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Thursday, November 10, 2016

जीतना ट्रम्प का

जीतना ट्रम्प का
बहुचर्चित अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में डोनाल्ड ट्म्प  विजयी हुये। इनकी प्रबल विरोधी हिलेरी क्लिंटन पराजित हो गयीं।  डोनाल्ड ट्रम्प की विजय अमरीकी जनता और उनके समाज की चिंतनधारा पर एक सवाल खड़ा करता है। वाशिगटन पोस्ट ने लिखा है कि ‘उनकी विजय से अमरीकी समाज हतप्रभ है। ट्रम्प की विजय बताती है कि तंत्रों के उपयोग से सही दिशा में सोचने वालों को इच्छित दिशा की ओर मोड़ा जा सकता है। ’ ट्रम्प ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान अपने विोदियों की खिल्ली उड़ाने और सामान्य जन पर अपनेसिमर्थन का मुलममा चढ़ाने के लिये सोशल मीडिया के प्लेटफार्म का जमकर उपयोग किया। चुनाव परिणाम के​ि बाद उन्होंने ट्वीट किया ‘विस्मृत नर नारी अब विस्मृत नहीं रह पायेंगे और हम उन्हें भी अपने साथ लेकर पूरी ताकत से आगे चलेंगे। ’ वर्तमान राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने डोनाल्ड ट्रम्प को विजय पर बधाई और गुरुवार को यानी बीते कल उन्हे वाइट हाउस आने का आमंत्रण ​दिया। उधर ट्रम्प ने अपने विरोधियों को घोटाला संस्कृति की पैदाइश कहा और कहा कि इसी के कारण अमरीका के नागरिक हर मोड़ पर नकामयाब होना पड़ता है। ट्रमप के विजय का प्रभाव को जानने के बावजूद विश्व नेताओं ने उन्हें बधाई दी।  उनकी विजय के नतीजे घोषित किये जाने के बाद दुनिया भर के शेयर बाजार लुढ़क गये। अमरीका   की जनता बहुसंस्कृतिवाद और ग्लोबलाइजेशन के आाघत और इसपर मरहम लगाने में वाशिंगटन की नाकामयाबी  से वहां की जनता त्रस्त है और ऐसे में ट्रम्प का संकेत कि वह अमरीका को फिर से महान बना देंगे अमरीकी जनता को ढाढस बंधाता लग रहा है। उन्होंने वादा कियाह है कि हर अमरीकी को पूरी क्षमता प्रदर्शित करने का अवसर मिलेगा। ट्रम्प का काल क्षेत्रीय राजनीति को गंभीरता से प्रभावित करेगा। ट्रम्प के अमरीकी विदेश नीति को बदल देने का वादा किया है और कहा है कि यह और ज्यादा एकतरफा होगी। उन्होंने मै​क्सिको की सग पर दीवार बनाने और अवैध प्रवासियों को निकाल देने का भी वादा किया है। उन्होंने कहा है कि वे आइ एस को बम मार कर धूल में मिला देंगे और आतंकी गिरोहों के सफाये के लिये उनके पास एक गुप्त योजना भी है। उन्होंे ताकतवर मुल्कों की प्रशंसा की और घोषणा की  कि वे रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से प्रगाढ़ रिश्ता बनाएंगे। ट्रम्प की विजय से दुनिया भर में क्षोभ और अनिश्चयता व्याप्त हो गयी है। क्योंकि प्रवासियों को भगाने और अंतरराष्ट्रीय जोर आजमाइश उनके प्रचार का मुख्य विषय था। उन्होंने अपने विजय भाषण में अफगानिस्तान तथा ईरान में अमरीका की युद्ध के लिये उपस्थिति की आलोचना की और कहा कि बेशक हम हर मामले में पहले अमरीका का हित देखेंगे लेकिन दुनिया से अपने रिश्तों पर होने वाले असर को भी नजर अंदाज नहीं करेंगे। इसराइल को छोड़ कर दु​निया के किसी भी देश ने ट्रम्प की विजय पर खुल कर हर्ष जाहिर नहीं किया। सबकी प्रतिक्रियाएं थोड़ी नियंत्रित महसूस हो रहीं थीं। मध्यपूर्वी एशिया के देश तो अजीब विभ्रम की स्थिति में दिख रहे हैं। वे नहीं समझ पा रहे हैं कि कैसे अपनी प्रितिक्रिया जाहिर करें। भारत के लिये मुश्किलें खड़ी नजर आ रहीं हैं। एशिया पैसेफिक मेंअर्से से अमरीकी मौजूदगी एक तरह से भारतीय उपमहाद्वीप की सोच में शामिल हो गया था। अब अगर वह वहां से सेना हटाता है तो दीगर प्रश्न है कि उसके बाद वहां की सुरक्षा का क्या होगा। यही नहीं इनके पाद वहां के 15 लाख भारतीयों का भविष्य भी समस्या भी खड़ी होगी। यही नहीं अगर वे इन फैसलों में साथ आगे बढ़ते हैं तो और बड़ी सम्स्या खड़ी होगी। लेकिन अमरीकी मीडिया में चर्चा हैकि ट्रम्प  पाकिस्तान पर सख्ती कर सकते हैं। भारत में अपने बिजनेस को सिक्योर करने के लिए भी ट्रम्प पाक के खिलाफ सख्त हो सकते हैं। पाकिस्तान को अमरीका से मिल रही आर्थिक मदद में कटौती हो सकती है।यही नहीं अगर चीन से भी सख्ती हुई तो यकीनन दक्षिण एशियाई क्षेत्र में अशांति बढ़ जायेगी।

Wednesday, November 9, 2016

मोदी जी का आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक

मोदी जी का आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार की देर शाम अचानक देश के नाम एक संदेश प्रसारित कर देशवासियों को चौंका दिया कि आधीरात से 500 और 1000 के नोट चलन से बाहर हो जायेंगे। इस फैसले से देश में चार घंटे में 87 प्रतिशत करेंसी चलन से बाहर हो गयी। 15 लाख करोड़ के नोट बेकार हो गये। सरकार ने दो हजार के नोट आज से यानी 10 नवम्बर से बाजार में लाने की घोषणा की है। हालांकि यह व्यावहारिक नहीं लग रहा है। दो हजार के नोट पहली बार आ रहे हें। इसके पहले दस हजार के नोट थे जिन्हे 1978 में बंद कर दिया गया था। अभी 500 रुपए के 1650 करोड़ नोट चलन में हैं। यानी 8.25 लाख करोड़ रुपए। इसी तरह 1000 रुपए के 670 करोड़ नोट चलन में हैं। यानी 6.70 लाख करोड़ रुपए। पांच सौ के नोट अक्टूबर 1987 में चलन शुरू हुआ था। जबकि एक हजार रुपए का नोट नवंबर 2000 में वापस लौटा था। उस समय 

मुद्रास्फीति के कारण नोटों की संख्या को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया था। प्रधानमंत्री ने कहा, 'कालेधन और जाली नोट के कारोबार में लिप्त देशविरोधी और समाज विरोधी तत्वों के पास मौजूद 500 और 1000 के पुराने नोट अब केवल कागज के एक टुकड़े के समान रह जाएंगे। ऐसे नागरिक जो संपत्ति मेहनत और ईमानदारी से कमा रहे हैं, उनके हितों और हक़ की पूरी रक्षा की जाएगी। ध्यान रहे कि 100, 50, 20, 10, 5, 2 और 1 रुपए के नोट और सभी सिक्के नियमित हैं और लेनदेन के लिए उपयोग हो सकते हैं। उसपर कोई रोक नहीं है'। प्रधानमंत्री की घोषणा के मुताबिक बुधवार को बैंक बंद रहेंगे। 10 नवंबर तक देशभर के दो लाख से ज्यादा एटीएम काम नहीं करेंगे। मंगलवार रात राष्ट्र के नाम संदेश में मोदी ने आह्वान किया कि  हमने काले धन के चोरों के लिए दरवाजे बंद कर दिए हैं। देश अब शुचिता की दिवाली मनाए। दीपावली के बाद ईमानदारी के इस उत्सव में आप बढ़चढ़कर भाग लें। प्रधानमंत्री ने कहा कि  “देश का ईमानदार नागरिक असुविधा तो चुनेगा लेकिन भ्रष्टाचार नहीं। ये देश की सफाई का अभियान है। ताकि हर नागरिक गर्व के साथ यह काम कर सके। दुनिया को दिखा दें कि भारत का नागरिक कितना ईमानदार है। कार्ड और चेक से लेनदेन पर असर नहीं पड़ेगा।” प्रधानमंत्री ने कहा, 'देशवासी 500 और 1000 रुपए के पुराने नोट 10 नवंबर से लेकर 30 दिसबंर 2016 तक बैंक या डाकघर में जमा करवा सकते हैं। आपके पास लगभग 50 दिनों का समय है। नोट जमा करने के लिए अफरा-तफरी करने की कोई आवश्यकता नहीं है। 500 या 1000 हजार रुपए के नोटों को जमा करके अपनी जरूरत के अनुसार ले सकते हैं ।’ आरंभिक दिनों में खाते से धनराशि निकालने पर प्रतिदिन 1 हजार और प्रति सप्ताह 20 हज़ार की सीमा तय की गई है। ऐसा नए नोटों की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए किया गया है। तत्काल आवश्यकता के लिए 500 और 1000 के पुराने नोटों को नए और मान्य नोटों के साथ 10 नवंबर से 30 दिसंबर तक किसी भी बैंक प्रमुख और उप डाकघर के काउंटर से अपना पहचान पत्र आधार कार्ड, मतदाता, पैन कार्ड इत्यादि सबूत के रूप में पेश करके नोट बदल सकते हैं। 30 दिसंबर 2016 तककोई भी व्यक्ति  किसी कारणवश पुराने नोट अगर जमा नहीं कर पाए तो उन्हें बदलने का अंतिम अवसर 31 मार्च 2017 दिया जाएगा। ऐसे लोग रिजर्व बैंक के निर्धारित ऑफिस में अपनी राशि घोषणापत्र के साथ उस तिथि जमा करवा सकते हैं। आज भी यानी 10 नवंबर को एटीएम काम नहीं करेंगे। शुरू में एटीएम से प्रतिदिन और प्रतिकार्ड समयसीमा 2 हज़ार की होगी, फिर उसे बढ़ा दिया जाएगा। सरकार के इस फैसले से अर्थ व्यवस्था के कई क्षेत्रों में भारी प्रभाव पड़ सकता है। मसलन, निर्माण में और आभूषण बाजार में जहां नगदी लेन देन बड़े पैमाने पर होता है। यही नहीं शुरू के दिनों में रोजाना जरूरत के सामान , सड़कों पर खुदरा कारोबार करने वाले वेंडर , हॉकर इत्यादि भी प्रभावित होंगे। चर्चा है कि यह निर्णय बाबा रामदेव की मांग के दबाव में किया गया है क्योंकि वे पिछले साल से ही बड़े नोटों को निरस्त करने की मांग कर रहे थे। हालांकि यह भी खबर है कि पुणें की इंजीनियरों और चाटर्ड अकाउंटेंट्स की किसी संस्थ ने भी सरकार को बड़े नोट हटाने का प्रस्मताव दिया था। 

अगर प्रशासनिक पक्ष से देखें तो नोटों को रद्द किया जाना सरकार की प्रशासनिक दुर्बलताओं का परिणाम है। इसका दंड देशवासी भोगेंगे। विदेश से कालाधन वापस लाने के बड़े बड़े दावे कर के सत्ता में आयी सरकार अपने देश में जमा हो रहे कालेधन को भी रोक नहीं सकी। इसके अलावा जाली नोटों का कारोबार पर भी लगाम नहीं लगाया जा सका। जिन लोगों पर जाली नोट बनाने और देश में प्रवेश कराने का आरोप लग रहा है वे लोग दो हजार के नोट नहीं बनायेंगे तथा देश में नहीं लायेंगे इसकी क्या गारंटी है। 

Tuesday, November 8, 2016

हम अपने बच्चों को कैसा भविष्य दें

हम अपने बच्चों को कैसा भविष्य दें

पिछले हफ्ते यूनिसेफ के एक प्रतिवेदन  के हवाले से न्यूयार्क टाइम्स की एक रपट में कहा गया था कि दक्षिण एशिया में दो करोड़ 20 लाख बच्चे जहरीली हवा में सांस लेने के लिये अभिशप्त है। क्योंकि बच्चों के फेफड़े अभी विकास के दौर से गुजर रहे हैं इसलिये उनपर हवा के प्रदूषण का ज्यादा असर हो रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पी एम 2.5 के जो कण हैं वे मनुष्य के केश की माटाई से भी कम हैं और ये पेट्रोल डजिल के धुएं और बारीक धूलकण के मिश्रण से बनते हैं तथा सांस के जरिये ये जहरीले कण मनुष्य की शिराओं तथा धमनियों में पहुंच जाते हैं। इससे ह्रदयाघात से लेकर निमोनिया और दमा तक होता है। डब्लू एच आहे के अध्ययन के मुताबिक 2012 से 2015 के बीच वायु प्रदूषण से 70 लाख लोग मरे हैं जिनमें पांच साल से कम उम्र के 6 लाख बच्चे थे। यानी हर दसवीं मौत पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की थी। इस रपट के संदर्भ में भारत की स्थिति देखें तो भयावहता और बढ़ जाती है।  भारत में हर साल 6 लाख 20 हजार लोग वायु प्रदूषण से काल के गाल में समाजाते हैं।ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज, जिसे अमरीका स्थित हेल्थ इफेक्ट इंस्टीट्यूट ने तैयार किया है, में वायु प्रदूषण को दुनिया के शीर्ष दस हत्यारों की सूची में और दक्षिण एशिया में इसे छठा सबसे खतरनाक हत्यारा कहा गया है। देश के कई नगरों में दिवाली के बाद बिगड़ी वातावरण की स्थिति अब तक सही नहीं हुई है। आम तौर सर्दियों में हमारे देश में लोगों की कार्यक्षमता बढ़ जाती है पर इस वर्ष तो प्रदूषण के कारण हवा में कायम धुंध के कारण सबनकुछ धीमा सा हो गया है खास कर राजधानी दिल्ली सहित कई महानगरों में। दिल्ली में तो हालात इतने बिगड़ गये हैं कि स्कूल बंद करने पड़े हैं। राजधानी में इस के कई कारण एक साथ मिल गये हैं और सब्के मिल जाने से स्थिति अतयंत चिताजनक हो गयी है। इनमें दिवाली में इस्तेमाल किये गये पटाखे, वाहनों से निकलते धुएं, उत्तर भारत में फसल कटाई के बाद खेतों में बचे डंठल और भूसे को जला देने के कारण निकले धुएं तथा हवा की गति में धीमापन जैसे कई कारण हैं। हर राजनीतिक दल विकास की बात करते हैं लेकिन ऐसे विकास का करेंगे जो विनाश का कारण बने। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने वायु प्रदूषण को लेकर 91 देशों के 1600 शहरों पर डाटा आधारित अध्ययन रिपोर्ट जारी की है। सबसे ज्यादा चिंता हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों (पार्टिकुलेट मैटर अथवा पीएम) को लेकर जताई गई है। ये कण फेफड़ों को सीधा नुकसान पहुंचाते हैं। मनुष्य दिन भर में जो कुछ ग्रहण करता है उसका 80 प्रतिशत भाग वायु है। प्रतिदिन मनुष्य 22000 बार सांस लेता है। इस प्रकार प्रत्येक दिन में वह 16 किलोग्राम या 35 गैलन वायु ग्रहण करता है। वायु विभिन्न गैसों का मिश्रण है जिसमें नाइट्रोजन की मात्रा सर्वाधिक 78 प्रतिशत होती है जबकि ऑक्सीजन 21 प्रतिशत और कार्बन डाइ ऑक्साइड 0.03 प्रतिशत पाई जाती है। शेष 0.97 प्रतिशत में हाइड्रोजन, हीलियम, आर्गन, निऑन, क्रिप्टन, जेनान, ओजोन तथा जल वाष्प होती है। वायु में विभिन्न गैसों की उपरोक्त मात्रा उसे संतुलित बनाए रखती है। इसमें जरा-सा भी अंतर आने पर वायु असंतुलित हो जाती है और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित होती है। भारत में उद्योगीकरण के कारण यह प्रदूषण और बढ़ता जा रहा है। लेकिन प्रिंसटेन विश्वविद्यालय के पर्यावरण के प्रोफेसर रमनन लक्ष्मीनारायणन मुताबिक भारत में अगर थोड़ी सावधानी बरती जाय तो इसे नियंत्रित किया जा सकता है और अर्थ व्यवस्था को भी आघात नहीं पहुंचेगा। । प्रदूषण रोकने के लिए किसी भी सरकार ने गंभीर प्रयास नहीं किए। जो प्रयास किए गए वे नाकाफी साबित हुए और यह संकट बढ़ता ही गया। इसे रोकने के लिए अब ठोस प्रयासों की दरकार है। प्रो. लक्ष्मीनारायणन के अनुसार ऐसे उद्योग लगायें जाएं जिससे प्रदूषण कम हो। जैसे दवा के कारखाने। अब हमें सोचना होगा कि हम अपना अस्तितव बनाये रखने के लिये क्या करें और अपने बच्चों को कैसा भविष्य दें

Monday, November 7, 2016

ये आपातकाल नहीं है?

ये आपातकाल नहीं है
पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रामनाथ गोयनका पुरस्कार समारोह में कहा था कि ‘देश के हर नागरिक को आपातकाल को याद रखना चाहिये ताकि भविष्य की कोई सरकार ऐसा पाप करने का साहस ना जुटा सके।’ सचमुच आपातकाल ने नागरिक स्वतंत्रता और लोकतंत्र का  जो विनाश किया उसे कम करके नहीं आंका जाना चाहिये। लेकिन यह सब कुछ सबको दिख रहा था। लेकिन आज बहुत लोग यह कहते सुने जा रहे हैं कि हम आोषित आपातकाल की ओर बढ़ रहे हैं जो उतना विनाशक है और दूरगामी है जितना 1975 वाली इमरजेंसी हुआ करती थी। असली आपातकाल तो है जांे दिखे नहीं कि हम आपातकाल में रह रहे हैं।  यकीनन जो लोग हमारी इस सरकार या हमारे नेता पर आपातस्थिति जैसे हालात बनाने के आरोप लगा रहे हैं वे सही नहीं हैं। आप कहेंगे कि ‘नेता’ का इगो या उसकी आत्मकामिका या उसका अहंकार  उससे या उसके कद से बड़ा हो गया है। यह कोई आपातस्थिति को खींचे थोड़े ही ला रहा है। भाई साहब, नेता कभी गलत कर ही नहीं सकता। लेकिन शासकीय अधिकार धीरे धीर बढ़ते जा रहे हैं ओर अब रोजमर्रा के काम में भी दखल देने लगे हैं। विरोधी दलों द्वारा शासित रज्यों की व्यवस्था और शासकीय अधिकारों को सही ढंग से संचालित नहीं होने दिया जा रहा है। अब दिल्ली में ही देखें कि एक मुख्यमंत्री को अपना विरोध जाहिर करने से रोक दिया गया। हालांकि यह पाबंदी अल्पावधि की थी पर इससे जाहिर तो हो ही गया कि शासन की मंशा क्या है और वह क्या करना चाहती है। पर संभवत: इसे इमरजेंसी नहीं कहा जा सकतना है। प्रतिपक्ष यू ही बवाल कर रहा है न? विपक्ष की सियासत राष्ट्र के लिये खतरनाक हो सकती है और सियासत का हक केवल सत्तारूढ़ दल को ही है न ! सभी प्रकार के चिंतन पर राष्ट्रवाद का डंडा चल पड़ता है। सामूहिक अहंकार व्यक्तिकता को दबोच रहा है। हर तरह के विरोध को राष्ट्रवाद के चश्मे से देखा जा रहा है और उसी आधार पर किये गो निर्णय के आलोक में विरोध का गला घोंट दिया जा रहा है। आपने यदि सरकार का विरोध किया तो यही सवाल उछाला जाता है कि आप देश के साथ हैं या उसके विरोध में हैं।  यकीनन इसे आपातस्थिति नहीं कहा जा सकता है पर जरूरत है इस हालात पर सोचने की। जिग्नेश मेवानी या हार्दिक पटेल की भांति सामाजिक मसलों पर जो लोग विरोश्ध प्रदर्शित करते हैं उन्हें रोक दिया जाता है यहां तक हिरासत में ले लिया जाता है। सामाजिक मसलों पर विरोध जाहिर करने से रोका जाना  आपातकाल तो नहीं कहा जा सकता है। यह तो शासन का समयसिद्ध हथकंडा अपनाना ण्मिडिया को आतंकित कर अपने पक्ष में लाना कई बार सेंसरशिप  से ज्यादा विनाशक हो जाता है। क्योंकि ऐसे हथकंडों के जरिये सेंसरशिप के बगैर ही  मीडिया को​ सरकार के विरोध में बोलने या लिखने से रोका जा सकता है। यह ज्यादा खतरनाक है पर इमरजेंसी नहीं है क्योंकि मीडिया ने खुद ही सरकार का विरोध नहीं करने की राह चुनी है।  भ्रष्टाचार का विरोध करने का जो सिविल सोसाइटी का तरीका है उसे निष्क्रिय कर दिया गया है तथा निगाह से ओझल कर दिया गया है। कितनाअंगेज है कि व्यापम से अब तक के सारे घेटाले आम जनता के विमर्श से गायब कर दिये गये हैं। सभी तरह के घोटालों और लफ्फाजियों को नादानी या मासूमियत का कपटरूप देकर नजरों से ओझल कर दिया गया है। शिक्षा संस्थानों जो छात्र या शिक्षक मुक्त विचार जाहिर करते हैं उन संस्थानों की शामत आ जाती है। सरकार अपने टहलुओं को नियुक्त करती है पर उन संस्थानों की मुश्के कसने के लिये वहां दोयम दर्जे के शिक्षकों की नियुक्ति के इस बढ़ते रिवाज को क्या कहेंगे आप ? कहा जा सकता है कि ‘सही सोचवालों’ को यह जगह दी गयी है। सरकार बड़ी तेजी से एक ऐसा वातावरण तैयार कर रही है जिसमें अदालत के आदेश के बगैर ‘मौत की सजा’ देने का रिवाज और हौसला बढ़ता जा रहा है। यह इमरजेंसी नहीं है जनाब जबकि हम स्थयी युद्दा के पक्ष बने हुये हैं ओर आतंकवादी तथा सभ्य शासन का फर्क इतना कम होता जा रहा है जिसे आसानी से नहीं समझा जा सकता है। गौ रक्षा के नाम पर मारकाट चल रही है जबकि प्रधानमंत्री ने इसे गुंडागर्दी कहा है लेकिन उन्हीं के मंत्री इनकी मदद कर रहे हैं। लेकिन यह भी इमरजेंसी नहीं है क्योंकि गौ माता के नाम पर अपराध को आप कैसे इमरजेंसी से तुलना कर सकते हैं। सरकार न्यायपालिका को नकेल लगाने की कोशिश कर रही है क्योंकि अरसे से देखा जा रहा है कि न्यायपालिका खुद ही कानून बनती जा रही है। जबकि उसका काम कानून के आधार पर निर्णय करने का है। यह एक सामान्य सरकार है। बस फौज का सियासत के लिये बढ़ता उपयोग और सोशल मीडिया में सैन्य प्रतीकों की बढ़ के माध्यम से समाज के विचारों को कुंठित करने का प्रयास इमरजेंसी कैसे हो सकता है?  पाकिस्तान को सबक सिखा देने की बात के परदे में हर चाल को छिव्पाने के प्रयास को आप क्या कहेंगे, यहां तक कि सफलता का दावा बढ़ाचढ़ा कर करने को आप क्या कहेंगे। सश्कल घरेलू उत्पाद के आंकड़े प्रभावशाली हैं पर यदि आप उन आंकड़ों की हकीकत पर उंगली नहीं उठा सके तो इस आजादी का अर्थ क्या होगा ? प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में जो कहा उन शब्दों का उद्देश्य देखिये ना कि उनके मीन मेख निकालिये। 

Sunday, November 6, 2016

सामाजिक विपर्यय के संकेत

सामाजिक विपर्यय के संकेत

आपने आस पास बहुतों को मिलने जुलने पर नमस्कार या प्रणाम की जगह राम राम कहते सुना होगा। कई जगह लोग राम राम की जगह सीता राम भी कहते सुने जाते होंगे। तीन सदी या उससे कुछ पहले से  रामनवमी या दशहरे के दिन या किसी धार्मिक उत्सव में एक नारा चलता था जै सियाराम। यानी राम पर सीता की विजय। यह भारत में नारी शक्ति का उद्घोष था। देश के लोकजीवन में लैंगिक समानता का प्रतीक था। भगवान राम की पहचान सीता से होती थी किसी दूसरे से नहीं। नारों का जबसे राजनीतिकरण आरंभ हुआ तो यह बदलने लगा। सीताराम या जै सियाराम बदल कर जय श्रीराम हो गया। भारतीय  समाज और भारतीय लोकजीवन की आस्था के प्रतीक राम का उपयोग युद्ध घोष के रूप में होने लगा। बाबरी ढांचा गिराये जाने के समय यह संघ परिवार और फिर हिंदूवाद का नारा बन ग्या। जय श्रीराम यानी राम की विजय। यह नारा या इस शब्द का बिम्ब  मर्यादा पुरुषोत्तम के शब्दिक बिम्ब या जैसियाराम से नहीं मिलता अथवा उनकी पर्याय बन पा रहा है। मर्यादा पुरूशोत्तम यानी मर्यादा या नियमों को मानने वाले और कहां आंदोलन तथा नियम कानून भंग करने का आह्वान करता नारा ‘जय श्रीराम।’ आडवाणी जी ने अयोध्या आंदोलन के समय स्पष्ट भी किया था कि‘ विचार मंदिर बनाना नहीं है विचार है इस माध्यम से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रचार।’ हिंदुत्ववादी जनता द्वारा इस नारे के स्वरों के आरोह अवरोह से तो अब तक यह स्पष्ट हो ही गया था कि हिंदू सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रचार की हवा बह रही है। अब दशहरे दिन मोदी जी का दिल्ली के राम लीला मैदान में ना रह कर लखनऊ में उपस्थित रहना और जय श्रीराम के उदघोष के साथ अपना भाषण शुरू करना इस बात का संकेत हे कि राम नहीं अयोध्या के 16वीं सदी के उस ढांचे को लेकर कोई नया आंदोलन शुरू होने वाला है। इसके दो ही चार दिन के बाद केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा द्वारा अपनी अयोध्या यात्रा के दौरान घोषणा करनी  कि अयोध्या में विवादास्पद स्थल पर एक संग्रहालय बनाया जायेगा साथ ही उनका यह कथन कि उन्हें राम के लिये कुछ करने का अवसर मिल रहा है यह उनका सौभाग्य है एक नयी दिशा की ओर संकेत कर रहा है। इससे कोई हैरत नहीं भी हुई क्योंकि साल भर पहले भी सरकार ने संग्रहालय बनाने की घेषणा की थी। लगभग चार महीने पहले उसने इसके लिये धन की भी मंजूरी दे दी है। इसका अर्थ है कि भाजपा यू पी चुनाव की प्रतीक्षा कर रही थी।  अबसे लगभग डेढ़ माह पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी अयोध्या गये थे और उन्होंने भी कहा था कि 1989 से अब्पातक कुछ नहं बदला। उल्लेखनीय है कि 1989 में राहुल के पिता राजीव गांधी अपना चुनाव अभियान यहीं से शरू किया था और उनका बंटाधार हो गया। राहुल के बारे में अच्छी संभावना नहीं दिखती है। इसके बाद अयोध्या में विवादास्पद ढांचे को ध्वस्त किये जाने की अनेक प्रतीकों में से एक ‘राम-शरद कोठारी ’ की धरती कोलकाता में  दिवाली के एक दिन पहले जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती द्वारा यह घोषणा कि वहां और ठीक उसी स्थल पर मंदिर के अलावा कुछ भी नही स्वीकार्य है, जल्दी ही एक नये राजनीतिक आंदोलन का संकेत दे रहा है। यही नहीं, ठीक हफ्ते भर पहले गत सोमवार को उभर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने घेषणा की कि अयोध्या में रलिला के थीम पर एक पार्क बनाया जायेगा ताकि पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। राज्य सरकार ने इस प्रष्ताव को आनन फानन में मंजूरी भी दे दी। मायावती को छोड़ कर सभी ने मंदिर के बरे में कुछ ना कुछ कहा है। भाजपा सांसद विनय कटियार ने म्यूजियम की घोषणा को ‘लॉलीपाप’ बताया है। संघ ने कहा है कि मंदिर तो बनना चाहिये पर सहमति से और कानूनी सममति से। इससे साफ संकेत मिलता है कि आने वाले दिनों में ‘मंदिर राजनीति’ का जोर होगा और सामाजिक विपर्यय बढ़ेगा, सामाजिक खतरा बढ़ेगा।