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Saturday, February 25, 2017

फिर धड़ल्ले से आने लगे हैं जाली नोट

फिर धड़ल्ले से आने लगे हैं जाली नोट 

रिजर्व बैंक की  कागज़ सप्लायर कंपनी पाकिस्तान को दे रही मदद 

हरिराम पाण्डेय 

कोलकाता : प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी  की घोषणा करते हुए कहा था कि इस उद्देश्य नकली नोटों की मदद से होने वाले आतंकवाद और अन्य विध्वंसक गतिविधियों  की फंडिंग को रोकना है. गृह  राज्य मंत्री श्री किरण रिजिजू ने बड़े शान से कहा था कि नोट बंदी के बाद जाली नोट छापने वाले आत्म हत्या  कर लेंगे,  पर देश भर की बात छोड़ दें केवल बंगाल की सीमा पर मालदा में विगत हफ्ते भर में लगभग तीन लाख रूपए मूल्य 2 हज़ार के जाली नोट पकड़े गए हैं. कितने बाजार में आ गए इसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है लेकिन इस धंधे  से जुड़े बंगला देशी सूत्रों का कहना है कि केवल इसी एक हफ्ते में 15 करोड़ से ज्यादा मूल्य के दो हज़ार के जाली नोट कोलकता पहुँच चुके हैं. देसी सूत्रों के मुताबिक इसके कुछ भाग का  उपयोग उत्तर प्रदेश के चुनाव में हो रहा है पर टारगेट वह नहीं है. 
लक्ष्य के बारे में बात करने से पहले ये नोट  छपते कहाँ हैं और कौन छाप रहा है. सन्मार्ग की खोज के मुताबिक ये नोट वही छाप रहे हैं जो भारतीय रिजर्व बैंक के  नोटों को छापते हैं. ये नोट कराची और दुबई में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी  आई एस आई द्वारा चलाये जा रहे प्रिंटिंग प्रेस में छप रहे हैं और छपाई में एक स्विस नागरिक की नॉट छपाई की ब्रिटिश कंपनी इस काम में सहयोग कर रही है. दिलचस्प बात है कि यही कंपनी भारतीय रिजर्व  बैंक के साथ दो हजार के नोट छापने में इन्टीग्रेटर है. 2010 में इस कंपनी पर भारत में पाबन्दी लगा दी गयी थी. चूँकि रिजर्व बैंक उसका सबसे बड़ा ग्राहक था, उसके आर्डर बंद होने के बाद वह कंपनी आरथिक संकट में फँस गयी थी. इधर  नोट छपाई के काम में इन्टीग्रेटर्स के तौर पर फ्रेंच फर्म आरजो विग्गिन्स, क्रेन ( अमरीका)  और जर्मनी की एक फर्म को जोड़ा गया. जर्मनी की वह फर्म रिजर्व बैंक को कागज़ बेचती थी और बाद में पता चला कि वह पकिस्तान के लिए नोट भी छपती थी. 2015 में भारत में उसे प्रतिबंधित कर दिया गया.  हैरत की बात है कि वह ब्लैक लिस्टेड कंपनी भारत के नोट छपाई तक कैसे पहुंची? 
सुन कर हैरान रह जाएंगे कि इस कंपनी के ताल्लुकात  सत्तारूढ़ दल से बहुत पुराने हैं.   जब सन्मार्ग ने इन संबंधों की डोर का सिरा खोजने की कोशिश की तो हैरत में डाल  देने वाली हक़ीक़तें सामने आईं. 24 दिसंबर 1999 को इंडियन एयर लाइन्स की उड़ान संख्या  आई सी 814 के अपहरण की घटना बहुतों को याद होगी. उस विमान की फिरौती के रूप में घोषित तौर पर मसूद अजहर समेत तीन आतंकियों को छोड़ा गया. देश को बताया गया कि विमान के यात्रियों को मुक्त कराने के लिए ऐसा किया जा रहा है. लेकिन एक यात्री का जिक्र नहीं किया गया जिसके लिए यह सारा चक्कर चला. उन यात्रियों में उस ब्रिटिश कंपनी का मालिक भी शामिल जो आज 2000 के नोट छापने के काम में रिजर्व बैंक का इंटेग्रेटर है. खुफिया सूत्रों के मुताबिक उसकी फिरौती की रकम भी भारत सरकार ने ही चुकाई थी. वह सबसे अमीर स्विस नागरिकों में एक है और उसकी रिहाई के लिए स्विस सरकार ने भारत पर दबाव दिया था. 
आज वही कंपनी फिर भारत में नोट छापने में लग गयी है. अंतरराष्ट्रीय राजनयिक   हलकों में तो यह भी चर्चा है कि नए नॉट छापने के लिए इस ब्रिटिश कंपनी ने एक बड़े नेता के नजदीकी व्यापारी को मोटी रकम चुकाई है. चर्चा तो यह भी है कि " मेक इन इंडिया " के तहत मध्य प्रदेश में नोट बनाने का कागज़ और स्याही का कारखाना बैठाने का समझौता हुआ है पर सरकार ने इस बारे में कुछ भी कहने से इंकार कर दिया है. 
कराची और दुबई में छपे ये जाली नोट पाकिस्तानी राजनयिक सामानों में ढाका लाये जाते हैं. वहां से मालदा आता है   और फिर देश के  अन्य भागों में चला जाता है. चूँकि पाकिस्तानी जमातों पर अमरीकी दबाव बढ़ रहा है इस लिए वहाँ के  आतंकी भारत भागेंगे और उन्हें यहां स्थापित करने के लिए इस बार यह कार्य किया जा रहा है.  अभी यह कह पाना कठिन है कि वह ब्रिटिश कंपनी आतंकियों को और क्या मदद कर रही है तथा भारतीय अर्थ व्यवस्था  में उसकी घुसपैठ कहाँ तक हुई है.

Friday, February 24, 2017

खतरे की ओर बढ़ता लोकतंत्र

खतरे की ओर बढ़ता लोकतंत्र

 

मैथिली शरण गुप्त ने लिखा है

हम कौन थे क्या हो गये हैं , और क्या होंगे अभी

आओ विचारें आज मिल कर यह समस्याएं सभी

हम खुद को परिभाषित करने की अपनी क्षमता धारे – धीरे खोते जा रहे हैं। हम नहीं जान पा रहे हैं कि हम क्या थे और क्या होना चाहते हैं। हमारीएक समाज के तौर पर इस कमी को जानने के लिये किसी बहुत बड़े अनुसंधान की जरूरत नहीं है। बस किसी चौराहे पर खड़े हो जाइये और खुद देखें ​कि यातायात के नियमों का कैसे उल्लंघन होता है। चौराहे पर पुलिस वाला खडझ है और लोग लाल बत्ती की वजर्ना कहे भंग कर जा रहे हैं तथा रोकने पर फिजूल की बहस तथा शक्ति प्रदर्शन। बिना ड्राइविंग लाइसेंस के वाहन चलना इन दिनों आम बात है। एक दिन हावड़ा के पुलिस कमिश्नर डी पी सिंह ने एक अनौपचारिक बातचीत में कहा था कि यहां की ट्रैफिक को व्यवस्थित करना बड़ा ही कठिन काम है। हालांकि यह बहुत ही साधारण और बिल्कुल अनौपचारिक ब्बात है पर एक गंभीर सामाजिक समस्या की ओर इशारा करती है।

किसी नियम या कानून को तोड़ना बहुत आसान है लेकिन कई बार यह कठिन भी है। नियम या कानून को मानने के दो अवयव हैं पहला कानून अथवा नियम से जुड़ी क्रिया और दूसरा उस कानून के बारे में हमारा अभिप्राय क्या है। सिर्फ लाल बत्ती पर रुकने के साधारण नियम को मानना एक बात है और उस नियम के बनाने कारणो को स्वीकार करना दूसरी बात है। दरअसल हमसे उम्मीद की जाती है कि हम कानून को मानें उसका पालन करें लेकिन इस बात के लिये कत्तई चिंतित नहीं हैं कि इस कानून अथवा नियम के पीछे क्या अभिप्राय था, इसकी नीयत क्या थी? जितनी बार एक वालहन चालक  ट्रैफिक सिगनल को अमान्य करता है वह उतनी बार केवल नियम नहीं भंग करता बल्कि उस नियम के मूल अभिप्राय की गलत व्याख्या करता है। वह समझता है कि उनके सामने सड़क खाली है और जब सड़क खाली है तो लाल बत्ती की र्जिना को मानने का कोई औचित्य नहीं है। वह आदमी एक आजाद निर्णायक के तौर पर काम करता है और मानता है कि मौजूदा हालात के बारे में उसके फैसले समाज या सरकार के बनाये गये नियम से ऊपर र्है और उनहें खारिज करते हैं। लेकिन इसके पीछे यह भी नजरिया है कि जो लोग ऐसा करते हैं वे सममझते हैं कि यह नियम उनपर लागू नहीं होता।

नियम को नहीं मानने की प्रवृति हमारे समाज में कई तरह के झगड़ों को जन्म दे रही है। कई बार झगड़ा इस लिये होता है कि लोग मानते हैं कि उनका फेसला समाज द्वारह यह सरकार द्वारा बनाये गये नियमों से सही है। कुछ मानते हैं कि यह बेकार नियम है क्योंकि जब सड़क खाली है तो एक मिनट के लिये वहां क्यों रुकें। धीरे धीरे यह मनोवृत्ति एक व्यापक ट्रैफिक जाम का कारण बन जाती है। आाज हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या यही सै। असंख्य सामाजिक विवाद खास कर भ्रष्टाचार इसी के कारण बढ़ रहे हैं। यहां पहचान की राजनीति प्रमुख् है। इन्हीं मनोवृत्तियों के कारण दार्म, जाति , परम्परा और राष्ट्र के स्वयंभू रक्षक पैदा हो रहे हैं और वे कानून को ताक पर रख देते हैं। पहचान की सियासत और ट्रैफिक के नियमों को भंग करने मनोवृत्ति के पीछे के मनोविज्ञान में कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं है। प्राथमिक तौर पर पहचान कुछ नियमों से जुड़ी होती है और इस बात से भी समर्थित होती है कि हम एक जाति या एक दार्म समुदाय के तौर पर उसे कैसे मानते हैं। हमारी जाति या धर्म की पहचान चंद सामाजिक नियमों से भी जुड़ी होती है। एक बड़े समाज में वास करने का मतलब ही उन नियमों को मानना होता है। एक मामूली नियम है कि आप सड़क पर बायें चलें। चूंकि आप आजाद है इसलिये चाहते हैं कि हम जिदार चाहें उधर चलेंगे और इससे यकीनन सड़क पर चलने वाले दूसरे की आजादी में खलल पैदा होगा जो एक विवाद का कारण बन सकता है और इससशे दंगे तक होते देखे गये हैं। इस लिये सामाजिक नियमों को मानना जरूरी है। लेकिन आज हालात ये हैं कि सब अपनी अपनी आजादी की बात करते हैं और इस क्रम में दूसरे की आजादी को खत्म करने कोशिश होती है। सड़क के चौराहे पर लाल बत्ती पर रुकना या राष्ट्रगान के समय खड़ा होना इत्यादि बहुत मामूली बात है इस नियम को तोड़ने के फलस्वरूप एक भारतीय के रूप में हम अपनी पहच्हहन खोते जा रहे हैं। यह एक शुरुआत है ओर इसका परिणाम कुछ वैसा ही होता है जैसे एक सम्प्रदाय विश्हेष्ह के लोगों पर आनतंकवादी होने कह ठप्पा लग गया है। हम अपने हाथों से अपनी पहच्हहन को मिटा रहे हैं। हमें इस बात की चिंता नहीं है कि हमारा समाज कैसा दिखेगा। अभी हाल में तमिलनाडु में बैलों के एक पारम्परिक खेल पर पाबंदी को लेकर व्यापक आंदोलन हुये। ये आंदोलन जितनी परम्पया या बैलों से नसीं जुड़े थे उससे कहीं ज्यादा तमिल होने की पहचान से जुड़े थे। यह लोकतंत्र में स्वार्थ से उद्भूत दुर्गुण है। इसमें छोटे छोटे समूहों के नेता स्थितियों को अपने अनुसार स्वरूप देने लगते हैं और बड़े नेता वोट के लोभ में उनका समर्थन करने लगते हैं। हम वोट देकर अपनी आजादी राजनीतिज्ञों के हाथों में सौप देते हैं इस उम्मीद में कि वह मेरे लिये सही काम करेगा। लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। यहां मूल समस्या है कि लोकतंत्र में जो लोग निर्वाचित नही हैं वे अपने अनुसार नियम को परिभाषित करने लगते हैं। यह ठीक वैसे ही होता है जैसे कुछ लोग लाल बत्ती पर भी निकल जाते हैं और कुछ खड़े रहते हैं। खड़े रहने वाले लोग भी दूसरे दिन से नियम भंग करने लगते हैं। आदमी धीरे धीरे गिरोह में बदल जाता है और हुकूमते वक्त वोट के लोभ में उसे कानून परिभाषित करने देता है।

तवायफ की तरह अपनी गलतकारी के चेहरे पर

हुकूमत मंदिर और मस्जिद का परदा डाल देती है

  

Thursday, February 23, 2017

बस जबानी जमा खर्च

बस जबानी जमा खर्च

मोदी जी ने जब चुनाव लड़ा था तो बार बार देश की जनता से वादा किया था कि राजनीति  को अपराध से मुक्त करा देंगे. लेकिन उन्होंने ऐसा करने कोशिश तक नहीं की. उत्तर प्रदेश के वर्तमान चुनाव में 35-40 प्रतिशत उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं. कई आपराधिक कृत्यों पर तो सामाजिक वैधानिकता की मुहर लगी हुई है और वह काम सज़ा के बदले इनाम का सबब बन गए हैं.मिसाल के तौर पर उत्तर प्रदेश के भा ज पा अध्यक्ष की बात करें. असोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ( ए डी आर ) द्वारा  चुनाव आयोग के समक्ष पेश शपथ पत्रों के आधार पर तैयार किये गए आंकड़ों के मुताबिक इस बार उत्तर प्रदेश में जितने लोग चुनाव लड़ रहे हैं उनमें भा ज पा के ऐसे उम्मीदवारों की सूची सबसे लंबी है जिन पर आपराधिक आरोप हैं.पहले चरण में भा ज पा के 41 प्रतिशत उम्मीदवार ऐसे थे और उसका अव्व्ल  नंबर था. दूसरे चरण कांग्रेस के 40% और तीसरे चरण में सपा के 41 प्रतिशत आपराधिक छवि वाले उम्मीदवार मैदान में थे. नरेंद्र मोदी जी ने 2014 में अपने चुनाव प्रचार के दौरान वादा किया था कि कोई भी अभियुक्त चुनाव लड़ने का साहस नहीं कर सकेगा. लेकिन हकीकत जान के लगता है कि यह सब बस कहने की बात थी. बहुतों को याद होगा कि मोदी जी ने कहा था कि “ हमें राजनीति के अपराधीकरण को रोकना होगा और यह सब केवल बड़ी बड़ी बातों से नहीं होगा.” लेकिन देख कर तो लगता है कि वे केवल बातें ही करतें हैं. राजनीति को अपराधियो से मुक्त करने , राजनितिक अपराध और भ्रष्टाचार ख़त्म करने की दिशा में कुछ नहीं हो सका है. अलबत्ता उनके भाषण समय समय पर अपना स्वरुप और टोन बदलते रहे हैं. हाल में इस मामले में उन्होंने नोट बंदी का जुमला पेश किया. मोदी जी 2014 वाले चुनाव अभियान क़ा  यहाँ जिक्र करने की क्या जरूरत है, यह पूछा जा सकता है, बेशक उसकी जरूरत है क्योंकि वादे  के मुताबिक उसे खत्म  करने की कोशिश भी की गयी हो ऐसा नहीं दिखता है. क्योकि अगर ऐसी भी हुई होती तो केशव प्रसाद मौर्य को उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष नहीं बनाया गया होता. मौर्य पर लगभग एक दर्जन आपराधिक आरोप हैं. उनपर खून का मुकदमा चल रहा है और उसपर चार्ज शीट भी दाखिल हो चुकी है. ऐसे आदमी को पार्टी ने देश के सबसे बड़े राज्य का अध्यक्ष बनाया है. मौर्य को जब अप्रैल 2016 में राज्य पार्टी अध्यक्ष बनाया गया तो वहाँ नेताओं में गुस्सा दिखा था. पुराने नेताओं ने इसका विरोध किया था लेकिन मोदी और शाह ने यह कह कर मामला ख़त्म कर दिया की यह सब राजनीति प्रेरित है. मौर्य ने खुद कहा था कि उनपर लगाए गए अधिकाँश आरोप “ जान आंदोलनों का नेतृत्व करने के कारण लगाए गए हैं. “  लेकिन यह कहना सही नहीं है. काम से कम छान खान की खून के मामले में तो नहीं ही है. इस केस में चार्ज सहित तक दाखिल हो चुकी है. उनका राजनितिक रसूख चाँद खान के परिजनों को केस वापस लेने के लिए मजबूर कर रहा है. ए दी आर के आंकड़े बताते हैं कि मोदी जी राजनीती को अपराध मुक्त बनाने के लिए कुछ नहीं किया वरना मौर्य इतनी तेजी से तरक़्क़ी नहीं करते. वे। अपराधियों को टिकट देते रहे. यही नहीं अगर समाज वैज्ञानिक नजरिये से देखें तो मोदी जी ने एक और आपराधिक धारा खोली है वह है आदर्श के नकाब में अपराध. चाय और अखबार बेचने वाला यूपी भा ज पा का अध्यक्ष बन जाता है केवल इसलिए कि वह विश्व हिंदू परिषद् का संगठन मंत्री था और 1991 का राम मंदिर आंदोलन में शामिल था. वह कभी संघ का नगर कार्यवाह भी रह चुका था. बाबरी ढाँचे को गिराया जाना एक आपराधिक कार्य था और अभी भी मुकदमा चल रहा है. लेकिन जो लोग उससे जुड़े थे उन्हें तरक़्क़ी दी जा रही है. 1949 में जिस जिला मजिस्ट्रेट ने मस्जिद में राम लाला की मूर्ति रखवाई थी उसे भ ज पा का एम् पी बनाया गया. इसमें हैरत नहीं है कि मौर्या ओर जो मुकदमें हैं राम मंदिर आंदोलन या गौ रक्षा आंदोलन  से जुड़े हों. राजनीति में धन बल और बाहु बल की भूमिका के विश्लेषण के दौरान आदर्श के नकाब में अपराध पर भी विचार ज़रूरी है.  क्योकि राम मंदिर और गौरक्षा आंदोलनों में पिछड़े तथा दलितों को शामिल किये जाने से इसका क्षेत्र और व्यापक हो गया. यह यह सरकार के कल्याण कारी कार्यों में शामिल हो गया है और  इसका स्वरुप पुराने जमाने के लूद और ठगी से बदल कर आंदोलनकारी हो गया है. आदर्श की नींव पर खड़े अपराध का भी भारत में अलग इतिहास है जो 1949 में बाबरी मस्जिद में जबरन राम लाला की प्रतिमा स्थापित करने से लेकर मंदिर आंदोलन , ढांचा ध्वंस और गो रक्षा आंदोलनों के नाम की गयी गुंडागर्दियों को शामिल किया जा सकता है. क्योकि इन्ही अपराधों मुम्बई के दंगे और कर सेवकों को गोधरा में जला कर मार डालने जैसी घटनाओं को हवा दी थी. इसमें जो सबसे बड़ी बात है वह है कि मौर्य जैसे लोग जो इस तरह के नकाबपोश आदर्शवादी आंदोलनों में शरीक होते हैं उन्हें लगातार पुरस्कृत किया जा रहा है. यह कैसी अपराध मुक्ति है? 

उधर जम्हूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो 

इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है , नवाबी है

Wednesday, February 22, 2017

भारत को खतरा बढ़ा

भारत को  ख़तरा बढ़ा 

पिछले हफ्ते सिंध के शेहवान के विख्यात शिया मस्जिद शाहबाज कलंदर  में विस्फोट से लगभग 100 श्रद्धालु मारे गए. ऐसी घटना पहले कभी नहीं हुई थी. इससे सारा मुल्क दहल गया. पकिस्तान में शिया और गैर सुन्नी आबादी आतंकी हिंसा का अक्सर शिकार होती रही है. शेहवान की घटना की सबसे बड़ी विलक्षणता है कि इस्लामिक स्टेट ( आई एस ) ने इसकी जिम्मेदारी ली है.  आई एस ने पकिस्तान को यह इत्तिला कर दी है कि वह उसकी चौखट पर खड़ा है और भविष्य में भारी खून खराबा कर सकता है. इसका सबसे पहला उद्देश्य था पाकिस्तानी सुरक्षा और खुफिया तंत्रों को झकझोर देना . और दुनिया को यह बता देना की ये फिसड्डी हैं तथा शिया अल्पसंख्यकों की हिफाज़त में नाकाम हैं.  इस हमले के इशारे को पकिस्तान ने भांप लिया और वहां के सुरक्षा तंत्र में हड़कंप मच गया. अफरा तफरी में कार्रवाई हुई और पाकिस्तानी फौज ने आतंकवादियों के संदेह में 100 लोगों को मौत के घाट उतार दिया. चौबीस घंटे के भीतर यह हुआ और इससे साफ ज़ाहिर है कि फ़ौज आतंकित थी और आवाम में आत्मविश्वास पैदा करने के लिए यह कार्रवाई की गयी. ताकि लोग यह समझें कि फ़ौज ने बदला ले लिया. लेकिन यहां एक सवाल है कि अगर उस घटना के दोषी आसपास ही थे और फ़ौज के पास उनकी फेहरिस्त भी थी तो यह कार्रवाई पहले क्यों नहीं की गयी ताकि उस धार्मिक स्थल पर मौजूद मरने से बाख जाते. इतना बड़ा नरमेध नहीं हुआ होता. यहां एक और संदेह होता है कि अगर शक के बिना पर सौ लोग मारे गए तो यक़ीनन कुछ बेक़सूर लोग भी होंगे जिनकी जान नाहक गयी. इस मामले पर बहस हिती रहेगी लेकिन फिलहाल जो सवाल पकिस्तान की जनता वहाँ की सरकार से पूछ रही है कि क्या कोई आतंकवाद विरोधी संगठन है सरकार के पास जो इस आतंक से निपट सके. अपनी ताकत और खुफियागीरी की डींग मारने वाले जनरलों से पाकिस्तानी अखबार लगातार पूछ रहे हैं कि ऐसा कैसे हुआ? क्या दोनों घटनाएं एक की प्रतिशोधस्वरुप थीं या संयोगवश एक साथ घटीं. यह वहाँ के सुरक्षा तंत्र पर एक गंभीर आरोप है. वहाँ राष्ट्रिय एक्शन प्लान पर भी सवाल उठ रहे हैं. इसका जिक्र कुछ ऐसे होता है मानो कि मज़ाक है. जनता नवाज़ शरीफ सरकार से भी पूछ रही है क्योंकि देश अर्से से आतंकवाद के खत्म होने का इंतज़ार कर रहा है. सभी आश्वासन और दिखाऊ कार्रवाईयां बदकिस्मती से बेनतीजा रहीं और मिली केवल मौत. अब पाकिस्तानी फौज ने अफगानिस्तान के आतंकी गिरोहों पर दोष मढ़ना शुरू कर दिया है कि वे पकिस्तान में इस तरह के हमले कर रहे हैं. अब उसकी नज़र फेडरली ऐडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरियाज ( फाटा ) पर जा रही है क्योंकि यह आतंकवाद का केंद्र माना जाता है. यह सब जानते हैं कि उस इलाके में अल कायदा , हक्कानी नेट वर्क , तालिबान और उससे जुड़े गिरोहों के गढ़ हैं.  फाटा बेहद पिछड़ा है और वहाँ सरकार की ओर विकास के लिए कुछ नहीं किया जाता है. यहां की आबादी लगभग 60 लाख है और सोलह प्रतिशत साक्षरता है, महिलाओं में फकत एक प्रतिशत साक्षरता है. वहाँ शिक्षा और विकास की जरूरत है. उनके जीवन में मामूली विकास भी आतंकवाद की पकड़ को कम कर देगा. यही नहीं उस इलाके में मानवाधिकार के उल्लंघन की घटनाएं अक्सर होती है. वहाँ मानवाधिकार को बहाल करने और उसकी हिफाजत करने के बदले सरकार वहाँ नए नए क़ानून लागू कर रही है. यह कदम प्रतिगामी हो रहा है वहां किसी भी तरह का विकास आतंकवाद की वृद्धि को लगाम लगायेगा.  पूरी संभावना है कि अब अफगानिस्तान पर दबाव डालेगा. क्योंकि वह उसी को आतंकवाद का जनक मानता है. उसकी खुन्नस इस बात पर भी है कि अफगानिस्तान भारत के करीब आता जा रहा है और दोनों मिल कर आतंकवाद का मुकाबला करने की तैयारी कर रहे हैं. यह पकिस्तान की आँखों में खटक रहा है और वहाँ भारतीय अवस्थापनाओं को ख़तरा है. आतंकवाद की घटनाओं ने पाकिस्तानी जनता के सामने फ़ौज की मूंछे नीची कर दी हैं. अब इसमें कोई शक नहीं है कि पकिस्तान अपनी जनता का ध्यान भटकाने की गरज से भारत पर आतंकी हमले शुरू करेगा और कश्मीर को निशाना बनायेगा. 

भतार सरकार को इसके लिए तैयार रहना चाहिए. क्योंकि वह अपनी शर्म को कम करने जके लिए देश के अन्य भागों में भी खून खराबा कर सकता है. इसके लिए फ़ौज कोण तैयार रहना होगा. इतना ही नहीं, पाकिस्तानी आतंकी गिरोहों पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने से उन गिरोहों के गुर्गे भारत में शरण ले सकते हैं. इससे भी सावधान रहने की जरूरत है.     

Tuesday, February 21, 2017

इतना सन्नाटा क्यों है भाई

इतना सन्नाटा क्यों है भाई

भारत में काले धन के साम्राज्य के लिए की गयी कार्रवाई के तौर पर प्रधान मंत्री ने नोट बंदी का हुक्म दिया. उस कार्रवाई का खात्मा इतने सन्नाटे में खत्म हो जायेगा इसकी उम्मीद नहीं थी. बजट आया , रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति आयी और दोनों चले गए पर सन्नाटा कायम रहा. सरकार चुप रही और जनता इंतज़ार करती रही. नोट बंदी का क्या असर हुआ यह सरकार ने नहीं बताया और बाकी जिन्होंने बताया उसमे गड़बड़ था. बजट और आर्थिक सर्वे को देखने के बाद पता चला कि सन्नाटे का राज क्या है. इतने बड़े सुधार का दावा करने वाली कार्रवाई का नतीजा सिफर रहा. एक कहावत है कि किसी वस्तु को अगर आप तौल नहीं सकते तो उसे उठा भी नहीं सकते. सरकार ने नोट बंदी का हुक्म जारी कर दिया. मुसाहिबों के जरिये बात कुछ इस तरह फैलायी कि “ मेरे तरीके से सोचो” , पर सरकार को खुद नहीं मालूम कि जिसके खिलाफ यह कदम उठाया गया है उसका वजन क्या है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने नवम्बर में कहा था कि यह यकीनी तौर पर मालूम नही कि बाजार में काला धन कितना है. अगर वित्त मंत्री का यह कहना सही है तो सरकार को यह बताना चाहिए था कि आखिर क्यों हज़ार और पांच सौ के नोट बंद किये गए.  यदि आर्थिक सर्वे की मानें तो नोट बेकार होने के कारण बंद किये गए. यहां बेकर  का मतलब है कि बाजार में चलते चलते  नोटों का खराब हो जाना. रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक पांच सौ छोटे   नोट के इस तरह खराब होने की दर 33 प्रतिशत है, 500 के नोटों की दर 22 प्रतिशत और 1000 के नोटों के ख़राब होने की दर 11 प्रतिशत है. इन आंकड़ों से रिजर्व बैंक  ने यह आकलन किया कि लगभग 3 लाख करोड़ के नोट कभी बाजार में नहीं गए हैं या फिर बहुत कम गए हैं. 3 लाख करोड़ की यह राशि सकल घरेलू उत्पाद के 2 प्रतिशत है. क्या इसे काला धन माना जा सकता है? सर्वे में इसका कोई जवाब नहीं है.  लेक़िन यह तार्किक ढंग से काले और सफ़ेद धन का फर्क बताता है. सफ़ेद रुपया वह है जो आपात स्थिति के लिए घर में रखा होता है या कर्मचारियों को नगदी के तौर पर दिया जाता है, जबकि काला वह है जिसे छोटे व्यापारी पूँजी के रूप लगाते हैं और टैक्स में उसका जिक्र नहीं करते या चुनाव में पार्टियों को देते हैं.  नोटबंदी से बहुत ज्यादा लाभ नहीं  दिख रहा है, फकत इसके कि अग्रिम टैक्स भुगतान 35 प्रतिशत बढ़ गया जो अगले वित् वर्ष में 25 प्रतिशत होने की उम्मीद है.अगर यह सही है तो अगले दो वर्षों में कुल कर संग्रह 1.5 लाख करोड़ बढ़ जायेगा. बहुत पहले रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने भी कहा था कि नोट बंदी के लाभ का कोई आंकड़ा नहीं है. बैंक को यह नहीं मालूम है कि बैंकिंग सिस्टम के बहार कितने बड़े नॉट हैं. सरकार ने बार बार कहा था कि नोट बंदी से आर्थिक मंदी नहीं आयी है लेकिन बाद में सरकार ने माना कि विकास पटरी से उतर गया है. आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि विकास दर में 1% की गिरावट आएगी. इससे कृषि को हानि हुई है, असंगठित क्षेत्रों को आघात लगा है. सरकार के पास इससे हुई हानि का कोई आंकड़ा नहीं है. अब क्या हुआ है यह समझने के लिए कोई बहुत अक्ल की जरूरत नहीं है. फिर भी इतना सन्नाटा क्यों है?