CLICK HERE FOR BLOGGER TEMPLATES AND MYSPACE LAYOUTS »

Wednesday, October 25, 2017

भा ज पा की मुश्किलें बढीं

भा ज पा की मुश्किलें बढीं

भारतीय जनता पार्टी की मुश्किलें बढती जा रहीं हैं. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जहां बढती बेकारी और गिरती अर्थ व्यवस्था के लिए पार्टी की आलोचना करता  चल रहता था  अब उसका उपहास भी उड़ाने लगा है. अब वह खुल्लम खुल्ला कह रहा है कि उनके गलत सुधार गरीबों को दुःख पहुंचा रहे हैं और अमीरों को सहायता  दे रहे हैं. संघ की श्रमिक इकाई भारतीय मजदूर संघ ( बी एम एस )  कहा है कि मोदी सरकार की आर्थिक तथा श्रमिक नीतिया पिछली कांग्रेस  सरकारों की नीतियों  का विस्तार है. उसने आरोप लगाया कि इस सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर “एन आर आई” सलाहकार बैठे हैं. और यही लोग आर्थिक अव्यवस्था का कारण हैं. बी एम् एस के अध्यक्ष सी के सजीनारायण  ने कहा कि “ नीति निर्माण में उन लोगों का वर्चास्वा है जो वैश्वीकरण के तरफदार थे नतीजा हुआ कि सरकार दिशाहीन सुधारों की रह पर चल पड़ी और यह हमारी अर्थ व्यवस्था को हानि पहुंचा रहा है.” सजीनारायण ने आगे कहा कि “ सहचर पूंजीवाद हमारी अर्थ व्यवस्था की ख़ास खराबी है और सुधारों के बाद भी इसमें बदलाव नहीं आया.” बी एमएस नेता ने नीति आयोग की खिल्ली उडाई और कहा कि “इस सारी  बीमारी का कारण  नीति आयोग के अध्यक्ष बिबेक देबराय के गलत सुझाव हैं. हम फकत विदेशी निवेश को ही आमंत्रित नहीं कर रहे बल्कि विशेषज्ञों और सलाहकारों को भी आमंत्रित कर रहे हैं. जिस आदमी ने किसानो पर टैक्स का सुझाव दिया वही आदमी आर्थिक सलाहकार परिषद् का प्रमुख है , अब नतीजा क्या होगा  यह सोच सकते हैं. इसी आदमी ने उदारीकरण, निगमीकरण और रेलवे के निजीकरण के  सुझाव दिये. यहाँ तक कि रेलवे की नलों पर भी टैक्स लगा दिया. अब ऐसे लोग निति निर्माण के महत्वपूर्ण पदों पर रहेंगे तो यही कहा जा सकता है कि वर्तमान सरका पिछली सरकार की नीतियों का ही अनुसरण कर रही है. नतीजा यह हुआ कि हमारा देश बेरोजगार भारत बन गया.” नारायणन के मुताबिक़ नीति निर्माण का मूल कारन ही दोषयुक्त है. मुद्दों के शिनाख्त के तंत्र नाकाम  पश्चिमी पूंजीवादी मॉडल पर आधारित है. उन्होंने कहा कि नीति आयोग के पुनर्गठन के सम्बन्ध में बी एम् एस ने हाल में जो प्रस्ताव पारित किया त्या वह उसे लागू करने की मांग जारी रखेगा. नारायणन ने कहह की गरीबी तो थी ही अब कृषि संकट , अवरुद्ध उत्पादन तथा बेरोजगारी बड़े संकट बन गयी है. बी एम् एस ने घोषणा  की कि वह आगामी 17 नवम्बर को दिल्ली में सरकार के विरोध में रैली का आयोजन करेंगे. केवल बी एम एस  अकेला हो इस विरिध में तो गनीमत थी अब इसमें भारतीय किसान संघ भी आकर जुड़ गया है. किसान संघ के नेता दिनेश कुलकर्णी ने मोदी सरकार की नीतियों पर गहरा रोष ज़ाहिर किया और कहा कि किसानों का संकट बढ़ा है. कुलकर्णी ने भी साफ़ कहा कि जब नीतियों की बात आती है तो यह कहा जा सकता है कि इस सरकार की नीतियाँ पिछली सरकार की नीतियों का विस्तार है. देश में किसानो की लगातार खराब होती जा रही स्थिति के बीच विभिन्न राजनीतिक दलों से एकजुट होकर उनके पक्ष मे आने का आह्वान करते हुए भारतीय किसान संघ ने आज यहां कहा है कि अन्न उपजाने वालों की स्थिति में  सुधार लाने के उद्देश्य से चर्चा करने के लिए सरकार संसद का विशेष सत्र बुलाये जिसके बाद देशव्यापी कृषि नीतिबने. दिनेश कुलकर्णी ने कहा, देश भर की सरकारों ने अपने अपने स्तर पर स्वयं को किसानो का हितैषी बनाकर पेश किया है और बहुत कुछ करने का दावा भी किया गया है। सरकारों ने इस दिशा मंे कुछ प्रयास भी किये हैं लेकिन फिर भी इन भुमिपुत्रों की स्थिति में  कोई सुधार नहीं आया है.

उन्होंने कहा, केंद्र सरकार को किसानों के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाना चाहिए जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष के लोग आरोप प्रत्यारोप तथा उपलब्धियों एवं असफलताओ का बखान छोड़कर किसानों से जुडे़ मसले पर और किसानों की माजूदा स्थिति पर गंभीरतापूर्वक चर्चा करे और इसके बाद देशव्यापी कृषि नीति बनाया जाए. कुलकर्णी ने कहा,किसान या तो कृषि छोड़ रहे हैं या फिर मौत को गले लगा रहे हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. कर्जमाफी अथवा सहायता राशि को किसानो की हर समस्या का समाधान मान लिया गया. देश के आम जन से सीधे जुड़े राजनितिक संगठनों ने सरकार के किलाफ आरोप लगाना शुरू कर दिया है. यह नीतियों की नाकामयाबी की  पहचान हगे. सरकार ने यदि खुद को नहीं सुधारा और जनता की अपेक्शायों को पूरा नहीं किया तो भविष्य में मुश्किलें बढ़ सकती हैं. 

Tuesday, October 24, 2017

मोदी का लोकलुभावनवाद

मोदी का लोकलुभावनवाद

जो लोग सियासत की नब्ज पर नज़र रखते हैं वे इस बात को समझ रहे होंगे की मोदी जी का लोक्लुभावान्वाद अपनी राह बदल रहा है और नए नारे गढ़े  जाने लगे हैं. 2014 के चुनाव में उनकी बातों में या उनके चुनावी विषयों में दो बातें  प्रमुख हुआ करती थीं  , पहली – भ्रष्टाचार और वंशवादी राजनीति के खिलाफ उफनता गुस्सा और दूसरा – सुसाशन और देश का आर्थिक पुनरुद्धार. मोदी के चुनाव में कहीं भी हिंदुत्व या हिन्दू राष्ट्रवाद के समर्थन की भूमिका नहीं थी. अब धीरे धीरे मोदी जी की कथनी और में फर्क देखा जाने लगा है. अन्तर्राष्ट्रीय  सामुदायों में भी इस पर खुसफुसाहट शुरू हो चुकी है. तेजी से खस्ता होती जा रही माली हालत, गो रक्षा के नाम पर एक खास सम्प्रदाय को निशाना बनाया जाना, प्रेस से आँखें चुराना और ट्विटर और आकाशवाणी से जनता का सीधा संबोधन, योगी जैसे हिन्दू छवि वाले नेताओं को प्राथमिकता, गो रक्षकों की ज्यादतियों का परोक्ष समर्थन  इत्यादि  चंद ऐसे मसायल हैं जो बताते हैं कि मोदी जी अब पुरानो कथनों को दरकिनार कर रहे हैं. इन दिनों अब ऐसा महसूस होने लगा है कि अर्थव्यवस्था अब मोदी जी के लिए प्राथमिक नहीं रही. भारत के आर्थिक विकास में गिरावट आत्म प्रहार की तरह है. दुनिया अब तक यह नहीं समझ पायी है कि नोट बंदी का कारण क्या था, क्यों अचानक अर्थव्यस्था में शामिल 86 प्रतिशत नोटों को बंद कलर दिया गया गया? मोदीजी की पुरानी कथनी अभी ख़त्म नहीं हुई है , उनमें जान बाकी है पर बेशक नए बोल उभरने लगे हैं. मोदी जी अभी भी बहुत लोकप्रिय हैं पर अब शासन पर विचारधारा की विजय प्रमुख हो गयी है. नागरिक स्वतन्त्रता के आगे हिन्दू बहुल वादी राजनीति को तरजीह दी जा रही है. अल्पसंख्यकों पर हमले मोदी जी का सबा साथ सबका विकास का वादा झुठला रहे हैं. लेकिन इससे लोक लुभावन वाद का क्या लेना  देना है? लेकिन इसका लेना देना है. समाजशास्त्र के सिधान्तों के मुताबिक़ सामाजिक आधारों में परिवर्तान के अनुरूप सियासत समाज में वह विभाजक रेखाएं नहीं खीच सकी जो आवश्यक थी और समाज का नजरिया वही रह गया जो 20 वी सदी में हुआ करता था. अब यहाँ किसी राजनीतिक शासन की आलोचना की अभिव्यक्ति का संकट नहीं हुआ बल्कि पारंपरिक राजनीतिक खिलाड़ियों की वैधता का संकट खडा हो गया. लोक्लुभावान्वाद को बढ़ावा देने वाला लोकतान्त्रिक घाटा सहभागी राजनीतिक आधार को विकसित करने के दावे से कम नहीं हुआ बल्कि समाज को नए विजेताओं और पराजितों में विभाजित कर दिया जिससे समानता की अवधारणा का संकट उत्पन्न हो गया. इससे लोक्लुभावान्वाद या कहें पोपुलिज्म कोई आइडियोलोजी ना होकर समाज और सियासत में विभाजनकारी बन गयी जिसमें नेता मुख्य  खिलाड़ी हो गए.  यहाँ लोकलुभावन और लोकप्रिय में फर्क समझ लेना ज़रूरी है. जवाहर ला नेहरु और परक ओबामा लोकप्रिय थे लोकलुभावन नहीं. उनके राजनितिक  आचरण में कहीं भी लोकलुभावन जैसे व्यवहार नहीं दीखते थे. उनके आचरण से कभी ऐसा नहीं झलकता था कि लोकतंत्र केवल चुनाव के लिए है और प्रेस , न्यायपालिका, सुरक्षा एजेंसियां इत्यादि केवल लोकतान्त्रिक सरकारों के समक्ष बाधा उतपन्न करती हैं. चुनावी फैसले को मानना चाहिए , क़ानून को नहीं. अब इससे क्या होता है कि कुछ नेता तो जनिच्छा के अनुरूप होते हैं लेकिन ज्यादातर शातिर अपराधी, कलंकित – लांछित हुआ करते हैं. करिश्मा क़ानून पर भारी पड़ने लगता है और जन अभियान के समक्ष सविधान हल्का पड जाता है. इस लोकलुभावन आइडिया के डो भाग होते हैं पहला वामपंथी पोपुलिज्म और दूसरा राइटिस्ट पोपुलिस्म. वामपंथी लोक्लुभावान्वाद की सबसे अच्छी मिसाल इ९न्दिरा जी थीं. उन्होंने गरीबी हटाओ का नारा दिया और प्रेस तथा न्याय पालिका पर हमले किये. वे जनता की चाट की प्रतिमूर्ति बन गयीं और उन्होंने आपात काल लागू कर लोकतंत्र को ही निलंबित कर दिया. अभी भारत में राइटिस्ट पोपुलिस्म का कोई शासक केंद्र में नहीं है. नरेंद्र मोदी भी उसके उदाहरण नहीं हैं. उनके आचरण का कुछ हिस्सा इन्द्दिरा जी के आचरणों से मिलता है. वे चुनाव के नतीजों को सर्परी मानते हैं प[आर स्वतंत्र प्रेस और कोर्ट से नाक भौंह सिकोड़ते हैं. लेकिन हिन्दू बहुल वाद समर्थन कर इंदिरा जी से अलग भी है. अब यह स्थिति देश के लिए कितनी सार्थक है यह जनता विचार करे. 

Monday, October 23, 2017

भूख  और सियासत

भूख  और सियासत

दुनिया की सबसे बड़ी हकीक़त भूख  है और इसी लिए हमारे मनीषियों ने भी कहा है कि “ बुभुक्षितः किम न करोति पापम” दुनिया की बड़ी से बड़ी सल्तनत भूख के विप्लव के आगे टिक नहीं सकी. भारत में भूख और राजनीती का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध रहा है. अभी हाल में ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट में बताया गया है कि भूखों की संख्या के मामले में दुनिया के 119 देशों में भारत का स्थान 110वां  है.बस इस आंकड़े को लेके पक्ष और प्रतिपक्ष में जोर आजमाइश शुरू हो गयी. कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने भाषणों में इस का जिक्र किया और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी  ने  राहुल गांधी की बातों का उपहास करते हुए कहा कि कुछ लोगों को निराशा का प्रसार किये बिना नींद नहीं आती. ऐसी बातों से समस्या तो ख़त्म नहीं होती. इसका एकमात्र जवाब है कि मोदी जी यह साबित करें कि जी एच आई के उस आंकड़े में जो बताया गया है उससे काम भूखे लोग भारत में हैं. जी एच आई का यह आंकडा कुपोषण, 5 साल की उम्र से कम बच्चों की मृत्यु दर , बच्चों का अवरुद्ध शारीरिक विकास तथा कम वजन पर संगृहीत तथ्यों  पर  आधारित है. सच तो नयः है कि ये पाचों गुणक भूख के कारण नहीं हैं. यह बाल पोषण रिपोर्ट ज़रूर है पर उसे भूख का नाम देना सुन्दरी को दिखाकर जूते के विज्ञापन की तरह है. ऐसी रपटों के लिए भूख ज्यादा बिकाऊ नाम है. जहां तक भारत का सवाल है तो एन एस एस ओ के आंकड़े के मुताबिक़ हालत सुधरे हैं. इस आंकड़े के अनुसार भारत में 1983 में 16 प्रतिशत आबादी भूखी थी जो 20 वर्ष बाद 2004 में घट कर 1.9 प्रतिशत हो गयी जबकि इस बीस वर्ष में आबादी भी बढ़ी. मोदी जी ने इन आंकड़ों को पेश ना कर सामने वाले की खिल्ली उडानी शुरू कर दी. भारत एक गरीब देश है और सांस्कृतिक  तौर पर लोग खुद को गरीब और भूखा  कहने में शर्म महसूस  करते हैं. पिछले साल यू एन डी पी द्वारा देश सर्वाधिक गरीब 16 जिलों के  सर्वे के अनुसार 7.5 प्रतिशत घरों में खाने को कुछ नहीं है और 29 प्रतिशत घरों में खाने के लिए बहुत थोड़ा है. नोबेल विजेता अर्थ शास्त्री एंगस डीटन और ज्यां देरेज के अनुसार भारत में 25 प्रतिशत निर्धनतम लोगों में1987 की तुलना में  कैलोरी की खपत  2004 में  बढ़ी है. जबकि इस अवधी में प्रति व्यक्ति आय में इजाफा हुआ है. इसका कारन यह है कि जिनकी आमदनी बढ़ी है वे कैलोरी युक्त खाद्य कम खरीदते है. ये भूख की कमी को पूरा नहीं करते बल्कि खुद को बड़ा दिखाना चाहते हैं. यही नहीं आदतें भी बदल रही है. ओःले लोग मीलों चल कर काम पर पहुँचते थे अब साइकल से आते हगें बस से आते हैं या एनी साधनों से आते है. इससे कैलोरी की अधिक मात्रा लेने की ज़रूरात नहीं होती. कृषि, उद्योग और अन्य सेवाओं में मशीनों का वर्चास्व हो गया. शारीरिक श्रम ख़त्म हो गए. इसके कारण कैलोरी को ग्रहण कने की मात्रा भी घटी है और उसी मात्रा पर आधारित ये आंकड़े कुपोषण की गलत तस्वीर दिखाते हैं. निति आयोग के पूर्व अध्यक्ष अरविंद पनागारिया ने सही कहा था कि बाल कुपोषण और विकास अवारुधता के ये अंतर्राष्ट्रीय आंकडें सही नहीं हैं.भारत में नवजात एवं शिशु मृत्यु दर अन्य अफ़्रीकी देशों से कम है. इन आंकड़ों में कहीं ना कहीं कुछ गड़बड़ ज़रूरे है. यहाँ बातें थोड़ी बढ़ा चढ़ा कर बतायी गयी हैं पर कुछ समस्याए ज़रूर हैं. भारत में शिशु मृत्यु दर प्रति एक हज़ार पर 47 है जबकि बंगलादेश में 38 , इंडोनेसिया में 27 और श्रीलंका में 10 है.  यह हो सकता है कि वैक्सीन के  प्रति जागरूकता में कमी और पोषकता के बारे में जानकारी का अभाव के कारन हो लेकिन यह समस्या नहीं है. यही नहीं मेडिकल शोधों से पता चलता है कि कैलोरी लेने के बावजूद कई मामलों में वह पचती नहीं है ख़ास कर डायरिया या अस्वच्छता की स्थिति में अक्सर ऐसा होता  पाता गया है. अब ऐसी हालत में पेट  भरा भी हो तो विकास नहीं होता. 

Sunday, October 22, 2017

भा ज पा बदल रही है पैंतरा

भा ज पा  बदल रही है पैंतरा

भा ज पा ने देश की अधिकांश जनता की नब्ज को समझ लिया है और उसी का लाभ उठा रही है. पार्टी को पूरी तरह मालूम है कि यहाँ  के लोग साधनहीन हैं  और धन उनकी ललक है. इसीलिए अच्छे दिन का प्रालोभन और काले धन की जब्ती के बाद बैंकों में रुपया जमा करवाने का जुमला इत्यादि काम कर गया और मोदी नौजवानों के भगवान बन गए. लेकिन वैसा कुछ हुआ नहीं पर मोदी जी और उनकी टोली को यह तो पता चल गया कि पैसा कुछ भी करा सकता है. वह देश की जनता की लाइफ लाइन हैं. उसी से देश की जिंदगी धडकती है और अर्थ व्यवस्थ्गा देश की धड़कन का पैमाना है.. नोट बंदी , जी एस टी और बैंकों के बढ़ते कर्ज के साइड इफेक्ट से देश की धड़कन धीमी पड गयी है. इस धीमी धड़कन से सरकार चिंतित है. और वह अपना पैंतरा बदलती नज़र आ रही है.  वैसे तब भी उसने पैसे को नहीं छोड़ा है.

आगे बढ़ने से पहले यह जानना बहुत ज़रूरी है कि पैसा है क्या और यह कैसे काम करता है. पैसा वह नहीं है जो हम नोट देखते हैं या सोने की शक्ल में तिजोरियों में बंद रहता है या जिसे हम काला – सफ़ेद कहते हैं. पैसा कोई ठोस वस्तु नहीं  बल्कि एक विचार है और विभिन्न कारणों से लोग इस पर सोचने लगते हैं. जितना ज्यादा समय तक इस पर सोचते हैं वह उतना ही महत्वपूर्ण होने लगता है. यानी पैसा और समय में एक अंतर्संबंध है.  हमारे देश में भारी असमानता है और बहुत काम लोगों की दौलत के बारे बहुत ज्यादा लोग सोचते हैं. अर्थशास्त्रीय व्याख्या के के अनुसार श्रम और समय से पैसे का सह सम्बन्ध है. पर भारत जैसे असमानतापूर्ण देश में स्ध्रम और समय के अनुपात में पैसा नहीं प्राप्त होता है. इसीलिए एक बड़ी आबादी सदा इसी दिशा  में सोचती रहती है. यह सोच एक मेस्मेरिक असर पैदा करता है.  राजनीति के कुशल खिलाड़ी इस असर को समझते हैं तथा इसे विभिन्न नारों बातों से और प्रगाढ़ कर देते हैं. शुरू से देखें गरीबी हटाने के नारे, रोज़गार पैदा करने के नारे, अच्छे दिन लाने के नारे इत्यादि सब इसी के बहुरूप हैं. ज़रा गौर करें चुनाव के दो तीन साल पहले से विदेशों में  जमा भारतीय धन का भारी प्रचार किया गया. इतना ज्यादा कालाधन जमा है कि अगर वह भारत ले आया जाय तो सबके खाते में 15 -15 लाख रूपए जमा हो जायेंगे. भारतीय जनता कस्तूरी के मृग की भाँति रेगिस्तान में दौड़ती रही. जनता में का मोह पैदा कर मोदी गेम चेंजर हो गए. लेकिन अर्थ व्यवस्था की खात्राब होती हालत ने संदेह पैदा कर दिया. सर्जिकल स्ट्राइक का बवंडर, भ्रष्टाचार मुक्त शासन का तिलिस्म, डोकलम का खौफ, राज्यों में विजय की तालियाँ और विकास के गगनभेदी नारे कुछ भी जन्म ले रहे संदेह को नहीं रोक सके. आर्थिक महाशक्ति होने के सारे बनावती इंडिकेटर ज़मीन पर पड़े नज़र आरहे हैं. कहाँ तक आश्वासन था रोज्गान श्रीजान का उलटे रोजगार हीनता फ़ैल रही है. इमेज , आख्यान , मुखौटे वगैरह राजनीती वाहक हैं अगर ये ढहने लगें तो राजनीति भी ढहने लगेगी.एक बार विखंडन शुरू हुआ तो वक्त नहीं लगता है सबकुछ क्ल्हतं होने में . कांग्रेस और वाम पंथी दलों का उदाहरण सबके सामने है. पिछले डो महीनों में द्जो सर्वे की रपटें आयी हैं उनमें साफ़ पता चलता है कि मोदी जी पर से भरोसा घटने लगा है. एक वर्ग तो उन्हें नाकाम तक मानने लगा है. सरकार की चिंता की झलक इस बात से भी मिलती है कि खुद ही भंग आर्थिक सलाहकार परिषद् को 40 महीनों के बाद खुद बहाल कर रहे हैं हैं. इससे डो बातें ज़ाहिर होती हैं पहली कि प्रधान मंत्री को वित्त मंत्रालय के काम पर से भरोसा उठ गया और दूसरा कि प्रधान मंत्री में ताज़ा हालात को लेकर बौखलाहट है.

प्रधान मंत्री को यह अहसास होने  लगा है  कि शायद युवा इस बार झांसे में नहीं आय्र्न्गे तो अब चुनाव के कथन बदलने लगे हैं. जिन नौज़वानों की वे जमकर प्रशंशा करते थे अब उसद वर्ग को आहिस्ता – आहिस्ता किनारे कर रहे हैं. अब उन्ही नौ जवानों की उम्र की महिलायें हैं. यू पी में चमत्कार इसी कारण हुआ था. देश के 60 प्रतिशत आवंटि यू पी के ही हैं. 2014 का चुनाव युवाओं में उम्मीदों के उमड़ते सैलाब और नाज़वानों के सपनों का चुनाव था. अब गरीब किसानों के घर रोशन होने की उमीदों का चुनाव होगा. रोजगार सृजन और स्किल डेवलपमेंट के फ्लॉप हो जाने बाद सरकार की निर्भरता महिलाओं पर बढ़ने  लगी है. उम्मीद है आने वाले दिनों में यह साफ़ पता चलजाएगा 

महापिता सूर्य और षष्ठी मातृका का पूजन  छठ पर्व

महापिता सूर्य और षष्ठी मातृका का पूजन 

छठ पर्व

हरिराम पाण्डेय

इस वर्ष यानि 2017 में  छठ महापर्व 26 अक्तूबर को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य सामर्पित कर आरम्भ होगा और दूसरे दिन उषा की वंदना के साथ समाप्त हो जाएगा. यद्यपि इसका प्रारंभ 4 दिन पहले से ही हो जाता है. हालांकि यह व्रती का सूर्य उपासना के लिए आत्म अनुकूलन की अवधि है.

वैदिक आधार

इसमें मूल पूजन सूर्य का ही होता है. भारतीय वांग्मय में सूर्य का सबसे ज्यादा वर्णन मिलता है. सूर्यांश संभव दीप: “ के उच्चार के साथ शुरू हुई  दीपावली के 6 दिनों के बाद कार्तिक षष्ठी को “ चक्षो सूर्यः जायतः “ के साथ अर्घ्य के बाद त्यौहार समाप्त हो जाता है. इसे कार्तिक षष्ठी को मनाये जाने का वैदिक महत्त्व है कि लोक मातृका षष्ठी की प्रथम पूजा सूर्य ने इसी दिन की थी. इसके अलावा वेदों के अनुसार सूर्या की सारी शक्ति उनकी दो पत्नियां प्रत्युषा और उषा से उत्सर्जित  होती है. इसलिए संध्या में प्रत्युषा को और प्रातः उषा को अर्घ्य दे कर सूर्य के वरदानों के प्रति आभार प्रकट किया जाता  है.  यजुर्वेद में सूर्य को परम देव सविता कह कर पूजा गया है - ॐविश्वानिदेव सवितर्दुरितानिपरासुव यदभद्रंतन्नआसुव. वेदों में जहां सूर्य को सविता कहा गया है वहीँ उसे  सबके कर्मो का विधान करने वाला है-  महीदेवस्य सवितु:परिष्टुति छत- वस्तुतः सूर्य के समवेत शक्ति की अराधना है लेकिन इसे छत माई कहा जाता है. इसे लेकर कई लोग सवाल पूछते हैं और भक्तों को अज्ञानी कहते हैं लेकी सच तो यह है कि वे खुद अज्ञान के अन्धकार में भटक रहे हैं.श्वेताश्वतरोपनिषद में परमात्मा की माया को 'प्रकृति' और माया के स्वामी को ' मायी ’ कहा गया है। यह प्रकृति ब्रह्मस्वरुपा, मायामयी और सनातनी है। यही मायी  यहाँ से चलकर हमतक आते आते माई हो गया. इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि प्रकृति खुद को पांच भागों में विभाजित करती है वे हैं – दुर्गा , राधा, लक्ष्मी , सरस्वती और सावित्री . ये पांच देवियाँ पूर्णतम प्रकृति कहलाती हैं. इन्हीं प्रकृति देवी के अंश, कला, कलांश और कलांशाश भेद से अनेक रूप हैं, जो विश्व की समस्त स्त्रियों में दिखायी देते हैं.  मार्कंडेय पुराण के अनुसार “ स्त्रियः समस्ता:सक्ल्ला जगत्सु  प्रकृति देवी  का छठा अंश देवसेना है,  इसे षष्ठ मातृका भी कहते हैं और यह विश्व के सभी बालकों की रक्षक मानी. जाती है और सूर्य ने सबसे पहले इसी की पूजा की थी इसीलिये षष्ठी पूजा या छठ पूजा कहते हैं.

सूर्य देव की उपासना सावित्री और गायत्री दोनों की उपासना होती है. ऋग्वेद में परम ज्योति [अग्नि स्वरूप] को कई रूपों में उपास्य माना गया है. श्रेष्ठ ज्योति सविता देवको वेदों में अमृत वर्णित किया गया है. मत्यभूतोंमें समाहित अमृतदेवअग्नि ही है।  इदं ज्योतिरमृतंमत्र्येषु।[ऋग्वेद6।9।4] आयुर्बलसे युक्त अग्नि म‌र्त्य भूर्तोमें रहने वाला अमृत अतिथि है। [ऋग्वेद 6/4/2]मत्र्येषुअग्निमृतोनिधायि [ऋग्वेद7/4/4] यह अमृत ही निधि स्वरूप है. सविता देव ब्रह्मरूप में जीवन-मरण के साक्षी और कारण हैं. 

यजुर्वेद में तीन तरह की अग्नि का उल्लेख है. विभा तेअग्नेत्रेधात्रयाणि [यजुर्वेद 12/19]अर्थात् मन, प्राण और वाक् ये तीन अग्नियां हैं। वैदिक ऋषि तीन नामों से उपासना करते हैं। ऋग्वेद [1/16/4/1] में तीन अग्नियोंको तीन भ्राता कहा गया है. सूर्य अग्नि का चित्रण वेद में विस्तृत ढंग से है. 

.वि या सृजति समनं व्यर्थिनः पदं न वेत्योदत
वयो नकिष्टे पप्तिवांस आसते व्युष्टौ वाजिनीवति

 

छठ पर्व का दार्शनिक महत्त्व

दर्शन में कहा गया  है कि शरीर का निर्माण पांच तत्वों से हुआ है. वे तत्व हैं- क्षिति ( मिटटी) , जल , पावक ( अग्नि) , गगन ( स्पेस ) और समीर ( वायु). इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सूर्य की है यह वैज्ञानिक शोधों से भी प्रमाणित हो चुका है. सूर्य से पृथ्‍वी पैदा होती है, पृथ्‍वी से हम सबके शरीर निर्मित होते है. थोड़े ही दूर फासले पर सूरज हमारा महापिता है.सूर्य पर जो घटित होता है वह हमारे रोम-रोम में स्‍पंदित होता हे. क्‍योंकि हमारा रोम-रोम भी सूर्य से ही निर्मित है. सूर्य इतना दूर दिखाई पड़ता है,इतना दूर नहीं है. हमारे रक्‍त के एक-एक कण में और हड्डी की एक-एक टुकड़े में सूर्य के ही अणुओं का वास है. हम सूर्य के ही टुकड़े है. और यदि सूर्य से हम प्रभावित होते है. इसमें कुछ आश्‍चर्य नहीं है—इम्‍पैथी है,समानुभूति है. सूर्य से इसी इम्पैथी यानी समानुभूति  के कारण भारत सूर्य संस्कृति  का देश बन गया और इसके समस्त धार्मिक कृत्य सूर्य से जुड़े हैं.

यस्या रुशन्तो अर्चयः प्रति भद्रा अदृक्षत 
सा नो रयिं विश्ववारं सुपेशसमुषा ददातु सुग्म्यम्

यौगिक दर्शन के अनुसार सभी जीवों के बाहरी आवरण अत्यंत संवेदनशील विद्युत्चुम्बकीय चैनल्स  हैं और विशिष्ट मानसिक एवं शारीरिक स्थितिओं में सौर ऊर्जा को सोखने एवं उसके परिचालन की क्षमता में काफी इजाफा हो जाता है. छठ पूजा के रीति रिवाज  व्रतियों का  इस ब्रम्हांडीय ऊर्जा को ग्रहण के लिए अनुकूलन करते हैं. पूजा के बाद यही ऊर्जा  शारीरिक चैनलों के माध्यम से अपने चतुर्दिक विद्युतचुम्बकीय वाले का निर्माण करती है. घर के सदस्य तथा व्रती के बच्चे उस अदृश्य ऊर्जा वलय के संपर्क में आते हैं तो उनके शरीर के बाहरी आवरण के चैनल्स उन्हें गृह कर उर्जस्व हो जाते हैं.  

वि या सृजति समनं व्यर्थिनः पदं न वेत्योदती 
वयो नकिष्टे पप्तिवांस आसते व्युष्टौ वाजिनीवति

यौगिक  दर्शन के अनुसार छठ पूजा 6 चरणों  में विभाजित होती है.

 पहला चरण ,  उपवास के फलस्वरूप मन , मष्तिष्क और आत्मा का निर्विषीकरण हो जाता है और व्रती ब्रम्हांडीय सौर  ऊर्जा को ग्रहण करने लगता है.

दूसरा चरण, जल में कमर तक खड़े होने के बाद शरीर के भीतर सौर ऊर्जा से बनने वाली अतिभौतिक ऊर्जा  का   रिसाव बंद हो जाता है और वह भीतर ही भीतर शुषुमना में प्रविष्ट होने लगती है.

तीसरा चरण , सौर ऊर्जा प्रकाशीय तंत्रिका और रेटिना  के माध्यम से व्रती के पिट्यूटरी तथा पीनिअल और हाइपोथाल्मस ग्लैंड्स जिसे त्रिवेणी कहते हैं में  प्रवाहित होने लगती है.

चौथा चरण, इससे त्रिवेणी सक्रिय हो जाती है.

पांचवा चरण, त्रिवेणी की सक्रियता से शुषुमना एक पावर हाउस में बदल जाता है और उससे क्रांतिक अतिभौतिक ऊर्जा का प्रवहन आरम्भ हो जाता है.

छठा चरण, चूँकि ऊर्जा अविनाशी है है अतः वह व्रती तथा उसके आसपास के वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है.

.विश्वस्य हि प्राणनं जीवनं त्वे वि यदुच्छसि सूनर
सा नो रथेन बृहता विभावरि श्रुधि चित्रामघे हवम्

छठ पर्व की कथा

 ब्रम्हवैवर्त पुराण के अनुसार प्रथम मनु महाराज  स्वयम्भुव  के पुत्र प्रियव्रत के कोई संतान नहीं थी. एक बार महाराज ने कश्यप ऋषि  से दु:ख व्यक्त कर पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा. महर्षि ने पुत्रेष्टि यज्ञ का परामर्श दिया. यज्ञ के फलस्वरूप महारानी को पुत्र जन्म हुआ, किंतु वह शिशु मृत था. राजा शोकाकुल हो गए. महाराज मृत  शिशु को अपने सीने  से लगाये विलाप कर रहे थे. उसी समय  एक आश्चर्यजनक घटना हुई.एक विमान पृथ्वी पर आकाश आता दिखा .विमान में एक ज्योर्तिमय नारी विराजमान  थी. राजा उसकी स्तुति करने लगे. इसपर देवी ने  कहा-मैं  षष्ठी  हूँ, ब्रह्मा की मानस पुत्री. मैं विश्व के सभी  बालकों की रक्षिका हूँ और अपुत्रों को पुत्र प्रदान करती हूँ.देवी ने शिशु के मृत शरीर का स्पर्श किया. वह बालक जीवित हो उठा.महाराज के प्रसन्नता की सीमा न रही.वे अनेक प्रकार से षष्ठी देवी की स्तुति करने लगे. राज्य में हर महीने के शुक्लपक्ष की षष्ठी को मनाये जाने की  घोषणा कराई. तभी से परिवार कल्याणार्थ, बालकों के जन्म, नामकरण, अन्नप्राशन  आदि शुभ अवसरों पर षष्ठी-पूजन प्रचलित हुआ. सूर्य को अर्ध्य तथा षष्ठी देवी का पूजन एक ही तिथि को पड़ने के कारण दोनों का समन्वय भारतीय जनमानस में इस प्रकार को गया कि सूर्य पूजा और छठ पूजा में भेद करना मुश्किल है, वास्तव में ये दो अलग - अलग त्योहार हैं, सूर्य की षष्ठी को दोनों की ही पूजा होती है.

छठ पर्व की स्थानिकता

छठ  पर्व मुख्यतः बिहारवासियों का पर्व है और बिहार से सटे नेपाल तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी  इसे मनाया जाता है.बिहार में इसे मनाये जाने का मुख्य कारण है इसकी स्थानिकता. कथा है कि एक बार शिव भक्त माली और सोमाली सूर्य की और जा रहे थे. यह बात सूर्य की नागवार लगी और सूर्य ने शिवभक्तों को जलाना शुरू किया. उन्होंने शिव जी से शिकायत की. शिव ने सूर्य पर त्रिशूल से प्रहार कर उसे खंडित कर दिया. सूर्य के तीन टुकड़े पृथ्वी  पर तीन स्थानों पर गिरे , वे तीन स्थान हैं , देवार्क ( बिहार में देव नामक स्थान में) , कोणार्क ( ओड़िसा) और लोलार्क ( काशी). चूँकि , देव का मंदिर पश्चिमाभिमुख और यही एकमात्र मंदिर है जिसमें मुख्या प्रतिमा पश्चिमाभिमुख है. बाद में उससे अन्य पौराणिक साक्ष्य जुड़ गए. इसीलिए अस्ताचल गामी सूर्य की पूजा यहीं से शुरू हुई. बाद में अन्य स्थानों में भी होने लगी.

.विश्वान्देवाँ आ वह सोमपीतयेऽन्तरिक्षादुषस्त्वम् 
सास्मासु धा गोमदश्वावदुक्थ्यमुषो वाजं सुवीर्यम्

 पर्व की स्वरुप योजना

यह चार दिवसीय पर्व है और यह कार्तिक शुक्लपक्ष चतुर्थी से शुरू हो कर सप्तमी तक चलता है. इस दौरान 36 घंटे तक व्रती उपवास करता है जिसके भीतर वह जल तक नहीं ग्रहण नहीं कर सकता है.

नहाय खाय

पहले दिन , यानी कार्तिक शुक्लपक्ष चतुर्थी  को घर की सफायी कर स्वयं शुद्ध हो विधान पूर्वक बने भोजन करता है , भोजन में कद्दू, चने की दाल और चावल ग्रहण किया जाता है.

खरना

दूसरे दिन, दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिनभर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं. इसे ‘खरना’ कहा जाता है. खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है. प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है. इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है.

 

संध्या  अर्घ्य  

तीसरे दिन यानी कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी  को दिन में छठ का प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ के अलावा फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है.

शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नियत जलश्रोत , तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य देते हैं.  सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है.

उषा अर्घ्य

चौथे दिन , कार्तिक शुक्ल पक्ष सप्तमी को उषा काल में उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. व्रती वहीं पुनः इकट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने पूर्व संध्या को अर्घ्य दिया था. पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है. सभी व्रती तथा श्रद्धालु घर वापस आते हैं. पूजा के पश्चात व्रती दूध या अन्य गर्म पेय  पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं.

.ये चिद्धि त्वामृषयः पूर्व ऊतये जुहूरेऽवसे महि 
सा न स्तोमाँ अभि गृणीहि राधसोषः शुक्रेण शोचिषा

 

छठ पर्व की तारीख

नहाय खाय –

24 अक्तूबर 2017

खरना :

25 अक्तूबर 2017

छठ पर्व 2017: मुहूर्त 
षष्ठी  के दिन सूर्यादय - 06:41 सुबह
षष्ठी के दिन सूर्यास्त  - 18:05 संध्या
 
संध्या अर्घ्य  की तिथि

षष्ठी तिथि प्रारंभ- 25 अक्टूबर 2017 को सुबह 09:37

षष्ठी तिथि समाप्ति- 26 अक्टूबर2017 को शाम 12:15 बजे