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Tuesday, March 13, 2018

मोदी की विजय का कारण नौजवानों का समर्थन

मोदी की विजय का कारण नौजवानों का समर्थन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विभिन्न राज्यों के चुनाव में विजयी होते आ रहे हैं । इसका मुख्य कारण है कि नौजवान जो चाहते हैं मोदी वही बोलते हैं । उन्होंने देश के नौजवानों का मन जीत लिया है। 
  समाज वैज्ञानिकों द्वारा विभिन्न तरह के तर्क दिए जा रहे हैं, तरह तरह की दलीलें गढ़ी जा रहीं हैं। उदाहरणस्वरूप, नौजवान जैसा चाहते हैं वैसा उन्हें अभी तक नहीं मिला है या वे उससे अनजान हैं वगैरह-वगैरह। यही नहीं कारपोरेट सेक्टर द्वारा चुनाव में पैसा लगाना भी तर्क के रूप में पेश किया जा रहा है। वैसे यह बिल्कुल अलग बहस है । 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में 19.7 प्रतिशत नौजवान बढ़ गए हैं जिनकी उम्र 15 से 24 वर्ष है । वामपंथी दल या कांग्रेस ने इस उम्र के नौजवानों  की अपेक्षाओं  कुछ
समझा नहीं।  यह 2013 के बाद से ही शुरु हुआ है। जब मोदी जी को  प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया गया तब अन्य राजनीतिक दल भविष्य के साथ तालमेल बैठाने में असफल हो गए। एकमात्र पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस  की नेता ममता बनर्जी ने नौजवानों की उम्मीदों को समझा और उसका सबूत सबके सामने है। वे राष्ट्रीय स्तर पर बहुत तेजी से उभरती हुई नेता हैं। मोदी जी या ममता जी के विजय के पीछे सामाजिक और आर्थिक कारण हैं जिसे अलग नहीं किया जा सकता। 
  ब्रांड मोदी ने नौजवानों की अपेक्षाओं को समझा और यह उम्मीद  पैदा की कि उनकी अपेक्षाओं को पूरा किया  जाएगा।  लेकिन गौर करें, ब्रांड मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नहीं हैं। सबको मालूम है कि हमारे नौजवान रूढ़िवादी नहीं हैं। मोदी जी भाजपा के शहरी विकास के प्रतीक हैं साथ ही हिंदुत्व के बिम्ब भी हैं। भारत के नौजवान धार्मिक असहिष्णुता के बाद भी मोदी जी की ओर देख रहे हैं । कितनी बड़ी विडंबना है कि रोजगार और अर्थव्यवस्था  के मोर्चे पर मोदी जी  का रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है फिर भी नौजवानों की उम्मीद कायम है।  इसका प्रमाण त्रिपुरा का चुनाव है। 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने " ट्रिकल डाउन " का एक नारा दिया जो  यूपीए के " समवेत विकास "  के नारे पर भारी पड़ा। दक्षिणपंथी अर्थशास्त्री जगदीश भगवती ने अमर्त्य सेन की जो तीखी आलोचना की थी वह भी सबके दिमाग में होगी।  अमर्त्य सेन को यूपीए  का आर्थिक मस्तिष्क समझा जाता था।  सेन लोक कल्याण की वकालत करते थे। भाजपा जैसे ही सत्ता में आई उसने "मार्केट फ्रेंडली" की अपनी छवि को बनाए रखने के साथ ही साथ लोक कल्याण  विरोधी अपनी छवि को  अलग कर दिया । गौर करने वाली बात है कि वामपंथी या कांग्रेस किसी ने भी गुजरात  मॉडल के गुब्बारे में छेद करने में सफलता नहीं पाई और ना बंगाल सहित किसी भी राज्य में अपने बनाए गए मॉडल को पेश कर सकी। जबकि वामपंथी पार्टियों ने बंगाल में 34 वर्षों तक शासन किया था।
   भाजपा अब कई तरह के बोल बोल रही है। वह रंग- रंग के पत्ते फेंक रही है।  जब जैसी जरूरत होती है वैसा ही पत्ता फेंका जा रहा है । माकपा और कांग्रेस इस मामले में भाजपा से बहुत पीछे है। पश्चिम बंगाल में माकपा का गठबंधन 34 वर्षों तक शासन में रहा। 2004 और 2006 में बुद्धदेव भट्टाचार्य की औद्योगिक नीति को भारी समर्थन मिला। खास करके नव मध्य वर्ग ने इसे व्यापक समर्थन दिया।  लेकिन इसी वर्ग ने 2014 में इसे नकारा बता कर किनारा कर लिया । मोदी और शाह की जोड़ी ने गुजरात मॉडल को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया।  वैश्वीकरण के बाद शहरीकरण और मीडिया की  बहुलता ने समाज की चिंतन धारा को बदल दिया है। 2001 से 2011 के बीच शहरी आबादी 17% से बढ़कर 26% पर पहुंच गई । यानी, लगभग 9% आबादी शहरी और अर्द्ध शहरी  क्षेत्रों में बढ़ गई । इंटरनेट और मीडिया के बाहुल्य ने गांव में बैठे एक नौजवान को महानगरों की न केवल झलक दिखाया है बल्कि बल्कि वहां पहुंचने की ललक भी पैदा किया है। इससे उम्मीदें और अपेक्षाएं बहुत ज्यादा बढ़ गईं । शिक्षा के विकास और उसके बाद दुनिया को समझने की  ताकत बढ़ने के बाद कोई भी नौजवान अब खेती करना नहीं चाहता, जैसे उसके मां  पिताजी इत्यादि करते थे और ना खेती अब पहले की तरह किफायती रह गई ।खेतिहर मजदूर लगातार कम हो रहे हैं।  खेती से जुड़े अधिकांश लोग उद्योग और सेवा क्षेत्र के लिए बेकार हैं। अब से पहले की पीढ़ी के ज्यादातर लोग कृषि से जुड़े थे लेकिन अब कोई मां-बाप नहीं चाहता कि उनके बच्चे पढ़ लिख कर खेती करें । वे शहरों  में गरीबी का जीवन बिताना अच्छा समझते हैं लेकिन गांव का जीवन नहीं स्वीकारते।

     1940 से 1980 के बीच के नौजवानों के लिए वामपंथ एक सपना था। हर नौजवान उसे ही आदर्श मानता था । यह केवल भारत की बात नहीं थी बल्कि पूरी दुनिया में ऐसा ही था ।आज हालात बिल्कुल विपरीत हैं। यद्यपि पश्चिमी देशों में  सैंडर्स और कोर्बिन जैसे नेताओं के कारण वामपंथ का उभार हो रहा है ,पर भारत में संसदीय वामपंथ एक तरह से आकाश कुसुम है। आज का युग  विशेषकर भारतीय नौजवानों का मानस वैश्वीकरण की देन है और उनकी जीवन शैली तकनीकी संचालित है । सत्योत्तर  विश्व में आदर्श और सामूहिक न्याय के लिए बहुत कम जगह है। आज का शहरी नौजवान संपन्न होना चाहता है और ऐसे में वामपंथ या कांग्रेस नौजवानों के भीतर सनसनी पैदा  करने में असफल है । 
   2020 तक भारत दुनिया का सबसे नौजवान देश हो जाएगा। शहरों में 29 वर्ष की आयु वर्ग के सबसे ज्यादा लोग मिलेंगे। कांग्रेस और वामपंथ का भविष्य इसी में है कि वे युवा वर्ग के लिए विकासशील आर्थिक और सामाजिक उदारवाद की राह तैयार करें । इसके साथ ही सामूहिक न्याय के प्रति वर्ग चेतना पैदा करें। इसके लिए उन्हें इंतजार करना होगा। उन्हें जागना होगा और यह स्वीकार करना होगा कि आदर्श भारत के विचार की ऐतिहासिक भूमिका अब समाप्त हो चुकी है।

Monday, March 12, 2018

यह सांस्कृतिक और सामाजिक विजय नहीं है

सांस्कृतिक और सामाजिक विजय नहीं है

त्रिपुरा में  मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी पर  भारतीय जनता पार्टी की विजय बेशक ऐतिहासिक है और अद्वितीय है। भारतीय जनता पार्टी  और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि एक दक्षिणपंथी पार्टी ने एक वामपंथी पार्टी को सीधे चुनावी मुकाबले में पराजित कर दिया। यह अचंभित कर देने वाली राजनीतिक विजय है। लेकिन, त्रिपुरा विजय का  समष्टिगत बिंबों के संदर्भ में विश्लेषण किया जाए तो यह होगा भारत के एक राज्य  के सांस्कृतिक और सामाजिक लैंडस्केप  पर दक्षिणपंथी ताकतों  ने वामपंथी  शक्तियों  को पराजित कर दिया। यह कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी की कमान में भारतीय दक्षिणपंथी ताकतों ने सांस्कृतिक विजय हासिल कर ली। दक्षिणपंथी ताकतों ने यह बहुत बड़ी विजय हासिल की है।  यह विजय  बहुत महत्वपूर्ण भी मानी जा सकती है लेकिन इस विजय को संपूर्ण भारत में सांस्कृतिक और सामाजिक जंग में विजय नहीं माना जा सकता जैसा कि भाजपा फैला रही है। भारत एक बहुत बड़ा देश है और  इसका सांस्कृतिक  इतिहास बहुत पुराना है और  विशाल भी है। इसका सामाजिक स्वरूप  बहुजातीय  और बहुभाषी है।  इसी लिये  देश में विविधता में एकता की बात की जाती  है।

     लेनिन की मूर्ति को तोड़े जाने के खिलाफ देशभर में जो गुस्सा दिखा उससे यह जाहिर होता है देश ने एक तरह से  चेतावनी दी है। भाजपा ने इस चेतावनी को बखूबी समझा है और यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अध्यक्ष अमित शाह सहित पार्टी के हर बड़े नेता ने इस घटना की निंदा  करनी शुरू कर दी। लेकिन इसी में किसी की जुबान फिसल गई और संघ के एक बड़े नेता ने कह दिया कि भाजपा ने सिद्धांत की जंग जीती है इसलिए मूर्ति तोड़ी जा रही है क्योंकि यह वामपंथ का प्रतीक है। इस बयान के साथ ही कई राज्यों मे  दक्षिणपंथी नेताओं की बोलती बंद हो गई। यह किसी को याद नहीं है कि मोदी जी ने घटना पर कब बयान जारी किया था। गौर करें,  देश में एक संप्रदाय के लोगों की हत्या, गौ हत्या के नाम पर हिंसा, दलितों पर अत्याचार इत्यादि की घटनाओं पर सब नेताओं ने चुप्पी साध  रखी है।

  त्रिपुरा में विजय का अगर समाज वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए क्या पता चलेगा कि यह विजय ना संघ के सिद्धांतों की है ना ही भाजपा के चुनावी मशीन की बल्कि यह विजय जाति , समुदाय और  संप्रदाय के समीकरण की है। जिसे भाजपा ने उत्साह में सोशल इंजीनियरिंग,  बूथ स्तर तक प्रबंधन तथा सबसे ज्यादा व्यवस्था विरोधी रुख बता रही है । यही नहीं कांग्रेस के संबंध में पूर्ण रूप से विकल्प हीनता भी इसका एक कारण है। कांग्रेस का वोट का हिस्सा 2013 के 36.5 से घटकर 2018 में 1.8 हो गया।  त्रिपुरा में   जीत हासिल करने वाली भाजपा सामाजिक सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप में शून्य है। भाजपा ने प्रतिद्वंदियों को तोड़ने की और अपने में मिलाने की रणनीति अपनाई थी। उदाहरणस्वरूप, भाजपा ने त्रिपुरा में जिन 14  प्रत्याशियों को खड़ा किया था  वह सब के सब कांग्रेस के थे और विधानसभा के सदस्य थे।  चुनाव के दौरान पांच पूर्व कांग्रेसी विधायक भी तृणमूल कांग्रेस में चले गए थे।

   पश्चिम बंगाल में भी तो पिछले चुनाव में कुछ ऐसा ही हुआ था।   वोट का समस्त आधार ही कांग्रेस से ममता बनर्जी के तृणमूल कांग्रेस में आ गया था।  यह एकदम माकपा के विकल्प के रूप में उभर आया। वैसे ही त्रिपुरा में भी विजयी भाजपा पुरानी कांग्रेस का ही परिवर्तित स्वरुप है। इसलिए भाजपा ने सांस्कृतिक और सामाजिक जंग नहीं जीती है , वहां उसका कांग्रेसीकरण हो गया है। भाजपा कांग्रेस  की संस्कृति का ही स्वरुप है और विडम्बना है कि मोदी जी कांग्रेस मुक्त भारत  बनाना चाहते हैं। 

Sunday, March 11, 2018

हम अपने बच्चों को बचा क्यों नहीं पाते ?

हम अपने बच्चों को बचा क्यों नहीं पाते ?

 एक समाज के रूप में कभी- कभी संदेह होने लगता है कि हम सचमुच बहुत  सहिष्णु हैं  या कायर हैं? हम अपने लोगों की भावनाओं या अपने चारों तरफ की परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील क्यों नहीं?  हम एक निष्क्रिय समाज में क्यों बदलते जा रहे हैं।  या, हमें अपने बच्चों की सुरक्षा के प्रति कोई चिंता ही नहीं है? हमारे बच्चे हर जगह  खतरे से घिरे रहते हैं और हम  दिनोंदिन इसके आदी होते जा रहे हैं। यहां तक कि बच्चों से बलात्कार और उनका  शीलहरण तक हमारे भीतर गुस्सा नहीं पैदा कर पा रहा है। क्या यह समय नहीं आ गया है कि इस पर हम बात करना बंद कर दें और काम करना शुरू करें। हाल में कोलकाता में एक   खाली बस में 3 साल की एक बच्ची के साथ बलात्कार की  खबर अखबारों में आई। इस खबर ने ठीक वैसा ही मनोभाव , वैसा ही गुस्सा पैदा किया जैसा आज से 5 साल पहले निर्भया कांड में हुआ था और इससे पूरे देश  का दिलो-दिमाग  दहल गया था। यह भी सही नहीं है कि इस बीच बलात्कार की और घटनाएं नहीं हुईं, लेकिन उस घटना और इस घटना में बहुत ही समानता है, खासकर जुर्म को अंजाम देने का तरीका और  जुर्म के लिए  चुनी गई जगह। 

    जब एक ऐसी घटना अबोध बच्ची के साथ होती है  तो मन ग्लानि से भर जाता है।  सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हमारे महान भारत में  हर 5 मिनट पर एक बच्चे के साथ अपराध होता है। पिछले10 सालों के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं देश में बच्चों के प्रति अपराध  की घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। आंकड़े बताते हैं विगत 10 सालों में  देश में आम जगहों पर बच्चों के प्रति अपराध की घटनाओं में 500% की वृद्धि हुई है। इनका और गंभीर विश्लेषण करने से यह पता चलता है बच्चों के अपहरण और उनके साथ बलात्कार की घटनाएं  बढ़ीं हैं। हां, यह भी कहा जा सकता है कि पहले के मुकाबले  इन दिनों घटनाओं की रिपोर्ट ज्यादा लिखाई जा रही है। कोलकाता की घटना से अलग यह भी देखा जा रहा है कि सुनसान जगहों पर  ही बच्चों के प्रति अपराध नहीं हो रहे हैं  बल्कि सुरक्षित जगह पर भी उनके प्रति जुर्म होते पाए जाते हैं। इसके पहले स्कूलों में जो घटनाएं हुई वह लोगों की स्मृति में अभी तक ताजा होंगी। यही नहीं, घर का वातावरण भी सुरक्षित नहीं है। घर के भीतर भी  बच्चियों से बलात्कार की घटनाएं सुनने में आतीं हैं। यहां तक कि निकट संबंधी भी इसमें शामिल पाए जाते हैं। कहने का मतलब यह है कि बच्चे कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। चाहे वह आंगनबाड़ी हो या स्कूल हो या  पार्क।

     इससे एक सवाल उठता है कि बच्चों की सुरक्षा एक साधारण प्रक्रिया है जिसे कुछ खास उपाय करके ठीक किया जा सकता है या यह एक प्रक्रिया श्रृंखला है जिसमें बच्चों को अपराधी के बारे में बताने के लिए तैयार करने से लेकर उन्हें सशक्तीकरण तक ले जाना होगा। उत्तर भी साधारण है। बच्चों में चेतना पैदा  करनी होगी और अपराधियों को तुरंत कार्रवाई के जरिए कठोरतम सजा देनी होगी। इसके साथ ही एक मसला और भी है जिसे सुलझाना होगा। वह है हमारी सामाजिक अवस्था। मां बाप रोजी रोटी कमाने के लिए घर से बाहर चले जाते हैं और बच्चे घर में अकेले रहते हैं, जिनकी देख भाल की जरूरत होती है। इसके लिए बच्चों की देखरेख के छोटे-छोटे केंद्र स्थापित  किया  जाना जरूरी है। इसके लिए अभिभावकों को भी प्रशिक्षित करना बहुत जरूरी है। हमारे समाज में बच्चों की सुरक्षा को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता है और न इसे गंभीरता से समझा जाता है। सामाजिक जगहों पर एक शक्तिशाली व्यवस्था करना और समाज में जागरूकता पैदा करना कि ऐसी स्थितियों में कोई भी आदमी या पुलिस हस्तक्षेप करे। यह भाव लोगों के मन में जगाना बहुत जरूरी है।

    इस मामले पर तुरंत ध्यान देना होगा और बिना देर किए सावधान हो जाना पड़ेगा। एक ऐसी व्यवस्था करनी पड़ेगी कि सार्वजनिक स्थल पर सरकार -मां –बाप- शिक्षक और समाज के  प्रतिनिधियों को तैनात करने की शुरुआत हो और वह तुरंत कार्रवाई भी कर सके। यही नहीं, बाल सुरक्षा के बजट को भी बढ़ाना होगा और देश में इस पर एक बहस शुरू करनी पड़ेगी। लोगों के अंदर इसके प्रति  शून्य सहनशीलता  का भाव जागृत करना होगा। हमारे सामने यह बहुत बड़ी चुनौती है कि हम अपने बच्चों को सुरक्षित कैसे रखें। हमें यह सोचना होगा कि क्या हम आने वाले  वक्त में बच्चों को यही देश सौंपेंगे!

 

Friday, March 9, 2018

एग्जाम वारियर्स या चुनाव वारियर्स

एग्जाम वारियर्स या चुनाव वारियर्स

जब बोर्ड परीक्षाएं माथे पर हैं तो एक किताब ने सबको आकर्षित किया है,  विशेषकर  तब और जब यह किताब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद लिखी है। इस किताब का नाम है  " एग्जाम वारियर्स " । इसका नाम कुछ ऐसा है और उसे जारी करने का समय भी कुछ ऐसा है ,जब सब लोगों को - विशेषकर छात्रों को - यह उम्मीद थी की परीक्षाओं को काबू में करने या उनसे  निपटने की कुछ नई तकनीक इस किताब के पन्नों में होगी। पर दुख की बात है कि इस किताब के पन्नों में यह बताया गया है कि परीक्षाओं के दवाब से कैसे मुक्ति पाएं। इस किताब के आरंभ में वादा किया गया है कि परीक्षाओं के दवाब से निपटने में मदद करेगी, लेकिन पूरी पुस्तक में जो लिखा गया है वह है एक सतही और घटिया  सुझाव है। यह सुझाव  अवास्तविक भी है। मान भी लेते हैं  की परीक्षाएं तनावपूर्ण होती है तब भी एक छात्र इसे उत्सव की तरह  कैसे मना सकता। यह तो कुछ वैसा ही है जैसे  सेव की तुलना  संतरे से की जाए। या ,ऐसा जैसे किसी प्रसूता महिला से कहा जाए कि वह प्रसव के क्षणों में हंसे। परीक्षाएं और उत्सव एक साथ, बड़ी अजीब बात है प्रधानमंत्री जी।

   परीक्षाएं सदा से तनावपूर्ण  हैं और रहेंगी। हम में से हर आदमी को अपना छात्र जीवन याद होगा। जब हम लोग या आप लोग रात - रात भर जाग कर  और बेचैन होकर  परीक्षाओं की तैयारियां करते थे। कई वर्ष गुजर गए लेकिन हालात अभी तक नहीं बदले हैं।  अलबत्ता मोबाइल फोन के माध्यम से वाट्सएप इत्यादि  ने थोड़ा कंफ्यूजन जरूर पैदा कर दिया है। लेकिन तब भी छात्रों का जीवन और जटिल तथा तनावपूर्ण हो गया है। ऐसे में प्रधानमंत्री जी की पुस्तक  " एग्जाम वारियर्स " यानी परीक्षा का  योद्धा परीक्षा के लिए चिंताजनक बन गया है।

    परीक्षाओं में कई तरह के दबाव काम करते हैं। पहला फेल होने की चिंता ,दूसरा कि फेल होने पर या अच्छा नंबर नहीं आने पर पड़ोसी क्या कहेंगे , तीसरा अच्छे कॉलेज में नाम नहीं लिखा पाएगा इत्यादि। ऐसे खौफनाक माहौल में प्रधानमंत्री जी की किताब सुझाव देती है की परीक्षा उत्सव की तरह मनाएं ,मौज मस्ती करें। यह बात समझ में नहीं आती है। छात्र इस किताब को किस तरह देखेंगे पर इसे पढ़ने के बाद एक बात तो जरूर मन में आती है  ​कि इस देश में  मुफ्त सुझाव देना सबसे आसान काम है।

  यह बात विश्वसनीय नहीं है और विश्वास का कोई अर्थ भी नहीं है कि यह किताब प्रधानमंत्री जी ने खुद लिखी है, या किसी ने उनके लिए लिखी है। लेकिन यह तो तय है यह पूरी किताब बिल्कुल निरर्थक है। इसका कोई मूल्य नहीं है। इसमें जो निर्देश दिए गए हैं या सुझाव दिए गए हैं उनसे छात्र पहले से अवगत हैं। लेकिन इसमें परेशान करने वाला मसायल यह है की यह पुस्तक एक ऐसे आदमी द्वारा लिखी गई है जो सत्ता के शीर्ष पर है और छात्रों को लक्ष्य करके लिखी गई है। जबकि छात्र अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं ना कि बातफरोशी। 

  इस पुस्तक को जारी किए जाने के लगभग 2 हफ्ते पहले प्रधानमंत्री जी ने " परीक्षा पर चर्चा " नाम से एक कार्यक्रम भी पेश किया था। यह कार्यक्रम छात्रों को संबोधित था। इसमें बोर्ड की परीक्षा में शामिल होने वाले छात्रों के तनाव पर चर्चा की गई थी। इस कार्यक्रम में उन्होंने आई क्यू और ई क्यू के बीच संतुलन बनाने, योग के फायदे और परीक्षाओं के समय शांत  रहने का सुझाव दिया था। खास तौर पर उन्होंने  यह समझाया था की परीक्षाओं के तनाव छात्रों को कितनी हानि पहुंचाते हैं। उनकी  बात सुनकर  यह सोचने पर मजबूर हुआ जा सकता है कि क्या हमारे छात्र , हमारे बच्चे, हमारे जिगर के टुकड़े  पहली बार बोर्ड परीक्षा में बैठने जा रहे हैं?  क्या यह पहली बार है जब छात्र तनावग्रस्त  हैं? या ऐसा पहली बार हो रहा है कि छात्र परीक्षाओं के जाल में फंस रहे हैं अथवा यह  जीवन  की पहली बाधा है?

  वही पुराना पाठ्यक्रम, पढ़ाने का वही पुराना तरीका, कॉपी जांचने का वही  पुरानी पद्धति, प्रतियोगिता, अच्छे कॉलेजों की कमी और हर साल बढ़ते कॉलेज के " कट ऑफ " ,इतनी कठिनाइयों के बाद एक छात्र कैसे महसूस कर सकता है की परीक्षा में उत्सव मनाया जाए या परीक्षा तनावपूर्ण ना हो।

  प्रधानमंत्री सहित हमारे नीति निर्माता सबसे पहले यह सोचें कि किताब लिखने और तनाव में नहीं रहने का सुझाव देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में " कट ऑफ " की सीमा नियंत्रित करनी होगी, सिलेबस दुबारा तैयार करने होंगे और संपूर्ण शिक्षा प्रणाली  की समीक्षा करनी होगी। केवल इन्हीं उपायों से परीक्षाओं में तनाव खत्म होंगे।  यह सब जानते हैं कि सिस्टम रातों-रात नहीं बदला जा सकता। अब ऐसे में यह सोचकर हैरत होती है की परीक्षा के तनाव इतने महत्वपूर्ण विषय हो गए हैं कि यह हमारे देश के शासन का प्रमुख समय निकाल कर इस पर किताब लिखे और फिर समय निकालकर छात्रों को या नौजवानों को संबोधित करे। इससे ऐसा लगता है की परीक्षाएं राष्ट्रीय मसला हैं या फिर उनका कोई निहित अर्थ है। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह 2019 के चुनाव की  तैयारी चल रही है। क्योंकि बोर्ड की परीक्षा में बैठने वाले छात्र ही, जिनकी संख्या लाखों में है, अगले साल तक मतदाताओं का नया समूह  बनकर उभरेंगे। 

झूठ की होती है बोहतात सियासत में 

सच्चाई खाती है मात सियासत में

और ही होते हैं हालात सियासत में 

जायज होती है हर बात सियासत में

Thursday, March 8, 2018

तेल - पानी ठीक रहा तो अगली बार भी मोदी सरकार 

तेल - पानी ठीक रहा तो अगली बार भी मोदी सरकार 

पूर्वोत्तर भारत में भाजपा की विजय से दो अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत प्रापत होते हैं। एक संकेत को तो बहुतों ने समझा कि यह विजय भाजपा के अत्यंत उन्नत सांगठनिक हुनर और पार्टी के प्रमुख एवं सरकार के प्रमुख में बेहतरीन तालमेल का परिणाम है। लेकिन जो बात बहुत कम लोग समझे और यह संकेत मतदाताओं की रफ से था वह थ कि वोटरों ने मोदी की अच्छे आर्थिक भविष्य के वायदे पर विश्वास किया। पार्टी ने छोटे से राज्य त्रिपुरा में जो आर्थिक वायदे किये ओर जो आर्थिक दलीलें दीं वह वास्तव में  विशाल भारत में आने वाले चुनाव को आर्थिक - राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में समझने में मदद करेगा।सरकार के वतंमान दौर के आर्थिक विकास की दर पिछली सरकारों से ज्यादा रही तो यह मान कर चलें कि मोदी सरकार के दुबारा सत्ता में आने की साठ प्रतिशत उम्मीद है। इसे अन्य गुणक भी प्रभावित करते हैं। पर चुनाव जैसे - जैसे नजदीक आता हे तो मैक्रोइकॉनोमिक गुणक भी दबाव डालने लगते हैं ओर वे दबाव कारगर होते से लगते हैं। अर्थशा​​​िस्त्र्यों का मानना हे कि आर्थिक विकास तेज हो रहा है। वैश्विक अर्थ व्यवस्था में भी ताजगी​ आ रही है। लेकिन अर्थव्यवस्था पर बीच बीच में नोट बंदी तथा जी एस टी की तरह आघात और सुधार अबसे ओर चुनाव के बीच ना हो तो अच्छा है। 

 अतएव भारत 2017 की तरह वैश्विक आर्थिक विकास का लाभ नहीं उठा सकता है। अतएव चुनाव के पहले पिछली सरकार के आर्थिक विकास की तुलना में बेहतर आर्थिक विकास ही गणना का मानक बनेगा। कुछ अर्थशा​िस्त्रयों ने विश्व बैंक के आंकड़ों के हवाले से अनुमान लगाया है कि यू पी ए- 2 के शासन काल में  औसत विकास दर 7.44 प्रतिशत थी जबकि इस सरकार के 2017 तक यानी साढ़े तीन वर्ष में औसत विकास दर 7.45 प्रतिशत रही है। यह कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं है। या, जैसा कि आर्थिक सर्वेक्षण में उम्मीद की गयी  है कि औसत विकास दर 7.5 प्रतिशत रहेगा तब भी सकल घरेलू उत्पाद की दृष्टि से मोदी जी का शासन काल विगत यू पी ए - 2 के शासन काल से पीछे रहेगा। क्या इसका अर्थ यह हुआ कि मोदी अगर दुबारा चुनाव जीतते हैं तो समष्टिअर्थव्यवस्था (मैक्रो इकॉनोमिक्स) बिगड़ी नहीं है। यही नहीं मतदाता भी 2014 के मुकाबले 2019 आर्थिक वातावरण को खुशनुमा भी नहीं पायेंगे। जरूरी नहीं कि ऐसा ही हो। क्योंकि चुनाव और अर्थ व्यवस्था में महत्वपूर्ण संयोग हे। पांच साल में कितना विकास हुआ यह मायने रखता है लेकिन जब चुनाव होते हैं तो उस समय विकास ज्यादा अर्थ रखता है। 

 अगले चुनाव में यानी 2019 के चुनाव में भाजपा के लिये नोटबंदी​ ओर जी एस टी ज्यादा असर डाल सकता है क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था की गति का ह्रास हुआ है लेकिन आने वो दिनों उसमें विकास होता ​दिख रहा है। यहां एक ओर बात काबिले गौर है कि इस विकास से किसे लाभ मिला है। यह तथ्य भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। यहां एक बड़ी बात यह है कि आम आदमी के जीवन में विकास का अर्थ होता है कृषि, उत्पादन ओर निर्माण। उत्पादन ओर निर्माण तेल की कीमतों से नियंत्रित होते हैं ओर कृषि पानी से यानी वर्षा से। व्याफक अर्थ में सोचें तो कह सकते हैं कि ग्लोबल स्तर पर कच्चे तेल की कीमत और देश में वर्षा। दोनों में से कोई एक या दोनो चुनाव पूर्व मैक्रोइकॉनोमिक परिदृश्य को बिगाड़ सकते हैं। ग्लोबल कच्चे तेल की कीमत 2016 से अबतक 60 डालर पति बैरेल रही है लेकिन क्या यह दर कायम रहेगी? अगर यह दर कायम रही तो सरकार के लिये खास चिंता की बात नहीं है लेकिन अगले लगभग 12-14 महीने तक ऐसा ही रहेगा यह नहीं कहा जा सकता है। अगर तेल की कीमत बड़ती है तो यह भाजपा के लिये बुरी खबर है। अब रही बारिश की बात। मौसम विज्ञाानियों का मानना है कि मानसून सामान्य रहेगा। लेकिन जून से सितम्बर तक की बारिश बहुत महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि अगले साल मार्च अप्रैल में क्या होता है इस पर चुनाव निर्भर करेगा। अगर जम कर बरिश हुई और खेतों में खड़ी फसल मारी गयी जैसा 2015 में हुआा तो मुश्किल बढ़ेगी। इसलियफे 2018 ही नहीं 2019 में भी बारिश का परिमाण सही होना जरूरी है। यानी तेल और पानी दोनों सही रहे तो मोदी जी की जय जयकार, वरना.....।