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Sunday, December 23, 2018

किसान कर्ज माफी से बात बनेगी क्या?

किसान कर्ज माफी से बात बनेगी क्या?

एक प्रश्न है, क्या नरेंद्र मोदी की सरकार किसानों और कृषि क्षेत्र की सभी मुश्किलों के लिए जिम्मेदार है ? शायद नहीं, किसानों की पीड़ा भारत की अर्थव्यवस्था के विकास के साथ जुड़ी है और यह पिछले दो दशकों से लगातार बिगड़ती जा रही है । मौजूदा संकट के  हालांकि कई कारण हैं, जिनमें तेल की बढ़ती कीमत ,आंतरिक आर्थिक निर्णय जैसे नोटबंदी और जीएसटी इत्यादि। किसानों की पीड़ा का बहुत बड़ा राजनीतिक महत्व है। कृषि क्षेत्र  एनडीए सरकार लगातार ध्यान में है , लेकिन राहुल गांधी और कांग्रेस ने किसानों की पीड़ा और उनके दुख को बहुत बढ़ा चढ़ाकर जनता के सामने रखा। विपक्षी दलों ने भी इस मामले का इस्तेमाल किया। इसे लेकर राजनीति करना बिल्कुल गलत नहीं है। राजनीति और शासन दोनों अवधारणा से जुड़े हैं और एक नकारात्मक अवधारणा का उपयोग विपक्ष करेगा ही।  2014 के आम चुनाव के प्रचार के दौरान भाजपा ने कांग्रेस को एक भ्रष्ट सरकार के रूप में चारों तरफ चित्रित किया । अब राहुल गांधी और कांग्रेस ने किसानों की कर्ज माफी के बारे में बात करके बहुत बड़ी गलती कर दी। क्योंकि किसान कर्ज माफी की घोषणा विगत एक दशक से या कह सकते हैं उससे कुछ ज्यादा समय से एक फैशन बन गई है । अब तक कर्ज माफी की कोई नीति नहीं बनी है। हालांकि , सभी सरकारों ने इसकी घोषणा की है और इसे लागू भी किया है। ताकि किसानों को दुख से बाहर निकलने  में मदद मिल सके। लेकिन, सवाल है कि क्या यह नीति प्रभावशाली हो  सकती है ? क्या किसानों की छोटी सी आबादी भी यूपीए सरकार के साठ हजार  करोड़ की कर्ज माफी से लाभान्वित हुई है? हम कई राज्यों में किसान कर्ज माफी की बात सुनते हैं। लेकिन कभी यह सुनने में नहीं आया इससे किसानों की पीड़ा कम हो गयी हो।फिर भी, भारत के राजनीतिज्ञ कर्ज माफी की घोषणा करते हैं। यह ठीक उसी तरह है जिस तरह पुराने जमाने के राजा- महाराजा किसी संकट के समय लोगों की मालगुजारी माफ कर दिया करते थे। भारत को आजाद हुए 70 वर्ष हो गए लेकिन हम इस सोच से उबर नहीं सके हैं । किसान कर्ज माफी के विरुद्ध कई तर्क हैं। पहला कि छोटे किसानों के लिए संस्थानिक कर्ज अपवाद हैं।  माफी इसे कभी लाभदायक नहीं बनाती। दूसरे, कर्ज माफी खेती का एक मौसम खत्म होने के बाद होती है, लेकिन तब तक फसल नुकसान हो चुकी होती है। सरकार को किसानों की मदद करनी चाहिए लेकिन यह मदद तब हो जब कृषि का मौसम शुरू हो। मसलन, बुवाई के समय ना की कटाई के समय। सरकार को किसानों को तब मदद करनी चाहिए जब वह बीज ,खाद इत्यादि खरीदता है या बुवाई के लिए खेत तैयार करता है। क्योंकि, इसी समय खर्च पड़ता है।  यह खर्च खेती की लागत में जुड़ जाता है। लागत की ज्यादा वापसी अपेक्षित होती है और यह ऋण माफी से ज्यादा महत्वपूर्ण है । वर्तमान में 1.7 लाख करोड़ रुपए  की कृषि ऋण माफी योजना चल रही है। यदि यह रकम फसल की शुरुआत में दी गई होती तो इसके लौटने या लाभप्रद होने की उम्मीद थी।  इसी समय किसानों को मदद चाहिए ,चाहे वह आर्थिक हो या कोई और। इस मदद को सब्सिडी या सीधे खाते में जमा करके दिया जा सकता है। इस मौके पर अगर मदद मिलती है तो इससे कर्ज कम होंगे। किसान भीख नहीं चाहते हैं। उन्हें सिंचाई के लिए पैसा चाहिए ,प्रतियोगिता मूलक बाजार चाहिए जिसमें वह अपना उत्पादन बेच सकें और बाजार दलाल विहीन होने चाहिए। कृषि कर्ज माफी बैंकिंग और अन्य आर्थिक क्षेत्र के लिए एक फंदा भी है। क्योंकि हर बार कर्ज माफी उधार के नियमों में या कहें उसके अनुशासन में बाधा डालती है और उसको बिगाड़ देती है। कर्जे से जूझ रहे किसान में यह सुरक्षा का मिथ्या भाव पैदा करती है।
            राजनीतिक दल कर्ज माफी की घोषणा करके एक दूसरे को नीचा दिखाने के चक्कर में रहते हैं । लेकिन सच तो यह है कि इसका प्रत्यक्ष आघात अर्थव्यवस्था पर होता है। कुछ किसान तो यह सोचते हैं कि अब उन्हें कर्ज वापस ही नहीं करना पड़ेगा। इससे कर्ज देने वाली संस्थाओं के आगे समस्या पैदा हो जाती है । आगे चलकर यह छोटे किसानों के लिए मुश्किल बन जाती है। बड़े किसान तो बैंकों इत्यादि से कर्ज ले लेते हैं और बाद में माफी का मजा लूटते हैं।  जो किसान खेती के लिए जरूरी सामान खरीदने की ताकत नहीं रखते वे ऊंचे ब्याज दर पर महाजनों से कर्जा लेते हैं और धीरे-धीरे लगातार गरीब होते जाते हैं इनमें से कई आत्महत्या कर लेते हैं। यह किसानों ,राजनीतिज्ञों  और  बैंकों  के बीच  का एक कुत्सित चक्र है। राहुल गांधी ने हाल में किसानों की कर्ज माफी की घोषणा की, क्या यह राजनीतिज्ञ किसानों की पीड़ा को अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करना बंद कर सकते हैं। राहुल गांधी क्यों नहीं इस दिशा में कदम बढ़ाते हैं।

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