इन दिनों एक कविता बहुत वायरल हो रही है उसका शीर्षक है "हम कागज नहीं दिखाएंगे।" दरअसल इस कविता को नागरिकता संशोधन अधिनियम (सी ए ए) का विरोध करने वाले लोगों "पंचलाइन" बन गई है। इसमें यह दिखाने के प्रयास है कि भारत अविभाजित है, सी ए ए को लागू करने वाले इसे बांटना चाहते हैं। " जहां राम प्रसाद बिस्मिल है उस माटी को कैसे बांटोगे।" लेकिन इसी के उलट एक और कविता वायरल हो रही है फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया पर कि " क्या मन में कोई चोर छुपा है, इसलिए कागज नहीं दिखाओगे ।" खैर, सीएएए के संदर्भ में यह देखने दिखाने की बात अलग है। अब तो भारत की राजनीतिक पार्टियां और नरेंद्र मोदी की सरकार खुद सूचना साझा करने कि अपनी कानूनी तथा नैतिक प्रतिबद्धताओं से पिछड़ती जा रही है। भारत में चुनाव के दौरान खर्च एक बड़ी समस्या है ,क्योंकि उस खर्च के लिए पैसे कहां से आए , उनका स्रोत कहां है, यह पूरी तरह पारदर्शी नहीं है। विख्यात पत्रकार पौल क्रूगमैन न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखा था कि "भारतीय चुनाव पूरी तरह से काले धन पर ही निर्भर है। राजनीतिक दल चाहे वह कोई भी हो इससे बचने या पूरी सूचना नहीं मुहैया कराने का कहीं न कहीं से उपाय खोजे ले रहे हैं और नए-नए उपाय खुलते जा रहे हैं। " 2017 में राजनीतिक दलों को धन कहां से मिला इस बारे में आम नागरिक को या तो बिल्कुल जानकारी नहीं थी या थी बहुत मामूली थी। हमारे देश का जो जनप्रतिनिधि कानून है उसके मुताबिक किसी भी राजनीतिक दल को ₹20,000 से अधिक मिले चंदे के स्रोत के बारे में जानकारी देना जरूरी है। बहुत से दल ऐसे हैं जो जरूरी कानून को नजरअंदाज कर जाते हैं । उन्होंने इसके लिए एक शॉर्टकट तलाश लिया है कि जो धन मिला वह 20,000 से कम था। उदाहरण के लिए बसपा के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक पार्टी ने 13 वर्षों में ₹20,000 से ज्यादा का चंदा ही नहीं लिया। यद्यपि अन्य बड़े दल की जानकारी मिल जाती है और इसी कारण पता चला कि 2017- 18 में दो प्रमुख दलों को सर्वाधिक चंदा "प्रूडेंट इलेक्टरल ट्रस्ट " ने दिया था। इस ट्रस्ट में भारती इंटरप्राइजेज सहित कई कंपनियां शामिल हैं। याद होगा कि 2017 का बजट स्वर्गीय अरुण जेटली ने पेश किया था और इसी बजट से चुनावी बांड की शुरुआत हुई थी। चुनावी बांड के बाद मोदी सरकार ने राजनीतिक दलों पर वित्तीय जवाबदेही के भार को काफी कम कर दिया। एसबीआई की 29 शाखाओं में से किसी से यह बांड खरीदे जा सकते हैं और इन्हें पूरी तरह गोपनीय रखा जाता है। जनता इनके बारे में केवल यही जानती है कि किस पार्टी को कितनी राशि प्राप्त हुई । जनता को यह जानने का कोई अधिकार नहीं है कि राजनीतिक दलों को इतने रुपए कौन दे रहा है। साथ ही साथ चुनावी बांड के जरिए राजनीतिक दलों को मिल रहे धन की मात्रा रोज बढ़ती जा रही है। पार्टियों को मिलने इस धन का अनुपात 2017 -18 और 2018 -19 के मध्य भाजपा को बांड से प्राप्त राशि तीन गुनी हो गई। कांग्रेसी भी पीछे नहीं रही । इसे प्राप्त चंदे का स्रोत 2.5 प्रतिशत से बढ़कर 40% हो गया। राजनीतिक दल अपनी आमदनी बढ़ाते जा रहे हैं और छानबीन या जांच के दायरे से बाहर निकलते जा रहे हैं। उन्हें यह सुविधा प्राप्त है कि वे प्राप्त धन का कागज नहीं दिखाएंगे।
सूचना के अधिकार के तहत जब एक करोड़ से अधिक की राशि के चुनावी बांड खरीदने वालों के नाम मांगे गए तो एसबीआई की चिन्हित 23 शाखाओं से जवाब हासिल हुए कि यह सूचना सार्वजनिक नहीं की जा सकती, क्योंकि यह परस्पर विश्वास से जुड़ी है और सूचना के अधिकार से जुड़े कानूनों में इस का कोई प्रावधान नहीं है। यानी, एक तरह से यह सूचना हासिल करने के जनता के अधिकार का उल्लंघन है। सरकार या अधिकारियों में इस विषय के सार्वजनिक व्यापक हितों पर ध्यान नहीं दिया है । अब जिन व्यवसायिक कंपनियों ने अपने व्यवसाय के हितों के लिए राजनीतिक दलों को एक तरह से खरीदा है या तकनीकी तौर पर कहें अनुगृहीत किया है अब उनके बारे में जनता को कोई जानकारी नहीं मिलेगी । अब जनता के लिए सरल नहीं रह गया कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए किसका हित सर्वोपरि है, आम जनता का या उन व्यवसायिक घरानों का जिन्होंने उन्हें भारी चंदे दिए । इस स्थिति से एक गंभीर कन्फ्यूजन पैदा होगा। टकराहट शुरू होगी समाज में विवाद बढ़ेगा। राज्यसभा के सदस्यों के लिए भी कुछ कानून है कि वह अपने धन के स्रोत की जानकारी दें। लेकिन, ऐसा नहीं होता। सांसदों के लिए बनाई गई है व्यवस्था आदर्श नहीं है इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि भगोड़े शराब व्यापारी किंगफिशर एयरलाइंस का मालिक विजय माल्या नागरिक उड्डयन से जुड़ी संसदीय समिति का सदस्य स्वयं इसका गवाह है। इससे सरकार के प्रति आम जनता में एक खास किस्म का दुराव होता जा रहा है। गौर करें, यह केवल भाजपा सरकार से नहीं है किसी भी सरकार से है। राजनीतिज्ञों को आम जनता धन के मामले में ईमानदार नहीं समझती है। उन्हें जनसेवक की सुविधाएं प्राप्त हैं लेकिन जनसेवा के मामले में उन पर भरोसा करना मुश्किल है क्योंकि एक कहावत है हमारे देश में जो राजनीति करते हैं इससे ज्यादा दौलत कमाते हैं। उन्हें अपने आय के स्रोत को छिपाने की सुविधाएं हासिल हैं । उन्हें अपनी आमदनी के कागज नहीं दिखाने पड़ते हैं और न पड़ेंगे। वे कागज नहीं दिखाएंगे और जब कागज नहीं दिखाएंगे तो यहां वही बात आती है:
मन में कोई चोर छुपा है,
क्यों कागज नहीं दिखाओगे
Friday, January 17, 2020
मन में कोई चोर छुपा है क्या?
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Thursday, January 16, 2020
गिरती अर्थव्यवस्था और आम आदमी
देश में तमाम तरह के आंदोलन चल रहे हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक शाहीन बाग से कैसरबाग किसी न किसी कारण आंदोलित है। लेकिन जो सबसे मूल मुद्दा है वह है आम आदमी की जेब में थोड़े से पैसे और पेट में थोड़े से अनाज का a से होता अभाव। जो लोग आंदोलन कर रहे हैं शायद उनके पास खाने के लिए कुछ है लेकिन जो गुस्सा एक बड़ी आबादी के मन में सुलग रहा है वह गुस्सा धारा 370 ,सी ए ए ,एनआरसी, एनपीआर, टुकड़े टुकड़े गैंग और शाहीन बाग के नारों से अलग है। यह गुस्सा कब फटेगा यह तो मालूम नहीं लेकिन इसका असर पड़ना शुरू हो गया है। रोजगार खत्म हो रहे हैं बच्चों की पढ़ाई बंद होती जा रही है:
भूख चेहरे पर लिए चांद से प्यारे बच्चे
बेचते फिरते हैं गलियों में गुब्बारे बच्चे
एसबीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक कर्मचारी भविष्य निधि आंकड़े बताते हैं की कम वेतन वाली नौकरियों में भी छटनी शुरू हो गई है। 2019-20 के ट्रेंड को देखते हुए कहा जा सकता है कि नौकरियों में भारी कमी आएगी। देश में आर्थिक विकास को लेकर लंबे समय से चिंता प्रगट की जा रही थी। सरकार ने इससे निकलने के लिए बीच-बीच में कई आर्थिक सुधार किए, कई घोषणाएं की ताकि लोगों की उम्मीद बनी रहे। फिर भी, हालात में कोई खास बदलाव नहीं है। ऐसे में नौकरियों में कटौती ,बढ़ती महंगाई और देश की आर्थिक वृद्धि दर में कमी इन तीनों मोर्चों पर निराशा मिलने का लोगों की आर्थिक स्थिति पर क्या असर होगा और आने वाले वक्त में इसके मायने क्या होंगे:
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझसे भी दिल फरेब है गम रोजगार के
कुछ विशेषज्ञों का कहना है, फिलहाल लोगों के लिए मुश्किलें हैं लेकिन आने वाले दिनों में राहत होगी। सब्जियों की कीमतें गिरेगी क्योंकि बाज़ार में नई फसल आ जाएगी। लोगों पर बढ़ती सब्जियों की कीमतों का बोझ कम होगा। इससे थोड़ी राहत मिलेगी महंगाई की मार से। लेकिन जहां तक नौकरियों का सवाल है अगर नौकरियां कम हो जाएंगी तो अनुमान लगाया जा सकता है जिनके पास नौकरियां हैं उनकी वेतन वृद्धि भी घटेगी या वेतन में कटौती होगी और जो नौजवान नौकरी ढूंढ रहे हैं उनके लिए यह बड़ा दर्दनाक होगा:
कॉलेज के सब बच्चे चुप हैं कागज की नाव लिए
चारों तरफ दरिया की सूरत फैली हुई बेकारी है
आर्थिक वृद्धि को देखें तो उससे साफ जाहिर है मंदी चल रही है। बाजार में नकदी की कमी है जिसका असर लोगों के खर्च करने की क्षमता पर पड़ रहा है। आरबीआई हर दो महीने में होने वाली बैठक में ब्याज दर में कटौती करता है और फरवरी की बैठक हो सकता है ब्याज दर बढ़ा दे। लेकिन अगर ब्याज दर बढ़ाई जाती है तो उसका असर बड़ा खराब होगा। जिन्होंने बैंक से कर्ज लिया हुआ है वह परेशानी में पड़ जाएंगे । इसलिए संभावना है ब्याज दर ना बढ़ाई है। लेकिन, सरकार के अपने खर्चे हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले 2 वर्षों से तीन बार आर्थिक सुधारों की घोषणा की लेकिन उससे कुछ नहीं हुआ। इसके पीछे कई कारण हैं। जैसे जीएसटी लागू हुआ उसका असर कई क्षेत्रों पर हुआ। लोगों को इसे समझने में समय लगा। तब तक इसकी भयंकर आलोचना होती रही और लोग उसे मंदी के लिए दोषी बताते रहे लेकिन जब बात समझ में आई तो लगा यह एक अच्छा कदम है। इससे आगे चलकर फायदा होगा। वैसे विपक्षी दलों को अपने फायदे के लिए या कहें राजनीतिक फायदे के लिए लोगों को गुमराह करना जरूरी है। लोग उनकी बातों में आ जाते हैं और फिर चाहे 370 विरोधी आंदोलन हो या आर्थिक मंदी के सब कुछ सरकार विरोधी नजर आने लगता है। सरकार का रुख देखकर यह कहा जा सकता है कि आने वाले समय में सुधार की कोशिशें शुरू होंगी। वैसे निजी क्षेत्र निवेश से कतरा रहा है सरकार को बुनियादी ढांचे जैसे कोयला स्टील बिजली में निवेश करना होगा ताकि नौकरियां पैदा की जाए । अगर सरकार दो से ढाई लाख करोड़ सड़क ,रेलवे या शहरी विकास में खर्च करती है इससे जुड़े उद्योग से सीमेंट, स्टील ,मशीनरी में लाभ होगा और उससे विकास होगा नौकरियां बढ़ेंगी
अर्थव्यवस्था में समय-समय पर ऐसा होता है। हां ,भारत में 1991- 92 के बाद ऐसी स्थिति देखने को नहीं मिली है। लेकिन इससे एक खास किस्म का भय तो जरूर व्याप गया है । परंतु यह तय है कि सरकार जिस तरह से काम कर रही है उसमें साल दो साल में सकारात्मक नतीजे जरूर आएंगे। 2019 में बनी सरकार का पहला बजट पेश होने में एक पखवाड़े से भी कम समय रह गया है। इस बजट में भी आर्थिक मोर्चे पर लड़ाई दिखेगी। सरकार की कोशिश होगी कि आम आदमी को थोड़ी राहत मिले उसके पास पैसे आ सकें। मंदी की वजह से लोग पैसा खर्च नहीं कर पा रहे हैं:
अपने बच्चों को मैं बातों में लगा लेता हूं
जब भी आवाज लगाता है खिलौने वाला
सरकार की कोशिश होगी कि ग्रामीण रोजगार का सृजन हो ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश हो सके और वहां से पैसा आए। अर्थव्यवस्था में जितनी मांग होनी चाहिए वह भी कम है। निर्यात घटा है और निजी क्षेत्र से निवेश कम हुआ है । जिसकी वजह से आर्थिक वृद्धि दर घट रही है । रोजगार सीधे आर्थिक विकास पर निर्भर है । अगर हमारी जीडीपी 6 से 7% हो जाएगी तो रोजगार अपने आप बढ़ जाएगा। पिछले 3 साल में यही हुआ कि नोटबंदी और जीएसटी से छोटे उद्योगों को दिक्कत आई और रोजगार में कमी हो गई । लेकिन सरकार की मंशा रोजगार बढ़ाने की है । यह स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है वरना इतने आंदोलनों को दबाकर बहुत कुछ किया जा सकता था। आपात स्थिति का उदहारण हमारे सामने है। इन आंदोलनों से सरकार का सख्ती से पेश नहीं आना इस बात का सबूत है कि सरकार आर्थिक स्थिति के विकास की कुछ न कुछ विचार कर रही है:
आने वाले जाने वाले हर जमाने के लिए
आदमी मजबूर है राहें बनाने के लिए
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Wednesday, January 15, 2020
8 करोड़ अदृश्य बच्चे! ओ माय गॉड!!
एन पी आर, सीएएए और कई तरह के प्रदर्शनों के बीच यह खबर चौंकाने वाली है कि हमारे देश में कुल 8 करोड़ से ज्यादा बच्चे ऐसे हैं जिनका कोई रिकॉर्ड नहीं है। सरकार एक तरफ जनसंख्या का रिकार्ड बनाना चाहती है तो दूसरी तरफ बिना रिकार्ड और जन्म प्रमाण पत्र के बच्चों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है ।
जन्म और मृत्यु पंजीकरण कानून 1969 के तहत जन्म और मृत्यु का पंजीकरण 21 दिन के भीतर करवाना अनिवार्य है लेकिन हाल में रजिस्ट्रार जनरल आफ इंडिया के सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की ओर से दिए गए आंकड़ों से पता चलता है 2017 में जन्म के 84.9% और मृत्यु के 79.6% का ही पंजीकरण हुआ था बाकी ना बच्चे पैदा हुए और ना लोग मरे। कैसी विडंबना है ,एक ऐसे देश में जहां जनसंख्या के आंकड़े तैयार किए जा रहे हैं और उसे लेकर पूरे देश में बवाल मचा हुआ है। जिन बच्चों के जन्म का पंजीकरण नहीं हुआ है, यूनिसेफ के मुताबिक उनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती यह भारत के लिए ही केवल विचित्र नहीं है बल्कि कई देशों में ऐसा होता है। आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में 16.6 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जिनका जन्म पंजीकरण नहीं हुआ है। इन 16.6 करोड़ बच्चों में आधे से ज्यादा यानी फ़र्ज़ करें लगभग 8 करोड़ से अधिक ऐसे बच्चे हैं जो भारत में रहते हैं। यूनिसेफ की 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पिछले 5 साल से 5 साल से कम उम्र के लगभग 2.6 करोड़ ऐसे बच्चे हैं जिनके जन्म का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ। जन्म का पंजीकरण एक बच्चे को ऐसी कानूनी मान्यता देता है जो उसकी पहचान बनता है। यही एकमात्र सबूत होता है कि बच्चा किस देश में जन्म लिया है और कब उसका जन्म हुआ है। बच्चे का जब पंजीकरण नहीं होता तो बाद में गणना भी नहीं हो सकती । जनगणना तभी होगी जब बच्चे जीवित बच जाएंगे। आई एस आई के मुताबिक भारत में शिशु मृत्यु दर खासकर 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर ज्यादा है इस कारण बहुत से बच्चों की शायद कभी गिनती नहीं हो पाती। जन्म पंजीकरण में तेजी 2000 के दशक में शुरू हुई जब अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में बच्चों की जन्म दर बढ़ने लगी। इससे पहले बच्चे घरों में पैदा लेते थे जिनका कोई रिकॉर्ड नहीं था। 2000 से पहले जन्मे बच्चों में बहुत के पास प्रमाण पत्र या फिर स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट नहीं होंगे या उनके पास एक से अधिक दस्तावेज होंगे। कई दस्तावेज ऐसे हो सकते हैं जिसमें अलग-अलग जन्मतिथि लिखी हुई है । इसमें कोई इरादा गलत नहीं है लेकिन मां-बाप के पास कोई सही तारीख नहीं होने के कारण तारीखें अलग अलग हो जातीं हैं।
सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम आंकड़ों के मुताबिक भारत में 2017 में पैदा हुए बच्चों में से 84.9% बच्चों का जन्म प्रमाण पत्र बना। जबकि 2008 में यह अनुपात 76.4 प्रतिशत से अधिक था। सन 2000 में यह अनुपात 56.2% था। इसका अर्थ हुआ इस वर्ष जन्मे बच्चों में से लगभग आधे या उससे कुछ ज्यादा बच्चों का जन्म पंजीकरण नहीं हो सका। ऐसे बच्चे सरकार के रिकॉर्ड में कहीं नहीं हैं और उनके कल्याण के लिए सरकार कुछ नहीं कर सकती है। बात यहीं तक हो तो गनीमत है हमारे देश में 9 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश है ऐसे हैं जिनमें जन्म के पंजीकरण की दर राष्ट्रीय दर से कम है। इनमें से चार बड़े राज्य हैं उत्तर प्रदेश 61.5 % ,बिहार 73.7% ,मध्य प्रदेश 74.6% और तत्कालीन जम्मू और कश्मीर 78.8 प्रतिशत है । 2017 में सीआर एस की रिपोर्ट में केवल 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्रों के बारे में जानकारी है। जिन राज्यों में इसके बारे में जानकारी नहीं दी उन्होंने इसके पीछे कर्मचारियों की कमी ,सॉफ्टवेयर और नेटवर्क की समस्याएं जैसी बात है बनाई हैं।
किसी भी आंदोलन का सबसे पहला शिकार या सबसे पहला निशाना गरीब और कमजोर तबके के लोग ही होते हैं । क्योंकि उन्हें उनके अस्तित्व के संघर्ष के नाम पर निहित स्वार्थी नेताओं द्वारा आंदोलनों में झोंक दिया जाता है। लेकिन विडंबना है कि भारत में शहरी क्षेत्रों में रहने वाले 5 साल से कम उम्र के सभी बच्चों में से 77% का जन्म पंजीकरण हुआ है बाकी 23% बच्चे अदृश्य हैं। यह अदृश्य बच्चे कहां के हैं, कैसे हैं कहां रहते हैं और उनकी आजीविका क्या है या फिर भविष्य में उनकी आजीविका का कैसे बंदोबस्त हो इस बारे में सरकार को अंधेरे में रखा गया है। यही नहीं ग्रामीण क्षेत्रों में भी हालत अच्छी नहीं है एन एफ एच एस -4 के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्र में हालत और खराब है। इन क्षेत्रों में 56.4% ही पंजीकरण हुआ है। परिवार की संपत्ति के मुताबिक भी इस आंकड़े में बड़ा अंतर है। यानी सबसे धनी समूह के 5 साल में से कम उम्र के 82.3% बच्चों के जन्म का रजिस्ट्रेशन हुआ था और उनके पास जन्म प्रमाण पत्र था जबकि सबसे गरीब समूह में यह आंकड़ा केवल 40.7% का था। इसके अलावा सबसे गरीब वर्ग से संबंधित प्रत्येक चौथे बच्चे यानी 23% के जन्म का पंजीकरण होने के बावजूद उनके पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं था। अब ऐसे में योजनाओं का क्या स्वरूप होगा और खास करके कल्याणकारी योजनाओं का क्या हाल होगा, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है । सरकार अंतिम व्यक्ति तक मदद नहीं पहुंचा पाती या कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं होता तो इसका क्या हश्र होगा आसानी से समझा जा सकता है। सरकार के खिलाफ विपक्ष अगर इसका उपयोग करता है तो बहुत गलत नहीं होगा।
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Tuesday, January 14, 2020
महंगाई के बेहद बुरे दिन
सी ए ए और एनआरसी की सुलगती आंच के बीच सहसा खबर आई कि महंगाई की दर 7. 35% बढ़ गई। यह विगत 5 वर्षों में सबसे ज्यादा थी। हालांकि रिजर्व बैंक का अनुमान था कि महंगाई की दर 4% बढ़ेगी पर प्याज की आसमान छूती कीमतों से दिसंबर 2019 में खुदरा महंगाई की दर साढे 5 साल के उच्चतम पर पहुंची। जबकि खाद्य पदार्थों की खुदरा महंगाई की दर 6 साल में सबसे ज्यादा उच्चतम स्तर पर 14.12% रही। कुल महंगाई की दर लगभग पांचवे महीने बढ़ी है। खाद्य खुदरा महंगाई की दर लगातार दसवें महीने बढ़ी। जबकि फरवरी 2019 में यह ऋणात्मक थी। रिजर्व बैंक ने मुद्रास्फीति को 4% के दायरे में रखने का लक्ष्य किया था। अब बैंक के लक्ष्य से कहीं अधिक बढ़ गई महंगाई। मोदी सरकार के कार्यकाल में पहली बार खाने पीने की चीजों के दाम इतनी ज्यादा बढ़े हैं। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक दिसंबर 2019 में सब्जियों की महंगाई की दर 60.50% पर रही। इसका मतलब है कि दिसंबर 2018 की तुलना में पहले महीने सब्जियों के दाम 60.50% बढ़े। दालों एवं उससे बने उत्पादों की महंगाई दर 15. 44% रही। यह लगातार दूसरा महीना है जब खाद्य पदार्थों की महंगाई दर दहाई अंक में रही। नवंबर 2019 में खाद्य खुदरा महंगाई दर 10.01 प्रतिशत थी 1 साल पहले दिसंबर 2018 में 2. 65% ऋणात्मक रही।
कई साल पहले एक फिल्मी गीत बड़ा मशहूर हुआ था। "महंगाई डायन खाए जात है" यानी घर की जरूरी चीजों को महंगाई के कारण खरीदा जाना बंद हो गया है। डायन हमारे धर्म में एक मुहावरा है जिसका सीधा अर्थ होता है शांतिप्रिय लोगों के घर की सुख शांति छीनने वाली। यह डायन खुद कुछ नहीं करती जो कुछ भी करती है अपने मालिक के आदेश से करती है। इसलिए केवल महंगाई को कोसने से काम नहीं चलेगा। महंगाई के माध्यम से जनता का शोषण होता है और जब तक उस शोषण करने वाले तंत्र पर वार नहीं किया जाता तब तक यह कम नहीं होगी। महंगाई का प्रभाव पूरे समाज पर समान रूप से पड़ता है ,यह सत्य नहीं है। समाज में दो तरह के लोग होते हैं। एक वे जिनकी आय का स्रोत मजदूरी है। चाहे वह मजदूरी शारीरिक हो या मानसिक। दूसरी तरफ वे लोग हैं जिनकी आय का स्रोत संपत्ति होती है। यानी ये लोग अपनी दौलत से दौलत कमाते हैं। समाज में भी जो पहले तरह के लोग हैं उनकी भी दो किस्में होती हैं। एक असंगठित क्षेत्र में काम करनेवाले लोग और दूसरी सरकारी कर्मचारी जैसे लोग , जो असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। पहले किस्म के लोगों की आय पूरी तरह जड़ता से जुड़ी होती है और जो सरकारी कर्मचारी है उनकी थोड़ी बहुत आय बढ़ जाती है। महंगाई सदा संपत्ति धारी वर्ग के पक्ष में होती है। क्योंकि ,महंगाई के दौर में संपत्ति की कीमतें बढ़ती जाती हैं फलस्वरूप उनका लाभ बढ़ता जाता है। अगर महंगाई थोड़ी कम हुई तो सबसे ज्यादा हाय तौबा मचाने वाले यही लोग होते हैं।
अर्थशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार महंगाई बढ़ने से आर्थिक विकास रुकेगा और आर्थिक मंदी आएगी। इसका सबसे ज्यादा असर रोजगार पर पड़ेगा। अर्थव्यवस्था में सुस्ती से चालू वित्त वर्ष में नौकरियों के अवसर पिछले वर्ष के मुकाबले कम हुए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार चालू वित्त वर्ष में 16 लाख से कम नौकरियों के सृजन का अनुमान है। पिछले वित्त वर्ष में यानी 2018 -19 में 89.7 लाख रोजगार के अवसर पैदा हुए थे। रिपोर्ट के अनुसार असम ,बिहार ,राजस्थान ,उत्तर प्रदेश और उड़ीसा जैसे राज्यों में मजदूरी के लिए बाहर गए व्यक्तियों की ओर से घर भेजे जाने वाले धन में कमी हुई है यानी एक तरफ महंगाई बढ़ी है और दूसरी तरफ छटनी के कारण ठेका श्रमिकों की संख्या कम हुई है। बंगाल ,पंजाब ,गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में रोजगार के लिए आए मजदूरों द्वारा अपने घर पैसा भेजा जाता है । जो वहां की अर्थव्यवस्था को संभाले रखता है। खासकर कृषि अर्थव्यवस्था को। ईपीएफओ के आंकड़ों के अनुसार 2018 -19 में 89.7 लाख नए रोजगार के अवसर उत्पन्न हुए थे। चालू वित्त वर्ष में यह घटकर उसके 15.8% हो जाने का अनुमान है। अब हमारे अर्थशास्त्री कहते हैं इस मंदी का कारण लोगों की क्रय शक्ति का बढ़ना है । लेकिन हैरत होती है कि यह क्रय शक्ति बढ़ती कैसे है? रोजगार है नहीं ,महंगाई के कारण खरीदने की ताकत कम हो गई और लोग खरीद नहीं पाते हैं । इसलिए महंगाई बढ़ने के पीछे आम लोगों की क्रय शक्ति का बढ़ना एक तरह से दूर की कौड़ी खोज कर लाना है। आम आदमी के खाने की थाली में पोषक तत्व धीरे-धीरे गायब हो गए। फलतः बीमारियां बढ़ी और इलाज में पैसा जाने लगा। आहिस्ता आहिस्ता लोगों की खरीदने की ताकत कम हो जाती है और आर्थिक मंदी बढ़ने लग जाती है।
दूसरी तरफ हमारे देशी खाद्यान्न धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं और उसकी जगह ज्यादा उत्पादन वाले चुनिंदा खाद्यान्न की उपज बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। इसका नतीजा यह होता है कि कृषि महंगी पड़ने लगती है और इसके कारण किसान धीरे-धीरे मजदूर बन् जाता है । खेती छूट जाती है और अनाज घट जाता है । लिहाजा खाने की थाली में अन्न नहीं होता। जिनके पास आय हैं वह तो गुजर कर लेते हैं लेकिन जिनके पास कुछ नहीं है सिवा कहने को थोड़े से खेत या फिर बिल्कुल कुछ नहीं वह लोग महंगाई का शिकार बन जाते हैं। महंगाई धीरे-धीरे बढ़ने लगती है और इससे बढ़ने लगती है समाज में अव्यवस्था। अगर समाज को व्यवस्थित ढंग से चलाना है तो सबसे पहली चीज है के लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी हों वरना सारी योजनाएं केवल कागजों पर ही रह जाएंगी।
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Monday, January 13, 2020
पाकिस्तान को देना होगा उत्तर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को विश्व प्रसिद्ध बेलूर मठ में अपने एक संबोधन के दौरान कहा कि नागरिकता संशोधन विधेयक ( सी ए ए) को लेकर विपक्षी दल नौजवानों को भड़का रहे हैं ,उन्हें गुमराह कर रहे हैं । मंत्री ने कहा यह कानून लोगों से नागरिकता लेने के लिए नहीं नागरिकता देने के लिए है। हावड़ा में बेलूर मठ में एकत्र जन समुदाय को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि "आज राष्ट्रीय युवा दिवस पर मैं फिर से देश के नौजवानों से, पश्चिम बंगाल के नौजवानों से , उत्तर - पूर्व के नौजवानों से ,जरूर कुछ कहना चाहता हूं। उन्होंने कहा कि, ऐसा नहीं है कि देश की नागरिकता देने के लिए रातों-रात कानून बनाया गया है। हम सबको पता होना चाहिए कि दूसरे देश से किसी भी धर्म के किसी भी व्यक्ति को जो भारत में आस्था रखता है, भारत के संविधान को मानता है ,भारत की नागरिकता ले सकता है। कोई दुविधा नहीं है।" इसमें प्रधानमंत्री ने कहा कि "मैं फिर कहूंगा कि सीएए नागरिकता छीन लेने के लिए नहीं है यह नागरिकता देने के लिए है। इस कानून में भारत की नागरिकता देने के लिए सहूलियत और बढ़ा दी गई है। यह सहूलियत किसके लिए बढ़ी है? यह उन लोगों के लिए बढ़ाई गयी है जिन पर बंटवारे के बाद बने पाकिस्तान में उनकी धर्म - आस्था की वजह से अत्याचार हो रहा है।" प्रधानमंत्री ने कहा हमने वही किया है जो महात्मा गांधी ने दशकों पहले कहा था। क्या हम इन शरणार्थियों को मरने के लिए वापस भेज दें? क्या यह हमारी जिम्मेदारी नहीं है? क्या उन्हें भारत का नागरिक बनाया जाना चाहिए या नहीं? प्रधानमंत्री ने कहा की सीएए को लेकर जो विवाद उठा है उससे दुनिया ने देखा है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ कितना अत्याचार हो रहा है। अब हमारी इस पहल से पाकिस्तान को दुनिया के सामने जवाब देना होगा कि उसके देश में अल्पसंख्यकों के साथ क्या हो रहा है?
अब से 22 दिन पहले 22 दिसंबर 2019 को रामलीला मैदान में सीएए का विरोध करने वालों पर प्रधानमंत्री ने कहा इसे लेकर विपक्ष अफवाहें फैला रहा है। यह किसी की नागरिकता छीनने के लिए नहीं है बल्कि देने के लिए है । यह पहला वाकया था जब प्रधानमंत्री ने इन विरोध प्रदर्शनों पर चुप्पी तोड़ी थी और इस वाकए के ठीक 22 दिन के बाद प्रधानमंत्री ने सीएए का बचाव लगभग इसी सुर में किया। उन्होंने इस बार भी विपक्ष पर हमने बोले। लेकिन बड़ी अजीब बात है कि प्रधानमंत्री ने जब पाकिस्तान पर निशाना साधा तो वह बांग्लादेश और अफगानिस्तान पर चुप्पी साध गए। उनका कोई जिक्र नहीं किया।
इतनी अपील और बयानों के बाद भी विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है। सरकार जनता को संतुष्ट क्यों नहीं कर पा रही है? विरोध , रूसो के मुताबिक, लोकतंत्र की खूबसूरती है। आप जिस विचार को मानते हैं उस पर शत प्रतिशत लोग सहमत हो जाएं ऐसा लोकतंत्र में संभव नहीं है। यह लोकतंत्र की खूबसूरती है उसमें असहमतियों को जगह दी जाती है। प्रधानमंत्री की चिंता हिंसक घटनाओं को लेकर है। विपक्ष को भी जनता ने ही चुनकर भेजा है। उसका काम है कि देश के खिलाफ अगर सरकार कुछ करती है तो उसका विरोध करें। प्रधानमंत्री के रुख से कितने लोग सहमत या असहमत हैं इसका एक छोटा सा उदाहरण विश्वविद्यालयों से समझा जा सकता है। देश में सरकारी और डीम्ड विश्वविद्यालयों की कुल संख्या 900 है। लेकिन यह विरोध सिर्फ पांच या छः विश्वविद्यालयों में हो रहा है उसमें भी बड़ी संख्या में छात्र ऐसे हैं जो उनके साथ नहीं हैं। इन विरोध प्रदर्शनों में प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक विरोधी भी हैं। शनिवार को कांग्रेस कार्यकारिणी का एक संकल्प पत्र भी आया था जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि वह इसका विरोध करेगी। वामपंथी दल पहले से ही विरोध कर रहे हैं। लेकिन, जामिया मिलिया और जेएनयू में जो विरोध हुआ जिस तरह की हिंसक घटनाएं हुई उसने विरोध प्रदर्शनों को और हवा दे दी और मामला सीएएए से आगे बढ़ गया है। इसमें सबसे जरूरी है कि प्रधानमंत्री छात्रों से बातें करें ।सरकार छात्रों से बातें करे। प्रधानमंत्री इस मामले पर केवल पाकिस्तान पर उंगली उठाते हैं। उन्होंने कभी नहीं कहा कि जामिया की लाइब्रेरी में घुसकर लड़कियों को क्यों पीटा गया? जेएनयू में एक लड़की का सिर क्यों फोड़ा गया? जरा गौर करें, क्या दिल्ली के शाहीन बाग से लेकर कर्नाटक, बंगलुरु ,लंदन और न्यूयॉर्क में होने वाले विरोध प्रदर्शन राजनीतिक पार्टियों से प्रेरित हैं, शायद नहीं। जो लोग विरोध कर रहे हैं ऐसा नहीं कि वह सत्तारूढ़ पार्टी और उसकी विचारधारा की भी समर्थक हों, लेकिन विपक्षी दलों के प्रदर्शनकारियों की बात बनेगी नहीं। अगर आज यह पार्टियां कह दें कि वे सरकार का समर्थन करती हैं तो कल से प्रदर्शन समाप्त हो जाएंगे ऐसा नहीं है। विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों को भरोसा है कि यह विपक्षी पार्टियां उनका साथ देंगी ,लेकिन वह कितना लड़ेंगे यह स्पष्ट नहीं है। यहां एक बात और है कि राजनीतिक पार्टियों की उतनी भागीदारी नहीं है जितनी प्रधानमंत्री जी और उनके मंत्री बढ़ा चढ़ाकर बोल रहे हैं । प्रधानमंत्री जी ने अपने कोलकाता दौरे में सिर्फ सीएए पर बोला। उन्होंने छात्रों पर कुछ नहीं बोला, जेएनयू के बारे में कुछ नहीं बोला। वह सिर्फ राजनीतिक पार्टियों पर उंगली उठा रहे हैं। सीएए और जेएनयू को लेकर फिल्मी हस्तियां भी विरोध कर रही हैं। यह विरोध प्रदर्शन उदार, आधुनिक चेतना वाले लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। इससे मोदी सरकार को डर हो गया है तभी टुकड़े-टुकड़े गैंग और अर्बन नक्सल जैसे शब्द लेकर आते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रामलीला मैदान में कहा था एनआरसी पर अभी तक मंत्रिमंडल में कोई बातचीत नहीं हुई है। गृह मंत्री अमित शाह ने भी कहा था कि फिलहाल एनआरसी नहीं लाया जा रहा है। लेकिन वे लगातार कहते आए हैं कि पहले सीएए आएगा फिर एनआरसी । प्रधानमंत्री या सरकार यह स्पष्ट भी कर देती है कि एनआरसी नहीं लाया जाएगा तो क्या यह प्रदर्शन समाप्त हो जाएंगे। क्योंकि यहां बात कुछ लाने की नहीं है बल्कि नीयत की हो रही है अगर वह घोषणा कर भी देते हैं कि एनआरसी नहीं लाया जाएगा तो प्रदर्शनकारी कहेंगे हमें इस पर विश्वास नहीं है सरकार झूठ भी बोल सकती है। पिछले छह-सात महीने के घटनाक्रम को देखें। तीन तलाक कानून , धारा 370, सुप्रीम कोर्ट का अयोध्या पर फैसला कहीं किसी ने विरोध नहीं किया। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सब उसका समर्थन कर रहे हैं। इस पर एक उलझन पैदा हो गई है। यह कानून भारतीय मुसलमानों के खिलाफ है। अब इंतजार किया जाना चाहिए कि सरकार अगर एनआरसी लाती है उसका तरीका क्या होगा? इसके बाद अगर कोई आपत्ति हो तो विरोध प्रदर्शन करना चाहिए। शायद ऐसा नहीं है। क्योंकि, सरकार यदि इस मसले पर विचार साफ भी कर दे शायद प्रदर्शन नहीं रुकेगा। क्योंकि इन प्रदर्शनों को पीछे से महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दे हवा दे रहे हैं। भारत जैसे संस्कृति उन्मुख देश में यह कोई नई बात नहीं है। यहां जब भी आंदोलन हुए हैं तो संस्कृति और जातियों को आगे रखा गया है, और सारी बातें उनकी आड़ में हुई है । चाहे वह नानक का सिख आंदोलन हो या शिवाजी का मराठा आंदोलन हो या गांधी का नमक सत्याग्रह अथवा सत्ता की दौड़ में लक्ष्य तक पहुंचने की हड़बड़ी में भारत का विभाजन हर आंदोलन में कुछ ना कुछ अवांतर तथ्य होता है जो किसी दूसरे मसले की पृष्ठभूमि में खड़ा होता है। यहां भी सीएए के विरोध में कई अन्य सामाजिक आर्थिक कारण हैं। सरकार को उसके प्रति जनता को विश्वास में लेना चाहिए।
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Sunday, January 12, 2020
पहले वार्ता फिर धरना
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शनिवार को राजभवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की और उनसे कहा कि वे सी ए ए वापस ले लें साथ ही उन्होंने केंद्र से मिलने वाले रुपयों का भी तकाजा कर दिया। प्रधानमंत्री ने इस संबंध में क्या कहा इस बाबत जानकारी नहीं है। इस मुलाकात के बाद मुख्यमंत्री धरने में शामिल हो गयीं। तृणमूल छात्र संगठन ने सी ए ए एनपीआर तथा एनआरसी के विरुद्ध इस धरने का आयोजन किया था।
वैसे बंगाल के मानस को संतुष्ट करने के लिए ओल्ड करेंसी बिल्डिंग में आयोजित अपनी सभा में प्रधानमंत्री ने कहा की बंगाल अतुल्य है। पूरे विश्व में एक ही चंद्र है, जबकि बंगाल में कई चंद्र हैं जैसे सुभाष चंद्रइस धरने का आयोजन जगदीश चंद्र शरतचंद्र वगैरह । मुख्यमंत्री ने जब पुराने पैसे देने को कहा प्रधानमंत्री ने बड़ी शांति से यह कहा कि वे इस पर दिल्ली आकर बात करें। ओल्ड करेंसी बिल्डिंग प्रधानमंत्री ने कोलकाता की पुरानी बिल्डिंग्स के नवीनीकृत स्वरूप का लोकार्पण किया यहां मुख्यमंत्री भी उनके साथ थीं।
इस बीच वामपंथी कार्यकर्ताओं ने उत्तर 24 परगना जिले के विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शन किए उनके हाथ में भक्ति अच्छे जिस पर लिखा था मोदी वापस जाओ उन्होंने दमदम हवाई अड्डे से रैली भी निकाली उनका दावा है कि जब तक यह कानून वापस नहीं दे दिया जाता तब तक हम अपना विरोध जारी रखेंगे इस बीच कांग्रेस ने आरोप लगाया है की मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गुप्त समझौता कर लिया है।
वैसे नागरिकता संशोधन कानून लागू हो गया है ,फिर भी देशभर में इस पर बहस छिड़ी हुई है । कई शहरों में हिंसा हुई लेकिन सरकार झुकने को तैयार नहीं है और विपक्षी दल अड़े हुए हैं कि सरकार इस कानून को वापस ले ले। अब क्योंकि यह कानून बन गया है ऐसे में इस कानून को लेकर जागरूकता बेहद जरूरी है। सोशल मीडिया में इसे लेकर अफवाह फैलाई जा रही हैं । इन अफवाहों से बचना सबसे ज्यादा जरूरी है। सी ए ए के खिलाफ याचिकाएं दायर की गई है । जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है । उन याचिकाओं में इस विधेयक को मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव पूर्ण बताया गया है और संविधान में सन्निहित समानता के अधिकार का उल्लंघन कहा गया है। यह कानून उन लोगों पर लागू होता है जो धर्म के आधार पर उत्पीड़न के कारण भारत में शरण लेने के लिए मजबूर हैं या मजबूर थे इसका उद्देश्य ऐसे लोगों के अवैध प्रवास की कानूनी कार्रवाई से बचना है। कटऑफ की तारीख 31 दिसंबर 2014 रखी गई है।
यह कानून पाकिस्तान अफगानिस्तान बांग्लादेश की हिंदू सिख पारसी बौद्ध और ईसाई के अवैध प्रवासियों की परिभाषा को परिष्कृत करने के लिए निर्धारित किया गया है। जो बिना किसी दस्तावेज के भारत में रहते हैं इस कानून के पीछे केंद्र सरकार का तर्क यह है कि जो अल्पसंख्यक समूह मुस्लिम बहुल बहुसंख्यक देशों में उत्पीड़न से बचने के लिए आए हैं वह हमारी जिम्मेदारी हैं। यद्यपि यह तर्क खुद में ही विवाद से भरा हुआ है। यह विधायक सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा नहीं करता है और ना ही इसमें सभी पड़ोसी देशों के उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को शामिल किया गया है। अहमदिया मुस्लिम संप्रदाय और शियाओं को पाकिस्तान में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। पड़ोसी बर्मा में हिंदुओं को उत्पीड़ित किया जाता है और इसमें या कहें कि इस श्रेणी में लंका की में ईसाइ तमिल भी शामिल हैं। गृह मंत्री अमित शाह का कहना है कि कांग्रेसी यदि धर्म के आधार पर देश के विभाजन के लिए सहमत नहीं होती तो बिल जरूरी नहीं होता। किसी भी तरह देश के सभी संस्थापक एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के लिए प्रतिबद्ध थे जहां सभी नागरिक नागरिकता का आनंद लेते थे चाहे वह किसी भी धर्म के हों। पूरे भारत में नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ विरोध किया है जिसमें आम जन भीषण, क्रूर तथा विभिन्न विचारधाराओं के से जूझ रहा है।
यद्यपि इंटरनेट प्रतिबंध वह विभिन्न शहरों में भाई और अशांति को कानून और व्यवस्था की कमजोरी के रूप में नहीं लिया जा सकता है। लेकिन ,पूरी तरह से पुलिस और सरकार को दोष देने से कुछ नहीं होता है। सीएए के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस कार्रवाई में उत्तर प्रदेश में 20 लोग कथित तौर पर मारे गए । उत्तर प्रदेश में एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक पुलिस वाले को यह कहते दिखाया जा रहा है कि " विरोध करने वालों को पाकिस्तान चला जाना चाहिए।" ऐसी उम्मीद पुलिस से नहीं थी। देश के विभिन्न हिस्सों में सीएए के समर्थन में रैलियां हुई हैं। उनमें भीड़ भी जुटी है बीजेपी ने रैलियों के माध्यम से इस से जुड़े भ्रम दूर करने का प्रयास कर रही है तो वहीं कांग्रेस - सपा हिंसा में मारे गए युवकों घर जाकर उनके परिजनों के जख्म पर मरहम लगाने क्या काम कर रही थी। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हर पार्टी अपने राजनीतिक फायदे और नुकसान के हिसाब से इस मुद्दे का इस्तेमाल कर रही है । एक धर्मनिरपेक्ष राज्य का नागरिक होने के कारण यह हमारा दायित्व है कि आधारहीन भय ना फैलाएं। सभी संपत्तियों को जलाने पुलिसकर्मियों को मारने और एक नकारात्मक प्रभाव का हिस्सा बनने से बचें।
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Friday, January 10, 2020
अभाव के कारण भड़कते दंगे
ईमान फिर किसी का नंगा हुआ
सुना है फिर शहर में दंगा हुआ
हाल में जारी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में दंगों के बदलते कारणों के बारे में बताया गया है। कुल मामलों की संख्या घटी है खास करके सांप्रदायिक और राजनीतिक मसलों पर होने वाले दंगों की संख्या में गिरावट आई है दूसरी तरफ औद्योगिक और जल संबंधी कारणों से होने वाले दंगों की संख्या बढ़ी है। देशभर में नागरिकता संशोधन कानून (सी ए ए) तथा एनआरसी को लेकर विरोध जारी है। इसी के बीच सरकार द्वारा जारी अपराध के आंकड़ों में बताया गया है कि 2017 के मुकाबले 2018 में जो दंगे हुए हैं उनका मुख्य कारण आर्थिक था राजनीतिक नहीं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक 2017 की तुलना में 2018 में जो दंगे फसाद हुए उनके पीछे औद्योगिक और जल संबंधी कारण थे ना कि 2017 की तरह सांप्रदायिक राजनीतिक, कृषि तथा छात्रों से संबंधित मामले थे। आंकड़े बताते हैं 2018 में इससे पहले वाले साल की तुलना में औद्योगिक विवाद ढाई गुना बढ़ा है लगभग इतना ही जल संबंधी कारणों से हिंसा की संख्या में वृद्धि हुई है । 2018 में सार्वजनिक शांति को भंग करने के 76, 851 मामले हुए जबकि 2017 में 78,051 मामले दर्ज किए गए। इनमें से 90% मामले दंगे फसाद के थे और बाकी धारा 144 को भंग करने या कह सकते हैं गैर कानूनी ढंग से इकट्ठे होने इत्यादि के थे।
यह आंकड़े आर्थिक मंदी और ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार हो रहे जल संकट के बीच आए हैं और इन आंकड़ों का विश्लेषण विभिन्न क्षेत्रों के सामाजिक आर्थिक आंकड़ों के बरक्स ही किया जा सकता है। इन आंकड़ों को यदि सामाजिक -आर्थिक आंकड़ों के त्रिपाश्व में देखें तो पता चलेगा जिन क्षेत्रों में ज्यादा आर्थिक तनाव रहे है उन क्षेत्रों में दंगे ज्यादा होते हैं । 2016 में भयंकर किसान आंदोलन हुए थे। उनकी पृष्ठभूमि में कृषि संकट था। एनसीआरबी के आंकड़े के मुताबिक 2017 में औद्योगिक फसादों की संख्या 178 थी जबकि 2018 में यह बढ़कर 440 हो गई। जल संबंधी कारणों से होने वाली हिंसक घटनाएं 2017 में 432 जो 2018 में 838 हो गई। यदि इनकी तुलना अन्य कारणों से होने वाले दंगों या हिंसक घटनाओं से की जाए जैसे सांप्रदायिक छात्र आंदोलन राजनीति या किसान संबंधी कारणों से की जाए तो आंकड़े बताते हैं कि 2018 में 2017 के मुकाबले इन घटनाओं में एक चौथाई कमी आई है। सांप्रदायिक दंगे तो लगभग 30% कम हो गए जातीय विवाद लगभग 20% कम हो गए। जबकि किसान आंदोलनों में 35% की गिरावट हुई है यहां तक कि जमीन संबंधी झगड़ों के बाद होने वाली हिंसक घटनाओं में 2017 के मुकाबले 2018 में 4% की कमी हुई है।
एक तरफ सांप्रदायिक दंगे कम हुए हैं दूसरी तरफ लोगों की भावनाओं को भड़काने तथा घृणा फैलाने के मामले बढ़े हैं। आंकड़े बताते हैं की विद्वेष फैलाने के मामलों में लगातार वृद्धि होती गयी है और 2016 से 2018 के बीच यह दुगनी हो गई। देशभर में पुलिस ने 2016 में ऐसे 478 मामलों को दर्ज किया जबकि 2017 में या बढ़कर 958 हो गया और 2018 में इसकी संख्या 1114 हो गई । उग्र समूहों द्वारा दंगे भड़काने के कई मामले भी इन आंकड़ों में दर्ज हुए हैं । ऐसा पहली बार हुआ है लेकिन आंकड़ों के चरित्र को देखकर लगता है कि इन्हें अनिच्छा से दर्ज किया गया है या फिर राज्य क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने इनकी कोटि अलग बता दी है। उग्र समूह द्वारा इन दंगों की संख्या आलोच्य अवधि में केवल दो थी जोकि 2018 में बढ़कर 4 हो गई । यहां यह बताना जरूरी है कि एनसीआरबी के आंकड़े पुलिस की एफ आई आर पर आधारिक होते हैं और एफ आईआर अत्यंत घातक अपराधों के फलस्वरूप ही दर्ज की जाती है। मसलन अगर कोई उग्र समूह मारपीट करता है और उसने किसी की मौत हो जाती है तो उस घटना को हत्या की श्रेणी में दर्ज किया जाएगा ना कि दंगा माना जाएगा। दंगे से जुड़ा एक अन्य पहलू भी है वह है सार्वजनिक संपत्ति को बर्बाद करने से रोकथाम करने वाला कानून हाल में सीए ए और एनआरसी पर बहुत बातें हुई खास करके उत्तर प्रदेश में सरकार ने सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाने वालों से पैसे वसूलने के लिए नोटिस अभी भेजी है। 2017 में इस कानून के तहत 7910 मामले दर्ज किए जबकि 2018 में मामले में 7127 मामले ही दर्ज की जा सके।
अगर राज्यवार आंकड़ों का विश्लेषण करें तो पता चलेगा कि उत्तर प्रदेश में पहली बार दंगाइयों पर बल का प्रयोग नहीं हुआ है 2018 में उत्तर प्रदेश में दंगाइयों पर बल प्रयोग की 2388 घटनाएं हुई थी जबकि तमिलनाडु में 2230 और हरियाणा में 415 घटनाएं 2017 में भी उत्तर प्रदेश बहुत पीछे नहीं था। 2017 में इस राज्य में 1933 बल प्रयोग की घटनाएं इस अवधि में हरियाणा में 2562 और तमिलनाडु में 1790 घटनाएं हुई इन कारणों को देखते हुए यह स्पष्ट होता है की हमारे देश में जब-जब आर्थिक अभाव बढ़ा है तब तब सरकार के खिलाफ जनता में गुस्सा भड़का है।
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