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Sunday, June 25, 2017

चलो सुहाना भरम तो टूटा

चलो सुहाना भरम तो टूटा

देश में जहां मोदी की कीर्तनपार्टी उनके खिलाफ लिखने बोलने वालें को क्रा क्या नहीं कह रहे हैं। यहां तक अश्लील गालियां तक दे रहे हैं वहीं विदेशों जहां प्रचारित था मोदी जी के नाम का डंका बज रहा है वहीं एक तरफ रूस के राष्ट्रपति पुतीन भारत सरकार को चेतावनी दे रहे हैं कि भारत की स्वायत्तता को खतरा है जरा संभल कर रहें ।  दूसरी ओर इन दिनों विदेशी अखबार दुनिया की इस  ‘सबसे तेज अर्थ व्यवस्था’ पर तीखे आलेख लिख रहे हैं। न्यूयार्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट ने तो कुछ दिन पहले भारत की अर्थ व्यवस्था और उससे प्रभावित हो रही समाज व्यवस्था की काफी आलोचना की थी। विख्यात पत्रिका इकॉनोमिस्ट ने अपने ताजा अंक में लिखा है कि ‘भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुधारक नहीं हैं’ , ‘मोदी कट्टर राष्ट्रवादी हैं’ और ‘कभी का रोता हुआ गणतंत्र इन दिनों दमित महसूस कर रहा है।’इकॉनोमिस्ट का जो सबसे नाजुक हमला है वह कि इन दिनों जो हिंदंत्व वैरायटी के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित किया है वह देश की अर्थ व्यवस्था में प्रगति के त्वरण से मंद कर दिया है और साथ ही एक परिपक्व लोकतंत्र के ग्लोबल सॉफ्ट पावर के तौर पर भी इसे अलग कर दिया है।

इन सबसे अलग अगर मोदी जी उपलब्धियों की बात करें तो दिवालिया कानून 2016 तथा 1 जुलाई से लागू होने वाले ज एस टी का उल्लेख कर सकते हैं। लेकिन जहां सुधार और त्वरा की आवश्यकता थी वहां मोदी जी के सुधार का भरम टूट गया। जहां 2013 के 6.7 प्रतिशत आर्थिक विकास तेजी से 2015-16 के वित्तीय वर्ष में 7.9 प्रतिशत हो गया था और दुनिया को लगने लगा था कि भारत एक तेजी से उभरती हुई अर्थवयवस्था है। इससे लगने लगा था कि मोदी जी सचमुच महान आर्थिक सुधारक हैं और हिंदू राष्ट्रवादी की उनकी छवि केवल चुनावी हथकंडा थी। लेकिन, जैसे ही यह वित्तीय वर्ष 2016-17 में प्रवेश किया कि अर्थ व्यवस्था लड़खड़ाने लगी। 2016-17 की तीसरी तिमाही में अर्थ व्यवस्था के विकास की दर लुढ़क कर 6.1 प्रतिशत हो गयी​। 8 नवम्बर 2016 को 56 इंच के सीने को और वृहदाकार बनाते हुये मोदी जी ने नोटबंदी की ोषण करते हुये कहा कि इससे आतंकवादियों धन मिलना बंद हो जायेगा और काला धन समाप्त हो जायेगा। पर कुछ नहीं हो सका। लेकिन कुछ नहीं हो सका उल्टे कितने लोगों की रोजी रोटी खत्म हो गयी। अब जीएस टी लाया जा रहा है। इसमें कर सीमा की भारी भूल भुलैया है। सन्मार्ग के एक पाटक पंकज कुमार ने जीएस टी पर अपनी अफनी प्रतिक्रिया में लिख भेजा कि ‘जिस देश में कहां शौच करना है यह भी टी वी में विज्ञापन देकर बताना पड़ता है उस देश में जी एस टी का फायदा कौन समझा सकता है।’ सचमुच जीएसटी के लागू होने से जहां अफसरी अड़चने बढ़ जायेगी वहीं ​निवेश भी सिकुड़ जायेगा। औद्योगिक ऋण का भुगतान रुक गया है ओर ढांचागत परियोजनाएं नगदी के अभाव में ठप हो गयीं हैं। देश का कारपोरेट क्षेत्र दुविधा में है। भूमि और श्रमिक समीकरण टूटते जा रहे हैं। भूमि सुधार के अभाव में उद्योगों जमीन नहीं मिल रही और जमीन की कमी कारण आद्यौगिक विकास थमता जा रहा है। कुल मिला कर वे सुधारक नहीं हैं जौसे कि गाया बाजाया जा रहा है। बेशक उनमें पूर्ववर्ती प्रदानमंत्री मनमोहन सिंह से ज्यादा ऊर्जा है और उन्होंने उद्योग से लेकर शौचालय तक के हर क्षेत्र में पहल की। लेकिन कुछ भी सफल नहीं हुआ। इधर समाज व्यवस्था का समन्वय ​बिगड़ता जा रहा है। मोदी जी के शासनकाल में कट्टर राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के तत्व छुट्टा चर रहे हैं। देश को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात चल रही है। ‘काउ और क्रिकेट’ की जुगलबंदी में देश के 14 प्रितिशत अल्पसंख्यक प्राड़ित हो रहे हैं। उनहें मानसिक और शारीरिक यातना दी जा रही​ है। ऐसा लग रहा है कि जनता और निवेशकों ने जो मोदी जी पर भरोसा किया था वह खत्म होता जा रहा है। मोदी जी ने देश की जनता से वादा किया था कि अगर वे सत्ता में आये तो ‘कम से कम नियंत्रण और ज्यादा से ज्यादा शासन।’ लेकिन आज तो लग रहा है कि आज ज्यादा से ज्यादा नियंत्रण है और नागरिक अधिकारों, बेतरह पीट कर मार डालने की घटनाओं वगैरह से लगता है कि शासन है ही नहीं। हाल तक ग्लोबल मीडिया मोदी जी की वाहवाही करता था और आज वही नुक्ताचीं करने में लग गया। इन दिनों तो लग रहा है कि मोदी जी ‘मेक इन इंडिया’ और अन्य प्रमुख कार्यक्रम मंद लोकतंत्र के भार से दब गये हैं और हिंसक हिंदुत्व का आतंक भड़क उठा है। मोदी जी के बारे में पूरी दुनिया में व्याप्त एक सुहाना सा भरम धीरे धीरे टूटने लगा है।        

Saturday, June 24, 2017

देश की स्वायत्तता को भारी खतरा

देश की स्वायत्तता को भारी खतरा
अंतरराष्ट्रीय मंच से मोदी जी को सतर्क रहने की सलाह

 हरिराम पाण्डेय

कोलकात्ता : अभी अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में के जी बी की भूमिका पर बहस खत्म भी नहीं हुई थी कि रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतीन ने यह कह कर देश की खुफिया बिरादरी को चौंका दिया कि भारतीय स्वायत्तता को खतरा है। 21वें पीटर्सबर्ग अंतरराष्ट्रीय फोरम की हाल की बैठक में बगल में बेठे मोदी से कहा कि भारत की​ स्वायत्तता को खतरा महसूस हो रहा है। उनकी इस बात से अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक बिरादरी में बेचैनी बढ़ गयी।

अभी हाल में भारत में पैर जमाने के लिये आई एस आई एस को मदद दिये जाने पर सन्मार्ग की खोज के दौरान यह पता चला था कि अमरीका की नेशनल सिक्यूरिटी एजेंसी (एन एस ए) ने भारत में खुफिया नेटवर्क बनाने की योजना बनायी है। इस योजना के तहत महत्वपूर्ण स्थानों में होने वाली वातर्नाओं को सुनने वाले यंत्र बठाया जाना था। विदेशी कूटनीतिक सूत्रों ने सन्मार्ग को बताया कि एस सी एस के नाम से चलने वाली ग्लोबल निगरानी योजना का कोडनेम स्टेटरूम था। इसका काम अंतरराष्ट्रीय रेडियो तरंगो, दूरसंचार वार्ताओं और इंटरनेट ट्राफिक को इंटरसेप्ट करने की व्यवस्था है। प्राप्त सूचनाओं के अनुसार इस तंत्र ने जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल की मोबाइल फोन पर निजी बात चीत लगातार दस साल तक रिकार्ड की। इसमें कई दक्षिण अमरीकी, यूरोपीय और अन्य लोगों की महत्वपूर्ण निजी वार्ताएं भी शामिल हैं। हम अपने देश की सूचना तकनीक के अग्रणी होने के बारे में लाख बड़ी बड़ी बातें कहें लेकिन जो पता चला है उसके मुताबिक अमरीकी दूतावास के भीतर अभी यह नेटवर्क चल रहा है। दरअसल संचार क्षेत्र सूचनाओं के आदान प्रदान जिसमें ध्वनि, डाटा, वीडियो और इंटरनेट नेटवर्क की सहूलियतें मुहय्या कराता है। यही नहीं सूचना क्षेत्र राष्ट्रीय सुरक्षा और आपात तैयारी का अंग है। अतएव वह संचार और राष्ट्रीय महत्व के सुरक्षा ढांचों के अंतस्संबंधों की व्याख्या है। जैसे जैसे तकनीकी विकास हो रहा है वैसे वैसे इस क्षेत्र से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियां भी बढ़ती जा रहीं हैं। अमरीका की इस कार्रवाई के फलस्वरूप और रूस के राष्ट्रपति की चेतावनी के फलस्वरूप भारतीय खुफिया तंत्र में हड़कम्प हो गया है। क्योंकि सूचना प्राविधिकी और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के उपयोग से इन दिनों सूचना समरनीति का विकास हो रहा है। गलत और गड़ी हुई सूचनाओं को विश्वसनीय तंत्रहों के मादयम से फैला कर किसी भी राष्ट्र का व्यापक अहित आसानी से किया जा सकता है। विस्तृत सुरक्षा सिद्धांतों के अभाव में इस तरह की साजिशें यकीनन किसी भी देश की स्वायत्तता के लिये खतरनाक हो सकती हैं।        

Friday, June 23, 2017

मोदीजी ध्यान दें

मोदी जी ध्यान दें

रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद के लिये उम्मीदवार बनाने कहा जाने लगा कि भाजपा ने 2019 का चुनाव फतह कर लिया। कोविंद दलित बिरादरी से हैं और उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात के डेरापुर तहसील के किसान परिवार से हैं अतएव सियासत के लिये खास कर चुनाव जीतने के लिये जो अर्हताएं चाहिये वे सब उनमें हैं। वे दलित हैं, किसान हैं और उत्तर प्रदेश के हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कोविंद को वोट देने का फैला किया है। अन्य दल भी हो सकता है ऐसा ही करें केवल कांग्रेस, वामपंथी ,तृणमूल कांग्रेस और राजद को छोड़कर।इसबीच भाजपा उत्तरपूर्व , पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत में भी पैर फैला रही है। हिंदू दलों का ध्रुवीकरण भी एक हकीकत है। गरीब समुदाय तो भाजपा के साथ है ही। कोविंद की चमकविहीन पृष्ठभूमि तो एक अतिरिक्त पूंजी है।यदि सवर्ण हिंदू, दलित, अन्य पिछड़ी जाति के लोग , किसान और गरीब वर्ग के लोग किसी को समर्थन करें तो वह कैसे चुनाव हार सकता है? उत्तर है कि पराजय मिल सकती है य​दि मोहभंग हो गया तो। फिलहाल भाजपा का जादू अर्द्ध उदारवादी अभिजात वर्ग और मध्य वर्ग के एक हिस्से में उतर रहा है। वे हर मोड़ पर दारने वाले टैक्स कानूनों तथा सुस्त अफसरशाही , पाकिस्तान और चीन के बारे में ढुलमुल नीति , बीफ पर तरह तरह के सरकारी तमाशे, गौरक्षकवाद इत्यादि से ऊब चुके हैं। लेकिन ये सब ऐसे मामलात नहीं है जिससे चुनाव का परिणाम तय होता है या कहें हार जीत का फैसला होता है। परंतु एक बात है कि मोदी जी को अपने अतिआत्मविश्वास के प्रदर्शन से बचाना होगा। उनमें ऐसा आत्म विश्वास दिखता है मानों वे जो करते हैं वही एकमात्र सही है। तीन साल से मोदी जी की सरकार है। उनके साथ 281 सांसद हैं। लेकिन भाजपा की जो दिशा है वह चिंताजनक है। जहां इसे दृढ़ होना चाहिये वहां यह नहीं होती है और जहां रुख लचीला होना चाहिये वहां कठोर दिखती है। जब मोदी जी ने सत्ता संभाली है तो उन्होंने कहा था कि वे प्रधानमंत्री नहीं प्रधान सेवक हैं। संसद के सदस्य वी आई पी नहीं हैं वे जनता के सेवक हैं। लेकिन मोदी जी के साथी सांसद लगता है उनकी बात पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। वे तो शाहों की तरह व्यवहार कर रहे हैं। शिवसेना के रवींद्र गायकवाड़ और तेलुगू देशम पार्टी दिवाकर रेड्डी का हवाई कम्पनियों के साथ अश्लील व्यवहार से यह पता चलता है कि उन्होंने कैसे अपनी भूमिका को समझा है। एक आम आदमी  हवाई यात्रा के लिये पैसे देता है जबकि एक सांसद उसके लिये भुगतान नहीं करता है। उसे सांसद को मिलने वाली सुविधाओं के तहत यह सुविदा मिलती है। यह जानकर हैरत होगी कि भारत के सांसद सबसे कम उत्पादक हैं और सबसे ज्यादा दिखाऊ हैं। ब्रिटिश सांसदों को अपने आवास का जुगाड़ करना होता है और उसके लिये भुगतान करता है। फोकट में घर नहीं मिलता। जबकि भारत के सांसदों को लुटियन जोन में विशाल बंगले मिलते हैं जिनका बाजार दर लगभग 15 से 20 लाख रुपया महीना है। राज्य सभा को छोड़कर और लोकसभा के 800 सांसदों में से अगर 500 सांसद भी ऐसे बगले में रहते हैं करदाताओं के 1200 करोड़ रुपयों का सिर्फ आवास में सतयानाश हो जाता है। हलक में हाथ टाल कर टैक्स के पैसे वसूलने वाली सरकार जनता के कथित सेवकों के आवास पर साल में 1200 करोड़ रुपये खर्च करती है। अब इस पर अन्य खर्चो तथा सुविधाओं को जोड़ दें तो राशि कितनी ज्यादा हो जायेगी इसका अंदाजा है क्या?जनता के इन कथित सेवकों को आवास के अलावा मुफ्त के गार्ड, मुफ्त टेलीफोन, मुफ्त बिजली , मुफ्त कार और मुफ्त पेट्रोल मिलता है। इसके अलावा हवाई यात्रा, रेल यात्रा और सेक्रेटरी भी मुफ्त मिलते हैं। अब ये बदले में देश को देते क्या हैं? देना तो दूर ये हवाई यात्रियों पर हमला करते हैं , स्टफ से गाली गलौज करते हैं आम जनता काहे कीड़ा मकोड़ा समझते हैं। इसकाह कोई समाधान है? समाधान है अगर गलती या गलत आचरण करने वाले सांसद की पार्टी उनपर कठोर कार्रवाई करती है तो बात बन सकती है। लेकिन ऐसा होता है क्या। हर सरकारी पक्ष को संसद के दोनों सदनों में समर्थन चाहिये और अगर वह अन्य पार्टियों के सांसदों पर दंडात्मक कार्रैवाई करता है तो सदन में कठिनायी बड़ सकती है। हर सरकार के सत्ताकाल में एक मोड़ जरूर आता है। जैसे यू पी ए सरकार के काल में निर्भया कांड हुआ। इसके पहले से घोटाले वगैरह तो चल ही रहे थे। अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने उसे और कमजोर कर दिया। निर्भया कांड के 17 महीनों के बाद यू पी ए सरकार गिर गयी।

अभी मोदी सरकार के से लिये ऐसा कोई मोड़ नहीं आया दिख रहा है। उल्टे राष्ट्रपति चुनाव उनके वोट आधार को और मजबूत कर देगा। लेकिन चिंताजनक संकेत मिलने लगे हैं। इन संकेतों को नजर अंदाज नहीं किया जाना चाहिये। उत्तर प्रदेश की भारी विजय ने उसे थोड़ा आत्म संतुष्ट कर दिया है। भाजपा को यह याद रखना चाहिये कि चुनाव में लहर अचानक आयेगी और सब कुछ बहा कर ले जायेगी।असहिष्णुता का झूठा अभियान जानबूझ कर गढ़ा जाता है। अतीत में भी इसका असर मेखा गया है और वर्तमान में भी हो सकता है। अगर प्रधानमंत्री ने अपने सांसदों को सचमुच जनता का सेवक नहीं बनाया और यही हाल रहा तो बात बिगड़ सकती है।  

चूक गए मोदी

चूक गये मोदी

 

छाया मदिर महकती रहती गोया तुलसी की चौपाई

लेकिन स्वप्निल स्मृतियों में सीता का बनवास लिखा है

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अंजान वकील को राष्ट्रपति पद के लिये अपने गठबंधन का उममीदवार बनाते समय अफने दरवाजे पर दस्तक दे रहे एक अवसर  को भांपने से चूक गये। बेशक कोविंद जी में दो खूबियां हैं या उनके चयन से पार्टी को दो फायदे हैंपहला कि वे उत्तर प्रदेश से हैं और दूसरा कि दलित हैं। पर इसके साथ कई और बातें हैं जो भविष्य में हानि पहुंचायेंगी ही। सबसे बड़ी बात है कि मोदी जी पर जो हिंदुत्व का ठप्पा लग चुका है उसे मिटाने की सख्त जरूरत है। वे ऐसे उममीदवार का चयन कर यह काहर्य सिद्ध कर सकते थे जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से ना जुड़ा हो। ऐसा करके सरकार के हिंदुत्व की ओर झुकाव पर लोगों में चल रही चर्चा को बदलने के किसी प्रयास की जरूरत थी ही नहीं। उन्हें केवल यह करना था कि वे याजनीतिक तौर पर एक निष्पक्ष उम्मीदवार का चयन करते जिससे देश के एक समुदाय में यह संदेश डजाता कि हिंदुतव के बाद भी जीवन है। बेशक प्रधानमंत्री सभी क्षेत्रों और कामकाज से जुड़े अपने लाखों समर्थकों के साथ मिलकर थोड़ा सा बदलाव करने की कोशिश करते तो अच्छा होता। भगवा बिरादरी से अलग जो बुद्धिजीवी वर्ग है तब उसे यह भरोसा होता कि 2019 के बाद के भाजपा के वारिसों की ताकत के बाद भी देश के सर्वोच्च पद की गरिमा को कायम रखने वाला कोई तो है।

 

विकट बाढ़ की करुण कहानी नदियों का संन्यास लिखा है

बूढ़े बरगद के वल्कल पर सदियों का इतिहास लिखा है

 

मसलन ए पीजे अब्दुल कलाम की तरह। वे कथित तौर पर जनता के राष्ट्रपति थे। रस्मी तौर पर ही सही एक राष्ट्राध्यक्ष के तौर पर जनता में उनकी आदरणीय छवि थी।इस बार का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि हिंदुत्व की धारा में बह रहे देश को दिशा देने वाले राष्ट्राध्यक्ष की जरूरत थी। मोदी चाहते हैं देश को कांग्रेस मुक्त बनाना और इसके लिये वे अपने मुसाहिबों को राज्यों में मुख्यमंत्री बना रहे हैं। अब देश के सर्वोच्च पद पर भी कुछ वैसा ही कर रहे हैं। यह सोचने की बात है कि बिहार के राज्यपाल या एक वकील अथवा एक सांसद के रूप में ऐसी कोई छवि देश के नौजवानों के मन में है जो उम्मीद पैदा कर सके। लेकिन मोदी जी के जाति की परिगणन और उत्तर प्रदेश का निवासी ज्यादा महत्व रखता है। इससे अगले चुनाव में फायदा होता दिख रहा है उन्हें। सबकों पसंद आने वाले के मुकाबले एक दलित राष्ट्रपति उनहें ज्यादा ‘लाभदायक’ महसूस हो रहा है। दलितों की ओर झुकाव मोदी जी की राजनीति का हिस्सा है जो सोशल इंजीनियरिंग के संघ के एजेंडा को समर्थन देता है। सोशल इंजीनियरिंग के उनके अजेंडे का पहला संकेत तब मिला था जब उनहोंने अम्बेडकर को श्रद्धांजलि दी। हाल कि यह बिल्कुल दिखावा था पर उनहोंने विदेशों में भी यह दिखावा किया। लेकिन एक दलित का राष्ट्रपति के तौर पर चयन करने से ना सामाजिक व्यवस्था बदलेगी और समाज की मनहूस हकीकत बदलेगी। ना इस देश के नौजवान छात्र रोहित वामुला की खुदकुशी का नंगा सच भूल पायेंगे ना गुजरात में दलितों की बेकायदा हत्या के आतंक को विस्मृत कर पायेंगे और ना ही भीतर भीतर सुलगते सहारनपुर के बय को नजरअंदाज कर पायेंगे।

 

इस व्यवस्था ने नयी पीढ़ी को आखिर क्या दिया

सेक्स की रंगीनियां या गोलियां सल्फास की

 

 मोदी जी का शायद यह मानना है कि मीडिया चाहे जितना शोर मचाये लेकिन यह सब जनता की सामूहिक चेतना में कायम नहीं रह सकेगा। वे यह मानते हैं कि इसके बाद उन्हें दलितों के मसीहा के तौर पर देखा जाने लगेगा और यह संभवत:भाजपा का नया स्वरूप होगा, जिस स्वरूप को पाने के लिये वह तरह तयह के ‘प्रसाधन’ के इस्तेमाल करता आया है। मोदी जी रणनीतियों ने अतीत में विजय दिलायी है इसमें कोई शक नहीं है लेकिन अब वे अपने बड़बोले पन की सियासत का वजन शायद ढोने में अक्षमता महसूस कर रहे हैं।  मोदी ने जबसे हिंदुत्ववादियों को मंच पर आने दिया है वे लगता है धीरे धीरे नेपथ्य की ओर खिसक रहे हैं। हो सकता है कि ‘हां जी- हां जी’ कहने वाला एक राष्ट्राध्यक्ष उन्हें इस अस्थिर राजनीतिक परिस्थिति के लिये मुफीद लगे पर शायद राष्ट्र की बहुजातीय संस्कृति के लिये दिक्कतें पैदा हो सकती हैं।

 

जो गजल माशूक के जलवों से वाकिफ हो गयी

उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो 

Thursday, June 22, 2017

सुलगते दार्जिलिंग की राजनीति

सुलगते दार्जिलिंग की राजनीति

गोरखा लैंड को समर्थन पर भाजपा दुविधा में

-       हरिराम पाण्डेय

 

पश्चिम बंगाल में पर्यटन के लिये विख्यात दार्जिलिंग में चार दशक पुराना गोरखा आंदोलन फिर से भड़क उठा है। भाषा के नाम पर एक पखवाड़े से चल रहा यह आंदोलन दबने का नाम नहीं ले रहा। उसे दबाने के सरकारी प्रयास उस आग में घी का काम कर रहे हैं। उस इलाके की सबसे बड़ी पार्टी गोरखा जनमुक्ति मोर्चा नेपाली भाषियों के लिये अलग राज्य की मांग कर रही है। बारह जून को भड़के इस आंदोलन से उत्तर बंगाल की माली हालत बिल्कुल चौपट हो गयी है। कानून और व्यवस्था की स्थिति अत्यंत खराब है। आंदोलन को दबाने के लिये फौज बुलानी पड़ी है। इस आंदोलन के सबसे बड़ी खूबी है कि इसमें गोरखाली महिलाएं भी भाग ले रही हैं , जिससे माहौल बिल्कुल बदल चुका है।

पिछले दिनों मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य में माध्यमिक स्तर तक बंगला की पढ़ाई अनिवार्य कर दी और इसी के विरोध में दार्जिलिंग और कलिम्पोंग नेपाली भाषी  बहुल जिलों में गोरखा मैदान में उतर आये। गोरखा समुदाय के लोगों के लिये अलग राज्य की मांग को लेकर यह आंदोलन 1980 में पहली बार शुरू हुआा था। उस समय इसके नेता थे सुभाष घीसिंग और अब इसके नेता है विमल गुरूंग। हालांकि भाषा तो एक बहाना है क्योंकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्पष्ट कर दिया कि बंगला भाषा की अनिवार्यता का कानून पर्वतीय जिलों में लागू नहीं होगा। गोरखा लैंड बनाने की मांग 1986-88 के बीच बहुत जोर पर था और इस दौरान लगभग 1 हजार लोग मारे गये थे।

हालांकि यह हिंसक आंदोलन और इसे लेकरगोरखा जन मुक्ति मोर्चा,  केंद्र तथा राज्य सरकार की रस्साकशी अखबारों की सुर्खियां बन रहा है पर हाशिये पर कई स्वतंत्र तथा अहिंसक मार्च और रैलियां भी हो रहीं हैं जो ग्रास रूट स्तर पर असंतोष का ओर इशारा कर रहीं हैं। सम्पूर्ण गोरखा जनता को अपने नेता विमल गुरंग पर पूरा भरोसा नहीं है। कुछ ऐसे भी गोरखा संगठन हैं जो पृथक गोरखा लैंड तो चाहते हैं पर विमल गुरुंग के तहत नहीं। यह आागे भी कठिनाई पैदा कर सकते हैं। क्योंकि मंगलवार को पहाड़ के सभी दलों की एक बैठक हुई और सबने मिलकर संकल्प किया कि पृथक राज्य की मांग को समर्थन देंगे। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के आहवान पर बुलायी गयी इस बैठक में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट ,गोरखा राज्य निर्माण मोर्चा,गोरखा परिसंघ , सी पी आई (आार एम) और भाजपा शामिल थी। गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट के नेता नीरज जिम्बा के अनुसार यह समर्थन गोरखालैंड के लिये है ना कि गोरखा जनमुक्ति मोचा के लिये। मजे की बात है कि जिम्बा ने 2016 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल को समर्थन दिया था। जिम्बा ने तो यहां तक कहा है कि गुरंग को गोरखा टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना होगा। हालांकि गोरखा जनमुक्त मोर्चा इसे मानने को तैयार नहीं है। कई ऐसे भी दल हैं जिन्हें इस साझा बैठक के लिये बुलाया गया था पर वे नहीं आये। हालांकि सब गोरखा लैंड के समर्थन में बोल रहे थे। कुछ गोरखा नेताओं ने ममता बनर्जी पर ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाने का आरोप लग रहे हैं। उनका कहना है कि ममता बनर्जी ने विकास बोर्ड्स का गठन कर और उसमें लेपचा, तमांग, भूटिया इत्यादि श्शिमिल कर हमलोगो ताकत को विभाजित कर दिया है।  ग्रासरूट सर्वदलीय स्तर पर विमल गुरुंग की पार्टी गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को समर्थन नहीं मिलना इसकी सबसे बड़ी कमजोरी कही जा सकती है और इसका लाभ तृणमूल कांग्रेस उठा सकती है।

 जहां तक राजनीतिक नफा नुकसान की बात है एक नजर में तो ऐसा लगता है कि इससे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को घाटा होगा। लेकिन ऐसा नहीं होने की पूरी संभावना है। आम तौर जो लोग इस तरह का विश्लेषण करते हैं वे आंदोलन के स्थान को ध्यान में नहीं रखते। उत्तर बंगाल की राजनीतिक बुनावट अन्य स्थानों से थोड़ी भिन्न है या कहें कि उतनी सरल नहीं है जितनी आमतौर पर विश्लेषक समझते हैं। हिंसा के बावजूद गोरखा लैंड का यह आंदोलन जब शेष होगा तो इससे तृणमूल को ही लाभ पहुंचेगा। क्योंकि इस अलगावादी आंदोलन से बंगाली मानस क्षुब्ध है। जब यह खत्म होगा तो राजनीतिक तौर बंगाली पहचान के अजेंडे को बल मिलेगा। पिछले विधान सभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने हिंदुत्व का अजेंडा उठघ्या और उसके मुकाबले के लिये ममता जी बंगाली पहचान को हवा दे दी। ममता बनर्जी ने बंगाली संस्कृति को उत्तर भारत की गाय पट्टी या राम पट्टी वाली संस्कृति से पृथक कर दिया। ममता बनर्जी ने राज्य की संवेदनशील बंगाली जनता के समक्ष यह बात रखी कि बाजपा एक नयी संस्कृति थोप रही है। रामनवमी के मार्च और आयोजनों का मुकाबला उन्होंने बंगाली संस्कृति पर उत्तर भारत की संस्कृति थोपने की कोशिश के रूप में प्रचारित कर किया। यहां यह बता देना जरूरी है कि बंगाली में राम की पूजा उतनी लोकप्रिय नहीं है जितनी दुर्गा और काली की। इसी के जरिये उन्होंने बंगाली संस्कृति की पहचान और सवाल को हवा दे दी।

वे इसी को पुखग करने के लिये बंगला भाषा की पड़ाई को अनिवार्य कर रहीं हैं। इसी कोशिश से दार्जिलिंग इलाके के गोरखा भाषी उखड़ गये और उनहोंने विरोध का झंडा उठा लिया। 8 जून को दार्जिलिंग में कैबिनेट की बैठक थी और उसी दौरान गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने आंदोलन की तीरही बजा दी। हालांकि तबतक ममता बनर्जी ने गोरखा भाषी इलाकों में बंगला की अनिवार्यता खत्म करने की घोषणा कर दी थी। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा नको शिकायत है कि उनपर बंगाली राजनीतिज्ञ थोपे जा रहे हैं और बंगाली संस्कृति लादी जा रही है। वे इस बात से भी चिढ़े हुये हैं कि वहां ममता बनर्जी ने सुभाष चंद बोस के जयंती इतनी धूमधाम से क्यों मनायी।

 

यह पहला अवसर नहीं है जब गोरखा – बंगाली तनाव बढ़ा और उससे गोरखा लैंड की मांग को प्रोतसाहन मिला। हालांकि पर्वतीय क्षेत्र नेपाली बहुल है लेकिन जबसे वहां बंगाली और आदिवासी आकर बसने लगे जातीय संतुलन बदलने लगा। अब उदाहरण के लिये सिलीगुड़ी शहर जो डुआर्स का हिस्सा है वहां जातीय संतुलन इतना बिगड़ा कि 2007 में गोरखाओं और बंगालियों में दंगा हो गया। डुआर्स में यद्यपि गोरखा अल्पसंख्यक हैं।

अब इस ताजा आंदोलन के बाद बंगाल में बात उठने लगी है कि एक बार फिर बंग विभाजन की साजिश चल रही है। 1986 में जब गोरखालैंड आंदोलन शुरू हुआ था तो राज्य में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का शासन था और उसने जनता को पक्का आश्वासन दिया था कि बंगाल की क्षेत्रीय अखंडता बनी रहेगी। यहां तक कि माकपा ने सिलीगुड़ी में बंगाली चेतना को जगाने के लिये कई मंचों को पैसा भी दिया था। 2011 के चुनाव में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी हार गयी और तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनी पर इस मामाले में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। दार्जिलिंग कोलकाता से ही शासित होता रहा। बंगाली बहुल इस राज्य में क्षेत्रीय मोह बहुत ज्यादा है। बंगभूमि के नाम पर किसी भी हद तक यहां के जन समाज को उकसाया जा सकता है। दूसरी बात है कि बंगाली मीडिया राष्ट्रीय मीडिया से इस मामले में अलग है। बंगाली मीडिया दार्जिलिंग मसले पर मुख्यमंत्री के साथ है और वह केंद्र की आलोचना में जुटा है। कोलकाता से प्रकाशित होने वाले एक अंग्रेजी दैनिक ने तो दार्जिलिंग की समस्या की तुलना कश्मीर की समस्या से करते हुये केंद्र पर आरोप लगाया कि उसने कश्मीर के पत्थरबाजों को कठोरता से काबू करने की कोशिश की जब​कि गोरखालैंड के मामले में चुप बैठी है। एक बंगला अखबार ने तो यहां तक लिखा कि गोरका मुक्ति मोर्चा की हिंसा से दार्जिलिंग की नदियों में पानी की जगह खून बह रहा है।

इस बंगाली पहचान की समरनीति को लेकर भाजपा के हाथ के तोते उड़ गये हैं। भाजपा ने पहाड़ पर जनमत तैयार करने की दूरगामी नीति गढ़ी थी। 2009 में सुषमा स्वराज ने लोकसभा में पृथक गोरखा लैंड की मांग समर्थन किया था। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणापत्र में वादा किया था कि यदि यह गोरखा लैंड की बहुत पुरानी मांग पर सहानुभूति पूर्वक विचार करेगी। गोरखा लैंड के इस समर्थन के बदले गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने भाजा को समर्थन दिया और तबसे वह दाजर्जिलिंग सीट जीतती आयी है। लेकिन 2017 में जब मौका आया तो भाजपा ने पल्ला झाड़ लिया। भाजपा की राज्य इकाई ने साफ कह दिया कि गोरखा जनमुक्ति मोर्चा से पूरी तरह चुनावी गठबंदान था, गोरखा लैंड के समर्थन वगैरह की कोई बात नहीं थी। क्योंकि भाजपा को यह मालूम है कि यदि वह बंगाल में मुख्य विपक्षी दल के तौर पर आना चाहती है तो उसके लिये गोरखा लैंड को समर्थन घातक हो जायेगा।

भाजपा आरोप लगा रही है कि दार्जिलिंग में ममता बनर्जी बंगाली-नेपाली दंगा करवाना चाहती हैं। भाजपा का मानना है कि इसी माध्यम से वह सभी बंगाली वोटरों को अपने झंडे तले एकत्र करना चाहती हैं। भाजप हालांकि मानती है कि हालात बहुत संवेदनशील हैं। लेकिन भाजपा में बात चल रही है कि वे इसका समर्थन करेंग्को। उनका मानना है कि पहाड़ के लोगों को भी वही अधिकार हैं जो अन्य स्थानों के लोगों को हैं। पृथक राज्य की मांग सांविधानिक अधिकार है। दूसरी तरफ भाजपा गोरखालैंड की मांग को समर्थन देने से इंकार भी कर रही है। साथ ही बंगाल में यह बात भी उठ रही है कि पृथक राज्य की मंजूरी देने में राज्य सरकार की कोई भूमिका नहीं होती। यह केंद्र सरकार का काम है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के पास इससे समबंधित कोई योजना ही नहीं है कि वह क्या करना चाहती है। इस बात से पहाड़ में अनिश्चियता की स्थिति बड़ती जा रही है और आंदोलन हिंसक होने के बावजूद व्यर्थ होता नजर आ रहा है। इसका लाभ स्पष्ट रूप से ममता बनर्जी को मिलेगा। - लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।