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Wednesday, August 19, 2015

लाल किले से रिकार्ड भाषण, पर क्या?


देश ने आज अपना सबसे बड़े पर्व मनाया। स्वाधीनता दिवस के रूप में यह पर्व हमें अतीत के कटु अनुभवों से निकालकर वर्तमान संघर्ष और भविष्य की सुखद कामना को बार बार याद दिलाता है। स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का अभिभाषण हुआ जिसमें उन्होंने संसद को अखाड़ा बनाये जाने पर चिंता जाहिर की और अपील की कि ऐसा ना हो। लोकतान्त्रिक संस्थाओं के दबाव में होने की बात, धर्मनिरपेक्षता के प्रति सजगता, चरमपंथ के प्रति सख्ती, पडोसी देशों के साथ सम्बन्ध, शिक्षण व्यवस्था पर आत्मनिरीक्षण, जल प्रबंधन और लोकतंत्र के नवीकरण जैसे मुद्दों को उभारते हुए राष्ट्रपति ने आने वाले समय की रूपरेखा ही स्पष्ट की। उनके इस भाषण के बिन्दुओं से शायद ही कोई असहमत हो। पर यहां प्रश्न आता है कि क्या इन सबके लिए सिर्फ सरकार ही जिम्मेवार है। हमसब की कोई जवाबदेही नहीं बनती है? क्या आज़ादी के लिए हमारे पूर्वजों का बलिदान हमारी पूंजी नहीं है? अगर वो बलिदान हमारी पूंजी है तो हमारी जिम्मेवारियां भी किसी सरकार से कम नहीं हैं। दरअसल नायक वह होता है जो आजादी के साथ आने वाली जिम्मेवारियों को समझता है और उन्हें पूरी करने के पक्ष में सदा खड़ा रहता है। यहां विख्यात वैज्ञानिक अलबर्ट आईंस्टीन का वह कथन याद आता है जिसमें उन्होंने कहा है कि आप क्या पाते हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि आप क्या देते हैं यह खास है। आजादी के लिए हजारों लाखों देशभक्त, क्रान्तिकारी, स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना जीवन समर्पित किया है और इस मशाल को आगे ले जाने की जिम्मेवारी निश्चित रूप से देश के युवा कन्धों पर ही है।
आज आजादी के 69 वें समारोह में शिरकत करते समय हमें उन तथ्यों से अवगत रहना चाहिए, जिन्हें हमने हासिल कर लिया है और उससे भी ज्यादा उन उद्देश्यों के बारे में याद करते रहने की आवश्यकता है जो हमारी पहुंच से दूर दिखते हैं। सकारात्मक बात यह है कि अब हमारा देश अपने मानव संशाधन, आर्थिक क्षमता, राजनीतिक नेतृत्व, रक्षा क्षेत्र, अंतरिक्ष क्षेत्र जैसे क्षेत्रों में न केवल आत्मनिर्भर हो रहा है, बल्कि विश्व को नेतृत्व देने वाले देशों की कतार में शामिल होने की क्षमता का जबरदस्त प्रदर्शन कर रहा है। लेकिन इन धमकाते विंदुओं को त्याग दें तब भी चंद अंधेरे कोने हैं और उन कोनों की तादाद भी कम नहीं है। मोदी सरकार से भारतीय जन को काफी उम्मीदें हैं। गत वर्ष आज के ही दिन जब मोदी जी ने लाल किले के प्राचीर से भाषण दिया था तो कई वायदे गिनाये थे। पर सवाल यह है कि एक साल बाद क्या वे वायदे पूरे हुये या बस वायदे ही रह गये। सरकार द्वारा पेश आंकड़े के मुताबिक वायदे पूरे होते दिखते हैं। पर वे पूरी तरह सच नहीं बताते हैं। सच छुपा हुआ है। आज हमारी सबसे बड़ी समस्या रोजगार की है। देश भर में हर साल 120 लाख लोगों को नौकरियों की जरूरत होगी। इसके इलावा खेती करने वाले 26 करोड़ से ज्यादा युवाओं को इस योजना में शामिल नहीं किया गया है। रोजगार के अतिरिक्त, आतंरिक सुरक्षा, पाकिस्तान से अस्थिर सम्बन्ध और चीन की घेरेबंदी भी आधुनिक भारत की मुख्य समस्याओं में से एक है। इस बार प्रधानमंत्री ने विशेषकर रोजगार के ऊपर कोई सीधी बात नहीं कही, जिससे देश की इस मुख्य समस्या के प्रति असमंजस की स्थिति यथावत बनी हुई है. हालांकि, यह कोई ऐसा विषय है भी नहीं जो एक दिन में चुटकी बजाकर हल कर लिया जाय। लाल किले के प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने एक बार फिर समृद्ध भारत और स्वच्छ भारत का सपना दिखाते हुए अपनी सरकार की योजनाओं के बारे में बताया। दूसरी बार स्वतंत्रता दिवस समारोह को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने देश वासियों से 2022 का रोडमैप तय करने की अपील की । उन्होंने देश से दस वादे किये हैं। वे वादे हैं , जिसमें प्रमुख हैं 18, 500 गांवों में बिजली पहुंचाना, छोटी नौकरियों में इंटरव्यू खत्म,कृषि मंत्रालय का नाम बदलना इत्यादि। उन्होंने सीना ठोंक कर कहा कि उनके शासन काल में एक पैसे का भी भ्रष्टाचार नहीं हुआ है। संसद के मानसून सत्र के बजरिये यह कितना सच है यह तो जनता ही तय करेगी। कुल मिला कर प्रधानमंत्री का रिकार्ड लम्बा भाषण कोई ज्यादा प्रभाव नहीं पैदा कर सका।


Friday, August 14, 2015

संसद स्थगित: भाषणबाज जीते, जनता हारी














संसद की कार्रवाई गुरुवार को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गयी। विपक्षी दलों ने ललित मोदी और व्यापमं घोटाले को लेकर इतना शोर मचाया कि भारत की संसद दुनिया के सामने एक तमाशा बन कर रह गयी। इन सारे प्रकरण में एक बात जो सबसे महत्वपूर्ण लगती है और जिस बात का जनता जवाब चाहती है वह है कि संसद की कार्यवाही को रोकने के अलावा सोनिया गांधी कभी भी अखबरों के मुख्य पृष्ठों पर या चैनलों के मुख्य समाचारों में क्यों नहीं दिखतीं। अगर घोटालों की ही बात करें तो कांग्रेस काल में कम घोटाले हुए, ऐसा नहीं कहा जा सकता। विख्यात फ्रांसीसी लेखक व इतिहासकार फ्रांस्वा गुटिये के मुताबिक ‘ जब अटल बिहारी वाजपेयी भारत के प्रधानमंत्री थे उस समय राहुल गांधी 1 लाख 60 हजार डालर से भरे सूटकेस के साथ अमरीका में पकड़े गये। एफ बी आई उन्हें गिरफ्तार करने वाली थी कि अटल जी ने ब्रजेश मिश्रा को कहकर उन्हें छुड़वाया। वह ममला आज भी चल रहा है। लेकिन कोई कुछ नहीं कह रहा है। ’ ऐसे कई और घोटाले हैं लेकिन मीडिया चुप है तथा जनता अनमनस्क। जहां तक भाजपा की बात है तो वह भी जब विपक्ष में थी तो वही किया जो आज कांग्रेस कर रही है। सर्विस टैक्स के नाम पर उसने क्या रुख अपनाया था यह सर्वविदित है। हां , वही करना जो भाजपा ने किया वह यकीनन सियासी परिपक्वता की पहचान नहीं है पर इस हालात के लिये दोषी तो दोनों हैं। संसद में बहस को सुनकर आप क्या याद कर पा रहे हैं कि इन सवालों के तमाम पहलू क्या हैं? इन सब पर भारतीय राजनीति में पर्याप्त चर्चा हुई है और कई बार नए सिरे से हो सकती है लेकिन इनसे ललित मोदी की मदद से उठे सवालों के जवाब नहीं मिल सकते। ये सब कांग्रेस की काली कोठरी की वो कालिख़ है जिससे काजल लगा कर बीजेपी अपना रूप नहीं संवार सकती। बाद में कांग्रेसी भक्त सोशल मीडिया पर गूगल से निकालकर बताने लगे कि कानून मंत्री के तौर पर अरुण जेटली ने क्यों राय दी थी कि एंडरसन को भारत लाने का केस कमजोर है। लेकिन क्या इस तरह से जनता की समझ बेहतर होती है। क्या वो इन तालीबाज दलीलों और आरोपों को विस्तार से समझ पाती है? क्या उसे जवाब मिलता है? यही केस तो ललित मोदी का है। कांग्रेस पर भगाने का आरोप है तो बीजेपी पर लंदन में बसाने का । सुषमाजी से सवाल था कि उन्होंने ललित मोदी की मदद क्यों की? उन्होंने बहुत आसानी से ललित मोदी की पत्नी को ढाल बना लिया। सुषमा स्वराज कहती रहीं कि अगर ये गुनाह है तो ये गुनाह किया है । पर सवाल ये नहीं था। सवाल था कि सबकुछ व्यक्तिगत स्तर पर क्यों किया। मंत्रालय को क्यों नहीं बताया। दो मुल्कों के संबंध की गारंटी ललित मोदी के लिए दी गई या उनकी पत्नी के लिए। खुद कहती रहीं कि मदद की है लेकिन सबूत मांगती रहीं कि दिखा तो दीजिये कि मैंने कुछ लिख कर दिया है। जैसे कि अनैतिकता सिर्फ लिख कर होती है। ललित मोदी भगोड़ा है तभी तो इसी अगस्त में उसके विरुद्ध ‘ रेड कार्नर ’ नोटिस जारी हुई है। सवाल उस भगोड़े की मदद का था जो लंदन में बैठा मुस्कुरा रहा है। जो कांग्रेसी सरकार को चकमा देकर लापता हो जाता है और बीजेपी सरकार के विदेश मंत्री को सीधा फोन कर देता है। हमारी राजनीति का लालित्य बन जाता है । बहरहाल लोकसभा की बहस का नतीजा यह निकला कि सबको भाषण कौशल के प्रदर्शन का मौका मिला। आपने सुना होगा गलाकाट भाषणों के बीच भावनाएं ऐसे चढ़- उतर रही थीं कि कोई मुद्दा ही न हो। एक दूसरे के खानदानों का हिसाब हुआ और अपनी खूबियों का बखान। ऐसी घमासान राजनीति से तो किसी का दिल घबरा जाए मगर यकीनन हमारे राजनेताओं को बहुत मजा आया होगा। यह देख कर ऐसा लगता है कि जब भाजपा विपक्ष में थी तो उसकी सियासत बेहद गैरजिम्मेदार थी और आज उसी की प्रतिध्वनि वे लोग सुन रहे हैं। यह ख्याल रहे कि , सबकी राजनीति जब एक सी हो जाती है, तब राजनीति मर जाती है। लोकतंत्र में जब विकल्प एक समान हो जाए तो लोकतंत्र मर जाता है। लोकतंत्र के खिलाफ हरकतें होने लगती हैं। जनता की आवाज दबने लगती है। आज आप लिख कर रख लें कि अब इस लोकतंत्र में जनता हमेशा हारेगी। वो मतदान प्रतिशत से खुश होना चाहती है तो हो ले।

Thursday, August 13, 2015

जनता की सकारात्मक धारणा जरूरी

भारत में दरअसल चुनाव जीतने के लिए सरकार द्वारा किये गये कामकाज जरूरी हैं लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि अगली अवधि के लिए जनता उस पार्टी के बारे में क्या सोचती है। उसकी धारणा क्या है? पिछले चुनाव में कांग्रेस की पराजय और भाजपा की भारी विजय के पीछे यही धारणा सक्रिय थी। अपने सारे प्रयासों के बावजूद कांग्रेस आम जन को यह यकीन नहीं दिला सकी कि वह उनके दु:ख- सुख के बारे में सोचती है जबकि भाजपा ऐसा करने में कामयाब रही। इसी परिप्रेक्ष्य में अगर बिहार का चुनाव देखें तो यहां भी धारणा ही विकसित होती दिख रही है और पक्ष तथा प्रतिपक्ष दोनों ही धारणाओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। जैसे लालू-नीतीश के ‘‘बेमेल’ गठबंधन, लालू राज के जंगल राज का शोर और इस दोस्ती को नीतीश के सुशासन के लाभों पर पानी फेरने वाला बताना भाजपा की बहुत सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। दूसरी तरफ , नीतीश अब भी सुशासन और विकास की बात को प्राथमिकता देते लग रहे हैं, जबकि लालू जनगणना के जातिवार आंकड़ों के मुद्दे से लेकर मंडल-कमंडल की लड़ाई वापस लाने के लिए प्रयास करते दिख रहे हैं। अपनी पहली यात्रा के दौरान मोदी ने राष्ट्रीय जनता दल के नए नामकरण और नीतीश के डीएनए का मसला छेड़कर कुछ मनचाहा नतीजा हासिल किया और एक बार में बिहार का चुनावी परिदृश्य गरमा गया। लालू तो बौखलाए ही, नीतीश ने डीएनए वाले मसले को एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा और बिहारियों के अपमान से जोड़कर सियासी लाभ लेने की कोशिश की। अब भी यह कोशिश जारी है और मोदी को पचास लाख बिहारियों के डीएनए नमूने भेजने का अभियान चल रहा है। मोदी की यात्रा के कुछ घंटों के अंतराल में ही लालू और नीतीश ने प्रेस के माध्यम से लगभग हर बात का जवाब उसी लहजे में दिया। अगर प्रधानमंत्री ने लालू-नीतीश गठबंधन का लक्ष्य जंगल राज पार्ट-2 बताया, तो लालू ने इसे मंडल-2 की तैयारी बताया। अपने जेल के अनुभव से अधिक शोर अमित शाह के जेल जाने का मचाया। बिहार चुनाव लालू और नीतीश के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है, तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए भी यह उतना ही महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि लोकसभा चुनाव में मोदी के हाथों बुरी तरह धुन दिए जाने के बाद सबसे पहले नीतीश ने ही मोदी की काट के लिए नई रणनीति अपनाई और लालू की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया। भले ही लोकसभा चुनाव में लालू की पार्टी का प्रदर्शन नीतीश के जदयू से बेहतर था, पर उनकी राजनीतिक मुश्किल चारा कांड में सजा पाने से बढ़ चुकी थी। सो, उन्होंने भी लपककर नीतीश का हाथ थाम लिया। बिहार में सिर्फ जोड़-तोड़, जुमलेबाजी या तीखे तेवर की बयानबाजी ही नहीं हो रही है। कई बार से मोदी को अपनी सेवाएं देने वाले प्रशांत किशोर इस बार नीतीश के सारथी बने हुए हैं और दरवाजे-दरवाजे तक उनका संदेश पहुंचाने का काम चल रहा है। विजन दस्तावेज के बाद अब रिपोर्ट कार्ड पहुंचाने की बारी है। बीजेपी सोच सकती है कि माहौल उसके अनुकूल है। प्रधानमंत्री की रैलियों में भीड़ दिख रही है, यानी उनकी लोकप्रियता काफी हद तक कायम है। दूसरे, बिहार बीजेपी के नेता विधान परिषद चुनाव परिणाम को विधानसभा की पूर्व पीठिका मान रहे हैं। परिषद चुनाव से जेडीयू, आरजेडी, कांग्रेस गठबंधन को निस्संदेह धक्का लगा है और बीजेपी का उत्साह बढ़ा है। तीसरे, बीजेपी के साथ जीतनराम मांझी के आने से दलित मतों के ध्रुवीकरण की संभावना बढ़ी है। चौथे, नीतीश के दस साल के शासन से असंतोष पैदा हुआ है और उनके द्वारा 2010 के चुनाव पूर्व बनाए गए सामाजिक समीकरण भी टूटे हैं। पांचवे, जिन लालू प्रसाद यादव के कुशासन के विरुद्ध नीतीश ने 1994 से संघर्ष किया, उनके साथ गठबंधन को राज्य का बहुमत स्वीकार कर लेगा, इस पर संदेह है। बीजेपी के पक्ष में वह आक्रामकता गायब है जो लोकसभा चुनाव के पहले थी। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने 160 परिवर्तन रथ रवाना किए जो सभी विधानसभा क्षेत्रों में मोदी सरकार की उपलब्धियां और नीतीश की विफलताएं दिखा रहे हैं। नीतीश ने उसके पहले ही 400 ट्रकों की रवानगी की योजना बना ली, जो पूरी तरह हाइटेक हैं। इसमें आक्रमण और जवाब दोनों है। द्वार-द्वार दस्तक कार्यक्रम के संबंध में दावा है कि नीतीश की देखादेखी जेडीयू के लोग भी करोड़ लोगों तक पहुंचें। जन भागीदारी अभियान, बढ़ चला बिहार, ब्रेकफास्ट विद सीएम, बिहार विकास संवाद, जिज्ञासा, गौरव गोष्ठी, इन सारे कार्यक्रमों को देख लीजिए तो लोकसभा चुनाव के पूर्व मोदी के चुनाव अभियानों की छाया दिखाई देगी। नीतीश के प्रयास अच्छे हैं पर इसके बावजूद उन्हें राज्य की जनता को आश्वस्त करना होगा कि जंगल राज - 2 की वापसी नहीं होगी और बिहार विकसित होगा। फिलहाल तो गीता वाली स्थिति है जिसमें संजय कहते हैं
दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥

Wednesday, August 12, 2015

बिहार में मोदी की जुमलेबाजी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को बिहार के गया में चुनाव प्रचार के लिये गये थे। जैसी कि उनकी​ शैली है वे विपक्षी पर मारक प्रहार करते हैं, उसी तरह से उन्होंने अपने विपक्षी नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव पर प्रहार किया। प्रहार की उनकी शैली बड़ी ही नाटकीय होती है। अगर महान मनोशास्त्री कांट की भाषा में कहें तो मोदी ‘पॉलिटिकल थियेट्रिक्स’ के विशेषज्ञ हैं। वे साधारण से जुमले में असाधारण सी बात कह जाते हैं आैर वह बात अपेक्षित प्रहार करती है। रविवार के ही जुमलों को देखें। उन्होंने दो बातें कहीं। पहली जंगलराज पार्ट 2 के पुनरागमन की और दूसरे बिहार की किस्मत पलट देने की। ये दोनों बिहार में ऐसे पॉलिटिकल थिपयेट्रिक्स के उदाहरण हैं जिसका वहां के जनमानस पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। वैसे अगर ध्यान से देखें तो समस्त भारतीय राजनीति ही एक नाटक है। कहते ही हैं कि ‘द ग्रेट इंडियन पॉलिटिकल थियेटर।’यह आरंभ से ही भारत की राजनीति में होता रहा है। गांधी, जो अफ्रीका से टाई कोट पहन कर आये थे, भारत आकर संन्यासी का वेश धर लिये और उसकी नाटकीय अपील से उन्होंने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिये। यही हाल राजा मांडा के नाम से विख्यात विश्वनाथ प्रताप सिंह का था। विप्र सिंह ने मंत्रिमंडल छोड़कर बोफोर्स घोटाले का पर्दाफाश करने की घोषणा से देश का दिल जीत लिया। फिर अचानक वो राजा वाली वेशभूषा त्याग धोती में दिखने लगे। कुछ तस्वीरों में तो ऐसे बन बैठे, मानो महात्मा गांधी की सादगी अपना ली हो। सब नाटकीय परिवर्तन थे। थिएट्रिक्स की नई-नई कलाएं सामने आ रही थीं। वे किसी की भी मोटरसाइकल पर पीछे बैठ जाते। लोग दंग रह जाते। प्रधानमंत्री बनते ही बदल गए। अनूठी अभिनय क्षमता। बड़े-बड़े अंगरखे आ गए। राजा जैसी शेरवानी, कोट, टोपी। समूचा गांधी रूप, रूप ही रह गया। बाद में मंडल की आग धधकाकर देश में घृणा की पीढ़ी तैयार करने का आधार बने, वो अलग। मतलब, हमारे देश में राजनीति में कामयाबी के लिये मुखौटे औरचोट करते जुमले जरूरी हैं। जब जुमले की बात चली तो भाजपा के चाल, चरित्र, चेहरा वाला जुमला याद होगा सबको। उससे भी अधिक याद आता है - नरेन्द्र मोदी का मुखौटा। गुजरात चुनाव से चर्चित वह मुखौटा मोदी-मास्क बनकर विख्यात हुआ। शायद ही कोई दूसरा नेता ऐसा होगा जिसका मास्क उसके ख़ुद के चेहरे से इतना मिलता जुलता हो, जितना नरेन्द्र मोदी का है। नाट्यकला, सभी कलाओं में श्रेष्ठ मानी गई है, चूूंकि इसमें आपको चुनने या पसंद करने या कि खारिज करने वाले ठीक सामने ही होते हैं। नाटक, मात्र मनोरंजन नहीं है। नाटक, गहन अर्थपूर्ण होते हैं। राजनीति, नाटकीय तो है। किन्तु नाटक नहीं है। अब रविवार के गया में मोदी को भाषण की जुमलेबाजी और नाटकीयता को देखें। प्रधानमंत्री ने एक पखवाड़े के भीतर बिहार में अपनी दूसरी जनसभा में कहा कि राज्य में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार बनने पर पांच साल के भीतर राज्य से ‘बीमारू’ का ठप्पा हट जायेगा हालांकि उन्होंने बहुप्रतीक्षित आर्थिक पैकेज संबंधी वादे के बारे में कुछ भी ऐलान नहीं किया। उन्होंने गया में गांधी मैदान में आयोजित ‘परिवर्तन रैली’ में लोगों से अपील की कि वे ‘अहंकार में डूबी सरकार’ को हटाएं। अपने संबोधन में ‘जंगल राज’ शब्द का कई बार जिक्र किया और कहा कि बिहार की जनता ‘जंगलराज पार्ट 2’ को आने की अनुमति नहीं दे। प्रधानमंत्री ने कहा कि आपने 25 साल तक राज्य पर शासन करने वालों के अहंकार, उत्पीड़न और धोखाधड़ी को झेला है। क्या आप पांच साल और इन्हीं लोगों को शासन करने का मौका देंगे। यह विकासहीनता का दंश झेल रहे बिहार वासियों की साइक पर सीधा प्रहार था। मोदी जिस ढंग से कह रहे थे वह सत्ता की एक खास किस्म की कीमियागीरी या यों कहें ‘अलकेमी’ है। इसमें दिखता वही है जो नेता चाहता है। मेकियावेली का कथन था कि ‘सत्ता के शीर्ष पर बैठ कर परिवर्तन या नयी व्यवस्था की शुरुआत करने के मुकाबले कुछ भी करना कठिन नहीं है । ’ प्रधानमंत्री​ ने अपने भाषण मे बिहारवासियों को यह उम्मीद दिलाने का प्रयास किया है कि वे वहां की दिशा और दशा में बदलाव लाकर अपनी सरकार के रवैये और कारगुजारी को वहां के लोगों के प्रति ज्यादा दोस्ताना और अर्थपूर्ण बनाएंगे। आपमें से बहुतों को याद होगा कि 14 अगस्त 1947 की रात को ठीक 12 बजे जब 15 अगस्त की दस्तक के साथ आजाद भारत का निर्माण हुआ था, उस अवसर पर नेहरू जी ने अपने भाषण में ट्रिस्ट विद डेस्टनी (नियति से पूर्व-नियोजित भेंट) नामक कालजयी पंक्ति का उल्लेख किया था। नरेंद्र मोदी ने बिहार में एक नई‘ ट्रिस्ट विद डेस्टनी’ शुरू करने का संकेत दिया है। लेकिन देश के अन्य भागों में मोदी की कारगुजारियों और सत्ता के परफॉरमेंस को देखते हुए क्या नहीं लगता कि राजनीति को नाटक बनने से रोकना असंभव है। किन्तु रोकना ही होगा। वरना कल नायक ही खलनायक बन जाएंगे। वैसे भी बिहार चुनाव को जितना कांटे का माना जा रहा है, छोटी से छोटी गलती नतीजों पर बड़ा फर्क डाल सकती है। ऐसे में दोनों पक्ष कोई कसर छोड़ना नहीं चाहेंगे। लेकिन बाजी को अपने हक में करने के फेर में नेताओं की तरफ से बयानबाजी में जैसी गिरावट देखी जा रही है और जिस तरह असंसदीय भाषा का इस्तेमाल हो रहा है उससे बचा जाना चाहिए।

इंसान को इंसान समझने की जरूरत है


संसद में हंगामा बरपा हो रहा है। काम- काज नहीं हो रहा है। देश की गरीब जनता की गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा उस संसद के चलाने में खर्च होता है। एक आंकड़े के मुताबिक संसद को चलाने में प्रति मिनट 2.5 लाख रुपये खर्च होते हैं। कामकाज नहीं होता है तब भी देश चल रहा है। अब आप सोच सकते हैं कि देश को चलाने के नाम पर कितनी बड़ी रकम खर्च होती है और तब भी संसद नहीं चलती।
उधर जम्हूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है।
आपने सोचा है कभी कि हमारे लोकतंत्र का कोई नेता गरीब क्यों नहीं होता। यही नहीं, भोपाल गैस कांड से लेकर सोमवार की सुबह देवघर के भगदड़ में मरने या घायल होने वालों में आज तक एक नेता नहीं मिला। इस हुजूम में जिसे संसद कहते हैं क्या कभी सुना है आपने कि जिस देश में दुनिया भर में सबसे ज्यादा कुपोषण के शिकार लोग रहते हों, उस देश में की संसद में कुपोषण से मरने वाले बच्चोंपर कार्य स्थगन की नोटिस दी हो और उसपर चर्चा हुई हो? हो? कभी गंदगी और कूड़े कर्कट के जहरीले पानी में उगायी जाने वाली सब्जियों के बाजार में बिकने और उसके कारण होने वाले भयानक रोगों से जनता को बचाने के लिए सदन की गांधी मूर्ति पर किसी ने सत्याग्रह और प्रदर्शन किया? नहीं न। क्योंकि ये नेता उस वर्ग के नहीं होते जो हावड़ा पुल के नीचे से या गांव मुहल्ले के फुटपाथों पर बिकने वाली स​​ब्जियों को खरीदने जाते हैं तथा मोल- भाव करते हैं।
दरअसल,हमारे देश में इंसान इंसान से अलग हो रहा है। अब शहरों में जाति से ज्यादा वर्गभेद होता है। सड़क पर चलते हुए कार वाले साइकिल या पैदल वालों को इंसान समझने को राजी नहीं हैं। गरीब-अमीर का फर्क बड़ा हो रहा है। गाड़ी से चार लोगों को रौंदने के बाद बड़ी तादात में लोगों का सलमान खान के समर्थन में आना ये बताता है कि हम गरीबों की मौत को शायद इंसानी मौत मानने को तैयार नहीं हैं। समानता के अधिकार का हर रोज मजाक उड़ा है, और यह सब पाप किया है देश की बहुमत प्राप्त सरकारों ने। चाहे कोई इसे माने या न माने यह एक कड़वी सच्चाई है कि हमारे देश की राजनीतिक व्यवस्था में बहुमत का मतलब निरंकुशता होकर रह गया है। बहुमत के जोर पर केंद्र और राज्यों में सत्ता के संस्थान देश की संपदा और संसाधनों का दोहन वर्ग विशेष के लिए करते आ रहे हैं।
बहुमत की निरंकुशता ने लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को वोट बैंक की राजनीति का पर्याय बना दिया है। देश का बड़ा हिस्सा आज भी कल्याण की बाट जोह रहा है, लेकिन उसके हिस्से में आज भी उपेक्षा , तिरस्कार और ग्लानि ही है। किसान और मजदूर आज भी अपने हक से वंचित हैं। आजादी के बाद शुरुआती वर्षों में जो कानून किसान और मजदूरों के न्यूनतम हितों की रक्षा के लिए बनाए गए थे उन्हें भी बहुमत की निरंकुशता के जोर पर बदला जा रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य पहले सेवाएं हुआ करती थीं, लेकिन बहुमत की सरकारों ने उन्हें भी धंधा बना दिया। आज हिंदुस्तान में औसत मध्यवर्ग के नागरिक की महीने भर की कमाई शिक्षा और स्वास्थ्य के दुकानदार लूट लेते हैं।
ये बन्दे-मातरम् का गीत गाते हैं सुबह उठकर
मगर बाज़ार में चीज़ों का दुगुना दाम कर देंगे
पिछले 6 दशकों में रोटी, कपड़ा और मकान का मूलभूत सपना देखते-देखते न जाने कितनी आंखे पथरा गई हैं। अवसाद से भरे इन तमाम वाकयों से बहुमत वाली किसी सरकार ने कोई सरोकार नहीं दिखाया है। बहुमत के जोर पर बनने वाले कानूनों का मकसद लोगों को राहत पहुंचाना नहीं अपनी बात मनवाना हो गया है।
जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक़्क़ाम कर देंगे
कमीशन दो तो हिन्दोस्तान को नीलाम कर देंगे
मिडिल क्लास, अपर मिडिल क्लास और विचारवान लोगों को देश और देश भक्ति एक गाली की तरह लगती है। हमारे देश की राजनीतिक पार्टियों में बौद्धिकता हाशिए पर पड़ी है।
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है
हमने बीते साठ सालों में खासी तरक्की की है लेकिन अब इंसान को इंसान समझने की जरूरत है। अगर हम ये नहीं समझ सके तो हमारी पैसे वाली तरक्की समाज के उस ताने-बाने को खत्म कर सकती है जिसके केंद्र में इंसानियत और भेदभाव मिटाने का संकल्प है।
तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है

Saturday, August 8, 2015

क्या यह टास्क नामुमकिन है













उधमपुर में हुए आतंकी हमले में मुहम्मद नावेद उर्फ उस्मान तो पकड़ा गया, मगर कहां है जावेद, कहां है रहमान उर्फ अकरम और कहां है खुर्रम। ये आतंकी खुफिया एजेंसियों के लिए सिरदर्द बने हुए हैं। फरार चल रहे ये आतंकी और हमलों को अंजाम दे सकते हैं। इनके बाद लश्कर-ए-तायबा के सीनियर आतंकी भी बड़े हमलों को अंजाम दे सकते हैं। पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई सांप्रदायिक दंगे भी करवा सकती है। खुफिया सूत्रों की रिपोर्ट और नावेद के बयान से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में और आतंकी हमले हो सकते हैं। दरअसल, गुरदासपुर में मिली सफलता और उधमपुर में हुए आतंकी हमले के बाद आईएसआई के हौसले बुलंद हो गए हैं। नावेद पूछताछ में बार बार अपना बयान बदलकर एजेंसी को गुमराह कर रहा है। हालांकि जांच एजेंसी अब तक की पूछताछ के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि आईएसआई लश्कर को हथियार से लेकर वित्तीय मदद तो दे ही रहा है, आतंकियों को प्रशिक्षण दिलाने में भी मदद कर रहा है। पिछले वर्षों से हममें से सबने आतंकी हमलों, आतंवादियों की क्रूरताओं और उनकी ट्रेनिंग के बारे में अनगिनत खबरें सुनी होंगी। हर बार, आतंकियों की क्रूरता और उसके पीछे की जेहनियत में इंजेक्ट की गई नफरत महसूस की है। आखिर कुछ तो खास होता है इनमें। ये ब्रेनवॉश तो किए जाते हैं, लेकिन कैसे कच्चे घड़े की तरह फिर संवार दिए जाते हैं एक नई शक्ल में। और शायद, पहले से कहीं ज्यादा मजबूत। कसाब से लेकर नावेद तक...एक बात महसूस की है आपने? ये आतंकी गढ़े जाते हैं। वह भी बेहद करीने से। मैं सोचता हूं कि ये लड़के होते तो हम-आप जैसे ही हैं न। आते भी हैं सब एक से। बस, फर्क इतना है कि इन्हें कुछ भयावह करने के लिए तैयार कर दिया जाता है। न इन्हें डर रहता है, न मोह और न ही चिंता। कैसा गजब कमिटमेंट रहता होगा इनमें, किस हद तक जुनून और कितना डेडिकेशन। ये पागलपन की हद तक अपने काम को लेकर जुनूनी होते हैं। नावेद तो खुल्लम खुल्ला कह रहा है कि ‘उसे हिंदुओं को मारने में मजा आता है।’ लेकिन शायद वह यह नही जानता कि हिंदुओं को न जाने क्यों मरने में आनंद आता है। हजारों साल से हिन्दू कभी नादिर शाह , कभी चंगेज खान , कभी औरंगजेब के हाथों मरता ही तो रहा है , जब कभी किसी राणा प्रताप , पृथ्वी राज ने विरोध किया तो जयचंद मान सिंह सरीखे लोग हिन्दुओं की इस परंपरा के रक्षार्थ किसी को जान से मरवा दिया तो किसी को जंगल में भेजकर घास की रोटी खाने के लिए मजबूर कर दिया। पाकिस्तान हमें हर तरह से परेशान कर रहा है जब कि इजराइल भी ऐसे ही प्रवृत्ति के देशों से घिरा हुआ है लेकिन किसी में हिम्मत नहीं जो उसकी सीमा में घुसकर दहशत फैला दे या किसी नागरिक की हत्या कर दे। आश्चर्य है कि वहां भी भारत की तरह लोकतंत्र है , वहां भी अमीर गरीब हैं , वहा भी तमाम जाति और धर्म के लोग हैं। एक छोटा देश म्यांमार भी ऐसी घटनाओं से मुक्ति पा चुका है। लेकिन एक भारत है जो पिछले 70 साल से इस दंश को झेल रहा है, आज तक इतना भी खौफ नहीं पैदा कर पाया कि पाकिस्तान उसे बड़ा और शक्तिशाली देश मानना तो दूर अपने समकक्ष ही मान ले ! इसके कारण को समझना बड़ा मुश्किल नही है। इसका जो सबसे साधारण कारण है वह है हम अपनी शिनाख्त के लिए लड़ना नहीं जानते। हम अपनी ताकत का इजाफा क्यों नहीं करते? आतंकियों जैसे कमिटमेंट वाले युवक हम क्यों नहीं गढ़ सकते? क्या हम ऐसे नौजवान नहीं गढ़ सकते जिनके लिए कुछ नायाब करना ही मिशन हो। ऐसे नौजवान तैयार कीजिए, जो बेहद प्रोफेशनल तरीके से इन आतंकियों को एक भी जान न लेने दें। जिसे न डर हो, न मोह। जिनका मिशन ही हो रक्षा। लेकिन, इसमें आपको आतंकियों जितनी ही ईमानदारी दिखानी होगी साहब। इसके बाद आप मजबूत 'राष्ट्र' बना पाने में कामयाब होंगे। । कुछ अच्छा करना ही है तो आतंकियों के से जुनून की तरह जुनून पैदा करें। किसी घर को जलने-उजड़ने से रोकिए। लड़िए, मगर गरीबों के हक की लड़ाई। उसी जुनून, कमिटमेंट और डेडिकेशन से। क्या मोदी, डोभाल और राजनाथ के लिए यह टास्क नामुमकिन है?



Thursday, August 6, 2015

लोकतंत्र बचाओ अभियान चलाने की जरूरत

लोकतंत्र बचाओ अभियान चलाने की जरूरत
देश की सबसे बड़ी पंचायत , संसद , इन दिनों बेचैन है। जो हो रहा है उसे सांसद के माननीय लोकतंत्र पर काला धब्बा बता रहे हैं। लेकिन आप गौर करें तो लोकतंत्र और काला धब्बा दो ऐसे शब्द हैं जिनसे आप उलझ जाएंगे। सबसे पहली बात कि लोकतंत्र का स्वाभाविक विकास अपने देश में नहीं हुआ। यह अंग्रेजों की विरासत है। आयात की हुई चीजों का जो हश्र होता है, सो लोकतंत्र का हो रहा है। यह हमारे मानस में न कभी था, न रहा और न इसे विकसित कराने की कोई पहल हुई। हमारा आदर्श कभी लिच्छवी गणतंत्र नहीं रहा, बल्कि रामराज्य रहा है, जो लोकतांत्रिक नहीं है। रामराज्य माने राजतंत्र और राजा राम मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान यानी राजा सर्वोपरि। हमने रामराज्य को प्रचारित किया। लिच्छवी गणतंत्र यहां के जनमानस में वो स्थान नहीं बना सका, जो स्थान रामराज्य ने बनाया। रघुकुल रीति है। जनता सर्वोपरि नहीं है। जनता सर्वोपरि यूरोप में है, भारत में नहीं।
1649 में इंलैंड में वहां के अन्यायी और अत्याचारी राजा चार्ल्स प्रथम को वहां की पार्लियामेंट ने फांसी दे दी। संसदीय लोकतंत्र की पहली हवा यहीं से चली, इसी से इसे मदर ऑफ पार्लियामेंट कहा जाता है। 1688 में इंलैंड की क्रांति के बाद वहां लोकतंत्र का दरवाजा खुला। संसदीय लोकतंत्र की शुरुआत यहीं से मानी जाती है। 1776 में अमरीकी स्वाधीनता संग्राम और डिक्लेयरेशन ऑफ द राइट्स ऑफ मैन, लाइफ, लिबर्टी और पर्स्यूट ऑफ हैपीनस की अवधारणा का उदय हुआ। सन् 1889 में फ्रांस की क्रांति हुई। लिबर्टी, ईक्वलिटी और फ्रटर्निटी (स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व) के विचार उत्पन्न हुए। दूसरा शब्द है काला धब्बा। लोकतंत्र का काला धब्बा किसे कहते हैं और यह कब और कैसे लगता है। क्या आप यह मानते हैं कि हमारा लोकतंत्र एक सफेद बोर्ड की तरह है। जिस पर कभी कभार काला धब्बा पड़ जाता है। आप कैसे तय करते हैं कि आपातकाल वाला काला धब्बा बड़ा है या बाबरी मस्जिद के ध्वंस वाला काला धब्बा। 2008 में लोकसभा के पटल पर नोटों की गड्डी रखने से पड़ा काला धब्बा बड़ा है या 1984 के दंगे वाला काला धब्बा। भ्रष्टाचार, जातिवाद और धनबल की राजनीति से लगने वाले काले धब्बे को मिला लें तो लोकतंत्र का पूरा बोर्ड ही ब्लैक लगने लगता है। इस बार कांग्रेस कह रही है कि सुषमा स्वराज पहले इस्तीफा दें फिर सदन चलेगा। आम लोग तब भी दु:खी थे, जब बीजेपी विपक्ष में रहते हुए सदन नहीं चलने देती थी और अब भी दु:खी है' जब कांग्रेस सदन चलने नहीं दे रही है। 2012 में कोयला खदानों के मामले को लेकर 19 दिन का मॉनसून सत्र सिर्फ 25 घंटे चला था। 2009 से 2014 के बीच 900 घंटे बर्बाद हुए थे। तब राहुल गांधी और कांग्रेस के सांसदों ने संसद परिसर में लगी गांधी की मूर्ति के सामने प्रदर्शन किया था। आज कांग्रेस उग्र हो गई है। राहुल गांधी ने कहा कि हमे संसद के बाहर फेंक दें, हमारे लिए पूरा देश पड़ा है, लेकिन इस्तीफे की मांग से पीछे नहीं हटेंगे। निलंबन के कारण कई विपक्षी दल कांग्रेस के साथ हो गए हैं। इस्तीफे की मांग से किनारा करने वाली समाजवादी पार्टी के सांसद मुलायम सिंह यादव ने स्पीकर से निलंबन वापस लेने की गुजारिश की और बाहर आकर कांग्रेस का साथ भी दिया। काला धब्बा हमारी राजनीति के अलोकतांत्रिक होने का प्रतीक माना जाता है। लोकसभा से कांग्रेस के 25 सांसदों को निलंबित किया गया तो इसे लोकतंत्र की हत्या से लेकर काला धब्बा तक कहा गया। मॉनसून सत्र में संसद के दोनों सदन हर दिन एक ही मुद्दे पर स्थगित होते जा रहे हैं। सदन में कांग्रेस के अलावा भी कई दल अपनी मांगों को लेकर आवाज उठा रहे हैं, वेल तक जा रहे हैं और बैनर भी दिखा रहे हैं। बाद में खबर आई कि मुलायम सिंह यादव बीच का रास्ता निकालने का प्रयास करने लगे। इसी सत्र में कांग्रेस के सांसद अधीर रंजन चौधरी को एक दिन के लिए निलंबित किया गया था। जब वे स्पीकर की मेज तक जा पहुंचे तब सरकार इनके खिलाफ कार्रवाई ले आई, जिस पर मतदान होते होते रह गया। 25 सांसदों के निलंबन के लिए सरकार प्रस्ताव लेकर नहीं आई थी। मंगलवार को बीजेपी संसदीय दल की बैठक में कांग्रेस की रणनीति के ख़िलाफ प्रस्ताव पास किया गया। सीपीएम के राज्यसभा सांसद सीताराम येचुरी ने कहा है कि इस मामले में स्पीकर ने भेदभाव किया है। सरकार संसद का मखौल उड़ा रही है। स्पीकर महाजन ने कहा है कि 25 सांसदों का निलंबन भलाई के लिए किया गया है। जब पूछा गया कि बीजेपी भी तो विपक्ष में रहते हुए यही रणनीति अपनाती थी तो स्पीकर ने कहा कि सही है कि पिछली संसद में बीजेपी ने किया, लेकिन उससे पहले कांग्रेस ने किया था। ऐसा इसलिए हो रहा है कि सभी राजनीतिक दलों का एक ही काम रह गया है, चुनाव लड़ना और जीतना। किसी के पास सामाजिक कार्यक्रम नहीं है। संपूर्ण देश में सामाजिक कार्यक्रमों के जरिये एक जागरूकता अभियान चलाया जाए कि राजनीति में निचले तबके के राजनीतिक कार्यकर्ता कैसे नेता, मंत्री बने और सत्ता में आए। इस पर बिना किसी आग्रह-दुराग्रह और पूर्वग्रह के हर दल के लोगों को विचार-विमर्श करना चाहिए कि राजनीति में पैसे वालों का जोर-खत्म हो और जमीन से जुड़े, धन-संसाधनों के अभाव वाले सच्चे-ईमानदार राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए सत्ता के द्वार कैसे खुलें। हमारा लोकतंत्र कैसे बचे? देश में लोकतंत्र बचाओ अभियान चलाने की जरूरत है।