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Wednesday, March 24, 2010

सरकार को जोखिम उठाना ही होगा

इन दिनों कांग्रेस लम्बे मुबाहिसों में ज्यादा उलझी सी दिख रही है। आखिर उसके इस बदले नजरिये का कारण क्या है? क्या वह अपने सहयोगी दलों की विश्वसनीयता आजमा रही है? लेकिन ऐसा नहीं लगता, क्योंकि कांग्रेस रहे या जाये घटक दलों की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है और जहां तक द्रमुक का सवाल है तो वह इसलिये चिपका हुआ है कि कहीं कोई मंत्रिपद ही हाथ लग जाय। बाकी सब या तो कांग्रेस से भितरघात करने में जुटे हैं या अविश्वसनीय हैं। इसके बाद भी कांग्रेस जोखिम पर जोखिम उठा रही है। इससे उसके संसदीय दल में खिंचाव भी आ सकता है। आखिर क्यों? यह अच्छा है कि संसद में लम्बी बहसें होती हैं और बाद में स्थायी समितियों द्वारा बीच बचाव करके उन पर रुख नरम नहीं किया जाता, क्योंकि यही तरीका है जिससे कांग्रेस के सांसद यह सीख सकें कि सांसदों का आचरण कैसा हो। सांसदों को साप्ताहिक निर्देशों का अध्ययन करना होगा और अगर किसी मौके पर वे गैरहाजिर होते हैं तो उन्हें मुख्य सचेतक से इसका स्पष्टीकरण देना होगा। उन्हें मतदान के लिये उपस्थित रहना होगा। अगर कांग्रेस 200 मतों के बारे में आश्वस्त हो तो अन्य घटकों से वह बातें कर सकती है। उन्हें बांटना भी सहज हो जायेगा। आखिर फूट डाल कर राज करने की इजारेदारी केवल अंग्रेजों की थोड़े ही है। इसके अलावा आगे जो आने वाला है उसके लिये एक अनुशासित और सुगठित कांग्रेस की जरूरत भी है। राहुल गांधी पार्टी को अपना आधार बनाना चाह रहे हैं। उनकी योजना है कि सन् 2012 में उत्तरप्रदेश पर कब्जा कर लिया जाय और लगे हाथ हो के तो बिहार पर भी। पश्चिम बंगाल को कब्जा करने में थोड़ा समय लग सकता है। क्योंकि ममता बनर्जी को पहले वहां से जीतने देना होगा फिर उनकी अक्षमता को प्रचारित करना होगा तब कहीं जाकर इसके आगे वाले चुनाव में कुछ हाथ लग सकता है। सन् 2014 में जब आम चुनाव होगा तब कांग्रेस उसी शर्त पर अकेले बहुमत में आ सकती जब विपक्ष कमजोर हो और कांग्रेस मजबूत हो। इसे विकसित देश की आधुनिक पार्टी की तरह होना होगा बस फर्क केवल इतना होगा कि इसके शीर्ष पद किसी खास के लिये आरक्षित होंगे। इसीलिये पार्टी ने राजनीति को नयी दिशा देने के लिये महिलाओं को जोडऩे का प्रयास किया है। सपा, राजद ओर बसपा अभी मंडल से चिपके हुए हैं और भविष्य में उन्हें बड़ी चुनौतियों का सामना कर पड़ सकता है। आने वाली सरकार को यदि जनता की आकांक्षाएं पूरी करनी हैं तो उसे जनता को साफ-साफ बताना होगा कि उसकी सीमाएं क्या हैं वरना वह कामयाब नहीं हो सकती है। जनता को बताने का यह रास्ता बेशक जोखिम भरा है।
हरिराम पांडेय

हेडली और 'स्टुपिड कॉमन मैन

डेविड कोलमैन हेडली के मामले में सभी सरकारें लोगों को बरगलाने में लगी हैं, इसलिये अकेले मनमोहन सिंह की सरकार पर यह दोष नहीं मढ़ा जा सकता है। कुछ विशिष्ट पत्रकारों के माध्यम से मनमोहन सिंह की सरकार, खास कर हमारे माननीय गृह मंत्री महोदय, लगातार बताने की कोशिश कर रहे हैं कि एफ बी आई के समक्ष हेडली का कबूलनामा हमारी कूटनीति की बड़ी भारी विजय है। हमारे गृह सचिव ने बिल्कुल विजयी अंदाज में बताया कि बेशक इस मामले में हेडली का प्रत्यर्पण नहीं हो सकता है लेकिन अन्य मामले में उसके प्रत्यर्पण के रास्ते खुले हैं। लेकिन उन्होंने यह बताने की कृपा नहीं की कि वे अन्य मामले क्या हैं? गृहमंत्री का कहना है कि हम कोशिश जारी रखेंगे और 'इस बीच आतंकियों के हाथों आम भारतीयों का खून जारी रहेगा।
देश के एक बहुत बड़े अंग्रेजी अखबार ने लिखा कि हेडली के कबूलनामे से जो भारत को विजय मिली है वह चार प्रकार से महत्वपूर्ण है। पहला कि, पहली बार अल कायदा और लश्कर में रिश्ते की पोल अमरीकी अदालत में खुली। क्या सचमुच? जी नहीं अमरीकी अदालत में इस तरह की पहली घटना सन् 2003 में तब हुई थी, जब जार्ज बुश राष्ट्रपति थे। इसके बाद भी पाकिस्तानी, अफगान और सऊदी मूल के कई अमरीकी नागरिक इन मामलों में गिरफ्तार किये गये। उन पर अमरीकी भूमि से भारत के खिलाफ जंग करने के आरोप थे। दूसरा कारण उस पत्र ने यह बताया है कि हेडली पर मृत्युदंड का खतरा कायम है। अब उन्हें कौन बताये अमरीकी कानून के अंतर्गत एफ बी आई अगर किसी मामले में मृत्युदंड का विकल्प त्याग देता है तो किसी भी नये सबूत के उद्घाटित होने पर वह उस मामले में मृत्युदंड की मांग नहीं कर सकता है। ... और तीसरा कि भारत अभी भी अमरीका जाकर हेडली से पूछताछ कर सकता है। अब क्या बताया जाय कि अपनी हिरासत में पूछताछ और एफ बी आई की हिरासत में पूछताछ में क्या फर्क है। पहले तो एफ बी आई को लिखित प्रश्न सौंपने होंगे और वह उनकी समीक्षा करेगा, तब ही पूछताछ करने की अनुमति मिलेगी। चौथा कारण है कि लश्कर के खिलाफ भारत का दावा और मजबूत हो गया। अब ये, बता सकते हैं कि क्या भारत लश्कर के अमीर प्रो. हाफिज सईद को पाकिस्तान के हाथों गिरफ्तार करवा सकता है और सजा दिलवा सकता है? या, भारत यह देख सकता है कि पाकिस्तान में लश्कर के शिविर बर्बाद किये गये अथवा नहीं? क्या भारत ऐसा कुछ कर सकता है जिससे 26 / 11 जैसी घटना दुबारा ना हो? अगर ऐसा नहीं हो सकता है। तो दावा मजबूत होने से क्या लाभ? एक ओर बड़े अंग्रेजी अखबार ने अपने ज्ञान के जोम में यह बताया है कि हेडली के अपराध कबूले जाने से बेशक मृत्युदंड उसे नहीं मिलेगा पर जो मिलेगा वह क्या कम है? क्या वे यह कहना चाहते हैं कि भारत की निरीह जनता, दैट स्टुपिड कॉमन मैन, आतंक के नाम पर जो झेल रही है वह बहुत कम है। 26/11 मसले पर भारत की जांच दो समानांतर रेखाओं पर चल रही है। पहला कि यह सरासर लश्कर का काम है और इसका पाकिस्तान सरकार से कोई लेना-देना नहीं है और दूसरा कि इसके प्रति पाकिस्तान सरकार की कोई जिम्मेदारी भी नहीं है। इस कबूलनामे से अमरीका अपना दो उद्देश्य सफल करना चाहता है। पहला कि भारत सबको बताये कि इसमें लश्कर दोषी है और दूसरा कि इसमें पाकिस्तान की कोई भूमिका नहीं है। यहां मुख्य बात यही है।
अब देखिये कि एफ बी आई के हलफनामे के अनुसार हेडली को क्या मालूम है? हेडली की दोस्ती इलियास कश्मीरी से थी। इलियास 313 ब्रिगेड से ताल्लुक रखता है और ओसामा बिन लादेन का करीबी है। उसने ही हाल में आई पी एल मैचों और कामनवेल्थ खेलों पर हमले की धमकी दी थी। हेडली की उससे अंतिम मुलाकात सन् 2009 के आरंभ में उत्तरी वजीरिस्तान में हुई थी। वह लश्कर के कई नेताओं को जानता है और पाकिस्तानी सेना के कई आला अफसरों से उसका दोस्ताना है। इसके अलावा वह जो जानता है वह एफ बी आई ने बताया नहीं। वह जरूर जानता होगा कि भारत में लश्कर के कौन-कौन लोग हैं और उसके संगठन कहां-कहां हैं ? अगर अमरीका ने भारतीय अफसरों को पूछताछ की इजाजत दी होती तो कम से कम पुणे कांड नहीं हुआ होता। एफ बी आई यह समझता है कि हम (भारत) अगर सीधे पूछताछ करें तो वह कुछ नहीं जान पायेगा। यह हमारे आत्मसम्मान पर सीधा आघात है। हममें दम है पर हम सीधे खड़े होने में न जाने क्यों हिचक रहे हैं? जो लोग इसे अपनी विजय बता रहे हैं उन्हें मालूम होना चाहिये कि अगर कोई तालिबान अफगानिस्तान में पकड़ाता है तो पाकिस्तान उसे अपनी हिरासत में लेकर पूछताछ करता है। अगर अफगानिस्तान को आपत्ति भी होती है तो अमरीका उसे घुड़क देता है। और बाद में अमरीका भी उससे पूछताछ करता है। अगर पाकिस्तान आनाकानी करता है तो उसे परिणाम भुगतने को तैयार रहने को कहा जाता है।
हरिराम पांडेय

Thursday, March 4, 2010

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस - खुशी मनाएँ या गम

सामाजिक मामलों में खुशी और गम का अद्भुत मेल होता है। पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी की तरह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस भी एक मुट्ठी में खुशी और दूसरी मुट्ठी में गम लेकर आता है। अगस्त और जनवरी के पर्व हमारे पुरखों के संघर्ष की यादगार बन कर आते हैं और हमें स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों और आदर्शों की याद दिलाते हैं। वह समय इतना दूर भी नहीं कि उसकी अनुगूंजें हमें झंकृत न कर दें। देश में अभी भी ऐसे हजारों लोग जीवित हैं, जिन्होंने इस संघर्ष में हिस्सा लिया था और अपना बहुत कुछ गंवाया था। यही वजह है कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर देश की उपलब्धियों का मूल्यांकन करते समय हमारा मन उदास हो जाता है। हमें लगता है कि हमारे साथ धोखा हुआ है और इन दोनों दिवसों पर होनेवाले समारोह बिलकुल रस्मी हैं।
क्या अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का चरित्र भी कुछ ऐसा ही है? जब राष्ट्रसंघ ने हर साल 8 मार्च को 'विश्व महिला दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय किया, तब तक दुनिया भर में स्त्री चेतना का संघर्ष एक निर्णायक दौर तक पहुंच चुका था। लेकिन इस संघर्ष को पश्चिमी देशों में जैसी सफलता और मान्यता मिली, वह विश्व के अन्य भूखंडों में रहने वाली आधी आबादी को नहीं मिल सकी। जहां तक हमारे अपने देश का सवाल है, हमने अपने संविधान में स्त्रियों को पुरुषों के बराबर जगह देने में जरा भी कृपणता नहीं की। हमारा संविधान बनाने वालों ने उन परिस्थितियों में जितना आदर्श संविधान बनाना संभव था, उसकी पूरी कोशिश की। उस विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उन महानुभावों की थी, जिन पर इस दस्तावेज को लागू करने की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी थी। यह काम कितना हुआ और कितना नहीं हुआ, यह हमारे सामने है। किसी भी देश के सांस्कृतिक विकास को आंकने का यह एक विश्वसनीय पैमाना हो सकता है कि वहां स्त्रियों की हालत कैसी है। इस मामले में हम भारतीय अपने आप पर बहुत ज्यादा इतरा नहीं सकते।
यही कारण है कि भारत में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस स्त्रियों का 'कोप दिवस' बन जाता है। वे तरह -तरह के तथ्य और आंकड़े जुटा कर यह साबित करती हैं कि देखो, आज भी हमारे साथ कितना अन्याय हो रहा है। इस दिन हर मुखर स्त्री समाज के विरुद्ध अपने एफआईआर को फिर से लिखती है और उसमें नई घटनाएं जोड़ती है। महिला दिवस पर गाना -बजाना कम होता है और दुखड़ा ज्यादा रोया जाता है। यह स्वाभाविक भी है। साल भर में हम जितनी समस्याओं से फारिग होते हैं, उससे ज्यादा नयी समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। इसलिए भारत में नारी संघर्ष के कम से कम दो चेहरे हैं। एक चेहरा मध्यवर्गीय महिलाओं का है, जिसकी मुख्य मांग 'नारी की स्वतंत्रता' की है। वह अपने शरीर, अपनी आत्मा और अपनी पारिवारिक तथा सामाजिक भूमिका को लेकर बहुत ही सचेत है और अपने सारे अधिकार हासिल करना चाहती है। दूसरा चेहरा ग्रामीण महिलाओं या शहर में रहने वाली गरीब महिलाओं का है। उनके लिए स्वतंत्रता से ज्यादा मूल्य दैनंदिन जीवन की सुविधाओं का है। उन्हें देह की आजादी से ज्यादा प्यारी है कई किलोमीटर दूर से पानी लाने और ढिबरी या लालटेन की मद्धिम रोशनी में चूल्हा -चौका करने के बोझ से आजादी।
वे मूर्ख या पागल हैं जो इन दोनों आजादियों को एक-दूसरे के विकल्प के रूप में देखते हैं। जीवन में इस तरह का बंटवारा नहीं होता और न चलता है। यही कारण है कि भारत में महिला आंदोलन तेज नहीं हो पा रहा है। ऐसा लगता है जैसे स्त्रियों के दो अलग -अलग लोक हैं और उनके बीच कोई संवाद नहीं है। मध्यवर्गीय औरत अपने लिए जिस आजादी की मांग करती है, वह आजादी गरीब औरतों को भी चाहिए और उन्हें भी तुरंत चाहिए -कल या परसों नहीं। लेकिन इस आजादी का उपभोग एक ऐसे ढांचे में ही किया जा सकता है, जिसमें मूलभूत भौतिक स्वतंत्रता सभी को हासिल हो। सच तो यह है कि आर्थिक सुरक्षा की चिंता भारत की मध्यवर्गीय महिलाओं के लिए भी उतना ही बड़ा मुद्दा है, जितना निर्धन महिलाओं के लिए। कोई औरत नौकरी करने जाती है, महज इससे यह अनुमान नहीं लगा लेना चाहिए कि उसे आर्थिक सुरक्षा प्राप्त हो गई है। असली सवाल यह है कि वह जो पैसा कमा रही है, उसे खर्च करने का अधिकार किसके पास है। हमारे परिवारों में अभी भी लोकतंत्र कायम नहीं है। लोकतांत्रिक माहौल बनाए बिना परिवार में या समाज में किसी भी वर्ग के वास्तविक अधिकारों की रक्षा नहीं की जा सकती।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर शहरों में और मीडिया में तरह -तरह के रंगारंग आयोजन होते हैं तथा धरना -प्रदर्शनों का तांता लग जाता है, लेकिन कोई भी समूह अपने शहर के रेड लाइट इलाके में जाकर उन औरतों को मुक्त कराने के बारे में नहीं सोचता, जो शोषण और दमन की सबसे बुरी शिकार हैं? यहां शहरी और ग्रामीण का कोई भेद नहीं रह जाता। ये औरतें रहतीं तो शहरों में हैं, पर गांवों और कस्बों से भगाई और उठाई जाती हैं। यह औरतों का तीसरा वर्ग है, जिसके प्रति औरतों के बाकी दोनों वर्गों में पूर्ण उदासीनता देखी जाती है।
इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर एक प्रयोग किया जाना चाहिए। पुरुषों को, पितृसत्तात्मकता को और व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करने के बजाय महिला समूह अपनी अब तक की गतिविधियों पर विचार करें और अपने विश्वासों का वस्तुपरक परीक्षण करें। सिर्फ मांगने से जो मिलता है, वह अकसर सांकेतिक होता है, वास्तविक नहीं। इसी तरह, मांग रखने वालों को तभी कुछ हासिल होता है जब उनमें कुछ दम हो। सवाल है यह दम कैसे हासिल किया जाए। इसके लिए साफ समझ, आत्मीय सामूहिकता और संघर्ष का ठोस कार्यक्रम होना चाहिए।

Wednesday, February 24, 2010

चालबाजियों की आड़ में वार्ता

आज से भारत - पाकिस्तान में सचिव स्तरीय वार्ता आरंभ होने वाली है। राजनयिक सर्किल में सरगोशियां हैं और विशेषज्ञ मुतमइन हैं कि जम्मू कश्मीर पर पाकिस्तान को रियायत देने के लिये भारत पर अमरीका ओर पश्चिमी देशों का भारी दबाव पड़ेगा। इसमें हैरत नहीं कि इसमें रूस, चीन और ईरान वगैरह देश बी भारत कें खिलाफ एकजुट हो जाएं। आखिर ऐसा क्यों और भारत को अब क्या करना चाहिये? यह बड़ा महत्वपूर्ण सवाल हैं जो आम लोग जानना चाहेंगे। दरअसल अब तक भारत और पाकिस्तान के मध्य जम्मू- कश्मीर ही एकमात्र बकाया मसला था। इसमें कश्मीर का भारत में पूरी तरह विलय हो गया और एक संसदीय संकल्प भी है कि पाक अधिकृत कश्मीर को भारत को देना होगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बारम्बार कह चुके हैं कि सीमा मसले में फैसला करने लायक बहुमत उनके पास नहीं है। अब इस स्थिति के सम्बंध में बहुत से उपप्रश्र हैं। चूंकि जम्मू- कश्मीर मुस्लिम बहुल क्षेत्र है और इस कारणवश यह भारत के धर्मनिरपेक्ष और बहुजातीय समाज का प्रतीक है। अब अगर यह भारत के साथ नहीं रह पाता है तो एक बार दोनों देशों में फिर बंटवारे की आग भड़क सकती है। इस मामले में सबसे खराब होगा कि देश बंट जायेगा। लश्कर- ए- तय्यबा, पाकिस्तानी फौज और आई एस आई का लक्ष्य ही यही है। दूसरी तरफ पाकिस्तान खुद को जम्मू- कश्मीर के बगैर पूर्ण नहीं मानता। बंगलादेश की फांस सदा उनके जिगर में चुभती रहती है। हालांकि इस विभाजन के लिये जनरल याह्या खां और भुट्टो दोषी थे पर पाकिस्तानी कट्टरपंथी इसके लिये भारत को दोषी मानते हैं। वे महसूस करते हैं कि यदि जम्मू- कश्मीर पाकिस्तान को मिल जाय और भारत तबाह-ओ-बर्बाद हो जाय तो रूह को जरा राहत मिलेगी। भारत को भी यह मालूम है और यह भी मालूम है कि 1947 से ही पाकिस्तान किसी ना किसी तरह भारत को तबाह करने में लगा हुआ है। भारत बड़ी दिलेरी से इसका मुकाबला करता रहा है। तब शुक्रवार को होने वाली बैठक में नया क्या है और कश्मीर पर दबाव में पुराना क्या है? पाकिस्तान ने जम्मू- कश्मीर मसले को बड़ी सफलता से अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दे दिया है। अब वह इस अफगान- पाक की डिजायन पर ले जाना चाहता है। हालांकि जम्मू- कश्मीर और अफगानिस्तान पाकिस्तान में कहीं सम्बंध नहीं है। लेकिन पाकिस्तान ने अपनी जुगत से सोवियत संघ को अफगानिस्तान से निकालने के बाद वह खुद को बहादुर मान रहा है। उसने ऐसी स्थिति तैयार कर रखी है कि बड़ी ताकतें खास कर अमरीका और यूरोप यह सोचे कि पाकिस्तान को कश्मीर मामले में संलग्न रहना चाहिये। इसके पुख्ता कारण भी हैं। यह तो सब जानते हैं कि अफगानिस्तान को गणतांत्रिक बनाने की राह में पाकिस्तान खड़ा है। अमरीका और यूरोप को भी मालूम है कि अल कायदा/ तालिबान से पाकिस्तान का चोली दामन का साथ है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफगानिस्तान से फौज वापस लाने की अंतिम तिथि तय की है। अब पाकिस्तान के सामने दो ही विकल्प हैं पहला कि वह तालिबान को सत्ता तक आने दे और कश्मीर में अपने हित साधन को कठिन बना दे अथवा कश्मीर में अपना पांव जमाने के लिये मौका पाने के बदले अल कायदा/ तालिबान को अमरीका / यूरोप के हाथों बेच देगा। यहीं पर आकर भारत- पाक वार्ता का स्वरूप बिल्कुल नया हो जा रहा है। पाकिस्तान की इस चाल से सरकार को सतर्क रहना होगा।

Tuesday, February 23, 2010

हालात को बदले बगैर माओवादियों से वार्ता व्यर्थ

हरिराम पांडेय
माओवादी नेता किशन जी ने सरकार के समक्ष वार्ता की शर्त रखी हे। उनकी शर्त हे कि सरकार माओवाद प्रभावित इलाकों से हथियारबंद पुलिस बल हटा ले, जेलों में बंद माओवादी नेताओं और कार्यकर्ताओं को रिहा कर दे और पुलिस ज्यादती के लिये क्षमा मांगे तथा 72 दिनों तक दोनों ओर से हमले बंद कर दिये जाएं। एक आपराधिक कृत्य को या यों कहें एक विद्रोही आंदोलन को राजनीतिक स्वरूप देने का यह प्रयास माओवादियों की समाज के एक बड़े हिस्से पर पकड़ और अपने प्रभाव क्षेत्र के बाशिंदों के गुस्से का भावात्मक शोषण करने की क्षमता का स्पष्ट उदाहरण है। माओवादियों ने पुलिस जुल्म के खिलाफ एक जन समिति (कमिटी ऑफ पीपल अगेन्स्ट पुलिस एट्रोसीटीज) का गठन कर पुलिस जुल्म के विरुद्ध आंदोलन आरंभ किया और उसे एक हिंसक आंदोलन में बदल दिया और अब उस हिंसक आंदोलन को सियासी जामा पहनाने की कोशिश शुरू हो गयी है। वामपंथी या ऐसा कहें धुर वामपंथी विचारधारा के चुनिंदा वामपंथियों को जोड़ कर खड़े किये गये इस संगठन के खिलाफ वोटों के भय से सरकार कार्रवाई करने में हिचक रही है।
... और ये स्वयंभू बुद्धिजीवी बार-बार झूठ को दोहरा कर सच का आभास कराने में 'गोयबलिज्म'तकनीक में इतने प्रवीण हैं कि यदि इन पर विश्वास करें तो भारतीय राजसत्ता द्वारा 1 नवंबर, 2009 से जनता के खिलाफ शुरू हो चुके इस युद्ध के कई हफ्ते बीत चुके हैं। और तो और, इस युद्ध में मारे जानेवाले आदिवासियों की संख्या रोज-ब-रोज बढ़ रही है। उसी तरह जलाये गये गांवों, विस्थापितों, घायलों और गिरफ्तार लोगों की संख्या भी बढ़ रही है। इस झूठ और किशन जी के बड़बोलेपन का पर्दाफाश करने के लिये जरूरी आम लोगों को यह बताना कि सरकार खासकर केंद्र सरकार माओवादियों की कारगुजारियों को आतंकवाद नहीं मानती हे। बेशक वे आंतरिक सुरक्षा के लिये खतरा हैं पर आतंकवादी इसलिये नहीं हैं कि उनका आंदोलन स्थानीय मसलों पर उपजे गुस्से से आरंभ हुआ और हालात के दबाव से चंद शातिर और हिंसक विचारधारा के लोगों के हाथों में चला गया। माओवादी हथकंडों (जिसे ये जनसंघर्ष कहते हैं) से सत्ता अपनाने के लोलुप इन लोगों के लिये गुस्से में गुमराह हो गये चंद युवक लड़ते हैं, मरते हैं।
इस समस्या से मुकाबले के लिये वार्ता से ज्यादा जरूरी है सरकार को अपनी समरनीति में बदलाव लाना। उसे विकास कार्य और राजनीतिक अप्रोच के बने बनाये व्यूह को किनारा कर ग्रामीण पुलिस व्यवस्था और ग्रामीण खुफियागीरी को विकसित करने के साथ - साथ ग्राम आधारित या वनपंथी अभियानों की क्षमता बढ़ानी होगी एवं प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा चौकियों के तादाद में इजाफा कर हिफाजती बंदोबस्त को पुख्ता करना होगा। इसके बाद अगर वार्ता होती हे तो बराबरी के स्तर पर होगी वरना शांति या बातचीत से कोई लाभ नहीं होने वाला।

Sunday, February 21, 2010

'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी इतिहास।'

वह कौन रोता है वहां
वह कौन रोता है वहां,
इतिहास के अध्याय पर,
जिसमें लिखा है,
नौजवानों के लहू का मोल है!
भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी पैरोकार माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के अत्यंत परिपक्व नेता और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने ई एफ आर के स्पेशल आई जी को फकत इसलिये सस्पेंड करने का हुक्म दे दिया कि उन्होंने मुख्य मंत्री की व्यवस्था के खिलाफ जबान खोली थी। हैरानी तो तब होती है जब दुनिया की सबसे ताकतवर ब्यूरोक्रेसी में से एक भारतीय अफसरशाही के किसी भी सदस्य ने इसका विरोध नहीं किया। ई एफ आर के स्पेशल आई जी ने केवल यही तो कहा था कि शिल्दा में, जहां ई एफ आर के कैम्प पर माओवादियों ने हमला कर 24 जवानों को मौत के घाट उतार दिया था, कैम्प गैरपेशेवराना तरीके से लगाया गया था और उनकी आपत्ति नजरअंदाज कर दी गयी।
पुलिस अफसर पर इस तरह की दमनात्मक कार्रवाई दरअसल माओवादियों को प्रोत्साहन है। नक्सलवाद को लेकर सरकार अब तक जिस तरह राजनैतिक रोटी सेंकती रही है वह आम जनता समझती है । नौकरशाह यानी वास्तविक नीति नियंताओं के बीच जनता के कितने हितैषी हैं, ऐसे चेहरों को भी आज जनता पहचानती है। उन्हें समय पर सबक सिखाना भी जानती है पर नक्सलवाद का सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि उसके परिणाम में केवल गरीब, निर्दोष, आदिवासी और कमजोर व्यक्ति ही मारा जा रहा है । इसमें राजनैतिक हत्याओं को भी नकारा नहीं जा सकता जिन्हें कई बार इनकाउंटर घोषित कर दिया जाता है।
जो आप तो लड़ता नहीं ,
कटवा किशोरों को मगर
आश्वस्त होकर सोचता ,
शोणित बहा, पर गयी बच लाज सारे देश की।
इन दिनों देश के कथित जन अधिकारवादी संगठन और प्रखर बुद्धिजीवी प्रमाणित और असंदिग्ध गिरफ्तारियों को मानव अधिकार का हनन साबित करने के लिए जिस तरह हो हल्ला मचा रहे हैं उसे या तो मानसिक रुग्णता कहा जा सकता है या फिर प्रतिभा संपन्न लोगों की विपन्नता भी जो भाड़े में अपनी आवाज भी बेचा करते हैं । इससे प्रत्यक्षत: भले ही नक्सलियों या वाममार्गी चरमपंथियों के हौसले बुलंद नहीं होते हों पर इससे भारतीय मनीषा पर गंभीर शक तो जरूर होता है कि कहीं वे ही तो समाज और देश को फासीवाद की ओर धकेलना नहीं चाह रहे हैं? वातानुकूलित विमानों पर लादे उन्हें कौन देश भर में घुमा रहा है ? यह बुद्धिजीवी वर्ग किस गरीब का हिमायती है और वे किसी एक व्यक्ति, जो अपनी अनैतिक और अलोकतांत्रिक गतिविधियों से संदेहास्पद हो चुका हो, के लिए ही क्यों चिल्लपों मचा रहे हैं? समाज और जनता को दिग्भ्रम करने का यह कौन सा बौद्धिक अनुशासन है? और जिससे शांतिप्रिय समाज के समक्ष कानून एवं व्यवस्था का प्रश्न खड़ा कर रहे हैं।
समाज भी चुप है। भारत को आजादी केवल गांधी या सुभाष या अन्य आजादी के सिपाहियों के प्रयास से ही नहीं मिली बल्कि आमजन के संघर्ष की भूमिका भी रही है। आज वह समुदाय चुप है। 'पाप का भागी नहीं है केवल व्याध, जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी इतिहास।'

Friday, February 19, 2010

दुर्भाग्य है!

हरिराम पांडेय
मेदिनीपुर जिले के शिल्दा में माओवादियों द्वारा ई एफ आर के जवानों की हत्या के बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री( गृहमंत्री भी) बुद्धदेव भट्टाचार्य ने स्वीकार कर लिया कि सुरक्षा में खामी थी। एक दिन पहले राज्य के पुलिस महानिदेशक ने भी लगभग ऐसा ही कुछ कहा था। राज्य की आम जनता की हिफाजत के लिये जिम्मेदार; ये पछताते लोग आखिर क्या कहना चाहते हैं? इन दोनों महानुभावों को शर्म आनी चाहिये जो अपने कर्तव्य का मूल्यांकन करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। क्या ये लोग अब भी मानते हैं कि उनकी पुलिस उनके कहे पर यकीन करेगी? यह मान भी लिया जाय कि हमला अचानक हुआ, तब भी क्या कारण है कि आला अफसरों की जवाबदेही क्यों नहीं तय की गयी? क्यों नहीं वहां साहसी ओर जांबाज अफसरों की कमान में कुमुक भेजी गयी? इसे निराशाजनक निकम्मापन के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता है। आखिर क्या कारण है कि परिष्कृत हथियारों, सक्षम वाहनों और आधुनिक उपकरणों के बिना चंद नौजवानों के सिर पर कफन बांध कर जंगलों में भेज दिया गया, वहां के लोगों की हिफाजत के नाम पर मरने के लिये। एक ऐसी सरकार, जो पिछली चौथाई सदी से पुलिस का पार्टी के तंत्र के रूप में उपयोग करती आ रही थी, को अब माओवादियों से मुकाबले में मानसिक तालमेल बैठाने में दिक्कत आ रही है।
दूसरी तरफ इस घटना के तुरंत बाद इस पर सियासत शुरू हो गई। सीपीएम ने फिर दोहराया कि तृणमूल कांग्रेस एक जनतांत्रिक दल होते हुए भी माओवादियों को मदद कर रही है। दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने हादसे के लिए राज्य सरकार को जवाबदेह ठहराते हुए यहां तक कह दिया कि यह जांच का विषय है कि हमले के लिए माओवादी जिम्मेदार हैं या माक्र्सवादी। सियासी टकराव से समस्या और उलझी है। राजनीतिक दलों के रवैये का फायदा उठाकर माओवादियों ने लगातार अपना विस्तार किया और खुलेआम प्रशासनिक मशीनरी को चुनौती दे रहे हैं।
पिछले दिनों केंद्रीय गृहमंत्री चिदंबरम ने प्रस्ताव रखा कि अगर माओवादी हिंसा छोड़ दें तो उनसे बातचीत की जा सकती है। लेकिन माओवादियों की दलील है कि सरकार पहले नक्सल विरोधी अभियान बंद करे, तभी वे वार्ता की मेज पर आएंगे। दोनों में से कोई पक्ष एक-दूसरे पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं है। केंद्र यह कहकर निश्चिंत हो लेता है कि सारे अभियान तो राज्य सरकारें चला रही हैं, वह तो उन्हें बस मदद कर रहा है। राज्य सरकारें दुविधा में हैं। वे कानून-व्यवस्था बनाए रखना चाहती हैं, लेकिन नक्सलियों से सीधे टकराव से बचना भी चाहती हैं क्योंकि इसमें उन्हें सियासी नुकसान दिखाई देता है।
लेकिन इन हालात का खामियाजा असंख्य गरीब - गुरबों को झेलना पड़ रहा है, जिन्हें आज तक इस व्यवस्था से कुछ नहीं मिला और जो अब नक्सलियों का मोहरा बनने को अभिशप्त हैं। सरकार भले ही माओवाद को आतंकवाद के समकक्ष माने, पर यह बेहद जटिल समस्या है, जिसका कोई एक सरल समाधान नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारें जब तक साफ मन से इस पर एकजुट नहीं होंगी, तब तक कोई रास्ता नहीं निकलेगा। यह पश्चिम बंगाल की जनता का दुर्भाग्य है कि उसे अपने जान-ओ- माल के लिये एक ऐसे समूह पर भरोसा करना पड़ रहा है जो पछताने अथवा हाथ मलने के सिवा कुछ नहीं कर सकता।