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Thursday, September 13, 2018

हिंदी: " पुरंदर ने पवि से लिखा है..."

हिंदी: " पुरंदर ने पवि से लिखा है..."
औपनिवेशिक शासकों ने हमारे विचारों को गुलाम बनाने के लिए हमारी भाषा और हमारी संस्कृति को किनारे कर दिया। हम अपनी संस्कृति और अपनी भाषा से विमुख हो जाएं इसके लिए उन्होंने तरह-तरह के प्रपंच रचे। इतिहास को दूषित किया, दर्शन का स्वरुप बदल दिया। यही कारण है यह हमारी मातृभाषा हिंदी राजभाषा बन गई  यह एक साजिश थी और हम आज भी उस साजिश के शिकार हैं। हमारे लोकतंत्र में चाहे जो भी कहा जाता हो लेकिन हम अभी तक अपने देश की एक भाषा को मान्यता नहीं दे सके और जो भाषा है उसे तकनीकी चोला पहनाकर राजभाषा का नाम दे दिया गया। भाषा  भाषिक ध्वनि से शाब्दिक बिंबों का विकास है। वही शाब्दिक बिंब हमारी अभिव्यक्ति के साधन हैं। हमारा देश बहुभाषिक है और समस्त भाषाएं संस्कृत से जुड़ी हैं। औपनिवेशिक काल में संस्कृत और संस्कृति के ह्रास  के लिए अंग्रेजी को अर्थकरी भाषा बना दिया गया यानी उसे रोजगार से जोड़ दिया गया और संस्कृत हाशिए पर आ गई। अभ्यास की न्यूनता के कारण धीरे-धीरे उसका क्षरण होता गया और अंततः इसका स्वरूप जटिल हो गया।  परिणाम हुआ कि उसका प्रसार सिकुड़ता गया। आजादी के बाद जो विशिष्टतावादी थे  उन्होंने अंग्रेजी को कायम रखने पर बल दिया। वक्त के हकीमों ने दोनों भाषाओं को कायम रखने का मध्यमार्गी कौशल अपनाया। नतीजा यह हुआ हिंदी जो हाशिए पर थी वह हाशिए पर रही और अंग्रेजी विकसित होती गई। हिंदी अभी तक सार्वभौम रोजगार की भाषा नहीं बन सकी है और दुर्दिन झेल रही है । यद्यपि , हिंदी हजारों वर्ष पुरानी भाषा संस्कृत से जुड़ी है किंतु इसकी उम्र बहुत ज्यादा नहीं है। इसके भीतर निहित ऊर्जा इतनी ज्यादा थी के इसने अपनी छोटी सी उम्र में उस हुकूमत की  नींव को झकझोर दिया जिसके साम्राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था। छोटी सी उम्र में इस भाषा ने भारतीय मानस, उसकी मनीषा और उसके आत्मबोध से वह संबंध बना लिया जो राष्ट्रीय चेतना का पर्याय बन गया। हिंदी केवल भाषा नहीं एक संस्कृति की स्मृति का स्वप्न भी बन गई । हमारी स्मृतियां पश्चिमी दर्शन के अनुरूप अतीत की भांति व्यतीत नहीं है बल्कि हमारी स्मृतियां अतीत के आगे बढ़ता हुआ वर्तमान हैं। हीगल और मैक्स मूलर जैसे भारतविदों ने हमारे इतिहास को खंडहरों में दफना एक काल बताया लेकिन वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं
पुरंदर ने पवि से लिखा है 
अस्थि युग का मेरा इतिहास
सिंधु सा विस्तृत और अथाह 
एक निर्वासित का उत्साह 
दे रही अभी दिखाई 
भग्न मग्न वह रत्नाकर में राह
हमारे पूर्वजों ने उन भारतविदों को बताया यह देश ग्रीकोरोमन सभ्यता का अवशेष नहीं है बल्कि एक जीवित संस्कृति है और उसकी भाषा स्वयं में एक मंत्र है। हमारी लिपि ब्रह्मांड के विभिन्न प्रकाश तरंगों का ऐसा दृश्यात्मक स्वरूप है जो अपौरुषेय है। ए एल बाशम जैसे इतिहासकारों ने लिखा है कि भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी वर्णमाला है। जिस भाषा की वर्णमाला इतनी ऊर्जावान है उसकी स्वयं की ऊर्जा का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है और इसी ऊर्जा से आतंकित मैकाले ने कहा था "वैचारिक स्वतंत्रता की जड़ें हिंदी में निहित है इसलिए जरूरी है कि अंग्रेजी को विकसित करने के लिए हिंदी को समूल उखाड़ दिया जाए।" यह एक साजिश थी और आम भारतीय हिंदी को अंग्रेजी के चश्मे से देखने लगा। अब जब भी हिंदी की बात सामने आती है तो अंग्रेजी चश्मा धारी भारतीय इसे संस्कृत से जोड़ लेते हैं और इसकी राह में अवरोध खड़े करने लगते हैं।  हिंदी एक अत्यंत आधुनिक भाषा है। इसके समस्त साहित्य की रचना दो सौ या पौने दो सौ साल पुरानी है। निराला जी या गुप्त जी जैसे कवियों को अपनी भाषा खुद गढ़नी पड़ी थी ।  इसकी ऊर्जा का अंदाजा लगाइए कि इसने इतनी कम अवधि में अपना सम्वेदना तंत्र विकसित कर लिया ।  अज्ञानता देखिए इतनी ऊर्जावान भाषा पर बात करने के लिए हमें एक साल में सिर्फ 15 दिन मिलते हैं ।जिस भाषा ने हमारे देश की स्वतंत्रता की चेतना का प्रतिनिधित्व किया वह भाषा आज भी हीन भावना से मुक्त नहीं हो पाई है । भाषा कभी भी सरकारी अनुदानों और आयोजनों में आत्मप्रशंसा  की बैसाखियों  के सहारे नहीं आगे बढ़ती। इसकी ऊर्जा मूल से प्रवाहित होती है । इसकी ऊर्जा का केंद्र वहां है जहां समाज के संस्कार वास करते हैं। हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसकी कई सतहें हैं। एक है जहां से हम संवाद करते हैं दूसरा वह जो भाषा का प्रत्यक्ष रुप है और उस सतह के नीचे रहता है जो हमारे बोले हुए शब्दों से ध्वनित होता है।   अंग्रेजी वालों के लिए यह कितनी लज्जाजनक बात है इतने प्रयासों के बाद भी प्रेमचंद्र तुलसीदास को छोड़िए हिंदी के दूसरे दर्जे के लेखकों की तुलना में भारतीय अंग्रेजी के कितने लोगों को खड़ा कर सकते हैं ,नाम गिनायें अगर गिना सकें तो। बचपन से अंग्रेजी पढ़ता हुआ बालक अपने जीवन के 25-26 साल ग्रामर, स्पेलिंग और प्रोननसीएशन  सीखने में लगा देता है और तब भी अशुद्ध एक्सेंट की अंग्रेजी बोलता है और शब्द प्रयोगों में ढेर सारी गलतियां करता है । भारत में जितने अंग्रेजी बोलने समझने वाले लोग हैं उन्हें शायद ही एक प्रतिशत  ऐसे लोग हैं जो अंग्रेजी में सोचते हैं सीना ठोक कर कह सकते हैं वह कि वह उसी स्तर की अंग्रेजी जानते हैं जिस स्तर का एक अच्छा पढ़ा लिखा भारतीय हिंदी जानता है। हमारी चेतना आरंभ से अगर व्यापक रही तो इसका मुख्य कारण था आरोपित नहीं बल्कि इसके संस्कार हमारी सांस्कृतिक परंपरा में पहले से ही मौजूद थे।विडंबना यह है कि अगर आज हम गुलाम भारत में चेतना और आज की बौद्धिक दासता से तुलना करें तो ऐसा लगेगा कि उस समय हम ज्यादा आजाद थे । हमारी चेतना स्वतंत्र थी। आज हमारी चेतना बौद्धिक दासता के नीचे दबी कराह रही है। हमें वैचारिक स्वाधीनता हासिल करने के लिए  फिर से प्रयास करने होंगे ।
हिंदी दिवस के आयोजनों और सम्मेलनों से हमारी चेतना स्वाधीन नहीं होगी। वरना क्या कारण है कि अंग्रेजी का एक लेखक शिव के तीन नाम लिखकर करोड़पति हो जाता है और हिंदी का एक लेखक विष्णु के सहस्त्रनाम लिखकर  भी विपन्न  बना रहता है।

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