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Monday, March 27, 2017

नमामि गंगे

नमामि गंगे 
पिछले दिनों उत्तराखंड हाई कोर्ट ने फैसला दिया की गंगा और यमुना जीवित नदी हैं और इन्हें वे अधिकार हासिल हैं जो एक जीवित मनुष्य को हासिल हैं। यह कोई बहुत बड़ा फैसला नहीं है , जितना उसे प्रचारित किया जा रहा है और ना ही दुनिया में इस तरह का यह अकेला है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में गंगा यमुना , कोशी यहाँ तक कि गंडक और अन्य कई नदियों को देवी की तरह वर्णित किया गया है, उनकी पूजा का विधान है। यहाँ तक की गंगा भारतीय आस्था का जीवंत प्रतिक है।यह 11 राज्यों के 40 प्रतिशत आबादी को पीने का पानी मुहैया कराती है। लेकिन दुःख तो इस बात का है कि गंगा में रोजाना 2 करोड़ 90 लाख लीटर कचड़ा गिरता है। केवल भारत में ही नहीं न्यूजीलैंड की व्हंगानुई नदी को मनुष्य का दर्जा हासिल है। हमारे देश में ऐसा किये जाने का मुख्य मकसद है कि इन नदियों को प्रदूषण से बचाया जा सके। हमारे देश में इन नदियों का धार्मिक महत्व भी है , लोग इसमें स्नान करते हैं और यहां तक कि जीवन के कई संस्कार इसके तट पर होते हैं। इसके बावजूद यह भी सच है कि इन नदियों को बुरी तरह प्रदूषित किया जा  रहा है। अदालत के फैसले से बहुत कुछ होने वाला नहीं है। नदियों को जीवित मनुष्य का दर्जा दिया गया, मनुष्यों के सम्बन्ध में मानवाधिकार हैं , ये अधिकार नदियों को हासिल हो गए। लेकिन दिल पर हाथ रख कर ईमानदारी से कहें कि क्या हम समस्त मानवाधिकारों का पालन करते हैं। बड़ी बड़ी बातों को छोड़ दें हमारे यहां जब बेटियां  गर्भ  में आती हैं तबसे लेकर जब विधवा हो कर मर जाती हैं उस बीच क्या उनका जीवन और सम्मान सुरक्षित रह पाता है। पुरुहों के साथ भी कुछ ऐसा ही है। अगर वे जाति और धन के मामले में ऊंचे नहीं हैं तो उनका जीवन क्या है , यह सब जानते है।  दरअसल हमारे देश वासियों को अदालत और विवाद पर बहुत भरोसा है। इसलिए कई मामलों में लोग कोर्ट में जाते हैं ताकि उन्हें अपनी समस्याओं का समाधान मिले। अगर हमारे मन में नदियों के प्रति सम्मान है तो कम से कम हम खुद उनमें जोकचड़ा डालतें हैं उसे तो ना डालें। लोग तो घर का सारा कूड़ा सड़कों पर डाल  देते हैं । जब लोगों को खुले में शौच करने से, या सड़क पर थूकने से  रोका नहीं जा सका तो नदियों प्रदूषित करने  से क्या रोका जा सकता है? प्लास्टिक के कप और पॉलिथीन की थैलियों को खुली सडक पर फेंकने से रोका नहीं जा सका यह खुद सरकार के लिए समस्या है तो नदियों को गंदा करने से कैसे रोका जा सकेगा? यह हमारी आत्म नैतिकता का सवाल है क़ानून का नहीं। नदियों को प्रदूषित नहीं करने के भी क़ानून हैं। गंगा की सफाई का राजिव गांधी का वादा बहुतों को याद होगा और आज प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का वादा भी सबको मालूम है तथा उस वाडे पूरा करने के लिए उमा भारती को जिम्मा भी दिया गया है पर यकीन करें भारत चाँद पर जा सकता है, राममंदिर भी बन सकता है पर गंगा प्रदूषण हीन नहीं हो सकती। क्या विडम्बना है कि हम भारत के लोग क्रिकेट से प्रेम करते हैं पर गंगा से नहीं।

Sunday, March 26, 2017

माजनूंगीरी के खिलाफ या महिलाओं के खिलाफ

मजनूंगीरी के खिलाफ या महिलाओं के खिलाफ 
उत्तर प्रदेश में इन दिनों एक अजीब सी व्यवस्था शुईरू हुई है जो अबतक केवल मध्यपूर्व एशिया के देशों में सुनी या देखी  गयी थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ को सत्ता संभाले अभी फकत हफ्ता ही गुजरा है और वहाँ सरकार ने कालेज, मॉल, पार्क और अन्य सार्वजानिक स्थानों पर " एंटी रोमियो दस्ते " तैनात्कर दिया है ताकि लड़कियों से गन्दी छेड़ छाड़ ना की जा सके। यहाँ इस बात से किसी को असहमति नहीं है कि भारत में लड़कियों के छेड़ छाड़ एक गंभीर समस्या है लेकिन हमारे देश में क़ानून की व्यवस्था लागू करने का जो इतिहास है उसके मद्देनजर यह नयी  व्यवस्था चंद  दिनों में " नैतिक आचरण या मोरल पुलिसिंग" व्यवस्था में बदल जायेगी।  आपातकाल के वे दिन बहुतों को याद होंगे जब परिवार नियोजन के प्रचार की व्यवस्था जबरन नसबंदी में बदल गयी और इसी उत्तर प्रदेश में गुंडा  क़ानून नौजवानों को धमका कर पैसे वसूलने के हथकंडे में बदल गया । यही नहीं सत्तर के दशक में बंगाल का नक्सल दमन अनगिनत निर्दोष नौजवानों का दमन कर गया। इसी शंका के समाधान के लिए शुक्रवार की रात जब उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक जाविद अहमद से पूछा गया तो उन्होंने कहा " जमाना  बदल गया है और पुलिस  संवेदनशील हो चुकी है, वैसा कुछ नहीं होगा।"  डी  जी पी के इस आश्वासन के बावजोड़ यू पी से जो खबरें मिल रहीं हैं उनसे लगता है कि पुलिस वही है जो 1946 में थी और पुलिस का यह दृढ मत है कि लड़के और लडकियां दोस्त हो ही नहीं सकते। जो खबरें मिल रहीं हैं उससे पता चलता है कि महिलाओं को रोका जा रहा है , उन्हें नैतिकता और शुचिता का पाठ पढ़ाया जा रहा है, उन्हें तंग किया जा रहा है। पुलिस का तो यह दवा है कि वे आँखें देख कर कह देंगे कि कौन " मजनूं " है , लिहाजा कालेजों के सामने खड़े वे लड़के भी पकड़ लिए जा रहे हैं जो किसी अन्य काम से खड़े हैं। इसासे प्रोत्साहित होकर युवा हिन्दू वाहिनि और अन्य दक्षिण पंथी गिरोह भी पुलिस की " मदद"के लिए मैदान में उतर गए हैं।  इसी लहार में पुलिस वाले अभिभावकों को भी नहीं छोड़ रहे हैं । नौजवानों को पकड़ कर वे अभिभावकों को बुलाते हैं और उन्हें भी भला बुरा कह कर लड़के को सौंपते हैं। देश के कई शहरों में लड़कियों से गन्दी छेड़छाड़ होती है इसासे किसी को असहमति नहीं  है। लेकिन अहमद साहब कोलकाता का यह अखबार आपसे एक सवाल पूछना छाता है कि " आपको संवेदनशील पुलिस तंग जीन्स और शर्ट पहन कर कड़ी एक लड़की को क्यों पकड़ ले रही है और उसे नैतिकता के सबक के सिखाने की आड़ में जमकर डांट पिलाती है? " विश्व  इतिहास में ऐसा उदाहरण देखने को नहीं मिलता कि कोई धार्मिक नेता शासन कर रहा हो और आम आदमी सामान्य जीवन जीता हो और उसके जीवन में " मोरल पुलिस " दखल ना दे। निजी जीवन में शासन की दखलंदाजी वहीँ से शुरू होती है जहां  नेता और अफसर यह तय करने लगते हैं कि आम जन को क्या  खाना है, क्या पहनना है।यहीं से तो शुरू होता है धर्मतंत्रिक शासन का निर्देशक सिद्धान्त। इसका विरोध किया जाना भारत के आदर्श का समर्थन है। इस देश में सबको जीने, प्रेम करने, पसंद के अनुरूप वस्त्र पहनने और पूजा पद्धति अपनाने की आज़ादी है। योगी आदित्य नाथ बेहद ईमानदार, निष्ठावान और कर्मठ व्यक्ति हैं पर उइके शासन काल में यह जो हो रहा है उसमें पुलिस तंत्र द्वारा अधिकारों के दुरुपयोग की व्यापक आशंका नज़र आ रही है। 

Friday, March 24, 2017

वाह योगी जी, वाह

वाह योगी जी , वाह 
योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री पद की शपथ लेने के हफ्ते दिन के भीतर अपना असर दिखा शुरू कर दिया है। कत्लगाहों पर हमले होने लगे हैं, " मजनुओं" की पिटाई चालू  हो गयी है, गो रक्षकों की जमातों के अभियान तेज हो गए हैं। जो लोग इसका विरोध अर रहे हैं उन्हें भी और कुछ नहीं तो गालियां ज़रूर सुनानी  पड़  रहीं हैं। बड़े बुद्धिजीवियों की दलील हैकि अगर सियासत मुस्लिम वोट बैंक बन सकता है तो हिन्दू एकजुटता क्यों नहीं?  लेकिन यहां विजय के नशे में लोग एक बात भूल रहे हैं कि यह विजर भा ज पा की नीतियों की नहीं मोदी जी के कौशल की है। मोदी जी की छवि नेहरू और इंदिरा की तरह अपराजेय की हो गयी है और उनका कद पार्टी से बड़ा हो गया है। यह एक खतरनाक संकेत है।  संगठन के सिद्धांत के मुताबिक यह उसके पतन के संकेत हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर प्रदेश की विजय " चुनावी लामबंदी के पुनराविष्कार " की विजय है। इसके चुनावी लाभ तो हैं पर इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं।अल्पसंख्यकों को भा ज पा की चुनावी परिगणना  से बहार रखने के अन्य मानकों छोड़ भी दें तो यह काहा जा सकता है कि इससे समाज में आपसी दूरियां बढ़ेंगी और टकराव के बहाने मिलने लगेंगे और परिणाम भयानक हो सकते हैं। बहुत पहले एक फिल्म आयी थी " गैंग ऑफ़ न्यूयॉर्क " जिसमें " बॉस" का कहना था कि " चुनाव में मतपत्रों से नतीजे नहीं हासिल होते बल्कि गिनती से प्राप्त होते हैं इसलिए गिनते रहिये।" पिछले पांच वर्षों में हुए चुनावो के नतीजों के रचनात्मक अर्थों की अगर व्याख्या करें तो फिल्म वाले " बॉस" कीबात को ऐसे कहा जा सकता है कि " नाटकबाजी और व्यख्या विजय दिलाती है इसी में लगे रहिये।" बहुतों को " ब्रेक्सिट" का जाना देश याद होगा। इसमें सरकार ने भीड़ के हाथ में ताकत दे दी और चुप बैठ गयी। नतीजा क्या हुआ?  एक सुस्त और गैरजिम्मेदार सरकार  हासिल हुई। उत्तर प्रदेश में भी ऐसे ही कुछ हुआ।  विधान सभा में सबसे बड़ी पार्टी को जनादेश के आधार पर  मुख्य मंत्री चुनने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। किसी विशेष सिद्धान्त को लागू किया जा सके इसके लिए जनादेश को ख़ारिज करना बेचैनी पैदा करता है।यहां एक महत्त्वपूर्ण बात यह साने आती है कि जो लोग योगी जी मुख्यमंत्री बनाये जाने के विरोध में हैं  उन्हें बहुमत को नहीं मानने का दोषी बता कर लांछित किया जा रहा है। मौजूदा वक्त में मतदान का मनोविज्ञान बदल चुका है। अब वोट देना नैतिकता की शिनाख्त बन गयी है ना कि वोट लेने वाला। ऐसे में मुठी भर लोगों को एक बहुत बड़ी आबादी वोट देती है और वे गिनती के लोग करोड़ों लोगों के मुकद्दर का फैसला करते हैं, नैतिकता का निर्णय करते हैं। इक़बाल ने कहा था,
जम्हूरियत वह तर्जे हुकूमत है 
जहां गिने जाते हैं , तौले नहीं जाते
जो लोग इस तरह के चुनाव का विरोध करते हैं उनपर तोहमत लगती है कि वे लोकतंत्र के मुखालिफ हैं पर इस तरह कहने वाले लोग यह क्यों नहीं मानते की विरोध लोकतंत्र की ही परंपरा है। जिस तरह से योगी जी को गाडी पर लाया गया और जितनिटेजी से वहाँ के सामाजिक हालात बदल रहे हैं उससे तो लगता है कि जब इसके बाद राज्य सभा में भा ज पा का बहुमत हो जाएगा तो संघ के एजेंडे तेजी से सामने आने लगेंगे। जहां तक यू पी का सवाल है , यहां विचार धारा सामने आती है। कहा जा रहा कि कत्लगाहों पर रोक से बहुतों की रोजी रोटी छीन जायेगी। परिवर्तन के दौर में इस तरह की दलीलें अक्सर आती हैं पर जब यह सब बात नाताजुर्बेकार नेता के साथ जोड़ कर  होती है तो निर्णय करना जल्दबाजी हो जाती है।  सरकार के आधा टर्म पर करने के बाद ही बात कुछ समझ में आती है। योगी जी के गद्दी पर आये अभी जुम्मा जुम्मा आठ दिन भी नहीं हुए हैं पर उन्होंने प्रशासन की सफाई शुरू कर दी। वे बहुत तेज चल रहे हैं, शाबाशी के पात्र हैं पर हनुमान कूद खतरनाक होती है।

Thursday, March 23, 2017

बिन पानी सब सून

बिन पानी सब सून 
पानी पर और जल स्रोतों के विकास पर बहुत कुछ कहा जा चुका है। कई लोगों ने तो यह भी कहा है कि अगला विश्व युद्ध जल के लिए ही होगा। लेकिन यह सुन कर हैरत होगी की देश 12 पंचवर्षीय योजनाएं गुजर गयीं और विकास के बड़े- बड़े दावे किए गए पर आज भी देश के गांवों में लगभग साढ़े 6 करोड़ आबादी को पीने का साफ़ पानी नहीं मिलता है।" वाइल्ड वाटर, स्टेट ऑफ़ थे वर्ल्ड वाटर 2017 " की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 6.34 करोड़ आबादी को पीने का साफ़ पानी नहीं मिलता। यह सुन कर हैरत हो सकती है कि पंजाब , हरियाणा, उत्तराखंड की समग्र आबादी आस्ट्रेलिया, स्वीडन , श्रीलंका और बुल्गारिया की कुल  आबादी से ज्यादा है। "वाटर एड इंडिया " के अनुसार देश के 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 27 ऐसे राज्य हैं जो महाविपदा प्रवृत्त हैं जहां हाशिये पर रहने वाले लोग घनघोर मौसमी दुर्घटनाओं या भरी मौसमी बदलाव के सबसे ज्यादा शिकार हो सकते हैं, उनके लिए इसे झेलना बहुत कठिन हो सकता है। क्या दुर्भाग्य ही कि " शस्य श्यामलां मातरम " का गीत गाने वाले इस देश की 67 प्रतिशत आबादी गाँव में रहती है और जिसमें 7 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिन्हें पीने का साफ़ पानी नहीं मिलता। देश के ये सात प्रतिशत भयानक मौसमी दुर्घटनाओं के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं। वैसे आंकड़े बताते हैं कि दुनिया के गरीब लोग ही मौसमी कोप के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं। 6 फरवारी 2017 को राज्यसभा में प्रस्तुत पेय जल स्वच्छता मंत्रेअले की रिपोर्ट में कहा गया है कि  ग्रामीण भारत के 16 करोड़ 78 लाख घरों में से महज 2 करोड़ 69 लाख घरों में ही पीने का पानी पाइप के माध्यम से उपलब्ध है। रिपोर्ट के अनुसार 17 लाख घरों को राष्ट्रीय ग्रामीण योजना के तहत पेय जल मुहैय्या कराया जाता है। इनमें से 13 लाख घरों प्रचुर जल दिया जाता यानि उन्हें एक दिन में 40 लीटर पानी दिया जाता है। सरकार के प्रचुर पेय जल की माप है प्रति घर को रोजाना 40 लीटर , यानी दो बड़ी बाल्टी , पीने का पानी। 3 ला\कह 30 हज़ार 86 घरों को इससे काम पानी मिलता है और 64094 घरों को साफ़ पानी नहीं मिलता है।  20 मार्च 2017 को राज्य सभा में यह जानकारी दी गयी है। लोक सभा में 16 मार्च 2017 को दिए गए उत्तर के अनुसार 19720 ग्रामीण घरों में जो पानी उपयोग में लाया जाता है उसमें बहुत ज्यादा आयरन है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पेय जल में आयरन की ज्यादा उपस्थिति स्वांस प्रणाली की खराबियों को जन्म देती हैं। पेय जल में आर्सेनिक की मौजूदगी से कैंसर जैसी बीमारियां हो सकती हैं। देश के गाँव में 30 प्रतिशत घरों में उपयोग में लाया जाने वाले  पानी  में आर्सेनिक पाया गया है। ग्रामीण आवासों की बात दूर हमारे महानगर कोलकाता तथा आस पास के इलाकों मानें पानी में आर्सेनिक पाए जाने की रपटें आ चुकी हैं। 
सरकार की योजना है कि चालू वर्ष के अंत तक देश के आधे ग्रामीण घरों में पाइप के जरिये पीने के पानी की व्यवस्था कर दी जायेगी और 35% घरों में तो नल लगवा दिए जाएंगे। 2022 तक 90% घरों में पाइप के जरिये पानी आपूर्ति की योजना है। वैसे भी देश में आबादी बढ़ने के कारण जल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता घटती जा रही है। एक आंकड़े के मुताबिक 2001 में देश में प्रति व्यक्ति जल की वार्षिक उपलब्धता 1820 घन मीटर थी  जो 2011 में घाट कर 1545 घन मीटर हो गयी। इस अवधि में भारत की आबादी में 17.6% वृद्धि हुई। आबादी 2001 के 102 करोड़ से बढ़ कर 2011 में 121 करोड़ हो गयी। पर्यावरण मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 2022 में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता  1341 घन मीटर हो जाने की आशंका है। यानी जल्दी ही जल की आपूर्ति और मांग में भारी अंतर आने की आशंका है।  काम वर्षा के कारण देश के बड़े जलागारों में पानी कम होता जा रहा है। देश जल संकट की ओर बढ़ रहा है और सरकार निरुपाय सी दिख रही है। इसके साथ ही पर्यावरण परिवर्तन की मार को झेलने के अपर्याप्त साधन इस पीड़ा को और बढ़ा देंगे।

Wednesday, March 22, 2017

अयोधया विवाद अब कोर्ट से बहार

अयोध्या विवाद अब कोर्ट के बाहर 

सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश जे एस खेहर की पीठ ने विचार व्यक्त किया है कि बाबरी मस्जिद - राम मंदिर का विवाद अदालत के बहार सुलझालिया जाय और इसके लिए अदालत ने मध्यस्थता करने की पेश काश भी की है। अदालत के इस विचार से एक नया विवाद पैदा हो गया है। अयोध्या या बाहर के जो लोग चाहते थे कि यह मसला सुलझ जाय उनमे एक नयी आशा जगी है क्योंकि यह विवाद अतीत में कई दंगों का कारण भी बन चुका है। भा ज पा सांसद सुब्रमनियम स्वामी की दलील पर सुनवाई  करते हुए अदालत ने यह विचार ज़ाहिर किया। इस पीठ में  प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति खेहर के अतिरिक्त न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और एस के कौल भी शामिल थे। सुब्रमिनियं स्वामी ने दलील दी थी कि इस मसले पर तुरंत सुनवाई की जाय। अदालत ने कहा कि " यह मसला धर्म और भावनाओं से जुड़ा है । यह ऐसा मसला है जिस पर सभी पक्ष बैठ कर सह्माती से कोई निर्णय कर सकते हैं। ऐसे मसले साझा तौर पर बेहतर ढंग से सुलझाए जा सकते हैं। सभी एक साथ बैठ कर आपस में विचार कर लें।" 2010 में इस मसले को अदालत के बाहर सुलझाने की पेशकश की गयी थी जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने ठुकरा दिया था और उच्च न्यायालय  को आदेश दिया था कि वह इसपर निर्णय दे। सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि दोनों पक्षों में विश्वास का अभाव है और भारी मतान्तर है। यह पहला मौका नहीं है जब इस तरह के समाधान पर बात हो रही है। अब यह कितना दिलचस्प है कि देश की सबसे बड़ी अदालत ने आपसी समझौते से मामला सुलझाने का सुझाव दिया है जबकि दोनों पक्ष कोर्ट का फैसला मानने का वादा कर चुके हैं । यहां अदालत के कथन का वक्त और इस समस्या के समाधान पर जिस तरह से इसने बहस की शुरुआत कर दी है वह बड़ा महत्वपूर्ण है। भ ज पा की यू पी में भारी विजय के बाद अभी गोरखपुर के गोरखनाथ मठ के महंत योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ही ली है । आदित्य नाथ तो अर्से से कहते आ रहे हैं कि " मंदिर वहीं बनाएंगे। " कहा तो यह जाता है कि गोरख नाथ पीठ के पूर्व महंत योगी दिग्विजयनाथ ने 1949 में जिस जगह पर विवाद है वहाँ एक धार्मिक कार्यक्रम करवाया था और उस कार्यक्रम में चमत्कारिक रूप से रामलला की प्रतिमा प्रकट हुई थी। कहते तो लोग यह हैं कि उस समय खुद रामलला प्रगट हो गए थे। 1990 में आडवाणी जी की रथ यात्रा से मोदी जी बहुत करीब से जुड़े हुए थे , इसके बाद कई दंगे हुए और आखिर में 6 दिसंबर 1992 को वह ढांचा ही ध्वस्त हो गया। 
जैसी की उम्मीद थी, भा ज पा के नेता, केंद्र के मंत्री और यू पी की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के अवलोकन का स्वागत किया है। केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा ने कहा है कि यह अवलोकन राष्ट्र के हित में है। हम तो राम मंदिर का मसला सदा संविधान के माध्यम से सुलझाने के तरफदार रहे हैं और अदालत का यह अवलोक स्वागत के योग्य है।" मुख्य मंत्री आदित्य नाथ ने भी इसका स्वागत किया है और सहयोग की पेशकश की है। उन्होंने कहा है कि " यदि दोनों पक्ष बैठने का निर्णय करें और किसी सहमति पर पहुंचे तो समाधान हो सकता है। राज्य सरकार जो जरूरी होगा करेगी। " इधर अब तो दिल्ली में और लखनऊ में  बहा ज पा की सरकारें हैं और अब इसके समर्थक राम मंदिर बनाने के लिए भारी दबाव दे रहे हैं। इन सब के बावजूद यहाँ एक शब्द है " सहमति " उसी के ही  आधार पर शान्ति पूर्ण समझौता हो सकता है।   अब जहां तक सहमति का सवाल है उसकी मुखालफत शुरू हो चुकी है।बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी के जफरयाब जिलानी का कहना है कि कोतबा ने सिर्फ कहा ही तो है फैसला थोड़े ही दिया है। भा ज पा ढोल पीते ही जा रही है। जिलानी ने कहेगा कि कई बार कोशिशें हुई हैं पर कामयाब नहीं हो सकीं। जिलानी ने ब्यौरा दिया की 1986 में कांची काम कोटि के शंकराचार्य ने मौलाना अली मियाँ से मुलाकात की थी , इसी सिलसिले में 1990 में चंद्रशेखर ने भी मुख्यमंत्रियों के एक कमिटी बनायी थी। 1992 में नरसिंह राव नेभी कोशिशें की थीं। जिलानी ने कहा कि 2003 में अयोध्या , मथुरा और वाराणसी की मस्जिदों को छोड़ देने की मांग की गयी थी। जिलानी ने कहा कि "हम्मस्जिद कैसे छोड़ सकते हैं।" हालांकि अन्य मुस्लिम नेताओं का रुख सकारात्मक दिख रहा है। मलाणा कल्बे सादिक ने कहा कीकोई ऐसी राह निकाली जय जिससे दो नो पक्षों को आघात ना लगे, खून खराबा न हो। मौलाना खालिद रशीद फिरंगीमहली का कहना है कि " कोई मुसलमान नहीं चाहता कि राम मंदिर ना बने लेकिन बाबरी मस्जीद भी तो बनानी चाहिए।"  अयोध्या में भी लोग अदालत के बहार फैसले का समर्थन कर रहे हैं। महंत ज्ञान दस ने कहा कि हम पहले से ही ऐसा चाहते हैं। अब सवाल है कि दोनों पक्ष बैठें और सहमति  हो तो कुछ बात बने।

Tuesday, March 21, 2017

योगी और मोदी : संघ के दो चेहरे

योगी और मोदी : संघ के दो चहरे 
कई साल पहले महानगर के साल्ट लेक इलाके में योगी आदित्य नाथ से मुलाकात का ब्यौरा सन्मार्ग में प्रकाशित  हुआ था। वे हिंदुत्व के कट्टर योद्धा के तौर पर ख्याति प्राप्त कर चुके थे और दिल्ली के तखत पर नरमपंथी अटल बिहारी वाजपेयी थे। वे सबको साथ लेकर चलना चाहतेथे जबकि गेरुआ वस्त्र धारी योगी इस खाके में कहीं फिट नहीं बैठते थे। भारतीय राजनीति में उनकी भूमिका के बारे में पूछे गए सवाल के बारे में उन्होंने कहा था कि " हिन्दू धर्म की रक्षा और राम मंदिर बनेगा और अयोध्या में ही बनेगा।" अब वे उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री हैं लेकिन दिल्ली दरबार की नीरसता और " गोरखपुर" की कट्टरता अभी भी बानी हुई है । उत्तर प्रदेश की भारी विजय के दूसरे दिन प्रधान मंत्री ने कहा था कि " सरकार बहुमत से बनती है पर सहमत से चलती है।" इसके बाद उन्होंने अपना वही नारा दोहराया जो चुनाव बार लगाते रहे हैं- " सबका साथ सबका विकास।" यह एक नेता की टिपण्णी थी। इसके लागभे हफ्ते भी बाद जब योगी को मुख्य मंत्री नियुक्त किया गया तो लखनऊ में नारे लगे कि " यू पी में रहना होगा तो योगी-योगी कहना होगा।" दिल्ली के मोदी मन्त्र और लखनऊ के " गोरख पुर मॉडल " के बीच की खाई बहुत चौड़ी नहीं है।" प्रकारांतर से दोनों ने बहुमत की ही बात कही है और इसमें राज्य की आबादी के " 18 प्रतिशत" के हिस्से को पूरी तरह नज़रंदाज़ कर दिया गया है। यू पी में विजय मोडियो ब्रांड के कारण मिली। यह एक ऐसा ब्रांड है उम्मीद और विकास का आश्वासन देता है लेकिन इस ब्रांड का विश्लेषण " अच्छे दिन" वाले नारे के सन्दर्भ में किया जाना जरूरी है खासकर जो लोग विपक्षियों के  भ्रष्ट और  बुद्धिहीन कामकाज से ऊब चुके थे।" यू पी में जो हुआ वह केवल परिवर्तन के  लिए नहीं हुआ बल्कि यह हिंदुत्व सोच की ताकत की स्पष्ट अभिव्यक्ति थी।" संघ का आदर्श भी तो यही है। इस सन्दर्भ में ज़रा उस अंदाज़ को तो याद करें जिस अंदाज में प्रधानमन्त्री जी ने " श्मशान - कब्रिस्तान" की बात की थी यह अमित शाह का अंदाज़ देखें जिस अंदाज में उन्होंने"कसाब" का ज़िक्र किया था। कुछ लोग दलील दे सकते हैं कि कांग्रेस और सपा गठबंधन या बसपा ने भी तो मुसलमानों या कहें अल्पसंख्यकों सर वोट मांगे थे पर उस सन्दर्भमें यह देखने की ज़रुरत है कि तब हिन्दू प्रतिध्रुवीकरण  भी तो चल रहा था- इसके साथ इसके साथ यादवों और जाटवों के वोट भी तो जुड़ रहे थे। एक तरह से इस चुनाव में हिन्दू एकजुटता और जादव , मुस्लिम और जाटवों  के ध्रुव केबीच का मुकाबला था। यह एक बदरंग हकीकत है जो विकास के परदे में छिपी है। इसमें मोदी मन्त्र का वह अर्थ कहाँ  है जो सबको बराबर अवसर प्रदान कर नए भारत का निर्माण करना चाहता है। कहा तो यह जा रहा है कि प्रधान मंत्री पहली पसंद मनोज सिन्हा थे , जिन्होंने केंद्रीय मंत्री के तौर पर अपनी प्रशाशनिक क्षमता को सिद्ध भी किया है, लेकिन इस कथन की पुष्टि संभव नहीं है। चर्चा गर्म तो इस बात की है कि आर एस एस ने प्रधान मंत्री के फैसले को अमान्य कर दिया और घुड़की दी कि तीन सौ से ज्यादा सीटें पाने के बाद भी यदि पार्टी अपनी वैचारिक विशिष्टा नहीं कायम रख सकती है तो कब ऐसा करेगी? इस विचार धारा का योगी से बेहतर कौन प्रतिनिधित्व कर सकता है ? ये तो बताने की ज़रुरत नहीं है कि यू पी में भा  ज पा - संघ के अत्यन्त मशहूर काडरों में से योगी एक हैं। हो सकता है मोदी- योगी का द्वैतवाद संघ को रास आता हो कि एक आदमी दिल्ली में बैठ कर सबके विकास की बात करता है तो दूसरा लखनऊ में हिंदुत्व की सांडी में अपनी खिचड़ी अलग पकाता है। योगी का चयन कर संघ ने एक बड़ा जोखिम तो लिया ही है, लेकिन यह जोखिम पूरा साधा सधाया है। योगी के चयन के घंटे भर के भीतर ही मोदी टी वी पर दिखे। कड़क कुर्ता और जैकेट में वे एकदम स्मार्ट लाग रहे थे। वे अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिना रहे थे । इसी दौरान  यहां कोलकता में जब यू पी के एक वरिष्ठ विद्वान् से मोदी के चयन के बारे में राय मांगी गयी तो उसने कहा कि यह गलत हुआ है और जब वोट दिया गया था तो ऐसा सोचा भी नहीं गया था। उत्तर प्रदेश में इस टिपण्णी का कोई मूल्य नहीं है । यू पी में भा ज पा को वोट देने वाले खुश हैं क्योंकि पार्टी ने उन्हें हिदुत्व की सियासत की घुट्टी पिलाई है। लेकिन बहुतों को याद होगा कि मोदी ने 2014 में जो भारी विजय हासिल की थी उसका कारण हिन्दू कट्टर वोटों से उनका आगे निकल जाना। 2002 के कट्टर हिन्दू की छवि के ऊपर सुशासन की छवि गढ़ने वाले नरेंद्र मोदी ने नौजवानों के जिस समुदाय में आशा जगायी  वह तबका जाति वगैरह नहीं  मानता था। नौजवान गुजरात के दंगे को भूल चुके हैं पर जिस अंदाज में योगी बोलते हैं वह अंदाज़ लोगों को याद है।नौ जवानों का वह समुदाय रोजगार चाहता है, विकास चाहता है , शांति चाहता है। वह लव जिहाद नहीं चाहता, भड़काऊ भाषण नहीं चाहता है । देश के सबसे महत्वपूर्ण प्रान्त के मुख्य मंत्री के रूप में योगी की नियुक्ति से 2002 के जिन्न को जगा दिया गया है। क्या यही पार्टी का भाविष्य है या बहुलतावादियो का उन्माद पुरानी खुन्नस को मिटाना चाहता है और हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करना चाहता है। योगी के पद संभालने के बाद बाज़ार में उनके विवादास्पद भाषणों के कई वीडियो आये । योगी समर्थकों का कहना है कि उन्हें एक अवसर मिलना चाहिए क्योंकि उन्होंने चार चार बार संसदीय चुनाव जीते हैं। लेकिन क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि योगी जी ने अपने भड़काऊ भाषणों के आधार पर ही चुनाव जीता है और देश के सबसे बड़े राज्य की कमान के लिए उनका चयन जोखिम भरा है। लेकिन इस जोखिम में रख चालाकी ज़रूर है। भा ज पा नें योगी के माध्यम से 2019 में खुद को मीडिया में स्थापित कर लिया। अगर वे कुछ भड़काऊ करते हैं तो मीडिया में भा ज पा छा जायेगी, और विकास की दिशा में वे कुछ कर बैठते हैं तो यह पार्टी के लिए बोनस होगा।