीखी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और तेजी से बढ़ते साम्प्रदायिक असंतोष के कारण पैर जमाने में दिक्कत नहीं होगी। दूसरी तरफ बंगलादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार द्वारा यह कहा जाना कि वहां आई एस है ही नहीं और जे एम बी खत्म हो चुका है, इस क्षेत्र में एक नयी और खतरनाक स्थिति को जन्म दे रहा है। यही नहीं पाकिस्तानी आतंकी शिविरों पर भारत के सर्जिकल स्ट्राइक के बाद बदला लेने के लिये बेचैन लश्कर भी भारत में अपने अड्डों को आई एस से सहयोग करने को कहा है। आई एस का लक्ष्य है कि भारत और दक्षिण पूर्व एशिया में अपने संगठन का विस्तार करने के लिये बगलादेश को पुल के तौर पर इस्तेमाल करे। 

हमले के तौर तरीकों में बदलाव

केरल में आई एस के स्लीपर सेल का पर्दाफाश होने के बाद आई एस नहीं चाहता कि वह भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की निगाह में आ जाय। अत्यंत करीबी सूत्रों के इसके लिये उसने अपनी कार्यशैली में भारी परिवर्तन किया है। यह परिवर्तन ना केवल अत्यंत खतरनाक है बल्कि बेहद क्रूर भी है। अब बड़े विस्फोट या भारी गोलीबारी नहीं की जायेगी। अब इनका हथियार होगा चाकू और निशाने पर होगे स्कूल जाने या आने वाले छोटे छोटे अरक्षित बच्चे, स्कूल कॉलेज आती जाती लड़कियां, पार्कों में एकांत में बैठे प्रेमी जोड़े और सड़क पर फल सब्जी तथा अन्य सामान बेचने वाले। चाकू से किसी को मार डालने से ना कोई विस्फोट होगा ना गोलियों की आवाज सुनायी पड़ेगी और जब तक लोग संभलें तबतक हमलावर जा चुके होंगे। यही नहीं इसके लिये गोलियां या रायफलों या बमो-विस्फोटकों का बंदोबस्त और रख रखाव में सावधनी भी नहीं बरतनी होगी। साथ ही बड़े चाकू जहां सब जगह उपलब्ध हैं वहीं सस्ते हैं और घटना के बाद उन्हें निपटा देना सरल है। इससे पहचाने जाने या पकड़े जाने का खतरा घट जायेगा।

कार्रवाई का संभावित समय

खुफिया सूत्रों के मुताबिक इन दिनों सोशल मीडिया पर पवित्र कुरान शरीफ की एक आयत (9.5) चल रही है। जानकारों के मुताबिक इसमें पवित्र महीने के गुजर जाने के बाद मशरीकिंयों पर कार्रवाई का आहृवान है। इस वर्ष इस्लाम का पवित्र महीना अक्टूबर के अंत में खत्म हो रहा है। यहां यह बता देना जरूरी है कि मशरीकीं शब्द मशरीक से बना है और पवित्र कुरान में इसका उल्लेख उनके लिये है जो अल्लाह को नहीं मानते।  अब सच क्या है यह तो हनाफी ही बता सकता है वह छलावा बना हुआ है।