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Thursday, October 5, 2017

गरीबी का बच्चों पर असर

गरीबी का बच्चों पर असर

हल में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ( आई एल ओ )  और एक आस्ट्रेलियाई संस्था “ वाक फ्री फाउंडेशन “( डब्लू एफ एफ )  की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में खास कर भारत में गुलामों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है. भारतीय खुफिया ब्यूरो (आई बी) ने दो दिन पहले भारत सरकार को एक नोट भेजा है कि इस रिपोर्ट में भारत की साख कम करने क्षमता बहुत ज्यादा है और इसके मुकाबले की कोशिश होनी चाहिए. दोनों रपटें अपने आप में काफी अहमियत रखती हैं. गुलामों की तादाद बढ़ना समाज और राष्ट्र के लिए कई स्तरों पर खतरनाक है. आई बी की रिपोर्ट में कहा गया है कि जबरन काम करवाने, बाल मजदूरी और मानव तस्करी को रोकना ज़रूरी है. ये ही गुणक हैं जो गुलामी को बढ़ावा देते हैं. जहां तक समाज विज्ञान का सवाल है उसके अनुसार गरीबी और गैर बराबरी गुलामी का भाव पैदा करती है ,  गुलामी आक्रोश पैदा करती है और आक्रोश का इज़हार व्यापक सामाजिक अपराधों के रूप में होने लगता है.  अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन के सर्वे के अनुसार घरेलू नौकरों पर जुल्म , निर्माण स्थल पर काम करने वालों पर दबाव , छोटे छोटे अघोषित कारखानों में काम करने वाले और सेक्स वर्कर के तौर पर काम करने वालों के गुलाम बनाने के खतरे ज्यादा हैं. ख़ास कर गरेरेबी और गैर बराबरी के महाजाल में फंसे बच्चे आरम्भ से ही गुलाम मानसिकता के होते हैं और इनका गुलाम बन जाना सरल है. दो दिन पहले ही गुजरात में एक दलित किशोर को केवल इसलिए चाकू मर दिया  गया कि उसने मूंछ रखी थी. मनोशास्त्री जॉन डी रिच के अनुसार “ गरीब घर में पैदा हुए बच्चों में आचरण सम्बन्धी दोष होने लगता है जो कई बार या यों कहें ज्यादा संवेदनशील बच्चो में अपराध में बदल जाता है. अभी हाल में कीस विश्वविद्यालय के कुलपति अच्युत सामंत ने एक मुलाक़ात में बताया कि “ अगर समाज को अपराध मुक्त और जिम्मेदार बनाना है तो गरीबों के बच्चों को उनके निजी सामाजिक वातावरण से हटा कर उन्हें  अच्छी शिक्षा देनी होगी. क्योंकि गरीब बच्चे जब स्कूल में आते हैं तो उनके सीखने तथा उनके भाषिक मुहावरों में भारी अंतर होता है.”  जो बच्चे समाज में अच्छी तरह घुल मिल जाते हैं और सदाचरण करते हैं उनके लिए उनके माता पिता  का संवेदनशील होना ज़रूरी है. इसके लिए ज़रूरी है कि आय का जनक खुद को अपने परिव३आर का अंग समझे. कई बार तो ऐसा देखने में लगता है कि पिता केवल आमदनी के श्रोत के रूप में होता है. ऐसे परिवार अगर गरीब है तो अच्छी शिक्षा दीक्षा के अभाव में गलत साथ पकड़ कर पथ विमुख होने लगते हैं और वहीँ से गुलामी का बोध शुरू होने लगता है. जो माता पिता  अर्थोपार्जन के लिए कठोर संघर्ष करते हैं वे आचरण के प्रति लापरवाह हो जाते हैं और बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते. ऐसे वातावरण में पले बच्चे अक्सर समस्याओं के जादुई समाधान पर भरोसा करने लगते हैं और उसके नहीं होने पर गलत काम करने लगते हैं. आतंकवादी या मानव बम ऐसे ही बच्चे बनाए जाते हैं. यह अवस्था भी एक तरह से गुलामी का ही रूप है. गरीबी और गैर बराबरी तनाव पैदा करते हैं और ऐसे तनावग्रस्त लोग अतिरिक्त आय के लिए साधन खोजने लगते हैं. ऐसे लोग अपने आत्मसम्मान पर लगातार हमला महसूस करते हैं और जब तुलनात्मक तौर पर अमीर लोगों से अपनी तुलना करते हैं तो तनाव तथा अवसाद मेविन आ जाते हैं. यहीं से अपराध की और पहला कदम आरम्भ होता है. अब्राहम मासलोव के अनुसार भोजन , वस्त्र और आवास बुनायादी ज़रूरतें हैं और इनकी उपलब्धता में कमी उस आदमी या उस समूह को अपराध की और उत्प्रेरित करती है. अपराध केवल वह नहीं है जिसकी  अदालत में सुनवाई हो या जिसकी पुलिस इत्यादि में शिकायत हो बल्कि वह भी अपराध है जो समाज के विहित नियमों से परे है क्योकि यहीं से आपराधिक सोच पनपती है और इस तरह के सोच वाले व्यक्ति का उपयोग किसी भी तरह से किया जा स्क्साक्ता है. यही विचार गुलाम बनाने वालों को समाज में प्रवेश की राह देते हैं. यह एक प्रक्रियागत तरिका है. भारत अंग्रेजो का गुलाम कैसे हुआ? अंग्रेजों ने सबकुछ अपने हाथ में ले लिया और साधन हीन बना कर देश को उनका ज़ुल्म मानने पर मजबूर कर दिया. आज जो समाज में आर्थिक असमानता बढ़ रही है वह समाज को गुलामी की तरफ ही ले जा रहा है. 

Wednesday, October 4, 2017

हिंसा को रोकने पर विचार करें

हिंसा को रोकने पर विचार करें

लॉस वेगास में ठीक उसी दिन कुछ बंदूकधारियों ने 58 लोगों को मौत के घाट उतार दिया और 100 से ज्यादा लोगों को आहत कर दिया जिस दिन शान्ति के मसीहा महात्मा गाँधी का जन्म दिन था. हालांकि अमरीकी जनता के लिए गांधी का प्रतीक कोई मायने नहीं रखता है लेकिन इस घटना ने भारतीय मानस को भी आहत किया है. यहाँ भारत का उल्लेख करना इसलिए ज़रूरी है कि मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कहा था कि “ हिंसा से हिंसा पैदा होती है.” नेशनल अकेडमी ऑफ़ साइंस की रिपोर्ट के अनुसार “ हिंसा छूत  की बीमारी की तरह फैलाती है और हर आदमी इससे ग्रस्त हो जाता है.” इस वाक्यांश से हमें यह समझने में मदद मिल सकती है कि हिंसा की ऐसी घटनाओं कैसे रोका जाय या कम किया जाय. सोशल नेटवर्क नौजवानों में बहुत लोकप्रिय है और नौजवानों में हिंसा एक समस्या है. अमरीका में तो विभिन्न बीमारीओं से जितने नौ जवान मरते हैं उससे कहीं ज्यादा आत्महत्या से मरते हैं. हिंसा के कई प्रकार होते हैं और उसका प्रसार देश, स्थान,काल और अन्य कई गुणकों पर निर्भर करता है. मसलन दंगा तेजी से फैलता है. यही बात स्थान के साथ है. क्योंकि स्थान सामाजिक समूहों का आधार होता है और विशिष्ट समूह में विशिष्ट प्रकार की हिंसक घटनाएं होती हैं. हिंसा का सबसे महत्वपूर्ण मेकानिज्म है नक़ल या कह सकते हैं अपने ख़ास रोल मोडल की नक़ल.

जब भी ऐसी कोई घटना होती है तो राजनीतिज्ञ मैदान सम्भालते  हैं. झंडा झुका दिया जाता है, दो मिनट का मौन होता है , भाषण होते हैं , कुछ लोग मोमबतियां जला लेते हैं और बस सबकुछ ख़त्म. अगली ऐसी ही किसी घटना तक सारा काम पूर्ववत चलने लगता है. इस तरह की घटना ना हो इसके लिए कोई तैयारी नहीं. सरकारें इस विषय पर नहीं सोचतीं कि यह कैसे ख़त्म हो? ऐसे मामलों में दो सवाल ख़ास हैं पहला कि कोई भी आखिर क्यों अनजान लोगों की बेमतलब  ह्त्या कर  देता है? ... और दूसरा इसे रोका कैसे जा सकता है? विख्यात फोरेंसिक मनोशास्त्री डा. जेम्स नोल के अनुसार “ऐसी घटनाओं को वही लोग अंजाम देते हैं जो हथियारों को बहुत ज्यादा चाहते हैं और उन्हें एकत्र कर के रखते हैं. ऐसे लोग सत्ता के लिए लालायित रहते हैं वह पाना चाहते हैं जो कानूनी तरीके से संभव ना हो. सामूहिक हत्याएं असल में हिंसा की फेंटासी और छद्म शक्ति के भाव को पूरा करती हैं. ऐसा करने वाला अपने दिमाग में अपनी ताक़त और “ श्रेष्ठता” को किसी फिल्म की तरह देखता है. वह अपनी नाकामयाबी के लिए दूसरे को दोषी बताता है और उसे दंड देता है. इसे रोकने का सबसे अच्छा तरिका है कि हथियारों को आम लोगों की पहुँच से दूर कर दिया जाय.” जर्नल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ के अनुसार अगर हथियारों की उपलब्धता कम हो जय तो ऐसी घटनाएं कम हो जायेंगी. पत्रिका में बताया गया है कि 1996 में आस्ट्रेलिया में ऐसी ही सामूहिक ह्त्या की घटना हुई थी , जिसके बाद सरकार हथियार क़ानून को बहुत सख्त कर दिया और एक साल में इस तरह की हमलों की संख्या लगभग आधी हो गयी और हथियार से आत्म ह्त्या की घटनाएं भी आधी हो गयीं. जो ज्ञान गुमानी हैं उनका मानना है कि सामूहिक हत्यायों को रोकने का कोई अचूक नुस्खा  नहीं है और उनका कहना कुछ हद तक सही भी है. क्योंकि कुछ अपराधी किसी भी तरह से हथियार हासिल कर ही लेंगे चाहे वह दुनिया का कोई भी कोना हो. ख़ास कर अमरीका में जहां 32 करोड़ की आबादी में 30 करोड़ हथियार (फायर आर्म्स)  हैं. हार्वर्ड के प्रो. डेविड हेमेनवे के अनुसार अमरीका में रोजाना 92  हथियारों  (फायर आर्म्स) मरते हैं और दुनिया के अन्य विक्सित मुल्कों में जितने बच्चे  हथियारों (फायर आर्म्स) से मरते हैं उससे 14 गुना ज्यादा बच्चे  अमरीका में मरते हैं. इस निष्कर्ष पर पहुंचना बड़ा कठिन है कि वह कौन से कारन थे जिनके तहत लास वेगास की यह घटना हुई. लेकिन यह तो स्पष्ट है कि अधिकाँश सामूहिक हत्याएं हैण्ड गन्स से हुई है और इसमें मरने वालों की तादाद सर्वदा ऐसे ही हथियार से ख़ुदकुशी करने वालों से कम रही है. हथियारों का समर्थन करने वाले यह कह सकते हैं कि यह वक़्त सियासत का नहीं है. लेकिन हम हत्यायों से सबक नहीं ले सकते हैं. इस तरह की घटना के प्रति राजनीति करने का एक सही तरिका है और गलत भी. गलत तरीका है कि इस घटना को अंजाम देने वालों की आईडियोलोजी पर बहस. सही तरीका है कि इसे कैसे रोका जाय इस विषय पर विस्तृत बहस शुरू कर दी जाय. इसे रोकने का सबसे व्याव्य्हारिक तरीका है कि नौजवानों को हिंसक घटनाओं के संपर्क में आने से रोका जाय. स्कूलों और समाजों में समाज सेवा और समाज प्रेम का पाठ पढ़ाया जाय. महात्मा गांधी यहीं आकर सामयिक और प्रासंगिक  लगने लगते हैं.  

Tuesday, October 3, 2017

यही है "अच्छे दिनों" की तस्वीर

यही है "अच्छे दिनों" की तस्वीर

कहाँ तो तय था चरागां हर घर के लिए

यहाँ रौशनी मयस्सर नहीं शहर भर के लिए

अच्छे दिन के वायदे पर आयी सरकार किसानो की आत्म ह्त्या,  दुर्घटनाओं और कुपोषण से होने वाली मौतों से बिलखते देश में उगते भारत से स्वच्छ भारत के बीच चहल कदमी कर रही है है. इसे कैसे बताया जाय कि मौत एक वर्तमान का खात्मा ही नहीं एक भविष्य का विनाश भी है. हमारे देश में मोदीजी की सरकार के स्वच्छ भारत का नारा तीन वर्ष में एक आन्दोलन बन गया है. यह मोदी जी का कहना है और उनका कहना है कि स्वच्छ भारत का अर्थ रोग मुक्त भारत. सुनाने में बड़ा सरल सा लगने वाला यह जुमला मनोवैज्ञानिक तौर पर एक बड़ा तिलिस्म है. रोग का भय  यानि मौत का कारण रोग और रोग का अर्थ है पीड़ा , दुःख, परेशानी इसलिए रोग का भय. हम धीरे धीरे रोग का तर्जुमा मौत के रूप में करने लगे हैं. मौत का पैमाना रोग बन गया है. बहुत से लोग दिल के दौरे से मरते हैं , डेंगू से मरते हैं, कैंसर से मरते हैं. आज किसी से बात करें वह किसी ना किसी कैंसर के मरीज को जानता होगा. बताया जाता है कि कैंसर देश में सबसे तेजी फैलती बीमारी है. इसके फ़ैलाने के कारणों की खोज चल रही है पर चिकित्सा विज्ञानियों का मानना है कि जीवन शैली और खान पान भी इसका एक कारन है. इसके बावजूद देश की 0 .15 प्रतिशत आबादी ही कैंसर से प्रभावित है और 2016 में विभिन्न रोगों से होने वाली कुल मौतों में कैंसर से मरने वालों की संख्या महज़ 8 प्रतिशत है. यह मारक है, यह तेजी से फ़ैल रहा है लेकिन यह उतना व्यापक नहीं है जितना सोचा जारहा है और जिस भयानक  तथ्य से ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है वह है भारत में कुपोषण से होने वाली शारीरिक कमियाँ. भारत की 46 प्रतिशत कुपोषण से होने वाली कमियों की शिकार है. इसके बाद सबसे व्यापक है टी बी जिससे 39 प्रतिशत भारतीय प्रभावित हैं. देश में दिल की बीमारी और ब्लड प्रेशर को सबसे बड़ी और व्यापक बीमारी बताया जाता है. परन्तु दिल की बीमारी से 5.5 करोड़ लोग और ब्लड प्रेशर से 6.5 प्रतिशत लोग ही आक्रान्त हैं. मधुमेह भी बहुत ज्यादा लोगों को है पर उससे तीन प्रतिशत लोग ही मरते हैं. मेडिकल पत्रिका लैंसेट के आंकड़े बताते हैं कि भारत में इन सब बीमारियों से ज्यादा व्यापक बीमारी है कुपोषण यानि अछे स्वास्थकर खाने के अभाव के कारन होने वाली शारीरिक कमियाँ जो बीमारयों को राह देती हैं. देश के 60 करोड़ लोग यानी  46 प्रतिशत आबादी विभिन्न प्रकार की विटामिन, प्रोटीन और आयरन की कमी से आक्रान्त है. इस अभाव से सुस्ती, थकावट, कमजोरी और किसी विषय पर ध्यान से सोचने में अल्श्मता जैसे लक्षण दीखते हैं. बच्चों में यह मानसिक और शारीरिक विकास को बुरी तरह प्रभावित करता है. यह ऐसी बीमारी है जिसे पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है. अच्छा भोजन  इसका एकमात्र उपचार है.दुखद यह है कि यह बीमारी सबसे ज्यादा अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों में व्याप्त है. इससे बच्चों का विकास रुक जाता है. आंकड़े बताते हैं कि दलित परिवारों के 39 प्रतिशत और आदिवासी परिवारों के 34  प्रतिशत बच्चे इससे प्रभीवित हैं. इससे  पिछले एक दशक में इस बीमारी में 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई. इसके बाद नंबर है टी बी का वह छूत से फैलने वाली  बीमारी है और जो कुपोषण ग्रस्त हैं उन्हें तेजी से दबोचती है. शिक्षा के अभाव , खान पान की आदतों के प्रति जागरूकता, अस्वस्थकर घरेलू वातावरण इसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है और इस अभाव को ख़त्म करना सरकार का कर्तव्य है.

 विकास और खुशहाली के बड़े बड़े वायदे कर के सत्ता में आयी सरकारें देशवासियों के एक बड़े भाग के लिए भरपेट भोजन का बंदोबस्त नहीं कर पाती है और विदेशों में जाकर विकास तथा खुशहाली की बड़ी बड़ी बातें करती है.

मिलती नहीं कमीज़ तो पाओं  से पेट ढँक लेंगे

कितने मुनासिब हैं ये लोग इस सफ़र के लिए.   

Monday, October 2, 2017

मोदी  जी का “ नया  भारत “

मोदी  जी का “ नया  भारत “

तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है

मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है

बड़े बड़े नारों के लिए मशहूर श्री नरेंद्र मोदी का “ न्यू इंडिया “ का नारा लगता है अपने खोखलेपन के कारण उन्ही को परेशान कर रहा है. भा ज पा ने खुद महसूस करना शुरू कर दिया है कि देश की आरती स्थिति तेजी से बिगड़ रही है है. जो चमक के आंकड़े पेश किये गए थे या दावे किये  गए थे किताबी थे, हकीक़त से दूर थे. नोट बंदी के दलदल में फंसे देश को जी  एस टी के दलदल में फंसे देश को और गहरे धकेल दिया. छोटे कारोबार डूबने लगे , रोजी- रोजगार  चौपट होने लगा. जी एस टी के लागू होने के पहले कारोबारी अपना माल निकालने लगे थे इस उम्मीद में कि इसके बाद नया स्टॉक करेंगे , पर ऐसा नहीं कर सके. अब विश्लेषक कह रहे हैं की टैक्स प्रणाली जब स्थिर नहीं हो जायेगी तब ही कुछ किया जा सकेगा. कब होगा यह मालूम नहीं. ... और यह सब हो रहा है त्योहारों के पहले. इसका असर 2017 की दूसरी छमाही में सकल घरेलू उत्पाद पर इसका असर पडेगा ही. जैसा लोगों ने महसूस किया है जी एस टी के बाद महंगाई भी बढ़ी है. बहु स्तरीय टैक्स से भी बात नहीं बन रही है. एकमात्र डीजल- पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतें ही सरकार के कोष को भर राहा है क्योकि यह जी एस टी से बाहर है. यही नहीं सरकार को जी एस टी की पहली टीस तो उस समय व्याकुल कर गयी जब 95 हज़ार करोड़ की जी एस टी वसूली में से 65 हज़ार करोड़ की वापसी की मांग की गयी. अगर सारा भुगतान कर दिया गया तो सरकार के खजाने में महज 30 हज़ार करोड़ बचा रह जाएगा. स्थिति कब ठीक होगी यह कोई नहीं जानता. बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशिल मोदी ने कहा कि हम एक जहाज बना रहे हैं और उसे पानी में उतार भी चुके हैं. यह साफ़  तौर पर केंद्र पर आरोप है जिसने बिना पूरी तरह सोचे इसे लागू कर दिया. संघ के बड़े आर्थिक चिन्तक भी अब कहने लगे हैं की हालत खराब है. हाल संघ के आर्थिक चिन्तक गुरुमूर्ति ने ने कहा कि जी एस टी , बैंक की एन पी ए , कालेधन पर बहुतरफ़ा हमला इत्यादि ने अर्थ व्यवस्था को भारी आघात पहुंचाया है. गुरुमूर्ति का यह कहना बड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि नोट बंदी और जी एस टी  के सबसे बड़े तरफदार वही थे. जिन्हें भीतर की व्यवहारिक बातें मालूम होंगी वे जानते होंगे कि टैक्स विभाग के अफसर उन व्याव्स्सयियों के यहाँ नहीं जाते जो बड़े हैं क्योंकि उनसे उनके पुराने मधुर रिश्ते हैं. वे छोटे व्यापारियों को ही निचोड़ते हैं. यह बात केवल कहने की नहीं है. अभी कुछ दिनों में ही 800 बड़े टैक्स अफसरों ने नौकरी छोड़कर बड़ी कंपनियों में ज्वाइन किया है. अब संघ के चिन्तक आलोचना करने लगे हैं तो  मतलब है कि बात बहुत गंभीर है तथा मोदी और जेटली के संभाले संभल नहीं रही है. निर्यातकों को पहले उत्पाद कर नहीं लगता था पर अब उन्हें जी एस टी का 18% जमा कराना पडेगा. हालांकि इसे निर्यात के तुरत बाद वापस कर दिये जाने की बात है पर जब वापस करने की मांग लेकर संबध विभाग में जाएँ तो ऐसा आचरण किया जाता है मानो वह कोई अपराधी है और टैक्स रिफंड मांग कर जुर्म कर बैठा. सोचिये भारत 300 अरब डॉलर का निर्यात करता है. और इसपर 18 प्रतिशत टैक्स देकर उनके चक्कर लगाने पड़ते हैं. अगले लोकसभा चुनाव में बस 18 महीने रह गए हैं और मोदी जी ने 2022 में पुरे किये जाने वाले बड़े बड़े वादे किये हैं. इसका साफ़ मतलब है कि वे दुबारा सत्ता में आने की सोच चुके हैं. इतहास गवाह है की सियासत कभी भी सीढ़ी रहा पर नहीं चलती. कई बार ऐसा होता है की लोकप्रियता के शीर्ष पर खड़े नेता के नीचे से जमीन निकल जाती है. 2018 के अंत तक मतदाता की मोदी जी वाडे करते हैं या जुमलेबाजी. आब न्यू इंडिया या स्वच्छ भारत क्या है वादा है या जुमलेबाजी. वे तो चाहते हैं कि ,

आँख पर पट्टी रहे, अक्ल पर टाला रहे

अपने साहबे वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे       

Sunday, October 1, 2017

बापू की विरासत

बापू की विरासत

दो दिन पहले रावण का दहन कर दिया गया. जहां जहां भी रावण का दहन वहाँ वहाँ रावण का अट्टहास सुनायी पड रहा था और उस अट्टहास के बीच रावण कह रहा था कि ” हज़ारों साल के बाद भी तुम रावण बनाते हो तब जलाते हो, कभी एक राम बना सके.”शायद रावण का कहना सही था क्योकि हज़ारों साल तो छोड़ दें 149  साल पहले अच्छाई का थोड़ा सा अंश लेकर जन्मा मोहनदास करम चंद गांधी नाम के इंसान की अच्छाईओं को याद तो करते हैं पर उइसके बताये रास्ते पर चलने से कतराते हैं. उसका उपयोग तो करते हैं पर अनुकरण नहीं करते. विचित्र संयोग है रावण के नाश  के दूसरे दिन यानी बुराई के नाश के दो  दिन बाद ही 2 अक्तूबर को  इस भारत भूमि पर गांधी का जन्मदिन है.  हम गांधी को  याद करते हैं और पृष्ठ भूमि में चलता रहता है पकिस्तान के खिलाफ भारी नफरत का खुल कर  प्रचार,  दलितों की सरेआम पिटाई, गोरक्षा के नाम पर समाज के एक वर्ग को यातनाएं. ये चंद बुराईयाँ जिन्हें मिटाने के प्रयास में गाँधी खुद मिट गए. वैसे गांधी आज भी ख़बरों में हैं, जन्म के 149 वर्ष के बाद भी. डेढ़ सौ साल अगले साल पूरा होगा और यह महज संयोग है कि इसी साल चुनाव भी हैं. दुखद यह है कि हालात बहुत अच्छे नहीं हैं. यह कौन सोच सकता है कि जिस उपमहाद्वीप ने मोहन दास करमचंद गाँधी को महात्मा बनाया वहीँ , उसी महाद्वीप में कहा जा रहा है कि गांधी को हटाया जाना चाहिये, उसकी  प्रतिमाओं को  हटाया जाना चाहिए. गाँधी जिन्होंने अछूत जैसे अपमानजनक शब्द को समाप्त करने के लिए हरिजन शब्द गढ़ा , अब दलितों  पर तरह तरह के जुल्म होते देखे सुने जाते हैं. नतीजा यह हो रहा है कि दलित भी समाज से कटते जा रहे हैं. खबर है कि अब दलितों के बच्चों को यह बताया जा रहा है कि भीम राव अम्बेडकर सबसे बड़े नेता थे. इसके लिए देश में  नयी बारहखड़ी ( अल्फाबेट ) तैयार की गयी है. ए से अम्बेडकर , बी से भीमराव सी से कास्ट , डी से डॉक्टर , ई से इंग्लिश इत्यादि. इस क्रम में सबसे दिलचस्प है  जी से जी से ग्रेट भीमराव और एल से लीडर भीम राव  . सोचिये, एक वर्ग के बच्चो के दिमाग से कैसे गांधी को मिटाने की कोशिश हो रही है औरे उस कोशिश को हवा देने वाले हैं हमारे आज केर नेता. दूसरी तरफ देश की दो बड़ी पार्टियों के पास गांधी के लिए कुछ नहीं है. राहुल गाँधी संघ को नीचा दिखाने के लिए अदालत में यह मामला दायर करने की कोशिश की कि “ संघ के लोगों ने गांधी जी की हत्या की थी.” दूसरी तरफ संघ के प्रचारक और प्रधान मंत्री  नरेंद्र मोदी दक्षिण अफ्रीका में उसी रूट पर यात्रा कर खुश हो गए जिस पर कभी गांधी जी ने यात्रा की थी. गाँधी के नाम पर स्वच्छ भारत की बात उठाई और भाषण में गांधी जी का नाम गलत बोल गए. आज गांधी पर कब्जे के लिए कोंग्रेस और भाजपा पंजे लड़ा रहे हैं , लेकिन क्यों? इसलिए कि देश की जनता पर अभी भी गाँधी का असर है, विदेशी विद्वानों को गाँधी  अभी भी प्रभावित करते हैं और इसी लिए दोनों दल केवल अपने स्वार्थ के लिए इस नाम का उपयोग करना चाहते हैं. दलित और माओवादी गांधी को खुल कर भला बुरा कहते हैं और जो गांधी का सम्मान करते हैं वे चुप रहते हैं. गाँधी असाधारण व्यक्ति थे और वे सुनाने तथा विचार विमर्श पर विश्वास करते थे. बुद्ध के बाद गांधी ऐसे पुरुष रहे हैं जो अपने मुल्क के हर इंसान के दिमाग में मौजूद हैं. बेशक कोई गाँधी का विरोध करता है पर उन्हें नज़रंदाज़ नहीं कर सकता. चाहे वह सियासत हो या सेकुलरिज्म, चाहे वह बटवारे का मसला हो या जाति का , धार्मिक बहुलवाद हो या ग्राम विकास का गाँधी हर जगह मौजूद मिलते हैं. आज 149 वर्षों के बाद भी गांधी ख़बरों का हिस्सा बने रहते है लेकिन इतिहास उनके साथ अच्छा सलूक करता नज़र नहीं आ रहा है.  

राम: शस्त्रभृतामहम्

विजयादशमी के अवसर पर
राम: शस्त्रभृतामहम्

राम की कथा द्वापर की है और “ राम: शस्त्रभृतामहम्”  श्लोक अंश  त्रेता का है. कई हज़ार साल के बाद गीता में कृष्ण ने कहा है कि “ राम: शस्त्रभृतामहम्  अर्थात मै शस्त्रधारियों में राम हूँ. आज उसी राम को हम विजय के लिए याद करते हैं. राम तो सदा याद किये जाते हैं पर आज का महत्त्व ही अलग है.  आज दशहरा है यानी विजयादशमी. कहते हैं यह राम के विजय का पर्व है. यहाँ विजय वाली बात बड़ी विरोधाभासी लगती हैं क्योंकि सब जानते थे, यहाँ तक कि रावण भी जानता था,  कि राम को पराजित नहीं होना है. फिर विजय कैसा. जहां पराजय है ही नहीं वहा विजय कैसी. दरअसल यह राम और सीता के मिलन का पर्व कहा जाना चाहिए लेकिन न जाने समय के किस दबाव ने या  व्याख्या के कौन से मनोविज्ञान ने इसे विजय की संज्ञा दे दी,  यह कहना संभव नहीं है.       लेकिन विजय की अपनी एक व्याख्या तो है ही. वस्तुतः राम और सीता का मिलन यानी देह और आत्मा का मिलन ,पृथ्वी और आकाश का मिलन , मृत्य और अमर्त्य का मिलन. इस मिलन में जो बाधा है वही रावण है . दस पाप उसके दस सिर  हैं. हमारे भीतर पूरी राम कथा लगातार चलती रहती है कभी माया के रूप में कभी रावण से द्वंद्व के रूप में. हममे से बहुतो ने थ्री डाईमेंश्नल फिल्में देखी होंगी. पहली बार ऐसा लगता है कि दौड़ता हुआ घोड़ा हमारे ऊपर आ जाएगा और दर्शक थोड़ा दायें- बायें हो जाता है. कितने धोखे में रहते हैं हम. क्षण भर को झूठ सच हो जता  और इसी झूठ को सच मानना माया है. राम दशहरे के दिन इसी माया का वध करते हैं. यही तो हर्ष है , यही त्यौहार है. वरना राम के हाथों में शस्त्र बड़ा अजीब लगता है. राम का स्वरुप एक काव्य प्रतिमा है , आँखें दया का सागर है और ऐसे में शस्त्र कैसा लगता है. यही नहीं , दिग्विजयिनीरामकथा  का अगरविश्लेषण करें तो तीन बातें स्पष्ट होती हैं, जिसमें युद्ध प्रगल्भ नहीं है.  जो बातें स्पष्ट होती हैं उनमें पहली तो राम के विजय  का उद्देश्य आधिपत्य स्थापित करना नहीं था. महाकवि कालिदास ने मेघदूत में एक शब्द का प्रयोग किया है. वह शब्द है –“ उत्खात प्रतिरोपण ”,  यानी उखाड़ कर फिर से रोपना. यह फसल के हित में होता है या उस क्षेत्र के हित में होता है जहां ऐसा किया जाता है. उस क्षेत्र के अयोग्य शासक को हटा कर उसी क्षेत्र के सुयोग्य शासक को वहां का आधिपत्य सौंपा जाता हैं। उस क्षेत्र की दुर्बलताएं अपने आप नष्ट हो जाती है. 
दूसरी बात इस प्रकार की विजय यात्रा में तय था  कि किसी सामान्य जन को सताया नहीं जाय. 
तीसरी बात यह थी किविजय  का उद्देश्य उपनिवेश बनाना नहीं था, न अपनी रीति नीति आरोपित करना था. अब प्रश्न है कि केवल राम का ही विजयोत्सव क्यों इतना महत्वपूर्ण है? इसका कारण है वह“ एक निर्वासित का उत्साह ” है, जिसने राक्षसों से आक्रांत अत्यंत साधारण लोगों में आत्मविश्वास भरा और जिसने रथहीन हो कर भी रथ पर आरूढ़ रावण के विरुद्ध लड़ाई लड़ी।
ऐसी यात्रा से ही प्रेरणा ले कर गांधी जी ने स्वाधीनता के विजय अभियान में जिन चौपाइयों का उपयोग किया वे'रामचरितमानस’ की हैं - ' रावनु रथी  बिरथ रघुबीरा. देखि बिभीषन भयउ अधीरा.' ऐसी विजय में किसी का पराभव नहीं होता,राक्षसों का भी पराभव नहीं हुआ, केवल रावण के अहंकार का संहार हुआ. राक्षसों की सभ्यता भी नष्ट नहीं हुई. उसी प्रकार जैसे अंग्रेजों का पराभव नहीं हुआ. अंग्रेजों की सभ्यता नेस्तनाबूद करने का कोई प्रयत्न भी नहीं हुआ, केवल प्रभुत्व समाप्त करके जनता का स्वराज्य स्थापित करने का लक्ष्य था.  इसलिए विजयादशमी महत्वपूर्णहै. हम कृषि  संस्कृति वाले लोग आज भी नए जौ के अंकुर अपनी शिखा में बांधते हैं और उसी को हम जय का प्रतीक मानते हैं. आनेवाली फसल के नए अंकुर को हम अपनी जय यात्रा का आरंभ मानते हैं. 
हमारे लिए विजययात्रा समाप्त नहीं होती, यह फिर से शुरू होती है,क्योंकि भोग में अतृप्ति,भोग के लिए छीना-झपटी, भय और आतंक से दूसरों को भयभीत करने का विराट अभियान, दूसरों की सुख-सुविधा की उपेक्षा,अहंकार, मद, दूसरों के सुख की ईर्ष्या- यह सभी जब तक हैं, कम हो या अधिक... विरथ रघुवीर.. को विजययात्रा के लिए निकलना ही पड़ेगा. आत्मजयी को इन शत्रुओं के ऊपर विजय प्राप्त करने के लिए नया संकल्प लेना ही होगा. सभी विज्ञापनदाताओं ,पाठकों और हितैषियों की यह विजययात्रा शुभ हो.