CLICK HERE FOR BLOGGER TEMPLATES AND MYSPACE LAYOUTS »

Wednesday, April 5, 2017

शेख हसीना की भारत यात्रा

शेख हसीना की भारत यात्रा 
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद काल से तीन दिवसीय भारत यात्रा पर आ रहीं  हैं। इस यात्रा के अबसे पहले भी दो बार कार्यक्रम बन चुके थे पर भारत सरकार की घरेलू उलझनों के कारण सफर मुअत्तल कर दिया गया था । उम्मीद की जाती है कि इस यात्रा से द्वी पक्षीय संबंध और सुधरेंगे। दोनों देशों कैद लोगों और सरकारों में बढ़ते संबंध का दक्षिण एशिया के देशों पर प्रशंसात्मक प्रभाव पड़ा है । सबसे बड़ी खूबी है कि इस रिश्ते में कहीं भी तू तो- मैं मैं नहीं है उल्टे दोनों के बीच ऐसे द्विपक्षीय संबंध हैं जो अपने लोगों के हितों के मामले में दूसरे देशों के लिए अनुकरणीय है। यह आश्चर्यजनक नहीं है कि बंगला देश के प्रधान मंत्री को राष्ट्रपति भवन में ठहरने किए लिए आमंत्रित किया गया है।राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने केवल शेख हसीना के मित्र हैं बल्कि दोनों के परिवारों में भी मित्रता है। ढक में भारत के राजदूत हर्ष वर्धन श्रृंगला ने  ढाका में मीडिया को यह सही बताया है कि " भारत प्रधानमंत्री हसीना की यात्रा को बहुत महत्व दे रहा है।" इस एक वाक्य में ही राजदूत ने भारत की भावना को अभिव्यक्त कर दिया। दोनों देशों के बीच कई मसले थे जिन्हें झाल के वर्षों में सुलझा लिया गया। शेख हसीना के नेतृत्व वाली आवामी लीग सरकार उन मामलों को सुलझाने में बहुत कारगर कारक बनी। 1974 का इंदिरा - मुजीब भूमि सीमा संझुता पिछले साल संसद द्वारा पारित किया गया।यदि 15 अगस्त 1975 को शेख मुजीब की हत्या नही हो गई होती तो इस समझौते में इतना वक्त नहीं लगता। तबसे बंगला देश की स्वतंत्रता को खत्म करने की कई कोशिशें हुई जो आज भी क़याम हैं। भारत के साथ समुद्री सीमा विवाद शेख हसीना ने सुलझाया। बहुपक्षीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिए निर्मित बे ऑफ बेंगाल इनिशिएटिव भी प्रगति पर है पर उसकी गति बहुत धीमी है।इस इनिशिएटिव में 7 क्षेत्रीय समूह शामिल हैं जिसमें भारत का अवदान ज्यादा है। इस इनिशिएटिव के मसाएल हैं इस में शामिल सदस्यों की समान चुनौतियों का मुकाबला, पारंपरिक और गैर पारंपरिक सुरक्षा की चुनौतियां एवं आर्थिक विकास। बंगला देश में बिजली का घोर अभाव है और वह भारत से बिजली खरीद रहा है। साथ ही भारत बंगला देश में विद्युत परियोजनाएं बनाने में मदद कर रहा है।लेकिन कुछ लोग हैं जो रामफल परियोजना को अवरूद्ध कर रहे हैं। उनका मानना है कि इसके बन जाने से सुंदर बन के पर्यावरण को खतरा है। यही नहीं बंगला देश नेपाल और भूटान से भी बिजली खरीद रहा है और भारत नै अपनी जमीन से ट्रांसमिशन लाइन ले जाने की छोटी दे रखी है। अगर इन सब प्रोजेक्ट्स को एक साथ मिला दिया जाय तो बंगला देश के विकास को काफी प्रोत्साहन मिलेगा।इसके अलावा दोनों देशों के बीच और भी कई परियोजनाएं चल रहीं हैं , जैसे बंगला देशी छात्रों के उच्च एवं तकनीकी  शिक्षा के लिए  छात्रवृत्ति , काम व्याज दर पर ऋण और दोनों देशों में सीमा के आर पार व्यापार वृद्धि के अवसर।इनके अलावा कई ऐसी भी सहूलियतें हैं जो दिखती नहीं हैं जैसे बंगला देशियों की चिकित्सा सुविधा खास कर कोलकाता में।यह सच है कि जितनी पूंजी चीन लगा सकता है पर यह भी सच है कि भारत जो कर रहा वह भी कम नहीं है। यहां विस्का यह अर्थ नही समाझ्ने चहिए कि चीन - बंगलादेश सहयोग का भारत विरोधी है।मूल समस्या है वहां बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्ट्री द्वारा लगातार भारत के खिलाफ फैलाई जा रही नफरत। हर कदम पर अवरोध से बांग्लादेश की जनता का कल्याण नहीं होने वाला।बेशक तीस्ता जल समझौते पर हस्ताक्षर मैं विलंब दुखद है। सब कुछ तैयार है बस हस्ताक्षर रुका पड़ा है।  शेख हसीना की इस यात्रा के दौरान भी हस्ताक्षर सम्भव नहीं लगता बशर्ते कोई चमत्कार ना हो जाये। भारत को यह अच्छी तरही मालूम है कि बांग्लादेश की कृषि नदी आधारित है और तीस्ता जल संझुता भी नहीं होनेवाला। ऐसे में बी एन पी इसे असफल यात्रा कह कर प्रचारित करेगी। उसे इस बात से कोई मतलब नहीं है कि भारत एक फ़ेडरल लोकतंत्र है और ऐसे में केंद्र राज्यों को नजर अंदाज कर के नहीं चल सकता। समस्त संबंध केवल एक मसले पर नहीं तौले जा सकते हैं। जिस समझौते से बी एन पी को पीड़ा हो रही है वह है द्वी पक्षीय सुरक्षा समझौता। बी एन पी के महा सचिव रहल कबीर रिजवी ने तो यहां तक कह दिया कि ' सुरक्षा समझौता बांग्लादेश की जनता से गद्दारी है और इसासे बांग्ला देश की संप्रभुता को खतरा है, जनता को यह समझौता नहीं होने देना चाहिए। "  दर है कि बी एन पी इस मसले को लेकर सड़कों पर ना उतर  आये। अब रिजवी से कोई पूछे कि किसने उसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों की शिक्षा दी है। 2002 में रिजवी की ही पार्टी की प्रधान मंत्री बेगम खालिदा जिया ने चीन से रक्षा समझौता किया था तब कहां था उनका विरोध?  आज बंगला देश के पास  चीनी हथियार और साजो सामान है। क्या चीन ने बांग्लादेश की संप्रभहुता को कम किया जो भारत ऐसे समझौते के बाद काम कर देगा? रिजवी साहब को याद करना चाहिए कि 1971 में भारतीय सेना ने बांग्लादेश की कितनी मदद की थी।उस समय भारत पर अमरीका परमाणु हमले की तैयारी में था तब भी भारत ने जोखिम लिया और काम खत्म होने के बाद भारत की फौज वहां एक दिन भी नहीं रुकी।यहां यह बता देना ज़रूरी है कि प्रस्तावित सुरक्षा समझौता बाध्यतामूलक नहीं है और ना ही कोई गठबंधन है। इसमें दोनों पक्षों की संप्रभुता बनी रहेगी।  शेख साहिबा की इस यात्रा को लेकर बी एन पी  चुप चुप ही है पर इसका अर्थ नहीं समाझना  चाहिए कि  वह चुप बैठा है। वह अवसर की प्रतीक्षा में है।उसकी ताकत इस्लामी छात्र शिबिर और अन्य आतंकी गिरोह हैं। बांग्लादेश में चुनाव होने वाले हैं और जमाते इस्लामी  बी एन पी की शक्ति का केंद्र है। भारत उसका प्रथम शत्रु है। जमात ने इतिहास को विकृत कर दिया है, खास कर वहां के मुक्ति युद्ध में भारत की भूमिका वाले भाग को। बी एन पी और जमात ने मिल कर बंगला देश में हिन्दू विरोधी वतावरण तैयार कर दिया है। उन्होंने शेख साहिबा की हत्या के कई प्रयास किये। बंगला देश में अगले दो वर्ष भारी उथल पुथल कर होंगे। भारत की मज़बूरी है कि चाहे जो सरकार आये इसे उसके साथ काम करना होगा।  इसलिए इसे गंभीर कूटनीतिक तैयारी करनी होगी। शेख साहिबा की यात्रा इस तैयारी को बल दे सकती है।

Tuesday, April 4, 2017

71 बरस से हर कदम पर साथ

71 बरस से हर कदम पर साथ 
आज राम नवमी है , हमारे शास्त्रों के मुताबिक भगवान श्री राम का जन्मदिन। संयोग कुछ ऐसा ही कि इसी दिन सन्मार्ग ने सबके सुख दुख में साथ चलने का वादा कर कोलकाता की वीथियों में आपके दरवाजे पर दस्तक देना आरम्भ किया। वादा था कि सूचना के आधुनिक तिलिस्म के मायावी धुंध को परंपरा के ज्ञान और आलोक से हटाकर उसका सही और स्वस्थ स्वरूप प्रस्तुत किया जाय।  71 वर्ष पूर्व की उस रामनवमी से आज तक हमारी यही कोशिश रही कि वर्तमान के सोपान पर खड़े होकर हम अतीत और भविष्य की जीवंत धड़कन को समाहित करें। आज हम सूचना के गहरे धुंध की भयावहता से गुजर रहे हैं। हमसे अक्सर पूछा जाता है कि आज के ही दिन हमारे पूर्वजों ने " सन्मार्ग " का शंख क्यों फूंका? क्यों सन्मार्ग पर चलने की शपथ ली उन्होंने? असल में हम अपने अतीत के  फैसलों को अपने समय में निपटाते हैं। हमारे पूर्वजों का जो भविष्य रहा होगा वह आज हमारा वर्तमान है। उन्होंने अपने भविष्य के बारे में जो सपने देखे होंगे हम आज उनके भोक्ता हैं या उनके शिकार हैं , हम  उन्हें स्वीकार करते हैं या उनसे जूझते हैं। सही आत्म मंथन सदा अतीत में लिए गए फैसलों के आस पास ही होता है। त्रेता का एक प्रश्न था राम का जन्म क्यों हुआ था और अबसे 71 साल पहले का सवाल है कि सन्मार्ग का आविर्भाव आज के ही दिन क्यों हुआ? त्रेता के उस सवाल का उत्तर द्वापर में मिला " परित्राणाय च साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम। "  उसी प्रवाह में अगर आप आज की स्थिति का मूल्यांकन करें तो लगेगा कि हम एक भयावह संकट के दौर से गुजर रहे हैं जिसमें हमारी परंपरा पर प्रश्न उठ रहे हैं।उस परंपरा की रक्षा ही " परित्राणाय च साधूनां " है। आज सबसे ज्यादा आघात हमारी परंपरा और हमारी भारतीयता पर है। एक प्रश्न उठता है कि हम कौन हैं। इस प्रश्न की निरंतरता त्रेता से ही कायम थी और इसका भी उत्तर द्वापर में ही मिला जब कृष्ण ने अर्जुन से कहा, ‘पवन: पवतामस्मि राम: शस्त्रभृतामहम् झषाणां मकरश्चास्मि स्त्रोतसामस्मि जाह्न्वी।’ आज हजारों वर्ष बाद वैसी ही संकट की घड़ी आ खड़ी है जब हमसे पूछा जा रहा है कि हम कौन है, परंपरा का अस्तित्व क्यों है और सन्मार्ग इस परंपरा को कायम रखने में क्यों जुटा है? ऐसी संकट की घड़ी में  अपनी परंपरा का मूल्यांकन करना एक तरह से खुद अपना मूल्यांकन करना है।अपनी अस्मिता की जड़ों को खोजना है। हम कौन हैं यह एक दार्शनिक प्रश्न ना रहकर खुद अपनी नियति से मुठभेड़ करने का एक तात्कालिक प्रश्न बन जाता है । यहीं परंपरा अपने भीतर की निरंतरता का बोध बन जाती है। वह अपनी तात्कालिकता में शाश्वत है इसलिए इतिहास से संत्रस्त ना होकर स्वयं हर ऐतिहासिक घटना का मूल्यांकन करने का साहस और सामर्थ्य रखती है। हम उसकी सम्पूर्णता में सम्पूर्ण हैं। सन्मार्ग की स्थापना के उद्देश्य को समझने के लिए हमे संस्कृति के प्रश्न पर पुनर्विचार करना होगा।हम संस्कृति को उन बिम्बों , प्रतीकों और मिथकों से अलग कर के नहीं देख सकते जो हमारे जीवन के साथ अंतरंग रूप से जुड़े हैं। इसी जुड़ाव से उद्भूत होते हैं सन्मार्ग के मिथक और बिम्ब। ये बिम्ब और मिथक एक अदृश्य कसौटी हैं। इस कसौटी से हम धर्म- अधर्म, नैतिकता- अनैतिकता के बीच भेद करते हैं। यह जानना बहुत दिलचस्प होगा कि मिथक और बिम्ब कैसे सन्मार्ग के अर्थ को खोलते हैं और उसके उद्देश्यों की व्याख्या करते हैं। सन्मार्ग का आप्त वाक्य है " नमोस्तु रामाय सलक्ष्मनाय......."  और इसमें एक वर्जना है " सन्मार्ग एव सर्वत्र पूज्यते ....." संधान के अधिकार और क्षमता के दुरुपयोग पर अंकुश। यानी फल की पवित्रता के लिए साधन की शुचिता आवश्यक है। यह स्वयं में एक दर्शन सृजित करता है। एक ऐसा दर्शन जिसकी जड़ें व्यक्तिगत अनुभवों में निहित हैं।यह अनुभव कुछ ऐसा ही है जैसा कि देह। सोचिए कि यह कितना दिलचस्प सह संबंध है कि " देह अंगों को ढोती है या अंग देह को।" ऊपर परंपरा के निरंतरता की बात कही गयी है और सन्मार्ग उसी निरंतरता का प्रतीक है। यहां जब परंपरा और सन्मार्ग की बात हुई तो यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि परंपरा का मूल मर्म उसके शब्द में नही बल्कि शब्द और कर्म के बीच अखंडित संबंध में निहित होता है। राम का सत्य वह नहीं है जो उनके बारे  में कहा गया बल्कि उसमें है जो उन्होंने अपने जीवन में चरितार्थ किया। राम का कर्म ही राम शब्द को पवित्र बनाता है। हमारे पूर्वजों ने इसी कर्म और अर्थ को समाहित करने के लिए आज का दिन चुना। सन्मार्ग की स्थापना उस काल में कई गई थी जब आम आदमी को उसके सहज स्वभाव से हटा कर एक छद्म लक्ष्य की ओर मोड़ा जा रहा था। ... और सन्मार्ग का प्रयास था उस छद्म लक्ष्य की ओर बढ़ रहे समाज की दिशा को बदल कर रचनात्मक यथार्थ की ओर ले जाया जाए। इसके लिए चिंतन, कर्म और व्यवस्थाओं को जातीय मर्यादाओं से जोड़ना लक्ष्य रखा गया था। चिंतन , कर्म और व्यवस्था  ये मानव जीवन के तीन पहलू हैं जो जिनका" सत " की शुचिता की सीमा में आबद्ध रहना जरूरी है। यहीं बात उठती है सन्मार्ग के आप्त वाक्य , उसके नाम और उसकी वर्जनाओं की । यह भौतिकता का मूलभूत तत्व है यानी " सत" है। वह सत जो सच्चिदानंद का सृजन करता है।

'सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ ध्वजा पताका ।।
बल बिबेक दम परहित घोरे । क्षमा कृपा समता रजु जोरे ।। 
ईसभजनु सारथी सुजाना । बिरति धर्म संतोष कृपाना ।।
दान परसु बुधि शक्ति प्रचंडा । बर बिज्ञान कठिन कोदंडा ।।
अगम अचल मन त्रोन समाना । सम जम नियम सिलीमुख नाना ।।
' कवच अभेद्य बिप्र गुर पूजा । एहि सम बिजय उपाय न दूजा ।' 
सन्मार्ग अपनी 71 वर्ष लंबी यात्रा के जिस मील पत्थर पर खड़ा है वहां भी हमसे एक ही सवाल पूछा जाता है कि हमने अपना लक्ष्य कहां तक पूरा किया? कुछ लोग परंपरा तथा धर्म रक्षा के हमारे लक्ष्य पर ताने भी देते हैं, आधुनिकता का हवाला देते हैं। वैसे लोगों से एक निर्मम सवाल है कि क्या भारतीय होने के नाते हमारे भीतर देश से कोई लगाव बाकी राह गया है?  एक ही उत्तर मिलता है कि नहीं। क्योंकि हम अबतक यह साहस नही जुटा पाए कि पश्चिमी बौद्धिक दस्ता से मुक्त होकर सोचने समझने के अपने औजार विकसित कर सकें। नौजवानों अपनी आद्यात्मिक और सांस्कृतिक मनीषा के अनुरूप दीक्षित कर सकें। पश्चिमी बौद्धिक दस्ता ने हमारे भीतर संस्कृति और सभ्यता के अर्थों में कन्फ्यूजन पैदा कर दिया है। अंस्कृति कि धर्म संस्थानों से जोड़ दिरा गया है और सभ्यता को बाह्य आवरण से। सन्मार्ग की सदा से यह बताने की  कोशिश रही है कि  " एक भारतीय का धर्म उसके ' आत्मन ' में रहता धर्म संस्थानों में नहीं। " यही कारण है कि एक भगौलिक क्षेत्र में हजारों साल से एक बहु संख्यक और सैकड़ों  अल्पसंख्यक समुदाय रहते आये हैं। सबने मिल कर भारतीय सभ्यता को अमीर तथा  दीर्घजीवी बनाया है। इसके मूल में भारत की संस्कृति ही है और इसी लिए इसे बचाये रखने ज़रूरी है।अब यहां यह पूछा जाता है कि सन्मार्ग का यह लक्ष्य कहां तक पूरा हुआ है?  यहां यह बता देना ज़रूरी है कि यह लक्ष्य व्यापक सभ्यता बोध के भीतर ही पूरा हो सकता है। गौर करेंगे कि भारत की भगौलिक एकता अब तक केवल ऐसे परंपरा बोध में ही स्वरूप ग्रहण कर सकी है जहां व्यापक सभ्यता बोध हो , जहां  अनेक संस्कृतियां और धर्म सम्प्रदाय एक दूसरे से प्रेरणा पाते रहे हैं। कजब जब इस प्रेरणा का स्रोत अवरुद्ध हुआ है तब तब भारतीयता पर आघात लगा है।देश का विभाजन  इसका भौतिक उदाहरण है। भारत ही एक ऐसा देश है जिसकी राष्ट्रीय अस्मिता दूसरों के विनाश से नहीं अपनी सभ्यता के विविध चरित्र से बनी है । सन्मार्ग विगत 71 वर्षों से अडिग इसी परंपरा को कायम रखने के प्रयास में लगा है। 
       71 वर्ष पहले जो दीपशिखा प्रज्वलित हुई थी वह आज भी प्रकाश दे रही है क्योंकि उसमें हमारे सुधि पाठक , विज्ञापनदाता और हितैषी अनवरत अपना " स्नेह" प्रदान करते रहे  हैं ।हम इस दीपक को प्रकाशमान रखने के लिए उनके अत्यंत आभारी हैं।
सखा धर्ममय अस रथ जाकें । जीतन कहँ न कतहुं रिपु ताकें ।।

Monday, April 3, 2017

नीतियों को लागू करना जरूरी

नीतियों को लागू करना ज़रूरी  
हाल में खत्म हुए विधान सभा चुनावों में लगभग उन सभी राज्यों में भा ज पा को सफलताएं मिलीं जिसमे उसने चुनाव लड़े । ये कामयाबियां के सवाल भी उठाती हैं। पहला कि क्या ये 2019 की बानगी तो नहीं है? दूसरा की देश के विकास के लिए मोदी सरकार ने क्या कुछ किया? पिछला साल यानी 2016 सुधार का साल था लेकिन साथ ही वह उन सुधारों के दावों को चुनौती देने का भी साल था। अक्सर यह पूछा जाता था कि क्या यह कोई  वास्तविक सुधार था या प्राधान्य मंत्री की केवल बातें ही थीं? यह भी देखा गया कि मोदी जी के समर्थक कहते फिरते थे कि बस सुधार होने ही वाले हैं जबकि विरोधी इसे इनकार कर रहे थे। 2017 के बजट और आर्थिक सर्वेक्षण में देश के जी डी पी में आगामी वित्त वर्ष में  6.75- 7.5 प्रतिशत विकास की बात कही गई है। यह आंकड़ा या कहें कि विकास दर कुछ ज्यादा है। लेकिन बात है कि और भी कई विकास मापदंडों में भारत पीछे दिखता है। कई ऐसे क्षेत्र हैं जिसमें गत वर्ष देश ने विकास किया है पर कई ऐसे भी हैं संसाधनों का ज्यादा आवंटन ज़रूरी है । हम दूर क्यों जाएं भ्रष्टाचार, मानव विकास और समावेशन के माप डंडों में कहां हैं। जहां तक भ्रष्टाचार का सवाल है प्रधान मंत्री जी ने उसकी जड़ों में मठ्ठा डालने की घोषणा की। कई क्षेत्रों से मिली खबरों में यह माना भी गया है कि भ्रष्टाचार से कड़ाई से निपटा जा रहा है जबकि कई क्षेत्न से निराश जनक खबरें भी आ रहीं हैं। हलानिक भ्रष्टाचार के बारे में लोगों की सोच है कि उससे कड़ाई से निपटा जा रहा है। ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल की एक रपट के अनुसार भ्रष्टाचार के मामले में भारत का 176 देशों की सूची 79 वां स्थान है। इस उप महाद्वीप में हैम सिर उठा कर चल सकते हैं , क्योंकि इससूची में लंका 95 वें  स्थान पर, पाकिस्तान 116वें स्थान पर, नेपाल 131 वें स्थान पर , म्यांमार 136 वें स्थान पर और बांग्लादेश 145वें स्थान पर है। चीन हमारे बराबर 79 वें स्थान पर है जबकि भूटान हमसे बहुत ऊपर 27वें स्थान पर है। अगर अपने आस पास देखें तो भारत भूटान को छोड़ कर सबसे कम भ्रष्ट देश है। 2012-13 में भारत का स्थान 94 वां था और दो वर्षों तक  स्थिति यथावत रही। 2014 में भारत 85वें स्थान पर आ गया और फिर 2015 में यह 76 वें स्थान पर आया। 2016 में इस सूची में 8 और देशों को शामिल कर लिया गया इसलिए भारत थोड़ा नीचे चला गया। रैंकिंग में यह परसेप्शन बेशक थोड़ा नीचे है पर हकीकी तौर पर सुधार हुआ है। यह सुधार लोगों की बातों से झलकता है। नोटबंदी खुद मानें इसकी कथा है। लेकिन यह यथेष्ट नही है।वैश्विक तौर पर हमारा स्थान 79 वां है लेकिन संतोष की बात है कि 2012 से अबतक हैम 20 अंक ऊपर गए हैं। यह पर्याप्त है अथवा नही यह तो अनुमान की बात है पर भ्रष्ट देशों को इंगित करने वाले नक्शे में भारत अति भ्रष्ट देशों की तरह आंखों में चुभता है।
इसके बाद आती है मानव विकास की बात।नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने कहा है कि " मानव विकास में निवेश के बगैर आर्थिक विकास ज्यादा टिकता नहीं है और ना नैतिक होता है।" संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास की रपट मानव विकास का की सूची मानी जाती है, यह मानव विकास सूचकांक पर आधारित होता है। इस सूचकांक में शिक्षा , स्वास्थ्य , व्यक्तिगत आय इत्यादि को शामिल किया जाता है। भारत 188 देशों की इससूची में 130 वें स्थान पर है। जबकि भूटान और  बांग्ला देश क्रमशः 132 वें और 142 वें स्थान पर हैं। जबकि श्री लंकाऔर चीन क्रमशः 73 वें और 90 वें स्थान पर हैं। नमेपल (145) और पाकिस्तान (147) की हालत तो बहुत ही खराब है। भारत में कई दुखद सूचक आंकड़े भी हैं जैसे जी डी पी के अनुपात में बढ़ता हुआ कर्ज का बोझ, स्कूलों में बच्चों के नाम लिखाने की बदर में कमी, जिससे कुशल कारीगरों की कमी इत्यादि। इसे दूर करने के लिए नीतियों का सही तौर पर लागू किया जाना जरूरी है।सरकार को इसे प्रमुखता देनी होगी और तभी 2019 का पथ प्रशस्त होगा।

Sunday, April 2, 2017

चुनाव और लोकतंत्र

चुनाव और लोकतंत्र

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को जनादेश से वामपंथी, उदारवादी और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के विरोधी राजनीतिक दल सदमे में हैं। सब यही जानना चाह रहे हैं कि लोगों ने खासकर गरीबों ने एक ऐसी पार्टी को क्यों वोट दिया जिसने नोटबंदी जैसा घातक कदम उठाया था । यह चकरा देने वाला परिणाम चुनाव विश्लेषकों और राजनीतिज्ञों सकते में डाल दिया, वे अवाक रह गए। उनका मानना था कि लागूं को बहकाया गाया है और लोग भोलेभाले हैं। पूरी दुनिया में ऐसी राजनीतिक घटना इसासे पहले केवल 1953 में पूर्वी जर्मनी हुई थी, जब तत्कालीन सरकार ने मजदूरों के हक से जुड़े एक आंदोलन पर पाबंदी लगा दी थी।उस समय चुनाव में उस सरकार का चुना  जाना असंभव सा था पर उसी सरकार को वोट मिले। भारत में भी कुछ वैसा ही हुआ है। लेकिन यहां दूसरा पक्ष , विजयी भा ज पा, भी भ्रम में है। वह इस विजय को लोगों के निर्णय या समझदारी का उदाहरण मान रही है। वह समझ रही है कि नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक एकदम सही था और उसपर उंगली नही उठाई जा सकती है। लोगों को यानी मत दाताओं को बहुत ज्यादा समझदार या एकदम  भोलाभाला समझना दोनों बहुत सही नहीं है। इसके लिए लोगों के व्यापक सामाजिक संदर्भों को समझना होगा। भारतीय समाज जाती, वर्ग, धर्म , लिंग और संस्कृति के आधार पर बहुत ज्यादा विभाजित है। खासकर , संस्कृति युक्तिपरक विचारों पर भारी प्रभाव डालती है।इन गुणकों को समझे बगैर लोग सीधा निष्कर्ष पर चले आते हैं।यही कारण है कि 2014 के चुनाव और इस बार के चुनाव को सांप्रदायिक नजरिये से देखा गया जबकि 2004 , 2009 , दिल्ली और बिहार के चुनाव को धर्म निरपेक्षता के चश्मे से देखा गया। इसमें भी वास्तविकता है पर महत्व पूर्ण प्रश्न है कि मतदाता साम्प्रदायिक होने और धर्मनिरपेक्ष होने का विकल्प कैसे चुनते हैं। इस तरह के विचार से एक समस्या पैदा होती है कि हम लोकतंत्र को चुनाव रूप में देखने लगते हैं। इसके फलस्वरूप हैम उन बदलाव को नहीं देख पाते जो व्यापक आर्थिक परिवर्तनों के कारण समाज में आ रहे हैं। यही कारण है कि चुनाव के नतीजे सकते में डाल देते हैं। अभी हाल में यू पी में कथित प्रगतिशीलों के साथ जैसा हुआ। जो लोग चुनाव के माध्यम से सामाजिक बदलाव लाना चाहते हैं वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि चुनावी रस्साकसी के नीचे की जमीन बदल रही है। अतएव यह समझना गलत होगा कि किसी चुनाव में बहा ज पा की पराजय का अर्थ जनता ने संपरतदायिकता को खारिज कर दिया है और साथ भी किसी चुनाव में कांग्रेस की विजय का यह अर्थ नहीं है कि मतदाता समूह धर्मनिरपेक्षता की ऊपर झुक रहा है। विगत ढाई दशक में हमारे देश में हिन्दू बहुलतावादी राष्ट्रवाद का उभार हुआ है और यह चुनावी ऊर्जा के स्वरूप में आ गया है।लेकिन यह परिणाम जो अभी दिखा है वह कई दशकों के सामाजिक परिवर्तनों का नतीजा है। इस बहुलतावादी राष्ट्रवाद को हम अगर स्टुअर्ट हॉल को मानें तो यह सत्तावादी लोकशासन है।सत्तावादी लोकशासन दरअसल आर्थिक और राजनीतिक विकास के संकट से उत्पन्न पृथक और विषम मोहभंग को समाहित कर देने की क्षमता है।इसका मतलब यह नही है कि समाजवाद या धर्मनिरपेक्षता अथवा जाति विरोधी आदर्श इत्यादि की अवधारणा समाप्त हो गई या उसके दिन लद गए।वास्तविकता तो यह है कि इन आदर्शो ने व्यवहारिक तौर पर एक ऐसी शिक्षा प्रणाली का विकास करने में कामयाबी नही हासिल कर सकी  जिससे यह आज की शिक्षा , संस्कृति और आर्थिक ढांचे को वास्तविक समानता के धरातल पर स्थापित कर सके। यह चुनावी ताकतों के रूप में आगे बढ़ गई। चुनावों और आदर्शों के बीच कहीं तालमेल नही हो सका ताकि अन्य आदर्शवादी ताकतें भी वहां स्थापित हो सकें। लोगों को विकासशील विकल्पों के चयन से विमुख करने वाली वर्जनाएं असल में विवेचनात्मक विचार के प्रशिक्षण के अभाव में जन्मी हैं। आर्थिक दृष्टिकोण से नियंत्रित मीडिया और सांस्कृतिक मूलोयों के प्रभाव से युक्त शिक्षा प्रणाली से उद्भूत वातावरण वास्तविक लोकतंत्र के अनुकूल नही होता। यही कारण है कि हिन्दू राष्ट्रवाद का वर्चस्व बढ़ रहा है। किसी भी सत्तावादी लोकशासन की  उपलब्धियों की वास्विकता बहुत ज्यादा अर्थ नही रखती है। लोग उन दावों को  सच मान लेते हैं। इस अवांतर सत्य पर ज्यादा तर्क वितर्क बेमानी हो जाते हैं। यहां समस्या यह नहीं है कि सच क्या है? यहां समस्या है कि सत्य और भ्रम एक ऐसी पद्धति से ग्रस्त है इसमें विचारों का स्थान नहीं होता और एक ऐसी सोच विकसित हो रही है जहां आर्थिक  नीतिगत विचार मुनाफे पर आधारित है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में भा ज पा के 10344 वाट्सएप ग्रुप भ्रामक सूचनाएं फैलाते है और लोग मान लेते हैं। पढ़े लिखे लोग भी इस अवांतर सत्य को स्वीकार कर लेते हैं। उत्तर प्रदेश में मिले जनादेश को लोग " मोदी मैजिक" कह रहे हैं। यही लोग लोकतंत्र के अवक्षरण में लगे हैं। यहां स्थानीय दंगों के माध्यम से साम्प्रदायिक ध्रवीकरण की लगातार कोशिशें चल रहीं हैं। एक ऐसा मुल्क जहां जाति प्रमुख तत्व है और जहां " मोदी मैजिक" का कीर्तन चलता हो उस देश में जाति भेद को समाप्त करने की बात चल रही है। बिना यह जाने की भावुक आख्यानों के बल पर इस देश में जातीय जटिलताओं को " सूक्ष्म प्रबंधन" किया जाता है और इस प्रबंधन के बल पर सत्तावादी लोकशासन और बहुलतावादी राष्ट्रवाद के मिले जुले स्वरूप के अवांतर सत्य को वास्तविकताओं  की तरह पेश किया जाता है। अगर लोकतंत्र के इस अभिशाप को खत्म करना है तो सबसे पहले नई सामाजिक स्थिति का निर्माण कर नए विचार से सम्पन्न नए लोगों का समाज गढ़ना होगा जो चुनाव में विजय से ज्यादा चुनौतीपूर्ण है।