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Wednesday, March 7, 2018

हमारे देश के मतदाता क्या सोच रहे हैं

हमारे देश के मतदाता क्या सोच रहे हैं

हमारे देश में हर चुनाव चाहे वह बड़ा हो चाहे छोटा उसका एक विषय होता है, उसके लिए कुछ संदेश होते  हैं । पूर्वोत्तर भारत में भाजपा का विकास  भी एक संदेश देता है। इस संदेश के मायने भाजपा के विकास और कांग्रेस तथा वामदलों के पराभव से कुछ ज्यादा है। पिछले कई चुनावों में हमारे देश के मतदाता राजनीतिक दलों को कई विशेष संदेश देते रहे हैं। इस वर्ष लगता है ये दल-  विशेषकर सत्तारूढ़ दल- उस संदेश को समझ नहीं पा रहे हैं। अगर उस संदेश को समझा नहीं गया और उसे अमल में नहीं लाया गया तो आने वाले राष्ट्रीय चुनाव में बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है। 

  सत्तारूढ़ दल के नेताओं का  यह बहरापन कई विशेष परिवर्तनों को जन्म देगा। आपने गौर किया होगा कि 2014  के चुनाव  में जनता खुशहाली चाहती थी। मोदी जी ने इस संदेश को भली-भांति समझा और अच्छे दिन का नारा दिया। उस नारे को  ध्यान में रखकर वोट डाले गए। आम जनता भले ही समृद्धि का मतलब ना समझे या कहें की परिभाषा ना दे सके लेकिन वह इसे महसूस जरूर करती है। हमारे देश की सबसे बड़ी  ट्रेजेडी है कि 1947 से अब तक  केवल समस्याओं पर बात होती रही है। वे नहीं समझ पाए हैं कि खुशहाली लाएं कैसे? उन्हें पहले यह समझना पड़ेगा आम भारतीय गरीब क्यों है? जब तक यह नहीं समझेंगे तब तक देश को खुशहाली के मार्ग पर नहीं लाया जा सकता। हमारी सरकार  खुशहाली का मतलब  यह समझती है की जनता को सरकारी योजनाओं पर ज्यादा निर्भर बनाना। आर्थिक आजादी प्रदान करना नहीं। ताकि जनता खुद ब खुद खुशहाली के रास्ते पर आगे बढ़ सके। इसके लिए सरकार को छोटे उत्पादक वर्गों से टैक्स लेना पड़ता है और इसके फलस्वरूप एक तरह से समृद्धि विरोधी तंत्र का निर्माण हो जाता है।  इसका निर्माण कांग्रेस ने किया और  अब विभिनन सरकारों  द्वारा , चाहे वह केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार। इसे समझना जरूरी है कि केवल लोक कल्याण से खुशहाली नहीं  लाई जा सकती। यहां तक कि राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं ने भी समृद्धि विरोधी  तंत्र को प्रोत्साहित किया है। वोटरों के लिए जरूरी है कि वह उस तंत्र को खत्म करें। उम्मीद और हकीकत के बीच की दूरी राजनीतिक पार्टियों को नुकसान पहुंचा सकती है।

    जो चुनाव समझते हैं उन्होंने पाया होगा  की वोटों की हिस्सेदारी में काफी अंतर आने लगा है और इसमें भारी अस्थिरता भी।  2014 में  भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय वोट शेयर में काफी वृद्धि हुई और यह वृद्धि बहुत तेज थी। साथ ही, कांग्रेस के वोटों में भारी गिरावट आई।  यह उतना ही महत्वपूर्ण है। फिर राजस्थान में कांग्रेस के वोटों में वृद्धि। यह  स्पष्ट संकेत है  कि जनता वर्तमान स्थिति पर नाखुश है और उसे सकारात्मक परिवर्तन की उम्मीद है। हर चुनाव अपनी तरह का नया होता है और इसमें आर्थिक प्रदर्शन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। जनता नए वादों को एक मौका दे सकती है लेकिन यदि वायदे पूरे नहीं किए गए तो वह उसके निष्कासन के बारे में भी सोच सकती है।  इसलिए  यह भाजपा  के लिए एक संकेत है और वह संकेत चेतावनी भरा है। क्योंकि कई राज्यों में और केंद्र में उसी की सरकार है। देश में खुशहाली लाने का कोई शॉर्टकट नहीं है इस मामले में भाजपा का रिकॉर्ड सबसे खराब रहा है।

    यदि सरकार या राजनीतिक पार्टियां  जो सत्ता में है वह जनता को खुशहाल नहीं बना सकती   या बना पा रही है  तो जनता  भी अन्य विकल्पों को देखने के लिए  तैयार है। गौर करें त्रिपुरा की भाजपा उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश या  राजस्थान की भाजपा नहीं थी यह एक तरह से त्रिपुरा में भाजपा का राजनीतिक स्टार्टअप था। उसने बड़े चमत्कारी ढंग से ईसाई और आदिवासी मतदाताओं को अपना निशाना बनाया। उसने अपने संदेश में कई बदलाव लाए। जनता तक संदेश पहुंचाने के लिए पार्टी ने  टेक्नोलॉजी और मजबूत संगठन का भरपूर प्रयोग किया। भाजपा ने एक मुरझाई हुई और पुराने तौर तरीकों वाली सरकार को हराने में कामयाबी हासिल की। भाजपा द्वारा उन राजनीतिक दलों का मुकाबला करना एक तरह से स्टार्टअप ही है। राजनीतिक स्टार्टअप के लिए एकदम नए विचारों का होना जरूरी है। नकि पुरानी चीजों को दोहराना। रजनीकांत और कमल हसन द्वारा नई पार्टियां खड़ी किए जाने से दक्षिण भारत में एक नई शुरुआत हो चुकी है। 

    हमारे देश की हकीकत यह है की पुरानी कांग्रेस और नई भाजपा की आर्थिक नीतियों में अंतर नहीं है। आज भी कई असफल नीतियों पर काम हो रहा है। सरकार को यह समझना जरूरी है आजादी भेद भाव हीनता, हस्तक्षेप मुक्ति और कम सरकार खुशहाली का जरिया है और उसकी जरूरत है।  

Tuesday, March 6, 2018

भारत में भ्रष्टाचार क्यों नहीं खत्म होता है

भारत में भ्रष्टाचार क्यों नहीं खत्म होता है

 भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे भारतीय शासन प्रणाली को भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ करने की इच्छा शक्ति ही नहीं है। अभी हाल के नीरव मोदी, चौकसी और कार्ति चिदंबरम की घटनाओं के प्रति दो तरह की राजनीतिक  प्रतिक्रिया हुईं हैं। कांग्रेस और भाजपा ने एक- दूसरे पर कीचड़ उछाल कर चुनाव में बढ़त पाने का निर्णय किया है।बोफोर्स के बाद राजीव गांधी चुनाव हार गए थे। क्योंकि उन पर और कई अन्य लोगों पर घोटाले के आरोप थे। उन्होंने टालने की भरसक कोशिश की लेकिन कुछ हो नहीं पाया। जनता के पास संदेश गया कि राजा चोर है। 2014 के चुनाव में भाजपा ने घोटाले के आरोपों का जमकर ढोल पीटा। उसके पास मसाला भी बहुत था ,जैसे 2G ,कोयला खनन घोटाला इत्यादि। मौजूदा हालात में नीरव मोदी, चोकसी और कार्ति चिदंबरम के मामले में किसने किसको मदद की इस बात पर कीचड़ उछालना चल रहा है। मोदी को किसने मदद की, कांग्रेस ने या भाजपा ने।

     ऐसे आरोप अक्सर हल्के होते हैं या सस्ते होते हैं। सोचिए  पी चिदंबरम और उनकी पत्नी नलिनी कार्ति चिदंबरम मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट में उपस्थित  क्यों रहेंगे। स्वामी का कहना है  यह उन्होंने जजों को धमकाने की नीयत से ऐसा किया। चिदंबरम पूर्ववर्ती सरकार में वित्त मंत्री थे। स्वामी का परोक्ष कथन था कि  पी चिदंबरम इस घोटाले में शामिल हैं। कार्ति चिदंबरम के मामले की कुछ फाइलें कई साल पहले वित्त मंत्रालय से हो कर गई थीं इसका अर्थ है कि करप्शन में शामिल हैं। इरादा भ्रष्टाचार को ढूंढने का नहीं है बल्कि कीचड़ उछालने का है। कार्ति चिदंबरम के खिलाफ मामला बहुत कमजोर है और  गलत जगह पर है।

   टीवी एंकर  कुछ इस तरह  मामले को पेश कर रहे हैं  कि वही जज हैं। टेलीविजन द्वारा मुकदमे की सुनवाई की परिपाटी खोजी पत्रकारिता की सर्वाधिक खराब परंपरा है। इस तरह के टेलीविजन की सुनवाई किसी भी सभ्य देश में बर्दाश्त के काबिल नहीं है। भारतीय टेलीविजन मीडिया सत्य के संधान में दिलचस्पी नहीं रखती बल्कि अपने राजनीतिक पक्षपात को भुनाती है। भ्रष्टाचार तमाशा बन जाता है। वर्तमान में भाजपा सत्ता में है और उसे इसका उत्तर देना होगा।

 

    अन्ना हजारे एक जमाने में हीरो बन गए थे क्योंकि जनता समझती थी भ्रष्टाचार देश के लिये अत्यंत चिंताजनक विषय है। जनता के सहयोग से अन्ना ने संसद को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। जवाहरलाल नेहरू के जमाने में ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त कृष्ण मेनन ने जीप घोटाले पर इस्तीफा नहीं दिया, लेकिन पूर्व वित्त मंत्री टी टी कृष्णामचारी को उद्योगपति डालमिया की मदद करने के कारण इस्तीफा देना पड़ा था। इसी तरह भ्रष्टाचार के मामले में नेहरू ने पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों को इस्तीफा देने के लिए बाध्य कर दिया था। सबसे बड़ा उदाहरण लाल बहादुर शास्त्री का है। जिन्होंने1956 में एक रेल दुर्घटना के कारण रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दियाथा। जबकि वे निर्दोष  थे। जवाबदेही की अवधारणा इसी बात पर निर्भर करती है कि कोई जिम्मेदारी स्वीकार करे। वर्तमान मसला वित्त मंत्रालय से संबंधित है और वित्त मंत्रालय अरुण जेटली के अंतर्गत है। संसदीय जवाबदेही की बेहतरीन परंपरा के मुताबिक अरुण जेटली को इस्तीफा दे देना चाहिए।

   यह दोष स्वीकृति नहीं है  बल्कि जिम्मेदारी  की स्वीकृति है। आज के जमाने में शास्त्री जी का उदाहरण नजरअंदाज कर दिया जाता है।

  अगले साल चुनाव है और जेटली का इस्तीफा इस चुनाव में काफी आघात पहुंचाएगा। प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी विदेशों में भारत की छवि को चमकाते फिर रहे हैं और भाजपा के लिए बड़ी-बड़ी बातें कह रहे हैं। किसे दोष दिया जाए।

   जेटली ने सुझाव दिया एक नया कानून बनाया जाए। उसका नाम होगा भगोड़ा अपराधी अधिनियम2018 । यह जेटली का उस समय से सपना था  जब से वह बोफोर्स के धन की तलाश में जुटे थे। विधिवेत्ताओं का मानना है कि यह विधेयक दोषपूर्ण है।  इससे सिर्फ यह प्रदर्शित होगा कि सरकार कुछ कर रही है। इसका एकमात्र उपाय है गंभीर जांच। गंभीर घोटालों को तमाशे में बदलने की कोशिश ना की जाए। भ्रष्टाचार निवेश की राह में भी रोड़े अटकता है। जब तक कोई जवाबदेही नहीं स्वीकार करेगा तब तक भ्रष्टाचार को मिटाना संभव नहीं है। भारत की सबसे बड़ी ट्रेजेडी यही है कि कोई अपनी जवाबदेही नहीं स्वीकार  करता। जबतक जवाबदेही नहीं स्वीकारेंगे तबतक भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा।

 

Monday, March 5, 2018

मोदी जी की डिग्री का विवाद, देश के शिक्षा संस्थानों के लिए  खतरनाक

मोदी जी की डिग्री का विवाद, देश के शिक्षा संस्थानों के लिए  खतरनाक

दिल्ली यूनिवर्सिटी का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 1978 में यहां से स्नातक  हुए थे,  हालांकि गत 28 फरवरी को दिल्ली हाईकोर्ट में विश्वविद्यालय ने उस परीक्षा के रिकॉर्ड पेश करने से इंकार कर दिया। दिल्ली विश्वविद्यालय ने एक आरटीआई के जवाब में ऐसा किया। उसके कदम ने प्रधानमंत्री के शैक्षणिक योग्यता पर एक और विवाद खड़ा कर दिया। अब प्रधानमंत्री की डिग्री को लेकर भारी विवाद हो गया है। बताया जाता है कि उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बी ए और गुजरात विश्वविद्यालय से एम ए  की डिग्री हासिल की है। दोनों विश्वविद्यालयों ने कुछ दिन पहले इसके पक्ष में बयान जारी किया था। लेकिन जब  अभिलेख मांगे गए तो इन दोनों ने इनकार कर दिया। मोदी जी की  जो डिग्री दिखायी है उसमें भारी भी गड़बड़ियां दिख रहीं हैं।  उनका नाम ,उनकी जन्म तिथि और यहां तक की उनकी विशेषज्ञता का विषय । जो विषय उनकी  सनद में लिखा है वह है पर "एंटायर पॉलिटिकल साइंस।" यह कौन सा विषय है मालूम नहीं। विश्वविद्यालयों ने इसे न्यायाधीन मामला बता कर आरटीआई का जवाब देने से इंकार कर दिया।  मामला तूल पकड़ने लगा। इससे भारत के प्रधानमंत्री सहित दोनों विश्वविद्यालयों की साख पर भारी सवाल उठाता है। वैसे कानूनन भारत के प्रधानमंत्री के लिए किसी प्रकार  की डिग्री की जरूरत नहीं है लेकिन शपथ के साथ झूठ बोलना गलत है। यह केवल मोदी जी का मामला नहीं है उनकी  नजदीकी कही जाने वाली स्मृति ईरानी की भी डिग्री विवाद में फंसी है। 

   इन दोनों महत्वपूर्ण लोगों की डिग्री  के विवाद में ना केवल उनकी  अपनी साख पर बट्टा लग रहा है  बल्कि उन दोनों विश्वविद्यालयों की साख पर भी सवालिया निशान लग गया है। सोचिए जिन विश्वविद्यालयों से हजारों  छात्र हर वर्ष मेहनत और ईमानदारी से डिग्री हासिल करते हैं और उन डिग्रियों की कीमत कुछ ना हो तो कितनी बड़ी विपदा आएगी। अभी तक कुछ विदेशी विश्वविद्यालयों की तरह भारत के विश्वविद्यालयों की डिग्री पर शंका नहीं की जाती  है।  इस  वैश्विक समय में दो-तीन प्रमुख व्यक्तियों की डिग्री के ऊपर उठे सवाल उन छात्रों की डिग्रियों  को संदेहास्पद बना देंगे। आश्चर्यजनक है की  श्रीदेवी के मौत का  मसला खोजने के लिए जिस  भारतीय मीडिया ने  जमीन आसमान एक कर दिया था उसने इस मामले में कोई गंभीर जांच नहीं की। जबकि पाकिस्तानी मीडिया ने कुछ साल पहले ऐसा किया था 

 2008 में जब राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने अपने देश में संसद सदस्य होने के लिए विश्वविद्यालय की डिग्री को अनिवार्य कर दिया था  उस समय पाकिस्तानी मीडिया ने 54 सांसदों की जाली डिग्री का पर्दाफाश कर तहलका मचा दिया था। यह मामला वहां के सुप्रीम कोर्ट तक गया था। 2012 में फिर पाकिस्तानी संविधान में संशोधन कर डिग्री की बाध्यता को समाप्त दिया गया और  जिन विश्वविद्यालयों ने  यह डिग्रीयां जारी की थी उन पर कार्रवाई नहीं हुई। 

 किसी भी देश के लिए अनिवार्य है कि उसके विश्वविद्यालयों की डिग्री वैध हो और पूरी दुनिया में   स्वीकार्य हो।  वरना यह देश के समस्त शिक्षा पद्धति पर सवाल खड़ा कर  देगी। कीनिया में राजनीतिज्ञ अपने नाम के आगे डॉक्टर लगाते हैं यह यहां का रिवाज है  इस से कोई मतलब नहीं है उन्होंने यह डिग्री कहां से हासिल की है। इसलिये वहां की डिग्री का कहीं कोई महत्व नहीं है।  बहुतों को याद होगा कि  2008 में   ईरान के राष्ट्रपति अहमदीनेजाद के बहुत करीबी एक कैबिनेट मंत्री को वहां की संसद ने इसलिए बर्खास्त कर दिया था कि उनकी ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की डिग्री जानी थी। 

    जाली डिग्रियां दुनिया भर में एक समस्या है लेकिन जिस देश में ऐसा होता है उसके शिक्षा संस्थान उन डिग्रियों के साथ क्या करते हैं यह महत्वपूर्ण है। 2012 में हंगरी के राष्ट्रपति  पॉल श्मिट को केवल इसलिए इस्तीफा देना पड़ा वहां के विश्वविद्यालय ने उनके डॉक्टरेट की डिग्री खारिज कर दी थी। एक साल पहले जर्मनी के रक्षा मंत्री  थियोडोर को केवल इसलिए इस्तीफा देना पड़ा था कि उनकी डॉक्टरेट की थीसिस में  साहित्यिक चोरी पकड़ी गई थी। मंत्रियों के साथ ही ऐसा नहीं हुआ यूरोपीय पार्लियामेंट के दो सदस्यों को भी थीसिस में साहित्यिक चोरी के लिए बर्खास्त किया गया था। 2008 में  वर्जीनिया विश्वविद्यालय ने वहां के गवर्नर की बेटी की अवैध डिग्री को रद्द कर दी थी। इस कांड में वहां के कानून ने उस विश्वविद्यालय के प्रेजिडेंट को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया था। कहने का मतलब यह है ऐसे मामलों को राजनीतिक और कानूनी क्षेत्र में कैसे लिया जाता है यह महत्वपूर्ण है।  इस समय दुनिया के दो वी आई पी नरेंद्र मोदी और तुर्की राष्ट्रपति तायेप एरडोगन का मामला कुछ वर्षों से विवाद में है।  एरडोगन के हाईस्कूल की डिग्री पर विवाद है। अगर यह मामला प्रमाणित हो जाता है तो तुर्की के संविधान के मुताबिक एरडोगन को इस्तीफा देना पड़ेगा। लेकिन वहां के अधिनायकवादी शासन ने इस मामले में अधिक जांच करने से रोक दिया है। नरेंद्र मोदी के मामले में भी कुछ ऐसा ही लग रहा है। एक तरफ तो विश्वविद्यालय और जांच एजेंसियां इस मामले में कुछ नहीं कर रही हैं संभवत: उन पर ऐसा करने के लिए दबाव है, दूसरी तरफ मीडिया की तरफ से भी कोई आवाज भी नहीं उठाई जा रही है। यह एक दुरभिसंधि की तरह लग रहा है। भारत के विश्वविद्यालयों और शिक्षा संस्थानों की साख को इससे भारी आघात पहुंचेगा।  पूरी की पूरी शिक्षा व्यवस्था के लिए जोखिम पैदा हो जाएगा। यह एक गंभीर संकट का संकेत है।

Sunday, March 4, 2018

त्रिपुरा का चुनाव परिणाम

त्रिपुरा का चुनाव परिणाम

उत्तर पूर्वी भारत के पर्वतीय राज्य त्रिपुरा  मैं भाजपा को बहुमत मिलने से चुनावी पंडित सकते में हैं। जो भाजपा के बहुत करीबी थे वह भी समझते थे कि  बढ़त सीपीएम को ही मिलेगी लेकिन मामूली अंतर से। परंतु भाजपा की विजय ने सारे समीकरण बदल  दिए। त्रिपुरा में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठित विकास , धन बल और केंद्रीय संसाधनों के नहीं पूरे होने वाले  बड़े बड़े वादे ने यह विजय दिलाई है। इसके अलावा बांग्लादेश करीब होने के कारण इस शांतिपूर्ण राज्य की राजनीति और जनसांख्यिकी  की परस्पर क्रिया भी  इसके के लिए जिम्मेदार हैं। यह राज्य कई कारणों से शांतिपूर्ण है।विगत 4 दशकों से वहां सीपीएम का शासन था और लोगों का मानना है इसका श्रेय मुख्यमंत्री माणिक सरकार   के  शांत और गंभीर  व्यक्तित्व  को जाता है। माणिक सरकार की सादगी का क्या  कहिए। वह अपनी सारी तनख्वाह पार्टी को दे देते थे और पार्टी से मिले 2,000 से कुछ  ज्यादा रुपए पर महीना भर गुजारा करते थे। उनके पास महज 2000 रुपयों का बैंक बैलेंस था। शहर अगरतला के बाहर बहन के साथ थोड़ी जमीन थी। न कार  थी ,ना मोबाइल। वे सच्चे कम्युनिस्ट थे और त्रिपुरा को उन पर गर्व था। माणिक सरकार ने सीमा पार आतंकवाद और अन्य समस्याओं के बावजूद राज्य में सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखें। वह पहले मुख्यमंत्री थे जिन्होंने सशस्त्र सेना विशेष अधिकार अधिनियम को खत्म करने का साहस किया। बंगालियों और त्रिपुरा के स्थानीय जनजातियों मैं सौहार्द्र कायम करने की कोशिश की इससे अलगाववाद की  ताकतों को प्रोत्साहन मिलना बंद हो गया। त्रिपुरा में  साक्षरता की दर 90% है और  कुपोषण भी काफी घट गया है। महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला है। कानून और व्यवस्था की स्थिति सराहनीय है तथा जनजातियों को उनके पारंपरिक अधिकार प्राप्त हुए हैं ।

    इन सदगुणों से अलग कई कारण थे जो वहां व्यवस्था विरोधी जनमत तैयार करने और हिंदुत्व ताकतों को उभरने में मददगार हुए। माणिक सरकार हार गए।  इस संदर्भ में हकीकत का विश्लेषण जरूरी है। चार दशक से बिल्कुल इमानदारी से राजकाज चलाना भर आधुनिक मतदाताओं के लिए आवश्यक नहीं है।  विशेषकर उन मतदाताओं के लिए जो पढ़े लिखे हैं रोजगार के इच्छुक हैं और वैश्विक उदारवाद के समर्थक हैं। इन्हें मतलब नहीं है दर्शन क्या है इतिहास क्या है और समाज विज्ञान क्या है। वैसे भी भारत में  " डाउनवार्ड  फिल्टर थ्योरी " कामयाब नहीं है। फिर  भी यह भारत में आकर्षण का कारण है। ठीक उसी तरह जिस तरह मुकद्दर ऊपर वाले के हाथ में है। माणिक सरकार की हार का मुख्य कारण व्यवस्था विरोधी जनमत था। वहां  कांग्रेस भी जोर आजमा रही थी  लेकिन  उसमें दूरदर्शिता का अभाव था। कांग्रेस ने दीवारों पर लिखी इबारत नहीं पढ़ी। कांग्रेस के त्रिपुरा के प्रभारी सी पी जोशी थे और वह बस एक बार त्रिपुरा  आए। दूसरी तरफ  राहुल गांधी ने भी बहुत कम दिलचस्पी दिखाई। नतीजा यह हुआ कि पार्टी के अधिकांश निर्वाचित सदस्य भाजपा में चले गए। अब कुछ ऐसा नजारा हुआ कि मतदाताओं ने कांग्रेसियों को ही वोट दिए लेकिन वह भाजपा के झंडे तले थे।  कुछ समय से त्रिपुरा में आदिवासियों और बंगालियों में तनाव चल रहा था। माणिक सरकार ने हालांकि बंगाली और आदिवासी समुदाय में बीच- बचाव और  सौहार्द्र पैदा करने  की कोशिश की थी पर सफल नहीं हो पाए थे। यही नहीं एक स्थानीय अलगाववादी पार्टी है "इंडिजेनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा"  (आईपीएफटी}, जिसे पिछले चुनाव में कोई मत नहीं मिला था। वह भी इस बार 8 सीटें जीत ली है।  यह भाजपा के साथ है। इसमें बंगाली वोटर ज्यादा है। माकपा को यहां 45% वोट मिले हैं जबकि विजयी होने के बावजूद भाजपा को 42% और आई पी टी एफ को 8%। दोनों दल मिल गए हैं। यानी, भाजपा के पास 50% वोट हो गए। लेकिन यह विश्वसनीय नहीं है। क्योंकि इसमें कभी भी फूट पड़ सकती है। त्रिपुरा में जो सबसे महत्वपूर्ण है वह है बंगाल की तरह वहां के बंगाली समुदाय में  कम्युनिज्म  को जनसमर्थन। अब अतीत में कांग्रेस बिना हिंदुत्व ताकतों के इस समुदाय के साथ कैसे समायोजित करती थी यह अभी भी एक रहस्य है। 

  बंगाल में ममता बनर्जी ने बंगाली विरासत के सभी प्रतीकों को बदलकर वामपंथियों को किनारे कर दिया ।  बांग्ला सभ्यता और संस्कृति के जितने भी प्रतीक थे चाहे वह रविंद्र नाथ  टैगोर हो या रामकृष्ण परमहंस या  अन्य कोई सबके साथ  ममता जी ने खुद को जोड़कर एक नया बिम्ब गढ़ दिया। ऐसा लगने लगा कि वह इन्हें पाकर या इनके प्रदर्शन से खुद को गर्वित महसूस करती हैं। इससे बंगाली समुदाय उनकी ओर आकर्षित हुआ। यही कारण है कि  भाजपा अपनी हर कोशिश के बावजूद बंगाल  के कई भागों  में  अपना झंडा नहीं फहरा सकी है।त्रिपुरा के चुनाव से यह आशंका है कि बंगाली समुदाय सांप्रदायिक ध्रुवों पर जमा हो सकता है। चाहे जो भी हो इसकी कीमत माणिक  सरकार को को ही चुकानी पड़ी है। 

सीताराम येचुरी और प्रकाश करात की रस्साकशी पूरे जोरों पर है। इससे  भारत में वामपंथ उसी तरह अव्यवहारिक होता जा रहा है जैसे मार्क्सवाद का दर्शन। इतिहास खुद को दोहराता है। पहले झूठ के रूप में, फिर विपदा के रूप में और फिर संकट  के रूप में। बंगाल में माकपा खत्म हो गई त्रिपुरा में हार गई अब लगता है इसका नाम किताबों में ही रह जाएगा।

बड़ाबाजार  के जरिये आई एस आई भेजता है कश्मीरी आतंकियों को धन

बड़ाबाजार  के जरिये आई एस आई भेजता है कश्मीरी आतंकियों को धन

कमांड भी ग्राउंड जीरो तक पहुंचता है बरास्ते कोलकाता

हरिराम पाण्डेय

कोलकाता : फौज और खुफिया विभाग  की हर कोशिश के बावजूद कश्मीर में उपद्रव बढ़ता जा रहा है। ना धन की आमद कम हो रही है और ना ग्राउंड जीरो पर कमांड का अभाव हो रहा है। बंगलादेश के शीर्ष खुफिया एजेंसी एन एस आई के एक उच्चाधिकारी के अनुसार इसका " क्लू " कोलकाता में है।  उक्त अधिकारी ने इंटरनेट प्रोटोकोल पर सन्मार्ग से लम्बी बातचीत में बताया कि बंगलादेश के कट्टरपंथी संगठनों को पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आई एस आई  सोना भेजती है। इस सोने को विशेष कूरियर के जरिये कोलकाता भेजा जाता हैं। पुलिस और निगरानी संस्थाओं की आंखों में धूल झोंकने की गरज से देश में घुसते ही यह सोना ऐसे लोगों को सौंप दिया जाता है जो जो बंगाली या बंगलादेशी ना दिखें। वे पहले से ही आई एस आई द्वारा निर्देशित होते हैं। आम तौर पर इन दिनों तमिल और कन्नड़ युवकों का उपयोग किया जा रहा है। ये लोग सोना बड़ा बाजार लाते हैं। यहां बड़ा बाजार के " कंक्रीट के जंगलों " की तरह बने मकानों में खास किस्म की भठ्ठी लगी है , जिसमें उस सोने को तत्काल डाल दिया जाता है। पिघल कर उसका स्वरूप बदल जाता है। वह एक ब्लॉक की शक्ल का हो जाता है। इस गोल्ड ब्लॉक को आई एस आई के निर्देश के अनुसार बढ़ा बाजार के " कुछ खास " सुनारों को दे दिया जाता है। अभी लगभग दो हफ्ते पहले ढाका एयरपोर्ट के समीप सोने के साथ गिरफ्तार एक युवक ने कोलकाता के उन " कुछ खास " सुनारों में से 6 - 7 लोगों  के नाम बताया है। हैरान करने वाली बात है कि सब के सब बड़ाबाजार के ही हैं।

 इस तरह आये हुये सोने की कीमत बाजार की कीमत से कम से कम 30 प्रतिशत कम होती है और  कुलमिला कर उन्हें लगभग 40 प्रतिशत कम दाम पर सोना मिलता है। अब यह कैश इलाहाबाद, मेरठ, पठानकोट और जोधपुर में हवाला के जरिये ट्रांसफर कर देते हैं। यहां से कैश कश्मीर में पूर्व निर्देशित आदमी को पहुंचा दिया ​जाता है। 

कैसे पहुंचता है निर्देश

निर्देश का बड़ा ही क्लिष्ट नेटवर्क है। इस्लामाबाद से सीधा कोलकाता संदेश आता है। यहां पूर्व कोलकाता की बस्तियों में छोटे-छोटे ट्रांसमिशन सेंटर बनाये गये हैं। इन सेंटर्स पर सीधा इस्लामाबाद से " वॉयस ओवर इंटरनेट प्रोंटोकोल " पर कॉल आती है। उस कॉल में नम्बर बताया जाता है। अब उस कॉल को  यहां " जी एस एम टर्मिनेशन डिवाइस " नाम के एक डवाइस के जरिये साधारण गेबाइल कॉल में बदलकर बताये गये नम्बर से जोड़ दिया जाता है। लगता है यह देश के किसी नम्बर से फोन आया है। चूंकि  " जी एस एम टर्मिनेशन डिवाइस " में जोड़े जाने के कारण आवाज की वेव लेंथ बहुत कम हो जाती है अतएव उसकी मॉनिटरिंग कठिन हो जाती है। अगर मॉनिटरिंग कभी हो भी जाय तो सुनने में एक दम सात्विक किस्म की बात लगती है। मसलन, " यार कोई पार्टी वार्टी नहीं दे रहे हो। चार वर्ष हो गये। एक जलसा लगाओ , यारों को बुलाओ सब यार बैठ कर मौज करेंगे। " यानी कोई एक्शन हुये चार हफ्ते हो  गये। कोई एक्शन करो। पैसा भेजा जा चुका है। देखने सुनने में लगेगा कि यह बात कोलकाता से मेरठ या किसी अन्य शहर  के किसी दोस्त से हो रही है। उस आदमी को मालूम है कि यह रिकार्डेड संदेश कश्मीर के किस हिस्से में किसे देना है यानी टार्गेट रिसीवर कौन है, कहां है। अगले 48 घंटों में यह संदेश उस टार्गेट रिसीवर तक पहुंच जाता है। रुपयों के साथ भी ऐसा ही होता है।  

आई एस आई की इस कारगुजारी से ना केवल कश्मीर जल रहा है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरा बढ़ता जा रहा है। खालिदा जिया के जेल जाने के बाद बंगलादेश की हालत बहुत तेजी से बिगड़ रही है, कभी भी कुछ हो सकता है।