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Tuesday, October 25, 2016

सपा का घमासान एक नया संकेत

सपा का घमासान एक नया संकेत

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने कल बता दिया कि वे धृतराष्ट्र नहीं हैं। ना अंधे हैं और ना पुत्रमोह से ग्रस्त हैं। लेकिन यह ट्रेजेडी है कि उन्होंने अपने पुत्र और अपनी पार्टी के खिलाफ अमर सिंह तथा भाई शिवपाल सिंह द्वारा की जा रही साजिशों के प्रति आंखें जरूर बंद किये रहे। सोमवार को लखनऊ में उन्होंने पार्टी के विधायकों की एक बैठक में अपने पुत्र और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह का जमकर खिंचाई की। यही नहीं एक तरह से उन्होंने अपने पुत्र को भी सभा में बुरी तरह से डांटा और बात में सलाह दी कि अपने चाचा शिवपाल सिंह के गले लग जाओ। लेकिन गले मिलने से जन्मी उष्मा ज्यादा देर नहीं कायम रह सकी और चंद मिनटों के दरम्यान ही अखिलेश सिंह ने कहा कि उनके समर्थकों ने बताया है कि अमर सिंह एंड कम्पनी ने एक अखबार में एक खबर छपवाई है जिसमें उन्हें शाहजहां और मुझे औरंगजेब कहा गया है। इससे अखिलेश और शिवपाल सिंह में थोड़ी धक्कामुक्की और कहा सुनी हो गयी। शिवपाल सिंह ने उन्हें झूठा कहा और माइक छीनने की कोशिश की। परिवार की कलह अपनी सारी विद्रूपताओं के साथ चौराहे पर आ गयी। शिवपाल सिंह ने आरोप लगाये कि अखिलेश ने भाजपा की मदद से पार्टी को तोड़ने का प्रयास किया है। कहासुनी के दौरान दोनों ने अपनी मांगों को बी रखा। अखिलेश ने कहा कि वे टिकट बटवारे में खुदमुख्तारी चहहते हैं तो शिवपाल सिंह ने कहा कि वे पार्टी चलाने में आजादी चाहते हैं। दोनों में कोई मेटमाट नहीं हो सका। बाद में दोनो अकेले में मुलायम सिंह से मिले। थोड़ी देर के बाद जब वे दोनो घर से बाहर निकले तो अखाबरों का कहना है कि दोनो के चेरे पर मुस्कुराहट थी। मुलायम सिंह ने अमर सिंह, शिवपाल, गायत्री प्रसाद प्रजापति और मुख्तार अंसारी के प्रति अपना रुख एकदम स्पष्ट कर दिया। उन्होंने साफ कह दिया कि शिवपाल अपनी कुर्सी मुझे देकर जमीन पर बैठ सकते हैं। वे पार्टी के ग्रासरूट नेता हैं। अमर सिंह के बारे में मुलायम सिंह ने कहा कि अगर वे उन्हें नहीं बचाये होते तो मैं सात साल के लिये ‘भीतर’ हो जाता। जिस जेल की बात वे कर रहे हैं वह संभवत: उनके मुख्यमंत्रित्व काल में अघोषित धन का मामला था। मुलायम सिंह ने अखिलेश सिंह यादव को यह अच्छी तरह समझा दिया कि मुख्यमंत्री बने रहना तो बने रहो पर पार्टी मामलों में टांग मत अड़ाओ। मुलायम सिंह ने अपने भाषण में कुछ नहीं छोड़ा। उन्होंने अमर सिंह के बारे में यहां तक कह दिया कि वे हमारे भाई हैं और मैं उन्हें नहीं छोड़ सकता। मुलायम सिंह ने पार्टी के नाताओं को भी एक तरह से सबक दिया। उन्होंने साफ कहा कि मंत्री पद मिल जाने के बाद लोगों का दिमाग खराब हो गया है और नेताओं ने चापलूसी का धंदा बना लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि मैंने ौजवानों को सबसे ज्यादा सममान दिया है और कोई यह ना जाने कि नौजवान मेरे साथ नहीं हैं। पर अखिलेश अपनी जिद्द पर कायम थे। वे लगातार अमर सिंह के खिलाफ बोलते रहे। सभास्थल से बाहर निकलने के बाद वे अपने नौजवान समर्थकों और दर्जन भर मंत्रियों के साथ फिर बैठे। लेकिन मुलायम सिंह ने उनकी औकात बता दी। उन्होंने यह बता दिया कि अखिलेश सिंह राजनीतिक तौर पर एकाकी है और देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री का पद भी जा सकता है। पार्टी ने अखिलेश सिंह यादव के सभी विकासमूलक कार्यो को खारिज कर दिया और पार्टी के नेताओं तथा जनता के सामने अखिलेश की किरकिरी कर दी। ऐसे में अब अखिलेश सिंह यादव के पास बहुत विकल्प नहीं बचते हैं सिवा इसके कि वे अपना मान बचाने के लिये इस्तीफा दे दें या फिर रबर स्टाम्प की मानिंद पद पर बने रहें। कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि इस बैठक में कोई सुलह नहीं हुई है और ना उम्मीद है कि सुलह होगी। डर इस बात का है कि कहीं मुख्यमंत्री राज्यपाल से मिलकर विधानसभा भंग किये जाने का प्रस्ताव ना कर दें। या यह भी हो सकता है कि मुलायम सिंह अपने पुत्र अखिलेश सिंह को अपनी कुर्सी देकर राष्ट्रीय अध्यक्ष ना बना दें। दोनो स्थितियों में पार्टी का टूटना तय है। चुनाव के पूर्व यह घटना य पी में एक नये राजनीतिक समीकरण का संकेत दे रही है। 

Monday, October 24, 2016

पाक में एक और तख्तापलट की सुगबुगाहट

पाक में एक और तख्तापलट की सुगबुगाहट

हाल में टाइम्स अखबार  में सिरिल अलमिडा के एक लेख में पाकिस्तान में सेना और राजनीतिक नेतृत्व में भारी तीखेपन का खुलासा हुआ है। उसमें कहा गया है कि ‘  सरकार ने सेना को चेताया है कि आतंकवाद को बढ़ावा देने के कारण दुनिया में उसे बिरादरी बाहर किया जा रहा है। ’  पाकिस्तान के पंजाब सूबे के मुख्यमंत्री शाहबाज शरीफ ने यहां तक कहा है कि जब भी आतंकी शिविरों या आतंकी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की जाती है तो आई एस आई उनके बचाव में आ जाती है। लेख में तो यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान में  इस मसले को लेकर कई बार पंजाब के मुख्य मंत्री और आई एस आई प्रमुख में कहासुनी भी हो गयी है। यहां बताना उचित होगा कि शहबाज शरीफ प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के छोटे भाई हैं। पाकिस्तान के विदेश सचिव ऐजाज चौधरी​ ने एक मीटिंग में कहा कि चीन सहित कई देशों ने पाकिस्तान से कहा है कि वह हाफिज सईद, मसूद अजहर, लश्करे तैयबा , जैशे मोहममद और हक्कानी ग्रुप इत्यादि पर कार्रवाई करे तथा पठान कोट हमले की जांच पूरी कर ले। लेकिन दूसरी तरफ वहां की फौज जो खुद को देश का रक्षक बताती है वह इससे गुरेज कर रही है। सेना पाकिस्तान पर एक तरह से विगत 33 सालों से शासन कर रही है। पाकिस्तानी फौज के प्रमुख अबी भी देश के सबसे ताकतवर इंसान हैं और सेना ही वास्तविक शासक है। पाकिस्तान में जो बी राजनीतिक नेता सेना से इत्तफाक नहीं रखता है उसे खत्म कर ​दिया जाता है या उसका तख्ता पलट दिया जाता है। जुल्फीकार अली भुट्टो और बेनजीर भुट्टो की मिसाल सामने है। नवाज शरीफ का तख्ता उनके  पहले कार्यकाल में पलट दिया गया था। नवाज शरीफ ने ही जनरल राहील शरीफ को सेना प्रमुख बनाया। हालांकि राहील शरीफ ने उनका तख्ता नहीं पलटा लेकिन विदेशी मामलो सहित भारत , अफगानिस्तान और अमरीका जैसे देशों के मामलात अपने हाथ में ले लिया है। उसमे नवाज शरीफ या उनकी सरकार की कुछ नहीं चलती। पाकिस्तानी फौज ने वजीरिस्तान में आतंकियों के खिलाफ जर्बे अज्ब अभियान चलाया। नवाज शरीफ इस अबियान के पक्ष में नहीं थे। क्योकि वे आतंकियों से वार्ता का वायदा करके ही गद्दी पर पहुंचे थे। हलांकि सेना ने उस अभियान में केवल ‘शैतान आतंकियों ’ को ही मारा ‘साधु आतंकी बचे रह गये। ’ सेना के नियंत्रण वाला एक और संगठन आई एस आई  भारत के खिलाफ एक हल्का फुल्का युद्ध आरंभ कर चुका है। जिन आतंकी संगठनों और नेताओं से उसका अच्छा संबंध है वह सब ‘साधु आतंकी ’ कहे जाते हैं। दुनिया में जितनी आतंकी घटनाएं होती हैं सबसे परोक्ष या प्रत्यक्ष सम्बंधह पाकिस्तान का होता है। सार्क सममेलन का टल जाना बी पाकिस्तान की प्रतिष्ठा पर आघत पहुचाया है। इसके बाद कश्मीर पर अपने देश की स्थिति बताने तथा उस जानकारी पर दुनिया को यकीन दिलाने के लिये पाकिस्तान ने अपने 22 सांसदों को बिबिनन देशों में भेजा है। उन देशो के नेताओं में से कुछ ने तो बस कूटनीतिक चुपपी सादा रही और कुछ देशों ने प्रतिगामी प्रतिक्रियायें दीं। पाकिस्तान सरकार का यह भी कहना है कि इन देशों में से किसी ने भी बारत के सर्जिकल हमले को गलत नहीं बताया। रूस के राहष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतीन और अमरीकी सीनेट के एक सदस्य ने तो खुल्लम खुल्ला भारतीय कार्रवाई का समर्थन किया। पाकिस्तान को मुस्लिम देशों से सदा समर्थन मिलता रहा है पर इस बार किसी मुस्लिम मुल्क ने पाकिस्तान के समर्थन में बयान नहीं दिया। उल्टे सऊदी अरब ने अपना सबसे बड़ा नागरिक सम्मान  ‘किंग सलमान बिन अब्दुल अजीज’ इस बार मोदी जी को दिया और यही नहीं अबू दाबी के युवराज के शेख मुहममद बिन जायेद अल नहयान इस बार गणतंत्र दिवस समारोह मुख्य अतिथि होंगे। वर्तमान सेनाध्यक्ष राहील शरीफ इस साल नवम्बर में रिटायर कर रहे हैं। सरकार को सेनाध्यक्ष चुनना होगा। विश्लेषकों का मत है कि यही अवसर है जब सरकार आई एस आई पर दबाव दे सकती है कि वह आतंकियों को मदद देना बंद करे। अब डर है कि सर्जिकल स्ट्राइक का बदला लेने के लिये पाकिस्ताननी आतंकी बारत में खास कर कश्मीर में कोई बड़ी कार्रवाई कर सकते हैं। इसी आशंका के कारण पाकिस्तान सरकार चाहती है कि आतंकियों को काबू में रखा जाय। इधर पाकिस्तान की सेना भारत पर हमला नहीं कर सकती है अब एक ही रास्ता बचता है कि सेनाध्यक्ष राहील शरीफ प्रधानमंत्री पर दबाव डालें कि वह उनका कार्यकाल बढ़ा दें। अगर नवाज शरीफ उनकी बात नहीं मानते हैं तो एक और तख्ता पलट की प्रबल संभावना है। 

Sunday, October 23, 2016

जाना रीता बहुगुणा जोशी का भाजपा में

जाना रीता बहुगुणा जोशी का भाजपा में

रीता बुगुणा जोशी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की एक महत्वपूर्ण नेता थीं। उन्होंने कांग्रेस छोड़ कर भाजपा का दामन थाम लिया। लेकिन लगता है कि कांग्रेस को इसकी बिल्कुल चिंता नहीं है। हालांकि मीडिया में यह बारम्बार कहा जा रहा है कि कांग्रेस को इससे भारी झटका लगेगा पर कांग्रेस की बड़े नेताओं का दावा है कि रीता बहुगुणा जोशी का जनाधार नहीं था इसलिये उत्तरमेश विधान सभा चुनाव पर उनके निष्क्रमण का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। कांग्रेस के नेताओं ने 2012 के उत्तर प्रदेश चुनाव के परिणाम का हवाला देकर कह रहे हैं कि जब रीता बहुगुणा जोशी यू पी कांग्रेस की प्रमुख थीं तो कुछ बना नहीं पायीं तो अब क्या बिगाड़ लेंगी। 2012 के चुनाव परिणाम खुद ही बहुत बातें बता रहे हैं। उस चुनाव में पार्टी की खराब हालत के लिये खुद को जिम्मेदार बताते हुये रीता जी ने प्रदेश कांग्रेस प्रमुख के पद से इस्तीफा दे दिया था। यहां तक कि 2014 के चुनाव में वे लखनऊ में राजनाथ सिंह से 2.7 लाख वोट से हार गयीं थीं। 2012 के चुनाव परिणाम के बाद जब यू पी कांग्रेस का नेतृत्व नयी टीम को सौंपा गया जिसमें शीला दीक्षित को मुख्य मंत्री के रूप में पेश किया गया और पार्टी की कमान राज बब्बर को सौंपी गयी उसी समय यह जाहिर हो गया था कि रीता जी पार्टी छोड़ेंगी। उनके भाई विजय बहुगुणा भी उत्तराखंड से भाजपा में शामिल हो चुके हैं। पिछले महीनों से जो बदलाव दिख रहा था उसमें रीता बहुगुणा के पास कोई विकल्प बचा भी नहीं था। उन्हें बिल्कुल दरकिनार कर दिया गया था। यहां तक यू पी कांग्रेस कमिटी में भी उनकी कोई भूमिका नहीं दिखती थी और राजमर्रा के काम काज से उन्हें अलग ही रखा जाता था। इसी तरह की कुछ महीने पहले एक घटना हुई। यू पी कांग्रेस कमिटी के नेता ​आने वाले विधान सभा चुनाव की रणनीति पर विचार करने के लिये नयी दिल्ली में ए आई सी सी के कार्यालय में एकत्र हुये थे। वहां रीता जी को नहीं बुलाया गया था। जब उन्हें यह बात चली तो वे अचानक वहां जा पहुंचीं। उनका इस तरह आना देख कर वहां उपस्थित मीडिया कर्मी चौंक गये। बाद में पता चला किजबसे यू पी कांग्रेस का काम नयी टीम ने संभाला है तबसे उनके साथ अक्सर ऐसा होता है। इसके कुछ दिन बाद ही सरगोशियां होने लगी कि रीता बहुगुणा भाजपा में जा रहीं हैं पर कांग्रेस  इसे निराधार अफवाह कहती रही और बताती रही कि वे अस्वस्थ हैं इस लिये पार्टी कार्यक्रमों आ जा नहीं रहीं हैं। यहां तक कि उनके पति पी सी जोशी ने भी बयान दिया था कि रीता जी के गले में कुछ इन्फेक्शन है इसलिये ​उनका कहीं आना जाना मुश्किल है। अब वे क्या कहतीं। उनके भाई विजय बहुगुणा ने भी भाजपा में रीता बहुगुणा के आने की खबरों का खंडन किया था। जबकि वे खुद चार माह पहले कांग्रेस से भाजपा में आ गये थे। रीता बहुगुणा अचानक राहुल गांधी की आलोचना करने लगीं और कहने लगीं कि राहुल गांधी को यू पी लोग नापसंद करते हैं। उनका कहना था कि राहुल गांधी पार्टी या संगठन को समझते ही नहीं हैं और ना कार्यकर्ताओं की सुनते हैं। वे नरेंद्र मोदी की बड़ाई करते नहीं थकतीं। उन्होंने राहुल गांधी के अलावा पार्टी के रणनीतिकार प्रशांत किशोर की आलोचना किया करतीं थीं। भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने कहा कि दुखद यह है कि पार्टी को प्रशांत किशोर को ठेके पर दिया गया है। रीता बहुगुणा के आरोपों के जवाब में कांग्रेस ने उन्हें दगाबाज कहा और साथ ही कहा कि पार्टी बदलना उनके परिवार की  आदत है। यह तो पहले ही साफ हो चुका है ीकि यू पी का चुनाव कांग्रेस के हाथ से निकल गया है पर रीता बहुणा का जाना कांग्रेस नेतृत्व पर उंगली उठाता है। यही नहीं पार्टी के कार्यकर्त्ता भी यह महसूस करने लगे हैं कि शीर्ष पर राहुल गांधी के रहते हुये संगठन को फिर से ताकतवर बनाना बड़ा कठिन काम है।

Friday, October 21, 2016

कौन सच है समझ में नहीं आता

कौन सच है समझ में नहीं आता

विदेश सचिव एस जयशंकर के हवाले से अखबारों में सर्जिकल स्ट्राइक की जो खबर आयी है और वह सच है तो सचमुच॑ेश के शीर्ष कूटनीतिज्ञ ने एक नयी मुसीबत खड़ी कर दी है। उन्होंने कहा है कि अबसे पहले भी सर्जिकल स्ट्राइक हुये हैं। उनकी इस बात से देश के सुरक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर का वह बयान कि 29 सितम्बर का सर्जिकल स्ट्राइक अद्वितीय था पहली बार ऐसा किया गया था। यह बयान विदेशी मामलों पर संसद की स्थाई समीति में विदेश सचिव एस जयशंकर द्वारा  दिया गया था। इस दौरान वहां सुरक्षा सचिव, सेना के उप प्रमुख और गृह मंत्रालय में सुरक्षा मामलों के विदेश सचिव भी उपस्थित थे। अखबारों की खबर के मुताबिक , वहां कहा गया कि ‘अबसे पहले भी सीमित क्षमता,टार्गेट स्पेसिफिक आतंक विरोधी’ हमले किये गये हैं। अलबत्ता इसबार सरकार ने इस हमले को नीतीगत तौर पर सार्वजनिक कर दिया। यही नहीं अखबारों में श्री जयशंकर के हवाले से यह भी कहा गया है कि ‘अगर आप पूछते हैं कि पहले भी इस तरह के नपे तुले हमले हुये हैं तो मेरा कहना है कि हां हुये हैं और अगर आप पूछते हैं कि क्या उन हमलों में कामयाबी मिली थी तो मेरा जवाब होगा कि हां मिली थी।’ बस फर्क यह था कि इस बार हमने कुछ कूटनीतिक कारणों से इस कार्रवाई को  उजागर कर दिया। अगर ये बातें सही हैं तो सरकार जो अब तक कहती आयी है उसमें भारी पोल दिखता है। सरकार ने सीना ठोंक कर कहा था कि ऐसा हमला पहली बार हुआ है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी हालांकि इस मामले पर कुछ दिन चुप रहे पर बाद में वे भीजोशो खरोश्ह से यह कहने में जुट गये कि ‘ऐसा हमला पहली बार हुआ है।’ पिछले पखवाड़े अपने कई भाषणों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सैनिकों को इसके लिये शाबाशी दी है। उन्होंने कई बार जनता से अपील की है कि ‘अगर उन्हें कोइै सैनिक दिखता है तो वे रुकें और सलाम करें।’ गत 18 अक्टूबर को हिमाचल प्रदेश के मंडी में उन्होंने एक सभटा में कहा था कि ‘अबतक दुनिया में इसराइली फौज ही ऐसा करती आयी है पर थ्अब हमारे सैनिकों ने दिखा दिया कि उनमें भी क्षमता है।’ जयशंकर के बयान से पता चलता है कि नेताओं की बाते सच नहीं हैं। इस बयान से कांग्रेस को भी लाभ पहुंचा है। कांग्रेस लगातार कहती आयी है कि यूपीए के जमाने में ऐसे तीन हमले किये गये थे पर सबने उसे मखौल बना दिया। दिलचस्प बात यह है कि पूर्व सेनाध्यक्ष बिक्रम सिंह का भी कहना है कि यह कोई नयी बात नहीं है। लेकिन अभी जयशंकर के बयान पर  विदेश मंत्रालय ने कोई टिप्पणी नहीं की है। अतएव इस पर सरकार डका रुख अभी अज्ञात है। खबरों को अगर सही माने तो यह भी चर्चा है कि विदेशी मामलों की स्थाई संसदीय समिति ने जब जयशंकर से ताजा सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगे तो उन्होंने कहा कि सेना वहां आतंकी शिविरों को नष्ट करने गयी थी सबूत इकठ्ठा करने नहीं। खबरों के मुताबिक , उस बैठक में उपस्थित सेना के उप प्रमुख विपिन रावत ने कहा कि सेना तीव्र और समयबद्ध ऑपरेशन के लिये गयी थी। उसे एकदम विशिष्ट लक्ष्य दिया गया था वह सबूत एकत्र करने नहीं गयी थी। कथित रूप से रावत ने समिति के सामने कहा है कि ‘कुछ सबूत हैं सेना के पास। इससे संकेत मिलता है कि विदेशी मीडया सहित कई हल्कों द्वारा इस हमले पर उठाये जा रहे सवालों को सरकार जानबूझ कर नजरअंदाज कर रही है। ’ इस हमले को लेकर राजनीतिक अभियान तेज हो रहा है। प्रधानमंत्री भी इससे न केवल जुड़ते जा रहे हैं बल्कि दिनोंदिन वे अपने भाषणों में हमले के ताप को बढ़ाते भी जा रहे हैं।  लेकिन दूसरी तरफ यह बहुत तेजी से विवाद का मसला बनाता जा रहा है। सुरक्षा के मामले पर इस तरह तू तू मैं मैं से अविश्वास का माहौल बनता है जो कालक्रम के अनुसार देश और सेना के नैतिक पराक्रम को घटाता है। 

महाशक्तियां मोदी को कम कर के ना अांकें

महाशक्तियां मोदी को कम कर के ना आंकें

ब्रिक्स का शोर थम गया और इसी के साथ एक नयी फुसफुसाहट चारों तरफ सुनी जा रही है कि ‘क्या मोदी जी आतंकवाद और पाकिस्तान पर कुछ ज्यादा नहीं बोल गये? क्या मोदी जी का पाकिस्तान पर इस तरह हमला हानिकारक होगा? क्या यह नही दिखाता है कि भारत की अपेत्र्क्षाएं बहुत ज्यादा है और वह अपने छोटे पड़ोसियों को सताना चाहता है? ’ इसके निष्पक्ष उत्तर की जरूरत है। निष्पक्ष इसलिये कि मोदी जी की हर बात एक तरह से प्रिज्म से गुजरती है। बाहर निकलते ही देश के राजनीतिक दलों द्वारा उसके कई अर्थ निकाले जाने लगते हैं।  अपने देश में विदेश नीति के मामले में इन दिनो कूटनीति और सुरक्षा के परीक्षित सिद्धातों को सियासत के कारण ताक पर रख दिया जा रहा है। अपी बातों में पाकिस्तान का नाम लिये बगैमोदी जी ने ब्रिक्स सम्मेलन में पाकिस्तान को ‘खास जजीरा या आधार पोत’ कहा। उन्होंने कहा कि दुनिया भर का आतंकवाद इस आधार पोत से जुड़ा है। उनहोंने कहा कि पाकिस्तान ऐसे विचारों का सम्पोषण करता है जिससे समझा जा सके कि राजनीतिक हित के लिये आतंकवाद जरूरी है। चूकि माहेदी जी ने यह बात ब्रिक्स के प्रतिबंधित सत्र में कही इस लिये इसके लिखित बयान कहीं जर्वजनिक नहीं किये जा सके लेकिन क्या कहा गया इसे बताने के लिये नेताओं पर पाबंदी नहीं थी। मोदी जी ने अपने भाषण के दौरान पाकिस्तान को अलग थलग करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि आतंकवाद पाकिस्तान का ‘दुलरुवा’ औलाद है। और यह औलाद मां बाप के चरित्र का भी बयान करता है। इसी के साथ मोदी जी ने पाकिस्तान का नाम लिये बगैर बताया कि वह कैसे हर वक्त हमारे काम काज में दखल देता है। इसके पहले देश के किसी प्रदानमंत्री​ ने दुनिया के सामने पाकिस्तान पर इतने प्रहार नहीं किये थे जितने मोदी जी ने गोवा में 16 अक्टूबर को किये। हालांकि उन्होंने इसे दुनिया भर के लिये कहा पर निशाना पाकिस्तान ही था। उन्होंने साफ कहा कि आतंकवाद का पोषण करने वालों को यह समझ लेना चाहिये कि वह अपनी हरकत से बाज आ जाये वरना सभ्य दुनिया में वह अलग थलग कर दिया जायेगा। अब इसमें समस्या यह है कि इतनी बड़ी बड़ी बातें हुईं और सब देशों ने सैद्धांतिक रूप से इसे माना भी लेकिन यहां भी वही चीज दिखी कि जहां महाशक्तयों का हित जुड़ा था वहां केवल सबकुछ छिछले तौर पर कहा सुना गया। ब्रिक्स में ही देखें, उसमें जो घोषणापत्र जारी हुआ उस पत्र में आतंकवाद पर पांच पैराग्राफ हैं पर कहीं भी किसी देश का नाम नहीं है। यहां तक कि परोक्ष तौर भी कुछ नहीं कहा गया है। पाकिस्तान पर निशाना साधने के लिये या कहिये कि मोदी जी पर मरहम लगाने के लिये घोषणा पत्र में यह तो कहा गया है कि आतंकवादथ् केखिलाफ सबको एकजुट होना चाहिये और हर देश को अपनी रक्षा के लिये आतंकवादियों या उनके अड्डों पर हमला करना कर्त्तव्य है। पर इससे यह कहीं नहीं जाहिर होता है कि मोदी जी ने ो किया वह जायज था या उनकी कार्रवाई का किसी ने किसी रूप में समर्थन किया हो अथवा उचित बताया हो। ब्रिक्स के अंत में मोदी जी ने अपने प्रेस कांफ्रेंस में भी कहा कि , जो देश आतंकवाद को समर्थन देते हैं या उसका उसका पोषण करते हैं वे भी हमारे लिये उतने ही घातक हैं जितने खुद आतंकवादी।  मोदी जी ने जो कहा वह यकीनन पाकिस्तान को ही लक्ष्य करके कहा पर यह सब किसी औपचारिक घोषणापत्र का हिस्सा नहीं बन सका। लेकिन यही जरूरी था। अतएव पाकिस्तान को अलग थलग करने की गोवा में मोदी की सारी कोशिशें व्यर्थ हो गयीं। उड़ी हमले के बाद भारत को यह दुनिया को बताना होगा कि आतंकवाद के मामले में हरबार पाकिस्तान का नाम लेना जरूरी नहीं है। यह तो दुनिया ने समझ लिया है। सच भी है कि 1990 के बाद ने पाकिस्तान के खिलाफ कभी फौज का उपयोग नहीं किया। बेशक कुछ गोपनीय कार्रवाई की गयी। इसबार जो हुआड उससे बौद्धिक समुदाय को यह समझ लेना चाहिये कि पाकिस्तान हरवक्त जो बोलता रहता है कि सेना के प्रयोग से युद्ध भड़क उठेगा , यह गलत है।  ब्रिक्स सम्मेलन में जहां चीनी प्रधानमंत्री भी उपस्थित थे, मोदी को अवसर मिल गया यह बहताने का कि पाकिस्तान के मामले में भारत की नीति बदल चुकी है।  हालांकि भारत को यह उम्मीद नहीं है कि ब्रिक्स देशों के नेता इसमें कोई मदद करेंगे पर कूटनीति में यह जरूरी होता है कि महाशक्तियां खास कर चीन और रूस अच्छी तरह समझ लें कि अगर वह देश अपना रवैया नहीं बदलेगा तो भारत छोड़ेगा नहीं। इससे हो सकता है वे महाशक्तियां पाकिस्तान को सलाह दे कि रास्ता बदल दो। अब जरूरी है कि मोदी पाकिस्तान पाकिस्तान चिल्लाना बंद करें और महाशक्तियों को बतायें कि वे पाकिस्तान पर दबाव डालें कि ताकि वह अपना रवैया बदल दे। चीन के विदेश मंत्री या राष्ट्रपति का यह कहना असरदार नहीं होगा कि ‘आतंकवाद के कारण पाकिस्तान ने बहुत  कुर्बानियाहं दी हैं।’ जरूरी है कि इस विचार को बदला जाय। भारत का हमला आतंकवादी संगठनों पर हुआ था और यह पाकिस्तान राष्ट्र के लिये कुर्बानी कहना तो आतंकवाद  का समर्थन करने की तरह है।