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Monday, July 13, 2020

अब हॉट स्प्रिंग से भी वापसी



अब हॉट स्प्रिंग से भी वापसी


गलवान घाटी से पीछे हटने के एक दिन बाद अब चीनी और भारतीय सेना हॉट स्प्रिंग के गोगरा क्षेत्र से लौट रही है। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति के लिए दोनों पक्षों में समझौते हुए और इसके बाद वहां से वापसी शुरू हो गई। लेकिन चीन पर भरोसा मुश्किल है 1962 में पंचशील के परदे के पीछे से चीन ने भारत के पीठ में छुरा भोंक दिया और इस धोखेबाजी से नेहरू इतने टूटे कि अवसाद के कारण 2 वर्ष के बाद इस दुनिया को छोड़ कर चले गए। चीन जब भी गले मिलता है तो बघनखे छिपाकर मिलता है। चीन भारत से संबंधित जितने पड़ोसी हैं सबको भारत के खिलाफ मानसिक रूप से तैयार कर रहा है। पाकिस्तान तो खैर भारत का जन्मजात दुश्मन है ही नेपाल भूटान पर भी वह जवाब दे रहा है। वैसे तो वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दोनों देश अपने निर्माण कार्य को रोक देगा। आश्चर्यजनक रूप से चीन तैयार हो गया है लेकिन उस पर भरोसा नहीं है। भारतीय सेना भी वहां से पीछे जा रही है ताकि दोनों के बीच थोड़ी दूरी बढ़ जाए और झड़प की गुंजाइश कम रहे।


हालांकि, भारत और चीन के बीच मोर्चाबंदी उपक्रम करने की प्रक्रिया का असर हमारी सेना या दुश्मन की सेना की सतर्कता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। भारत को विवादास्पद सीमा पर नई हकीकत से निपटने के लिए तैयार रहना होगा। यहां पिछले पांच दशक के बाद बर्फ पर खून फैल गया था। इसका सबसे बड़ा कारण था दोनों से देशों की सेना में भरोसे की भारी कमी। दोनों देशों की सेना के कोर कमांडरों में बातचीत के पहले दौर के बाद दोनों देशों की सेना गलवान में पीछे हटने लगी थी लेकिन चीन की एक निगरानी चौकी के स्थल को लेकर बात बढ़ गई और इतनी बड़ी कि 15 जून को हिंसक संघर्ष हो गया जिसने भारतीय सेना के 20 जवान शहीद हो गए और चीन के कितने जवान मारे गए इसकी कोई खबर नहीं है। अब फिर दोनों देश अपने-अपने मोड़ के हटा रहे हैं लेकिन भारतीय सेना चीन की सेना के हर कदम की निगरानी कर रही है और आश्वस्त होने के बाद ही पीछे की ओर कदम उठा रही है। इसका मतलब है कि मोर्चाबंदी खत्म करने के लिए जो प्रक्रिया आरंभ हुई है उसमें काफी वक्त लगेगा। क्योंकि का जो मनोविज्ञान है उसे देखते हुए फौज का पीछे हटना और वहां टिके रहना एक दिवास्वप्न भी हो सकता है।





दोनों देशों में जो शांति की प्रक्रिया आरंभ हुई है दोनों ने अलग-अलग बयान जारी किए हैं। भारत की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि दोनों देशों के बीच शांति बनाए रखने के लिए और सीमा पर शांति जरूरी है। बयान में कहा गया है कि दोनों देशों की सीमा पर शांति बनी रहे और दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा का सम्मान करना चाहिए। आने वाले दिनों में ऐसा ना हो इसलिए आपसी सहमति तैयार की गई। चीन द्वारा दिए गए बयान भाषा भारत से अलग है। उधर चीन के बयान कहा गया है कि वह अपनी संप्रभुता बनाए रखने के लिए शांति बहाल करना चाहता है।





उधर चीन को लेकर भारत में विचित्र स्थिति है। पहली बार भारत मनोविज्ञान के बारे में कुछ समझ में नहीं आ रहा है। यह पता लगाना मुश्किल है कि भारतीय नेतृत्व चाहता क्या है क्या चीन के साथ संघर्ष चाहता है यह सामा कानून खत्म करना चाहिए और भावी रणनीति है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन का नाम लेकर अभी तक कुछ कहा नहीं है। उन्होंने जो कुछ भी कहा है उसे दोहराने की हिम्मत किसी भारतीय नेता में नहीं है। भारतीय सैनिकों की हौसला अफजाई के लिए और भारतीय सेना के बलिदान और पराक्रम की प्रशंसा में कह दिया कि भारतीय सीमा में प्रवेश नहीं किया है और ना भारत की जमीन पर कब्जा किया है। इसके अंधेरे पक्ष को लेकर काफी टीका टिप्पणी हुई और कई नेताओं ने तो इसे सूचना छिपाना कहा। लेकिन इसका एक प्रत्यक्ष असर दिखाई पड़ रहा है चीन के राष्ट्रपति ने अब तक भारत के खिलाफ कुछ नहीं कहा। इसे देखते हुए मोदी जी की कूटनीति की प्रशंसा करनी होगी। मोदी जी ने जिस तरह से मामले को हैंडल किया उसे अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो की प्रशंसा मिली और दबी जुबान से ही सही फ्रांस ने भी भारत की प्रशंसा की। डोभाल के साथ श्री प्रतिनिधि की बातचीत के बाद जो तनाव कम हुआ इसका मुख्य कारण था कि चीन यह समझ गया भारत के साथ दुनिया के कई बड़े दोस्त की तरह खड़े हैं। गौर करें चीन के साथ तब कौन खड़ा हुआ जिसने एलएसी पारकर हमले की बात की ,शायद कोई नहीं। यहां तक कि चीनी कर्ज के बोझ से दबा लाओस और पाकिस्तान ने भी सामने आकर कोई बात नहीं की। इसके विपरीत भारत ने दुनिया के कुछ सबसे शांत और सबसे अशांत खिलाड़ियों को अपने साथ खड़ा कर लिया। चीन के हाथ पांव फूल गए और उसने लौटने में ही कुशलता समझी। यह नरेंद्र मोदी की कूटनीति का कमाल है।

चीन के तंबू उखड़े



चीन के तंबू उखड़े


अगर समरनीतिक भाषा में कहें तो चीन के तंबू नहीं पैर उखड़ गए हैं। 15 तारीख के हमले के बाद 61 दिन के दरमियान चीन बड़ी-बड़ी बातें कर रहा था कभी नेपाल के मुंह माध्यम से, कभी पाकिस्तान के माध्यम से और कभी भूटान के माध्यम से। हालांकि चीन का मनोविज्ञान देखते हुए इस बात पर भरोसा नहीं हो रहा था कि चीन इन बड़ी-बड़ी बातों पर कायम रहेगा। क्योंकि आरंभ से ही एक व्यापारिक देश है। चीन जितनी तरक्की कर सकता था उसने व्यापार के माध्यम से ही किया। भारत ने खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया। उसके डिजिटल पैंतेरे को चारों खाने चित कर दिया तथा अन्य व्यापारिक उद्देश्यों के आगे अवरोध खड़े कर दिए। चीन की आवाज बदल गई। रविवार को भारतीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीनी प्रतिनिधि वांग ई में टेलीफोन पर लंबी बातचीत के बाद चीन गलवान घाटी से अपनी फौज हटाने को तैयार हो गया। हालांकि भारतीय सेना को पूरी तरह सचेत रहने के लिए कहा गया है और ज्यादा आशावादी नहीं बनने के लिए कहा गया है। चीनी सेना भारतीय सीमा में लगभग 8 किलोमीटर घुस आयी थी और उसे लौटते हुए देखा गया है। फौजें पीछे हटाने के मसले पर यह दूसरे दौर की बातचीत थी। पहले दौर की वार्ता 6 जून को हुई थी और उसके बाद 15 जून को चीन की सेना ने भारत पर हमला कर दिया। इस हमले को नाकाम बनाने की कोशिश में भारत के 20 जवान शहीद हो गए। पूरी प्रक्रिया काफी लंबी चली। चीन का चरित्र कुछ ऐसा है अभी उसके पीछे हटने पर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है और 15 जून की घटना की पुनरावृत्ति नहीं होगी। भारत और चीन 3 दिनों के बाद इसकी जांच करेंगे कि समझौतों पर पूरी तरह अमल हुआ है या नहीं


लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा का पश्चिमी हिस्सा पड़ता है और गलवान से लेकर हॉट स्प्रिंग तक कई ऐसे स्थल जहां से चीन अप्रैल-मई में भारतीय सीमा में घुसपैठ कर चुका है। अभी जो फौज हटाने का सिलसिला चालू हुआ है उसके अंतर्गत चीन 1.5 से लेकर 2 किलोमीटर पीछे लौटेगा जबकि भारत को इतना पीछे नहीं लौटना होगा क्योंकि भारतीय सेना अपनी ही भूमि पर थी। दोनों देश की सेना बफर जोन के लिए तैयार है। इस जोन में कोई भी पक्ष नया ढांचा नहीं बनाएगा या गश्त नहीं लगाएगा। इससे जाहिर होता है चीनी सेना भारत के मुकाबले वास्तविक नियंत्रण रेखा के ज्यादा करीब है। इस समझौते में एक विवाद का बिंदु दिख रहा है वह की इस बात पर कोई समझौता नहीं हुआ है बफर जोन कब तक रहेगा। विशेषज्ञों का मानना है यह विश्वास बहाली का एक उपाय है और अप्रैल के आरंभ की स्थिति पर आने के लिए एक समय है। लेकिन एक दिलचस्प बात यह है या पीछे लौटना उस समय हुआ है जब गलवान घाटी में पानी का बहाव तेज हो गया है। अभी वहां बर्फ पिघल रही है उससे पानी के बहाव में दीजिए जिसके फलस्वरूप दोनों देशों इस सेना के लिए वहां रह पाना कठिन है। इस पूरी स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि इसमें चीन का एक गेम प्लान है। वह चाहता है कि शायोक गलवान नदी के आसपास भारत कोई निर्माण नहीं कर सके क्योंकि नदी की तेज धार के कारण ऐसा करना फिलहाल मुश्किल है।





सीमा समस्या को हल करने की गरज से भारत और चीन में मई से ही कूटनीतिक तथा सैन्य वार्ताएं चल रही हैं। रविवार को टेलीफोन पर डोभाल और वांग में बातचीत हुई। इसमें जो सबसे बड़ी बात तय हुई वह थी आंखे दिखाने के बदले रणनीतिक आकलन किया जाए और दोनों देश एक दूसरे को विकसित होने का अवसर प्रदान करें। लेकिन चीन अक्सर जो बोलता है वह करता नहीं है। 1962 में जो जंग हुई उसके पहले वह लगातार हिंदी चीनी भाई भाई कहता रहा था इसलिए भारत को हमेशा सतर्क रहना होगा और सीमा की नई वास्तविकता से निपटने के लिए तैयार रहना होगा। दोनों देशों में कमांडर स्तर की वार्ता के बाद पीछे हटने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी लेकिन 15 जून को हिंसक झड़प हो गई। गलवान घाटी में जो खून बहा उसका घाव अभी ताजा है और उसे भरने में वक्त लगेगा। तनाव कम करने की इस प्रक्रिया में भारत को बहुत ज्यादा सतर्क रहना पड़ेगा और पूरी प्रक्रिया में काफी समय लगेगा। चिंता इस बात की भी है कि उल्टी दिशा में चल सकता है और इसलिए भारत को अपनी फौज कम करने के बारे में सोचना नहीं चाहिए। बेशक, समझौते की शर्तों के अनुसार सेना की संख्या और भारी हथियार हटाने होंगे लेकिन तुलनात्मक तौर पर यह भी देखना होगा उसने कितना हटाया है। डोभाल और वांग 2018 और 19 में मिल चुके हैं उस समय भी ऐसे ही समझौते हुए लेकिन चीन ने उसे भंग कर दिया और 20 भारतीय सैनिकों को अपनी जान देकर इसकी कीमत चुकानी पड़ी। इसके बाद 17 जून को विदेश मंत्री एस जयशंकर की भी वांग ई से बातचीत हुई थी। अभी हाल के समझौते के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि दोनों पक्ष चरणबद्ध तरीके से पीछे हटेंगे वास्तविक नियंत्रण रेखा का सम्मान करेंगे। भविष्य में कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाएंगे जिससे यथास्थिति बदले। लेकिन, चीन पर पूरी तरह भरोसा करना उचित नहीं होगा।

Monday, July 6, 2020

चीन ने बदला पैंतरा



चीन ने बदला पैंतरा


अब चीन ने भूटान की पूर्वी सीमा पर दावा करना शुरू किया है और इससे दिल्ली की बेचैनी बढ़ गई है। पूर्वी भूटान के ट्रेसीगैंग इलाके में विकसित किए जाने वाले एक वन्य जीव अभयारण्य पर आपत्ति जताते हुए दावा किया है कि यह क्षेत्र उसका है। भूटान ने इसके लिए 1992 में ग्लोबल एनवायरमेंटल फैसिलिटी (जीईएफ) से समझौता किया था। यह एक अमेरिकी फर्म है। भूटान में चीन के दावे पर आपत्ति जताई है और जीईएफ ने परियोजना को पारित कर दिया है। इस परियोजना की कार्रवाई के बाद प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है चीनी प्रतिनिधि ने इस पर आपत्ति जताई है। पता चला है कि भूटान चीन को अपनी आपत्ति के बारे में बता दिया है ।पता चला है कि भूटान और चीन ने सीमा मामले पर 24 बार बातें की अब अगर अगली सीमा वार्ता में चीन इस मामले को उठाता है तो भूटान इसका प्रतिरोध करेगा। यह वन्यजीव अभयारण्य भूटान के भीतरी भाग में है और इसके अंतर्गत 650 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र है। चीन ने इस पर पहले कभी आपत्ति नहीं की थी अब उसने लद्दाख की घटना के बाद शायद भारत पर दबाव बनाने के लिए आपत्ति शुरू कर दी है। यहां भी उसका वही पैंतरा है कि इस क्षेत्र में अभी सीमा का निर्धारण नहीं हुआ है और पूर्वी तथा पश्चिमी सीमा को लेकर अक्सर विवाद होता रहा है यह कोई नया विवादास्पद क्षेत्र नहीं है। चीन सदा बातचीत के लिए तैयार है। चीन ने कहा है की इस मामले में किसी तीसरे पक्ष को कुछ कहने की जरूरत नहीं है। चीन का इशारा शीशे भारत की ओर है। अब इधर भारतीय विदेश मंत्रालय चीन के दावे पर बहुत बारीकी से नजर रखे हुए। चीन और भूटान के बीच केवल उत्तरी और पश्चिमी क्षेत्र में सीमा को लेकर विवाद है। यह सब कोई जानता है कि चीन और भूटान में 1984 से लेकर 2016 के बीच 24 बार बैठकें हुई हैं। 2017 से दोनों देशों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई है। यह बता देना जरूरी है कि 2017 में ही डोकलाम को लेकर भारत से विवाद हुआ था और उसी के बाद दोनों देशों के बीच वार्ता रुक गई। अब इधर भारत नेपाल के साथ सीमा विवाद में उलझा हुआ है भूटान की बात एक नया मोर्चा खोल दिया। जानकारों का मानना है कि चीन ने भूटान के साथ विवाद पैदा कर भारत को परेशान करना चाह रहा है।


ध्यान देने की बात है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत और चीन की फौज में गुत्थम गुत्था 2 महीने हो गए। पहली बार 5- 6 मई को गलवान घाटी में झड़प हुई थी और उसके बाद दोनों देशों के बीच सेना का जमावड़ा हो गया। आज जो दिखाई पड़ रहा है कि यह डोकलाम के संघर्ष से लंबा खींचेगा और उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग ये बीच में समझौतो को निरस्त कर देगा। 30 जून को कोर कमांडर स्तर की वार्ता हुई थी और इससे आवाज नहीं बदले दोनों अपनी अपनी जगह जमे हुए हैं। चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर एक तरफा फैसला ले लिया है और भारत का कहना है कि चीन पीछे लौट जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लद्दाख में फौजियों को संबोधित किया और कहा कि 1962 की पराजय जैसी हालत नहीं होगी। सैन्य स्तरीय वार्ता से कोई नतीजा निकलता नहीं दिख रहा है। सेना की तैनाती को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है और अब और सेना वहां जा रही है। कूटनीतिक स्तर पर भी बातचीत कोई नतीजा नहीं दिख रहा है। चीनी एप्स पर पाबंदी और भारत द्वारा उसके खिलाफ उठाए गए कदमों कभी कोई प्रभाव बीजिंग पर पड़ता नहीं दिख रहा है।





दोनों देशों को अपने रणनीतिक आकलन में लग जाना चाहिए। भारत के लिए जरूरी है कि वह अपनी फौज का आकलन कर ले जिससे चीन पर दबाव दिया जा सके और चीन को भी चाहिए कि वह संबंधों के स्थाई तौर पर खराब होने से रोकने के लिए कोई उपाय करे। दोनों देश मैं अगली बातचीत जल्दी होने वाली है और हो सकता है कि कोई न कोई हल निकल आए जिससे दोनों देश की सेना आमने सामने एक दूसरे को डराने के काम से बाज आए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी लद्दाख यात्रा के दौरान यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत डरने वाला नहीं और चीन विस्तारवाद की अपनी नीति को छोड़ दे। अगर चीन अपनी हरकत से बाज नहीं आता है तो केवल एक ही रास्ता रह जाता है वह है युद्ध का। चीन भी यह बखूबी समझता होगा आज का भारत 1962 वाला नहीं है इसलिए वह भी नहीं चाहेगा जंग हो। शांति एकमात्र रास्ता है जिससे दोनों देश के लोग अपने संबंध को बनाए रखें और विकास की राह पर चलते रहें। अगर चीन अपने परमाणु बम पर ऐंठा हुआ है तो उसकी गलती है।

चीनी हमले के आईने में प्रधानमंत्री का लद्दाख दौरा



चीनी हमले के आईने में प्रधानमंत्री का लद्दाख दौरा


गलवान घाटी में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के हमले के बाद ऐसा लगने लगा है कि दशकों की शांति अब समाप्त हो गई। वस्तुतः भारत चीन के बीच समझौते ऐसे हैं जैसे भारत को प्रतिक्रियात्मक स्थिति उलझा देना है। ऐसा लगता है कि मोर्चाबंदी के सदा एक कदम पीछे है और चीन के उकसावे तथा गलत सूचनाओं के जंजाल में भारत हमेशा फंस जाता है। इसमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है और चिंताजनक भी किस सिद्धांत रूप से भारत और चीन के बीच एक समझौता हुआ जिसके तहत वास्तविक नियंत्रण रेखा से 2 किलोमीटर के दायरे में इसी प्रकार के हथियार का उपयोग नहीं करना है भारत और चीन के लिए सीमा अवधारणा अलग-अलग है उसी तरह हथियार की भी अवधारणा पृथक है। इन सारी स्थितियों में सबसे बड़ी बात क्या है कि चीन में वास्तविक नियंत्रण रेखा का फिर से निर्धारण के प्रति अनिच्छा जताई है ताकि भारत का संतुलन बिगड़ता रहे यहां तक कि उसने इस मामले में इसके पहले कभी बातचीत भी नहीं की है। नतीजा यह हुआ है कि दशकों से सीमा विवादास्पद रही है और हम उसे शांति समझते रहे हैं और सीमा के प्रति लापरवाह रहे हैं। यह पहला अवसर है प्रधानमंत्री अग्रिम मोर्चे पर खुद गए और हाल की झड़प में घायल सैनिकों से अस्पताल में जाकर मुलाकात की। बेशक इसका समर नैतिक मूल्य बहुत कम है परंतु हमारे सैनिकों का इससे मनोबल तो जरूर बढ़ेगा। भारत का सैनिक इतिहास देखें तो सीमा की स्थिति का पता चलेगा। 1962 के युद्ध के 1 साल के बाद चीन ने सिक्किम में सीमा पर निर्माण कार्य शुरू किया। क्योंकि काम चीन की तरफ हो रहा था इसलिए भारत ने कुछ किया नहीं। इसके बादअभी भारत 1965 के पाकिस्तान युद्ध से उबरा ही था कि 1967 में नाथूला में भारतीय सीमा में घुसकर चीन ने अचानक हमला कर दिया। महीनों के चीनी मोर्चाबंदी और हाथापाई कमांडर ने सीमा पर कटीले तारों की लगा दी ताकि आमने सामने की मुठभेड़ ना हो सके। खंभे गाड़े जाने लगे कि चीन की ओर से चेतावनी आने लगी। भारतीय सेना अपनी सीमा के भीतर थी और बिल्कुल खुले में थी। वहां चीनी सैनिक भी पहुंच गए और बाड़ लगाने का काम रोकने की कोशिश करने लगे। अचानक चीन की तरफ से फायरिंग शुरू हो गई। भारतीय सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट कर्नल रायसिंह को सीने में गोलियां लगीं लेकिन वह तब तक नहीं गिरे जब तक उन्होंने उस चीनी अधिकारी का खात्मा नहीं कर दिया जिसने उन को चेतावनी दी थी और फिर उसकी मशीन गन मशीन भी छीन ली। कर्नल राय सिंह उस हमले से बच गए। चीन को अपनी सेना के लोगों के मरने की परवाह नहीं 5 घंटे तक युद्ध चला और 80 भारतीय सैनिक शहीद हुए तथा 300 चीनी सैनिक मारे गए लेकिन भारत की सेना ने नाथूला को नहीं जाने दिया। यह 9 सितंबर की घटना है। इसी के कुछ दिन बाद 1 अक्टूबर को फिर मामला उस समय गरम हो गया जब चीनियों ने समीप के ही चो ला कब्जा कर लिया और भारतीय सैनिकों से हाथापाई के दौरान एक चीनी सैनिक ने एक भारतीय जवान को संगीनों से घायल कर दिया। वहां तैनात गोरखा ब्रिगेड के जवान आग बबूला हो गए और खुखरी से चीनियों पर हमला कर दिया। चीनी भाग खड़े हुए। भारतीय सैनिकों ने उस स्थान को फिर से अपने कब्जे में ले लिया। वास्तविक नियंत्रण रेखा कायम रही।


1967 की घटना के समय पूर्वी कमान जनरल मानेक शा के हाथों में थी और वे सेना प्रमुख की भूमिका निभा रहे थे। वहां उन्होंने लोगों के सवाल के जवाब में कहा मैं अब बताऊंगा उनसे कैसे निपटा जाएगा। मानेक शा की बात सुनकर चीनी हतप्रभ रह गए और जब उन्होंने देखा वहां तैनात भारतीय फौज को अतिरिक्त भेजी जा रही है वे समझ गए कि मामला गड़बड़ होगा उन्होंने सिक्किम का नाथू ला खाली कर दिया।


नाथू ला और गलवान की मोर्चाबंदी में एक बात समान है कि चीनी वहां लगातार गश्त कर रहे हैं कर रहे हैंऔर भारतीय सैनिकों को धमका रहे हैं ताकि भारतीय फौज के जवान डर जाए लेकिन ऐसा नहीं होगा उन्होंने भी जैसे को तैसा करना शुरू कर दिया है। हमारे सैनिकों ने गलवान में जो वीरता दिखाई वह तारीफ के काबिल थी। भारत के सैनिक इतिहास में इस घटना का जिक्र स्वर्ण अक्षरों में किया जाएगा। अब जरूरी है हमारे नेता कुछ करें और इसी के तहत प्रधानमंत्री ने पहला कदम उठाया है। इसके बाद जरूरी है कि सुरक्षा संबंधी विदेश नीति में बदलाव किया जाए। अब हमें 70 साल पुरानी इस नीति को त्यागना होगा वीरता पर आधारित तैयार करनी होगी।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लद्दाख जाने के बाद इस दिशा में परिवर्तन साफ दिखाई पड़ रहा है। भारतीय सेना ने लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों तथा अन्य परिवहन बेड़ों की तैनाती बढ़ाने शुरू कर दी है। वायु सेना ने भारत की सैन्य तैयारियों को और मजबूत करने के लिए कई अग्रिम मोर्चे तक भारी सैन्य उपकरण और हथियार पहुंचाने के लिए सी 17 जो मास्टर 3 परिवहन विभाग और सी130 जे सुपर हर्कुलस के बेड़े भी लगाया है। एक तरफ सैनिक तैयारियां चल रही है और दूसरी तरफ कूटनीतिक एवं राजनीतिक हवा भी गर्म की जा रही है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में साफ कहा उदारवाद का जमाना गया तथा विकास का जमाना है। हालांकि उन्होंने चीन का नाम नहीं लिया लेकिन यदि गुंजाइश नहीं छोड़ी है कि कयास लगाया जा सके कि निशाना किस की ओर है। इसके बाद उन्होंने खोल कर कहां की हमें मालूम है इसके खतरे क्या हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन के विस्तार वादी इरादों को सारी दुनिया समझ चुकी है और अब चीन नया सिरदर्द बन गया है। प्रधानमंत्री ने कहा लद्दाख तो चीन के लिए छोटा सा मामला है बड़ा मामला तो 83000 वर्ग किलोमीटर वाला अरुणाचल प्रदेश है और अगर वह सोच रहा है अरुणाचल को कब्जे में लेगा तो 21वीं सदी में ऐसी बातें सोचने का मतलब है आपको अपने दिमाग का इलाज कराने जरूरत है। जबरन कब्जा कभी नहीं किया जा सकता। की सलाह से चीन चौंक गया। लेकिन मोदी की इस बात से देश की सेना और देश की जनता का मनोबल तो बढ़ा ही है। बढ़े हुए मनोबल से तो कुछ भी किया जा सकता है। आजादी के बाद किसी प्रधानमंत्री ने इतने सख्त शब्दों में चीन को नहीं चेताया।

Saturday, July 4, 2020

नेपाल की राजनीति में तूफान



नेपाल की राजनीति में तूफान


नेपाल की राजनीति में तूफान आया हुआ है। गुरुवार को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने प्रधानमंत्री पद छोड़ने के पार्टी के दबाव को मानने से इंकार कर दिया और दोनों सदन की बैठक स्थगित कर दी। स्थगन के पहले उन्होंने दोनों सदन के अध्यक्षों से भी परामर्श नहीं किया। उनके इस कदम से माओवादी नेता अत्यंत गुस्से में है। पूर्व प्रधानमंत्री एवं माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड नए राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी से भेंट की और प्रधानमंत्री के इस और संवैधानिक हरकत पर विरोध किया तथा उनसे कहा कि वे इस पर कार्रवाई करें। प्रचंड और ओली दोनों सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष हैं। पार्टी को टूटने से बचाने के लिए केंद्रीय समिति की बैठक शनिवार तक टाल दी गई है। ओली ने टिप्पणी की थी कि नेपाल के राजनीतिक भारत के साथ मिलकर उनकी सरकार को चाहता है। उनकी इस टिप्पणी पर सत्तारूढ़ दल में बवाल हो गया। पार्टी में ओली के कामकाज को लेकर भारी विवाद है खासकर भारत के साथ संबंध को लेकर। नेपाल के नए नक्शे पुष्कर संविधान संशोधन विधेयक को प्रस्तुत किए जाने कई दिन पहले ओली ने कहा था कि काठमांडू के कुछ नेता भारत के साथ मिलकर उन्हें पद से हटाना चाहते हैं। उनकी इस टिप्पणी से गुस्साए लोग साफ-साफ कहने लगे कि उन्होंने पार्टी को जटिल स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। उन्हें पद छोड़ देना चाहिए। यह मांग जैसे-जैसे बढ़ती गई और उन पर दबाव बढ़ता गया उन्होंने वहां की संसद के दोनों सदनों की बैठक स्थगित कर दीं। अनुमान है कि कुछ विद्रोही नेताओं को मंत्री पद से हटाकर प्रधानमंत्री खुद अपनी पसंद के नेताओं को लाएंगे और यह काम जल्दी होने वाला है। ओली का कहना है कि प्रचंड ने उनकी पीठ में छुरा मारा है। ओली ने हर पैंतरा आजमाया है और दोनों देशों में सत्ता के गलियारे में यह चर्चा है कि सरकार यह सब चीन के समर्थन से कर रही है। इन बातों में तो सच्चाई हो या ना हो लेकिन चीन की छाप काठमांडू की हर गली में दिखाई पड़ती है। चाहे वह धर्म हो, अध्यात्म या फिर रहन सहन और खान पान सब जगह चीन की मौजूदगी के संकेत मिलते हैं। चीन की नेपाल में रुचि लगभग डेढ़ दशक से दिखाई पड़ती है लेकिन जब मधेसी आंदोलन हुआ तो चीन की दिलचस्पी और बढ़ गयी। उसके अफवाह तंत्र ने यह हवा फैलाई कि सब भारत का किया धरा है। इससे नेपाल में नाराजगी की लहर फैल गई। नेपाल और भारत में रोटी बेटी का रिश्ता होने के बावजूद नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में और काठमांडू अभिजात्य वर्ग में भारत के प्रति शंका दिखाई पड़ने लगी। अचानक 2016 में नोटबंदी हुई उससे नेपाल और नाराज हो गया। भारत नेपाल से आए चलन से बाहर हुए नोटों को बदलने से लगातार टालता रहा। यह भारत के प्रति नेपाल की नाराजगी का मुख्य कारण बताया जाता है। अभी जो कुछ नेपाल में हो रहा है उससे साफ लगता है कहीं न कहीं चीन की भूमिका है। वह भारत से नेपाल के संबंध को कमजोर कर अपने हितों को साधना चाहता है। नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री का चीन से नजदीकी रिश्ता है यह सब जानते हैं लेकिन अभी जो हालात पैदा हुए हैं उससे साफ जाहिर हो रहा है कि ओली अलग-थलग पड़ गए। 2016 में प्रचंड ने ओली को सत्ता से हटाया था उस समय चीन का सरकार समर्थित पत्र ग्लोबल टाइम्स ने लिखा था कि काठमांडू वैसे बीजिंग के साथ का मौका गंवा सकता है। इससे साफ जाहिर होता है कि चीन नेपाल की राजनीति को कैसे देखता है।


इसके पहले भी भारत और नेपाल में दो एक बार जिच पैदा हुई थी। इसे बातचीत के जरिए और कूटनीतिक समझ बूझ के साथ सुलझा दिया गया। 1960 की घटना है जब राजा महेंद्र ने भारत को यह कह कर डाल दिया कि चीन द्वारा बनाई गई सड़क नेपाल और तिब्बत को जोड़ने के लिए है और इसका महत्व केवल विकास के लिए बाकी कुछ नहीं और इस सड़क का रणनीतिक उद्देश्य तो बिल्कुल नहीं है। 1980 में जब महाराजा विरेंद्र नेपाल में सत्तारूढ़ तो उन्होंने चीन द्वारा सड़क बनाने के एक ठेके को रद्द कर दिया था। 210 किलोमीटर लंबी सड़क कोहलपुर से बनबसा के बीच थी और भारतीय सीमा के करीब थी। बाद में महाराजा विरेंद्र में यह ठेका भारत को दे दिया। इससे पता चलता है नेपाल के पूर्व शासकों ने भारत से कैसे संबंध को साध रखा था और जब चीन और भारत के हित टकराते थे तो वह भारत के पक्ष में फैसला देते थे। लेकिन हालात तब बदले जब 2005 में राजशाही को समाप्त करने के लिए नेपाल के आठ राजनीतिक दलों के बीच 12 सूत्री समझौता हुआ। इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वालों में माओवादी भी शामिल थे। भारत नेपाल की अंदरूनी सियासत का एकमात्र कारक तत्व था। लेकिन जब भारत ने नेपाल को हिंदू राष्ट्र से एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बनाने में खुलकर सहायता की तो नेपाल में उसके चाहने वाले धीरे-धीरे कम होने लगे । नेपाल की आंतरिक राजनीति में भारत ,अमेरिका और यूरोपीय यूनियन की बढ़ती पकड़ से चिंतित हो गया और उसने नेपाल में निवेश बढ़ाना शुरू कर दिया तथा साथ ही उस पर दबाव बनाने लगा।





अब यहां दो महत्वपूर्ण प्रश्न उभरते हैं। जब नेपाल से राज शाही खत्म हुई थी तो भारत मानता था उसकी पकड़ बढ़ेगी। लेकिन हुआ इसका विपरीत चीन के पैर वहां जमने लगे और दूसरा प्रश्न कि क्या नेपाल में भारत के लिए वातावरण तैयार करने के उद्देश्य से कोई संगठन है या नहीं। दोनों प्रश्नों के उत्तर अभी तक नहीं मिल रहे हैं। उधर ओली की सांस भी फूल गई है और कोई पैंतरा काम नहीं कर रहा है यहां तक कि हर वक्त जब ओली ऐसी स्थिति से दो-चार होते थे तो राष्ट्रवाद का पत्ता फेंका करते थे इस बार वह भी नहीं काम आ रहा है और ना भारत ही उन्हें कोई मदद कर रहा है। ऐसा लगता है पार्टी विभाजन के कगार पर है और उन्हें सत्ता से हटाया जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो भारत के पड़ोस में एक और चीन समर्थक देश खड़ा हो जाएगा और भारत की घेराबंदी बढ़ जाएगी। इसलिए भारत को अभी से सचेत हो जाना चाहिए।

Friday, July 3, 2020

चीनी सीमा पर गर्म हो रहा है मामला



चीनी सीमा पर गर्म हो रहा है मामला


भारत में चीन के लगभग 59 एप्स पर प्रतिबंध लगा दिया। भारत के साथ ही अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से लेकर जापान तक कई देशों ने इस पाबंदी का समर्थन किया है। अमरीकी विदेश मंत्री माइकल पॉम्पियो ने बुधवार को कहा कि भारत ने जो किया वह सही किया है और इससे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के निगरानी का एक तंत्र खत्म हो गया। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरीसन ने अपनी सुरक्षा रणनीति का खुलासा किया और उसमें भारत चीन की मोर्चाबंदी का भी जिक्र किया। ऑस्ट्रेलिया से लेकर जापान तक, राष्ट्र संघ से लेकर आसमान तक और यूरोप में एक ढीला ढाला रणनीति संबंध है और सब के सब भारत के कदम का समर्थन कर रहे हैं। चीन ने खुलकर भारत के इस कदम पर कुछ नहीं कहा लेकिन चुपचाप 20000 और सैनिक पूर्वी लद्दाख में भेज दिए। चीन की इस गतिविधि से ऐसा लगता है मामला जल्दी सुलझेगा नहीं। क्योंकि भारत पर दबाव बनाने की चीन की चाह पर पाकिस्तान ने भी गिलगित बालटिस्तान में नियंत्रण रेखा के निकट 20000 सैनिकों को तैनात कर दिया है। चीन के इस कदम को देखते हुए दुनिया के कई देशों में भारी आशंका उत्पन्न हो गई है और सैन्य विशेषज्ञ यह कयास लगाने लगे हैं इस विवाद के कारण मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देशों के लिए 17 उत्पन्न हो रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने इसे वर्तमान समय की चुनौती के रूप में बताया है और उन्होंने कहा कि वे सुनिश्चित करना चाहेंगे उनके साधन सही जगह पर मौजूद हैं या नहीं। अमेरिका का इशारा यूरोपियन एलाइज की तरफ है। यहां उल्लेखनीय है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने जर्मनी और जापान पर कब्जा किया था बाद में कब्जा तो रहा नहीं लेकिन दोनों देशों में अमेरिकी सेना की टुकड़ियां अभी मौजूद हैं। राष्ट्र संघ के आंकड़ों के अनुसार जर्मनी में लगभग 40000 अमेरिकी सैनिक और 15000 असैनिक मौजूद हैं। अमेरिका इन्हें हटाना चाह रहा है। पहले इन्हें पोलैंड भेजने की बात थी। यह चीन के लिए चेतावनी है। अमेरिका उसे यह बताना चाह रहा है कि वह एशिया प्रशांत की ओर मुड़ रहा है। ट्रंप लगातार चीन के खिलाफ बातें कर रहे हैं। हालांकि भारत इन बातों को गंभीरता से नहीं ले रहा है क्योंकि अमेरिकी सेना के पास समुद्र में लड़ने या बर्फीले पहाड़ों पर लड़ने की ट्रेनिंग नहीं है। हो सकता है अमेरिका अपने देशवासियों का ध्यान किसी एक मुद्दे से हटाकर दूसरी ओर करना चाह रहा है ।दूसरी तरफ चीन अपनी रणनीति क्षमता को बढ़ाना उसने अपनी अति महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव के तहत विश्व के किस्से में बंदरगाह बना रखा है बंदरगाहों को सड़कों से जोड़ रहा है ताकि वह अपनी सेना को जल्दी से मोब्लाइज कर सके। बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव चीन की अरबों डालर की परियोजना है जो 2013 में जिन पिंग सत्ता में आने के बाद शुरू हुई। इस परियोजना के तहत दक्षिण पूर्वी एशिया , मध्य एशिया, खाड़ी क्षेत्र, अफ्रीका और यूरोप के हिस्सों को जोड़ना है। इसके माध्यम से जमीन से लेकर समंदर तक सड़कों का जाल बिछाने वाला है।





भारत सरकार द्वारा पिछले वर्ष जम्मू और कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने और अनुच्छेद 370 को खत्म किए जाने के बाद लद्दाख सीधे केंद्र के अधीन आ गया। अब क्योंकि चीन ने अक्साई चीन पर कब्जा कर रखा है और यह भू भाग भैौगोलिक रूप से लद्दाख का हिस्सा है और चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना इसी रास्ते से गुजरती है तो इसे लेकर झगड़ा तो पड़ेगा ही क्योंकि चीन की विस्तार वादी नीति को तेज आघात लगा है। भारत सरकार के इस कदम से उसके मकसद के सामने एक बड़ी बाधा उत्पन्न हो गई है। नरेंद्र मोदी के शासनकाल का सबसे सूझबूझ भरा कदम है। चीन यह रणनीतिक तैयारी किसी युद्ध की मंशा से बल्कि सीमा पर तनाव बढ़ाकर दमखम दिखाने की चाल है। चीन एक तरह से भारत को सीमा विवाद के माध्यम से धमकाने की कोशिश कर रहा है तरह-तरह के पैंतरे रहा है उन पैतरों में सीमा पर फौज की तैनाती और फिर बातचीत के बाद उसे थोड़ा पीछे हटा लेने की आड़ में वह साजो सामान जमा करने तथा निर्माण संबंधी तैयारियां मजबूत करने में लगा है। उधर, भारत भी उसकी मंशा को समझ रहा है और मिरर इमेज की रणनीति अपना रहा है। भारत पूरी तरह तैयार है। पड़ोसी देशों से सीमा पर लगातार घुसपैठ की गतिविधियों के मध्य नजर भारत में एक तरफ नियंत्रण रेखा और दूसरी तरफ वास्तविक नियंत्रण रेखा मध्य पड़ने वाले क्षेत्र लद्दाख में बेहतर बुनियादी ढांचा और सड़क संपर्क के साथ-साथ अब संचार नेटवर्क के विस्तार के प्रयास में है। भारत ने इसी नजरिए के अंतर्गत चीनी एप्स पर रोक लगाने के बाद दो और निर्णय किए जिससे चीन को भारी आर्थिक आघात पहुंचेगा। इसमें पहला निर्णय है कि भारत के हाईवे प्रोजेक्ट में चीनी कंपनियों का प्रवेश निषेध यही नहीं संचार मंत्रालय ने चीन की कंपनी द्वारा बीएसएनल के 4G अपग्रेडेशन का टेंडर रद्द कर दिया। भारत सरकार चीन पर हथियारों से नहीं हमला करने की तैयारी में है और ना चीन की ऐसी मंशा दिखाई पड़ रही है फिर भी दोनों तरफ से तनाव कायम है और दंडात्मक कदम उठाए जा रहे हैं। इसी को देखते हुए भारत सरकार ने चीन के आर्थिक तंत्र पर आघात किया है और चीन घबरा गया है। सीमा पर नई तैनाती इसी घबराहट को दिखाती है। यह सब संभवतः सितंबर अक्टूबर या नवंबर तक चलेगा। जब गलवान घाटी और अन्य क्षेत्रों में बर्फ जम जाएगा तो फिर सब कुछ शांत हो जाएगा। इस बीच इन चाहता है भारत को ताकत का प्रदर्शन कर कुछ हासिल कर ले। लेकिन भारत शायद ऐसा नहीं करने देगा। जब जम्मू कश्मीर को भारत में शामिल किया गया तो चीन ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की थी उसी दिन लगने लगा था कि हिमालय पर बर्फ पिघलने के बाद कुछ होने वाला है। वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कहीं ना कहीं चीन भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करने के लिए छोटा-मोटा हमला कर दे। इसी उद्देश्य थे सीमा पर वह हालात को गर्म कर रहा है।

Thursday, July 2, 2020

अब छठ तक गरीबों को मुफ्त अनाज



अब छठ तक गरीबों को मुफ्त अनाज


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि गरीब कल्याण अन्न योजना का विस्तार दिवाली और छठ तक कर दिया गया है। इसका मतलब है अगले 4 महीने तक देश के करीब 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज उपलब्ध कराया जाएगा। इसके तहत प्रति व्यक्ति 5 किलो गेहूं या 5 किलो चावल और प्रति परिवार 1 किलो चना मुफ्त मिलेगा।कोरोनावायरस महामारी में भारत सरकार ने गरीब परिवारों को यह राहत देने की योजना बनाई जिसे अब नवंबर तक विस्तार दे दिया गया है और इस योजना पर लगभग 1. 50 लाख रुपए खर्च होंगे। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि भारत दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले बेहतर स्थिति में है लेकिन अनलॉक एक के पश्चात लोगों में लापरवाही बढ़ गई है तथा लोगों ने सावधानी बरतनी छोड़ दी है। जबकि अनलॉक के दौरान ज्यादा सावधानी जरूरी है और लापरवाही हानिकारक है। प्रधानमंत्री ने हिदायत दी कंटेनमेंट जोन में स्थानीय प्रशासन के नियमों को पालन करना आवश्यक है। प्रधानमंत्री ने कहा लॉकडाउन के दौरान सरकार के अलावा सिविल सोसायटी ने भी प्रयास किया कि कोई गरीब भूखा ना रहे। संकट के समय सही फैसले लेने से संकट का मुकाबला करने की ताकत कई गुना बढ़ जाती है प्रधानमंत्री ने कहा कि जब लॉकडाउन शुरू हुआ था तो प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना लाई गई। इसमें पौने दो लाख का पैकेज घोषित हुआ और 9 करोड़ से ज्यादा किसानों के खाते में 18000 करो रुपए डाले गए 20 करोड़ से अधिक महिला जन धन अकाउंट में पैसे डाले गए। अप्रैल मई और जून राशन 80 करोड़ लोगों को मुफ्त दिया गया इसके अलावा प्रति परिवार हर महीने में 1 किलो दाल भी मुफ्त दी गई। अमरीका पूरी आबादी ढाई गुना अधिक एवं ब्रिटेन की जनसंख्या से12 गुना अधिक लोगों को मोदी सरकार ने मुफ्त अनाज दिया।





कई लोग इसे मोदी सरकार का राजनीतिक दृष्टिकोण मान रहे हैं। उनका कहना है कि अगले दो-तीन महीनों में बिहार समेत कई राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। खास तौर पर उनका फोकस बिहार पर है। कुछ राजनीतिक समीक्षकों का यह मानना है कि बार-बार छठ का नाम लेकर घोषणाओं को दोहराना स्पष्ट बताता है कि मोदी जी का ध्यान बिहार पर है। लेकिन इन आलोचकों ने यह नहीं सोचा कि बिहार में जिसके लिए हुए पानी पी पीकर मोदी जी को कोस रहे हैं वहां का मुख्य पेशा और आमदनी का जरिया मेहनत मजदूरी है या फिर कृषि। बिहार में बरसात के दिनों में अनाज की भारी किल्लत रहती है और सबसे ज्यादा काम कृषि क्षेत्र में ही होता है। उसी दौरान धीरे धीरे त्योहारों का मौसम भी आता है और त्योहार ना केवल जरूरतें से बढ़ाते हैं बल्कि खर्च भी। उधर लॉकडाउन के कारण रबी की फसल का आधा अधूरा लाभ मिला। उसी दौरान बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में तेज बारिश के कारण खेतों में खड़ी रबी की फसल का सत्यानाश हो गया। साथ ही, बाहर जाकर कमाने वाले लोग महामारी के चलते घर लौट आए जिससे आमदनी शुन्य हो गई। सरकार ने शुरू में ही कठिनाइयों को समझा और मुफ्त अनाज देने की घोषणा की। आज अगर अनलॉक डाउन के तहत यह राहत बंद कर दी जाती है तो भुखमरी की स्थिति आ जाएगी। त्योहारों आना जाना इसी दरमियान शुरू होता है और यह सिलसिला छठ तक चलता रहता है। उस समय किसानों के घर में नया आना-जाना शुरू हो जाता है जिससे थोड़ी राहत मिलती है। इसी कठिनाई को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री ने मुफ्त अनाज देने का फैसला किया। कुछ लोगों का कहना है प्रधानमंत्री ने 17 मिनट के अपने संबोधन में चीन का जिक्र नहीं किया। अब उन लोगों को या कैसे समझाया जाए कि भाषण का लक्ष्य देश के गरीब लोग थे जिन्हें केवल मेहनत करना और जान देना आता है। यह लोग ड्राइंग रूम में बैठकर सेब खाते हुए अंतरराष्ट्रीय मसलों पर चर्चा नहीं करते। यह अपने खेतों की और अपनी गरीबी की चर्चा में डूबे रहते हैं। ऐसे लोगों को चीन की बात सुनाना बड़ा अजीब लगता है। जिन 80 करोड़ लोगों के लिए प्रधानमंत्री घोषणा कर रहे थे उनमें 80 लाख लोग भी टिक टॉक नहीं जानते होंगे और अगर नाम भी सुना होगा तो उन्होंने उपयोग नहीं किया होगा । जो आलोचक इस किस्म की बातें करते हैं वह मुख्य मसले पर से फोकस भटकाना चाहते हैं। सामाजिक तौर पर हमारे देश में जो लोग ज्यादा गरीब हैं वह ज्यादा चिंतित हैं और जो ज्यादा चिंतित हैं उनमें ज्यादातर लोग बीमार हैं। ऐसे में चीन, गलवान घाटी इत्यादि की चर्चा व्यर्थ है। आज की जो जरूरत है वह है बीमार होने पर खर्च करने के लिए पैसे कहां से आएंगे, खाना कहां से खाएंगे और तब कहीं जाकर नंबर आता है बच्चों को पढ़ाएंगे कैसे? इस स्थिति में उनकी पीड़ा पर मरहम लगाने वाला अगर दूसरी बात करता है तो वह गलती करता है। मोदी जी ने इस अवसर पर चीन की चर्चा ना करके सही काम किया है। जो लोग गरीबों को मुफ्त अनाज दिए जाने की घोषणा को राजनीति से जोड़ते हैं वह खुद नहीं समझ पाते कि उनका यह इनकार भी राजनीति प्रेरित है। जिस देश में राम की पूजा करना भी राजनीतिक घटना बन जाती है उस देश में अनाज का मुफ्त वितरण अगर राजनीति से जुड़ता है तो क्या कहा जाए?