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Monday, February 17, 2020

मुफ्त की सुविधाएं और हमारे चुनाव

मुफ्त की सुविधाएं और हमारे चुनाव 

किसी हिंदी फिल्म का एक दृश्य याद आता है कि झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले कुछ मतदाताओं को कुछ राजनीतिक नेता पैसे बांट रहे थे और जब पुलिस ऑफिसर बने उस फिल्म के नायक को यह बात पता चली तो उसने घटनास्थल पर पहुंचकर पैसा लेने वाले नौजवान की जमकर पिटाई की। अभी पिटाई चल ही रही थी कि उस नौजवान की मां आ गई और उसने बहुत मार्मिक बात कही कि " इस थोड़े से रुपए में आपको बेशक फर्क नहीं पड़ता लेकिन हमें पड़ता है। आप बच्चे को पीट रहे हैं लेकिन उन लोगों को कुछ नहीं कर पाते जो यह पैसे बांट रहे हैं।" यह दृश्य खुद में भारतीय चुनाव व्यवस्था और उसके बरक्स हमारी समाज व्यवस्था का एक उदाहरण है। अभी हाल में दिल्ली चुनाव में अरविंद केजरीवाल ने मुफ्त की बिजली, मुफ्त का पानी और महिलओं के लिए मुफ्त बस यात्रा की सुविधा देकर प्रचंड बहुमत से चुनाव में विजय  पाई। अरविंद केजरीवाल ने मतदाताओं को यह भरोसा दिलाया कि यह सुविधाएं आगे भी जारी रहेगी। बेशक यह सही है। कोई भी सरकार अपने प्रदेश की जनता के हितों के लिए क्या कर सकती है, कल्याण के लिए कुछ कदम ,जिसे वह उचित कदम कहती हैं , उसे उठाने का फैसला कर सकती है। लेकिन सवाल है ,क्या मतदाताओं को मुफ्त सुविधाएं प्रदान करने का वादा या प्रलोभन लोकतांत्रिक शुचिता के अनुरूप है? जब चुनाव आते हैं तो राजनीतिक दल मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए अपने घोषणा पत्रों में कई सुविधाओं का जिक्र करते हैं। उन्हें एक तरह से प्रलोभन देते हैं और प्रलोभन देने की इस प्रवृत्ति से सुप्रीम कोर्ट भी सहमत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि चुनाव के दौरान घोषणा पत्रों में मुफ्त की सुविधाएं देने या कह सकते हैं रेवड़ियां बांटने का प्रलोभन मतदाताओं को नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि इससे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की बुनियाद कमजोर होती है। सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में अपने फैसले में कहा था कि चुनाव घोषणा पत्रों में किए गए वायदों का जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 के तहत भ्रष्ट आचरण नहीं है। परंतु इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि बड़े पैमाने पर मुफ्त सुविधाएं समाज के सभी वर्गों के लोगों को प्रभावित करती है और इस तरह की गतिविधियां बड़े पैमाने पर स्वतंत्र निष्पक्ष चुनाव की जड़ों को हिला देती है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि चुनाव आयोग को आदर्श आचार संहिता में अलग से एक शीर्षक के तहत राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों के बारे में प्रावधान करना चाहिए।
         संविधान की धारा 324 के अंतर्गत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की होती है और वह इसके लिए लगातार प्रयास करता रहता है। उन प्रयासों में विभिन्न तरह के आदेश और निर्देश भी रहते हैं । चुनाव आयोग को यह मालूम है कि  इस सरकार की कीमत पर इस तरह की सुविधाओं के वायदों से निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया प्रभावित होती है और इसलिए उसने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों या निर्णय लागू करने की इच्छा भी व्यक्त की थी। चुनाव आयोग इस तरह का कोई भी आदेश या निर्देश नहीं दे सकता जो कानून के दायरे में नहीं हो। मुफ्त की सुविधाओं के वायदे पर अंकुश लगाने के बारे में कोई कानून नहीं है इसलिए राजनीतिक दल एक सीमा तक ही सुविधाएं दे सकते हैं। यद्यपि चुनाव घोषणा पत्र को सीधे-सीधे शासित करने के लिए हमारे देश में कोई नियम नहीं या कोई कानून नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के इसी फैसले के बाद 2014 में चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता में एक नया प्रावधान जोड़ा। इस प्रावधान में मतदाताओं को अपने मताधिकार का प्रयोग करने के दौरान उन्हें प्रभावित करने से रोकने के लिए कई तरह के आदेश  जारी किए। इसका असर भी हुआ। पर कोई विशेष प्रभाव दिखाई नहीं दिया ना ही कोई बदलाव नहीं आया जितने प्रावधान हैं सब सुझाव की तरह थे। चुनाव आयोग ने भी कहा था कि राजनीतिक दलों को ऐसे वादे करने से बचना चाहिए जिनसे चुनाव की स्वतंत्रता और निष्पक्षता प्रभावित होने के साथ-साथ मतदाताओं पर गैर जरूरी असर भी पड़ने लगे।    कोर्ट के फैसले के 7 साल गुजर गए लेकिन हालात वही के वही हैं। मतदाता वर्ग से किए गए वायदे ऐसे अव्यावहारिक होते हैं जिन्हें पूरा ही नहीं किया जा सकता या पूरा करना व्यवहारिक नहीं है। संभवत ऐसा नहीं देखा गया है कि किसी राजनीतिक दल के पास कोई ठोस योजना हो कि वह सत्ता में आएगा तो विकास कार्यों से अलग इस तरह के वायदों को पूरा करने के लिए क्या करेंगे और इस पर कितना धन खर्च करेंगे।लेकिन मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए मुफ्त की सुविधाएं देने का सिलसिला चल रहा है इसका परिणाम यह हुआ की सरकारी धन का उपयोग विकास कार्यों की बजाए मतदाताओं को संतुष्ट करने या कह सकते हैं अपने वोट बैंक को एकजुट कर बनाए रखने के लिए अनावश्यक और अन उत्पादक कार्यों पर खर्च होता है । यह मुफ्त की सुविधाएं देने की बातों का दिनोंदिन इन दायरा बढ़ता जा रहा है और अगर इस पर रोक नहीं लगाई गई तो एक बहुत गंभीर विभ्रम की स्थिति पैदा हो जाएगी जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। साथ ही इससे विकास भी प्रभावित होगा। उदाहरण के लिए देख सकते हैं कि आप पार्टी का मुफ्त बिजली
बसों में महिलाओं की यात्राएं फ्री करने पर  जितना खर्च हो रहा है वह तो दिल्ली के विकास के खर्चों को काटकर ही होगा अथवा अनावश्यक टैक्स बढ़ाकर होगा। इससे बड़ी कठिनाई पैदा होगी। विकास रुक जाएगा और मुफ्त के पाने   की आदत  बढ़ती जाएगी और बाद में दूसरे राज्यों के लोग भी इस तरह की सुविधाओं की अपेक्षा करेंगे अथवा एक नए किस्म का सामाजिक तनाव शुरू हो जाएगा इस पर रोक लगाना जरूरी है।


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