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Monday, March 6, 2017

जी हां,कठोर परिश्रम ज़रूरी है पर

जी हां , कठोर परिश्रम जरूरी है पर …

 बेशक कुछ खास मौकों के कुछ खास जगहों पर अलग अलग मायने होते हैं। उत्तर प्रदेश में एक चुनाव सभा में भाषण का अर्थ दूसरा होता है और केरल में विश्वविद्यालय में भाषण का अलग अर्थ होता है। बीते एक मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में एक चुनाव सभा में नोटबंदी के विरोधी अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन पर तंज करते हुये कहा कि ‘हार्वड से हार्ड वर्क’ कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। इस क्रम में प्रधगनमंत्री जी ने हार्वड को बौद्धिक जीवन का बिम्ब बना दिया जो कठोर श्रम का विरोधी है। वे इस क्रम में किसानों की मेहनत को एक वस्तु के रूप में ढाल रहे थे , जी हां ठोस जिनस के स्वरूप में ओर उसे उदाहरण का मेटाफोर बना रहे थे। वे यह अभिव्यकत करना चाहते थे कि विश्वविद्यालय चाहे जो हों फकत किताबी ज्ञान देते हैं जो कि कठोर हकीकतों से दूर होते हैं। उन्होंने इस क्रम में यह बताया कि नोटबंदी का फायदा किसान समझते हैं जबकि हावर्ड के पड़े लोग इसे नहीं महसूस कर रहे हैं।

 

आंख पर पट्टी रहे अक्ल पर ताला रहे

अपने शाहे वक्त का यूं मर्तबा आला रहे

 

प्रधानमंत्री का यह ‘प्रवचन’ रामजस कॉलेज में गुंडागर्दी के कुछ ही दिन बाद हुआ। ऐसा लगता है कि अपने भाषण से वे उच्च शिक्षा पर प्रहार करना चाह रहे हों। प्रधानमंत्री के भाषण के ठीक दूसरे दिन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कोच्चिं में के एस राजमणि व्याख्यान देते हुये जो कहा वह प्रधानमंत्री के भाषण का विरोध करता हुआ सा दिख रहा है। राष्ट्रपति ने कहा कि ‘विश्वविद्यालय में मुक्तचिंतन की अनुगूंज होनी चाहिये। भारत में असहिष्णुता का कोई स्थान नहीं है।’ यहां यह महत्वपूर्ण है कि प्रधानमंत्री के भाषण की आलोचना जो सेन समर्थकों ने देश भर में, खासकर बंगाल में , शुरू की उसे राष्ट्रपति , जो सेन की तरह बंगाल के ही मूल निवासी हैं, ने भी जारी रखा। अब सवाल है कि क्या सचमुच राष्ट्रपति , जो खुद कॉलेज शिक्षक रह चुके हैं, प्रधानमंत्री के हार्वड वाली टिप्पणी का विरोध कर रहे थे? अगर बारीकी से देखें तो यकीनन वे विरोध कर रहे थे। राजनीति से अलग भी अगर देखें तो अमर्त्य सेन पर प्रदामेंत्री टिपपणी सही नहीं कही जायेगी , क्योकि नोबेल पुरस्कार के अलावा अमर्त्य सेन को भारत रत्न और विश्वभारती विश्वविद्यालय का सर्वोच्च सम्मान ‘देशिकोत्तम’ भी उन्हें प्राप्त है। दिलचस्प यह है कि प्रधानमंत्री ही विश्वभारती के कुलाधिपति हैं। यहां यह बताने की जरूरत नहीं है कि विज्ञान और समाज शास्त्र में उच्च शिक्षा तथा अनुसंधान ओर उसकी प्रयुक्ति के लिये कितना कठोर परिश्रम करना होता है। इसमें बहुत ज्यादा बौद्धिक ओर शारीरिकऊर्जा की जरूरत होती है। अब शिक्षा और बौद्धिकता की खिल्ली उड़ाने का मतलब है कि विकास, जीवन यापन की गीणवत्ता और विश्व के प्रतिचेतना का अनदेखी किया जाना। खासकर एक ऐसे व्यक्ति का जिसने देश और व्यापक तौर पर कहें कि सकल मानवता के विकास के लिये जो किया है वह वोट लोलुप और स्वार्थी सियासत कभी नहीं कर सकती थी।

 

खुद को जख्मी कर रहे हैं गैर के धोखे में लोग

इस शहर को रोशनी के बांकपन तक ले चलो

 

यही नहीं राट्रपति ने कोच्चि में कुछ और भी कहा जो प्रशंसनीय है। एक तरफ गुरमेहर कौर की जुबान बंद करने कोशिशें की जा रहीं हैं ओर वहीं दूसरी तरफ केरल में, जहां महिला शिक्षादर भारत में सर्वाधिक 92 प्रतिशत है,राष्ट्रपति द्वारा यह कहा जाना कि ‘महिलाओं की सुरक्षा हमारी राष्ट्रव्यापी प्राथमिकता होनी चाहिये। किसी भी समाज की परख उस की महिलाओं और बच्चों के प्रति प्रवृति से होती है। भारत को इसमें नाकाम नहीं होना चाहिये।’ क्या उनका यह कथन गुरमेहर कौर और बेला भाटिया की ओर इशारा नहीं करता। इन दोनों को अपने साहस पूर्ण बौद्धिक के कारण कठिनाइयें का सामना करना पड़ रहा है। इनके अलावा बहुत सी महिलाएं हैं जो सामाजिक कारणों का शिकार हो रहीं हैं।

 

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले

हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है

 

कल महिला दिवस है। उस दिन यही नेता अपने भाषणों में लक्ष्मी बाई , जीनत महल, प्रीतिलता वाडेदर, कल्पना जोशी, अमृत कौर, लक्ष्मी सहगल इत्यादि महिलाओं के नाम पर तालियां बजवायेंगे। इसमें यदि किसी ने उन आंकड़ों की तरफ इशारा किया कि आखिर क्यों 70 प्रतिशत महिलाएं अपने काम काज में यौन शोषण का शिकार होती हैं और असकी शिकायत नहीं कर पातीं तो सवाल पूछने वाले की दुर्गति निश्चित है। इस डर से जागते सवालों को नींद की गोलियां खिलायीं जा रहीं है।

अब इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात

अब किसी बात पर खुलती नहीं खिड़कियां    

Sunday, March 5, 2017

जो आप तो लड़ता नहीं ...

जो आप तो लड़ता नहीं …

एक नवयुवती की जबान इसलिये बंद करने की कोशिश की जा रही​ है कि उसने युद्ध को आपसी नफरत का नतीजा बताया और कहा कि यह यानी आपसी नफरत अगर ना हो तो जंग ना हो। विख्यात दार्शनिक बट्रेंड रसल ने कहा है कि ‘युद्ध विखंडतावादी राजनीति की देन है। राजनीतिज्ञ दंश के लोगों को बांट कर उनमें नफरत फैला कर लाभ उठाते हैं। हम लड़ते इसलिये हैं कि हम भीतर से लड़ रहे हैं। भीतर से टूट रहे हैं।’ हमने कभी कोशिश नहीं की घृणा और सदभाव के मध्य खड़े होकर देखें कि दरअसल यह क्या है?

सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत || |
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् |
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ||

हमें तो हांका जाता है कि लड़ो और मरो। जवानी की दहलीज पर खड़ी उस लड़की गुरमेहर ने यही तो कहा था कि हमारे पिता को दुश्मनों ने नहीं युद्ध ने मारा अगर युद्ध नहीं होता तो वे अबी जीवित होते। लेकि युद्दा होते हैं और इसके खिलाफ बोले जाने वालों को बहुत कुछ सहना होता है।

जो आप तो लड़ता नहीं,
कटवा किशोरों को मगर,
आश्वस्त होकर सोचता,
शोणित बहा, लेकिन, गयी बच लाज सारे देश की?

आज हमारे देश में दो बातें हो रहीं हैं पहली कि बेवजह बात को बतंगड़ बनाया जा रहा है और दूसरी कि उस बतंगड़ को लेकर चर्चा होने लग रही है। उस चर्चा के बाद तनाव का वातावरण बन जा रहा है। हर बात को देश की लज्जा विषय से जोड़ दिया जा रहा है। कोई नहीं जानता कि यह लज्जा क्या है?

ईश जानें, देश का लज्जा विषय
तत्त्व है कोई कि केवल आवरण
उस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि का
जो कि जलती आ रही चिरकाल से
स्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणी
नायकों के पेट में जठराग्नि-सी।

विख्यात इतिहासकार चार्ल्स टिली ने लिखा है कि ‘हमारे नेता और राजनीतिज्ञ बाहरी हमले का स्वांग तैयार करते रहते हैं ओर कई बार तो खुद ही इसकी पटकथा लिख देते र्हैं। ’ यहां कहने का मतलब यह नहीं है कि हमें शासन को अमान्य करना चाहिये या फौज को समाप्त कर देना चाहिये। जरूरी है कि सरकारों द्वारा की जा रही कथित सुरक्षा व्यवस्थाओं की आम जनता द्वारा भी समीक्षा की जानी चाहिये। न कि जिज्ञासा जाहिर करने या सरकार पर उंगली उठाने के लिये हमें दंडित किया जाय। सरकारें अक्सर युद्ध का इस्तेमाल करतीं हैं चाहे वह लड़े जाएं या नहीं। बाज मौकों पर वह इसका उपयोग हमारे ध्यान को विचलित करने के लिये करतीं हैं तो कभी राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिये।  बेशक युद्ध में शहीद हो गये फौजियों का सम्मान किया जाना चाहिये पर उनको इतना गौरवान्वित नहीं किया जाना चाहिये कि वह जंग लड़ने का बहाना बन जाय और हम शांति खोजने या शत्रुता समाप्त करने के उपायों पर विचार ही ना करें।

जंग में शहीद होने वालों को इतना ज्यादा गौरवान्वित किये जाने के पीछे सरकारों की चाल यह हुआ करती है कि अमन के उपाय खोजने की मुश्किलों का सामना ना करना पड़े।

 

और तब सम्मान से जाते गिने

नाम उनके, देश-मुख की लालिमा

है बची जिनके लुटे सिन्दूर से;

देश की इज्जत बचाने के लिए

या चढा जिनने दिये निज लाल हैं।

 

युद्ध में शहीद हो जाने पर उन शहीदों को गौरवान्वित करने से बेहतर है कि युद्ध रोके जाएं क्योंकि उन जवानों की जान भी उतनी ही कीमती है जितनी एक राजनीतिज्ञ की। लेकिन हो उल्टा रहा है। फौज की आंतरिक व्यवस्था पर अंगली उठाने वाले तेज बहादुर का शव मिलता है और एक शहीद कैप्टेन की बेटी को मानसिक तौर प्रताड़ित किया जाता है। इनके बीच कितना कुछ अजाना पड़ा है यह भगवान ही जानें।

वह कौन रोता है वहां-
इतिहास के अध्याय पर,
जिसमें लिखा है, नौजवानों के लहू का मोल है
प्रत्यय किसी बूढे, कुटिल नीतिज्ञ के व्यावहार का;
जिसका हृदय उतना मलिन जितना कि शीर्ष वलक्ष है
 

 

सरकारें आमतौर पर जंग की आग भड़का देना आसान समझतीं हैं। एक तरफ तो हमारे नेता मैत्री का दिखावा करते हैं, झगड़े सुलझाने का ढोंग रचने हैं। इसका सबसे ताजा उदाहरण है कि जब मोदी नवाज शरीफ के जनम दिन पर अचानक जा पहुंचे। इसे प्रचारित किया गया सद्भाव बड़ाने की कोशिश के रूप में , लेकिन जब एक लड़की पुद्ध को मिटाने की बात करती है तो मोदी जी की ही पार्टी के नेता उसे प्रदूषित दिमाग वाले बताते हैं। कैसी विडम्बना है यह।

हर युद्ध के पहले द्विधा लड़ती उबलते क्रोध से,
हर युद्ध के पहले मनुज है सोचता, क्या शस्त्र ही-
उपचार एक अमोघ है
अन्याय का, अपकर्ष का, विष का गरलमय द्रोह का!

Friday, March 3, 2017

कैसा देश चाहते हैं ये

कैसा देश चाहते हैं ये

 इनदिनों भारतीय सेना के एक शहीद कैप्टेन की बेटी गुरमेहर कौर का मामला सोशल मीडिया में छाया हुआ है। उसे लगातार धमकियां दी जा रहीं हैं यहां तक कि उससे कुकर्म तक करने की दामकी दी गयी है। गुरमहर का दोष इतना ही था कि उसने कहा था कि उसके पिता को पाकिसतानियों ने नहीं मारा बल्कि ‘वे दो देशों में नफरत के कारण पैदा हुई जंग में मारे गये। ’ इसके बाद  रामजस कॉलेज में हुई घटना के बाद उसने सोशल मीडिया पर एक मफ्ती लिये हुए फोटो डाली कि ‘मैं ए बी वी पी से नहीं डरती।’ यह तो मालूम ही होगा कि ए बी वी पी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का छात्र संगठन है। इस लड़की का यह रुख संघी बंदाओं को खल गया और असे दामकियां मिलने लगीं। अबसे पहले कभी छात्र राजनीति का इतना पतन नहीं देखा गया है। गुरमेहर ने घोषणा की कि वह ‘डी यू बचाओ अभियान से बाहर आ रही है।’ विश्वविद्यालय परिसर में विद्यार्थी परिषद की हिंसा के बब में यह अभियान शुरू किया गया था। जिस देश में ‘बेटी बचाओ’ के नारे लगते हों उस देश में गुरमेहर की घोषणा बेहद मायनेखेज है। हम अपनी इक बेटी को बोलने का मुक्त वातावरण नहीं दे पा रहे हैं, जीने का वातावरण तांे दूर है। गुरमेहर कौर ने सोशल मीडिया पर चार मिनट का एक मूक वीडियो डाला था , जिसमें तख्तियों के जरिये हिंदू मुस्लिम एकता की बात कही गयी थी। जब बलात्कार की धमकी सोशल मीडिया पर आयी तो सरकार के कान खड़े हुये। वह चेतने लगी कि सेना के शहीद कैप्टेन की बेटी का मामला है अगर तूल पकड़ा तो समस्या हो जायेगी। गृह राज्य मंत्री किरन रिजिजू ने ट्वीट किया ‘एक नौजवान लड़की के दिमाग को कौन प्रदूषित कर रहा है।’ विदथीं परिषद के पूर्व नेता और अरुण जेटली ने भाजपा के छात्र संगठन का विरोध करने वालों को अलगावादी कह। भाजपा के इक सांसद प्रताप सिनहा ने गुरमेहर की तुलना अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद इब्राहिम से कर डाली। दूरसंचार मंत्री रविशंकर ने कहा गुरमेहर के बारे में सोशल मीडिया में जो कहा गया है वह सही नहीं है पर उनहोंने साथ ही यह भी कह दिया कि रिजिजू ने कुछ गलत नहीं कहा है। बाद में रिजिजू ने अपने बयान का स्ब्पष्टीकरण देकर मामला और गर्म कर दिया। उनहोंने कहा कि वे केवल ‘‘वामपंथियों के विरोध में बोल रहे थे जो 1962 के भारत चीन युद्ध में भारत की पराजय पर खुशियां मनाते थे और राष्ट्रविरोदा नारे लगाते थे।’’ जो भी ये मंत्री- नेता कहने की कोशिश कर रहे थे उससे स्पष्ट हो रहा है कि विद्यार्थी परिषद का विरोध करने वालों को निशाना बना रहे थे और सबको राष्ट्र विरोधी बता रहे थे। पिछले साल जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जो हुआ उस समय भी कुछ ऐसा ही कहा जा रहा था। इसपर कोई कुछ नहीं कह रहा है कि रामजस कॉलेज में विद्यार्थी परिषद वालों ने छात्रों के अलावा शिक्षकों को भी पीटा। यह तो उसी तरह का राष्ट्रवाद है जिसने रोहित वेमुला को खुकुशी करने पर मजबूर कर दिया। हमारे नेताओं और सरकार ने कभी यह सोचा है कि विश्वविद्यालय परिसर में जो कुछ भी वे कर रहे हैं वह विश्वविद्यालय की शिक्षा को कैसा बना देगा? बंगाल में लम्बे मार्क्सवादी शासन में कलकत्ता विश्वविद्यालय को इसी तरह के आंदोलनों ने कैसा बना दिया यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। तब भी हमारे मंत्री सबक नहीं ले पा रहे हैं। वे यह नहीं सोच रहे हैं कि किस तरह कह देश वे गढ़ रहे हैं जहां खुली अभिव्यक्ति पर पाबंदी लग रही है। हर विरोधी गतिविधि को राष्ट्रविरोधी बताना तथा उनपर हमला करने वालों को पुलिस की मदद से हिफाजत देना एक तरह से विरोध को मारना है। दिल्ली महिला आयोग ने पु​लिस को कहा है कि गुरमेहर कौर से कुकर्म की जिन लोगों ने धमकियां दी हैं उनपर प्राथमिकी दर्ज की जाय। गृहमंत्री ने बी कार्रवाई का निर्देश दिया है पर पुलिस ने अभी तक कुछ नहीं किया। मंत्रियों की प्रतिक्रियाओं ने संघी तत्वों को और प्रोत्साहित किया जा रहा है और अब तो गुरमेहर के तार राजनीतिक दलों से जोड़े जा रहे हैं। अगर यह सच है तो इससे क्या होता है? क्यों एक पार्टी के साथ जुड़ना सही है और दूसरी के साथ जुड़ना गलत? गुरमेहर के पिता की शहदत पर भी फब्तियां कसीं जा रहीं हैं। यह पूछा जा रहा है कि क्या वे कारगिल में मारे गये थे या कुपवाड़ा मे? इससे कुछ होने वाला नहीं है सिवा इसके कि गुरमेहर और असकी मां को भयानक भावनात्मक आघात के। इस राह पर चलने से ज्यादा अच्छा होता कि सरकार कॉलेज कैम्पसेज का वातावरण स्वस्थ करने की कोशिश करे जहां मुक्त अभिव्यक्ति की आजादी हो। जो लोग कैम्पसेज में गुंडा गर्दी करते हैं उन्हे पकड़ा जाना चाहिये तथा गुरमेहर जैसी छात्राओं को हत्या तथा कुकर्म की धमकी देने वालों की पड़ताल कर उन्हें सजा दी जानी चाहिये। दुर्भाग्यवश यह सब नहीं हो पा रहा है। समझ में नहीं आता कैसा भारत चाहते हैं ये लोग?

Thursday, March 2, 2017

कैसी चालाकी है यह

कैसी चालाकी है यह

 
अमीरी दिन भर भटकती है सोने की दूकानों में

गरीबी कान छिदवाती है तिनका डाल लेती है

 गरीबी को बिंदास बताने की हमारे देश में कई को​शिशें हुई साहित्य में ,दर्शन में और समाज में पर सच तो यह है कि गरीबी का दर्द बुरी तरह सालता है। दुनिया में जितने सामाजिक परिवर्तन हुये उसमें गरीबी की बहुत बड़ी भूमिका रही है ओर इंसानियत के अपमानित होने की जितनी घटनाई हुईं हैं उनके मूल में अमीरी की भूमिकाएं देखी गयीं हैं। एक दिन अमीरी के आंकड़ों पर बातचीत के दौरान जनसंचार की एक छात्रा एकता ने सवाल उठाया कि आखिर इतनी दौलत का लोग करते क्या हैं? वह कोलकाता के अरबपतियों के जवन शैली पर काम करना चाहती थी। इस प्रश्न का आधा भाग ‘इतनी दौलत’ काबिले बहस है। ऑक्सफेम के आंकड़ों के मुताबिक भारत के एक प्रतिशत अमीरों के पास देश की 58 प्रतिशत दौलत है। दुनिया के आट सबसे अमीर लोग दुनिया की आदा दौलत के स्वामी हैं। भारत की आबादी लगभग 130 करोड़ हो गयी है ओर इसकी अर्थव्यवस्था तीन खरब डालर की है। एक वक्त था जब दुनिया को यह बताया गया था कि दौलत का असमान बटवारा एक तरह से संगठित लूट है। इसका नतीजा यह हुआ कि अमीरों तथा गरीबों में अक्सर झगड़ा चलता रहता था। दौलत को जमा किये जाने का आधुनिक इतिहास यूरोप में व्यावसायिक पूंजीवाद से शुरू हुआ ओर श्रमिकों के शोषण के बल पर शीर्ष पर पहुंच गया। कम्युनिज्म और सोशलिज्म शोषण ओर पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष की देन है। इसका परिणाम यह हुआ कि सरकारों ने धन पर कब्जा कर लिया ओर उसके पुविर्भाजन की कोशिशें शुरू हुईं। 1917 में बोल्शेविक क्रांति हुई। लेनिन, स्टालिन और ट्राटस्की उसके नेता थे। यह क्रांति उसी अमीर गरीबी के बड़े फर्क के कारण हुई थी। यह दुनिया की सबसे खूनी क्रांतियों में से एक थी। दौलत अमीरों से छान ली गयी। इसके फलस्वरूप दुनिया भर में कम्युनिज्म का विकास हुआ। इसके बाद अमरीका के नेतृम्त्व में कम्युनिज्म के विरुद्ध शुरु हुआ। मैदान में अमरीका और सोवियत संघ थे। इसे शीतयुद्ध का नाम दिया गया। आरंभिक चरण में सोवियत संघ का पलड़ा भारी था। क्योंकि कई देशों ने कम्युनिज्म की शासन शैली को स्वीकारा था। इसी के कारण कल्याणकारी राष्ट्र के सिद्धांत का सूत्रपात हुआ। संविधान के मुताबिक भारत भी एक कल्याणकारी राष्ट्र है। श्रमिकों और गरीबों ने राहत महसूस की क्योंकि यह समानता के सिद्धांत पर आधारित था। लगभग पांच दशक यह सब चला और 1991 में सोवियमत संघ के पतन के बाद इसका भी पतन शुरू हो गया। पूंजीवाद पर भरोसा बढ़ने लगा। पूंजीवाद ज्यादा ताकत के साथ फैलने लगा और दौलत का असमान विभाजन फिर शुरू हो गया। इसबार यह दलील दी गयी कि यह दोलत कठोर मेहनत और मेदा से कमायी गयी दौलत है। नतीजा यह हुआ कि इक अमीर आदमी होशियार और स्मार्ट कहा जाने लगा। भयानक फिजूलखर्ची इसी स्मार्ट होने के गर्व से बढ़ी। असमानता और अन्याय केवल गैरकानूनी कामकाज का परिणाम नहीं है यह चालाक और धूर्त लोगों द्वारा कानूनी तरीके अपनाये जाने के कारण भी हुआ। अगर आप तार्किकऔर वैज्ञानिक नजरिये से देखें तब भी यह मानना होगा कि इतनी बड़ी दौलत एक जीवन में नहीं जमा हो सकती। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि एक आदमी के दिमाग का आयतन 1600 घन सेंटीमीटर है तथा आम आदमी महज उसके 8 प्रतिशत का उपयोग करता हे जबकि जीनियस उसके 12 प्रतिशत भाग का इस्तेमाल करता है। अब प्रश्न यह है कि ये सबसे अमीर एक प्रतिशत लोग इस तरह का दिमाग कैसे पाते हैं और इस तरह की क्षमता वे कैसे हासिल करते हैं। यह क्षमता बाकी 99 प्रतिशत लोगों को क्यों नहीं हासिल होती है। अगर दौलत का रिश्ता दिमाग की क्षमता से है तब भी असमानता के सतर को वैज्ञानिक तौर पर साबित नहीं किया जा सकता है। एक दलील यह भी दी जाती है कठोर परिश्रम ओर मेधावी योजना के फलस्वरूप यह सब हुआ है। समाज का अमीर वर्ग बहरहाल लोगों को अपने कठोर परिश्र और अत्यंग मेधावी योजनाओं के बारे में विश्वास दिलाने में कामयाब रहा है पर यह सही नहीं है। वक्त की बात है जिस दिन यह रहस्य टूटेगा अस दिन हालात बदलेंगे और क्रांतियां शुरू हो जायेंगी। इसका प्रमाण केवल इस बात से मिल सकता है कि नोटबंदी के दौरान कोई उत्पात नहीं हुआ क्योंकि गरीबों को सरकार ने यह भरोसा दिलाया था कि कालाधन खत्म हो जायेगा और इस तरह के दौलत वाले सड़कों पर आ जायेंगे। वह एक सियासी चाल थी पर यह सदा कायम नहीं रहेगा ना सफल होगा।   

Wednesday, March 1, 2017

शिक्षा क्षेत्रे, युद्धक्षेत्रे

शिक्षाक्षेत्रे ,युद्धक्षेत्रे

 हमारे लोकतंत्र के अगुआ हमारे नौजवान छात्र आज विश्वविद्यालयों में युद्धरत हैं। वे लोग जो मानते हैं कि विश्वविदलय नये विचारों को जन्म देते हैं , उन्हें संवारते हैं और उन्हें बहस तथा चर्चाओं के माध्यम से अभिव्यक्त करने का अवसर देते हैं। साथ ही, हुकूमत- ए- वक्त के आदर्शों से असहमत विचार राष्ट्रविरोधी नहीं होते वे छात्र इस बात के लिये भी समर्थन में खड़े होते हैं। उका परम उद्देश्य होता हैं कि अभिव्यक्ति का गला न दबाया जाय। पर दिल्ली के रामजस काहॅलेज में जो हुआ उसके पीछे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का हाथ था और छात्रों का यह संगठन सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की छात्र इकाई है। कॉलेज में ‘कल्चर ऑफ प्रोटेस्ट’ (विरोध की संस्कृति) विषय पर सेमिनार चल रहा था। इस सेमिनार में जलवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से डाक्टरेट कर रहा एक छात्र उमर खालिद वक्ता के रूप में आमंत्रित था। इस सेमिनार के दौरान विद्धार्थी परिषद से जुड़े छात्रों ने जमकर शोर शराबा किया। दूसरे दिन इस शोर शराबे के विरोध में प्रदर्शन था। अचानक विद्यार्थी परिषद से जुड़े छात्रों ने प्रदर्शन करने वालों पर हमला कर दिया। पत्थर ओर बोतलों का उपयोग किया। शिक्षक तथा मीडिया कर्मी भी घायल हो गये। दिल्ली पुलिस की एक बड़ी टुकड़ी वहां मौजूद थी​ पर उन्होंने उपद्रवियों को रोकने का प्रयास नहीं किया। यही नहीं पुलिस ने विद्यार्थी परिषद के छात्रों के विरुद्ध प्राथमिकी तक नहीं दायर की और प्राथमिकी दायर करने की मांग को लेकर मॉरिस नगर थाने के सामने एकत्र छात्रों को तितर बितर करने के लिये लाठियां चलाईं।यह अगर छात्रों के दो गुटों में मारपीट का मसला होता तो कोई बड़ी बात नहीं थी। लेकिन यहस्पष्ट तौर पर सत्तारूढ़ दल के आदशौं के ग्लिप बहस और उसके ऐसे एजेंडे का विराध करने वालों की आवाज बंद करने का यह प्रयास था और यही चिंता का विषय है। यह संघ परिवार की अर्से से चल रही रणनीति है कि बौद्धिक विमर्श को विकृत कर दिया जाय और सत्ता की सहायता से उच्च शिक्षा संस्थानों पर जबरन कब्जा कर लिया जाय। इसी तरह एक घटना जय नारायण व्यास विश्वविद्धालय जोधपीरमें हुई। वहां एक सेमिनार में जे एन यू के एक प्रोफेसर निवेदिता मेनन ने कश्मीर पर सरकार विरोदा टिप्पणी की थी. वहां के रजिस्ट्रार ने निवेदिता के खिलाफ थाने में एफ आई आर करा दिया। यही नहीं उस सेमिनार की आयोजक राजश्री राणावत को सस्पेंड कर दिया गय। वे उस विश्वविद्यालय में अंग्रेजी पड़ाती थीं। इसी तरह हरियाणा के केंद्रीय विश्वविद्यालय में महाश्वेता देवी के नाटक ‘द्रौपदी’ के मंचन के लिये दो शिक्षकों को कठोर सजा देने की मांग की गयी थी। अस नाटक में सेना को महान नहीं दिखाया गया था। हैदराबाद विश्वविद्यालय  और ज एन यू के परिसर से गत एक साल से युद्धक्षेत्र बने हुये हैं। ये सारी घटनाएं स्पष्ट बतातीं हैं कि नरेंद्र मोदी जबसे प्रधानमंत्री बने तबसे वे देश के सभी शिक्षा संस्थानों को एक ‘आदर्श’ के अनुरूप ढालना चाहते हैं। इस उद्दश्य की पूर्ति के लिये तरह तरह के उपाय किये जा रहे हैं। इन उपायों में संस्थानों के प्रमुखों की नियंक्ति से लेकर परिसरों में विरोधी स्वरों को दबा देने के उपाय तक शामिल हैं। शिक्षकों और छात्रों को नियमित तौर पर धमकियां मिल रहीं हैं या उन्हें निलंबित किया जा रहा है। विश्वविद्यालयों में ऐसे कुलपतियों की नियुक्ति हो रही है जो संघ और विद्यार्थी परिषद की ताल पर नाचें। भाजपा शासित राज्यों के मंत्रियों द्वारा परिसरों की विचार गोष्ठियों को देश प्रेम और देश विरोधी खेमे में बांट देने की लगातार कोशिशें विद्याथीं परिषद को शक्ति प्रदान कर रही है तथा उसके बल पर वे मारपीट कर रहे हैं। मुक्त विचार और सत्ता के विरोदा विचारों की अभिव्यक्ति का साहस चुकता जा रहा है। इसका दो तरफा असर पड़ रहा है। वैचारिक कट्टरता का यह मनोभाव केवल भाजपा या संघ तक ही सीमित नहीं रह पा रहा है। अभी हाल में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्त संघ ने परिसर में अपने कार्यकर्ताओं की बैठक को रद्द कर दिया और इतना ही नहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संगठन की इक कार्यकर्ता साहेला मसूद पर प्राथमिकी दर्ज करायी है कि उन्होने फेसबुक पर हजरत मोहम्मद का अपमान किया है। ये घटनाएं देश के नौजवानों में बढ़ रही वैचारिक संकीर्णता का उदाहरण है। विश्वविद्यालय एक ऐसी जगह है जहां विभिन्न विचारों और आदर्शों पर बहस हो सकती है , नये विचार बन सकते हैं और जो स्थापित है उसे चुनौती दी जा सकती है। इससे लोकतंत्त ताकतवर बनता है। लेकिन जब सत्ता के संगठन का एक निकाय या कहें अंग इस अभिव्यक्ति दबाने के लिये प्रवृत होता है तो लोकतांत्रिक विचार विनिमय को खतरा पैदा हो जाता है जो अंतत: लोकतंत्र को हानि पहुंचाता है।