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Wednesday, June 3, 2020

नए शीत युद्ध के संकेत



नए शीत युद्ध के संकेत


आरंभिक काल से ही चीन सीमाओं को लेकर भारत के प्रति बेहद हठधर्मिता रहा है। चाहे वह मैक महोन लाइन को मान्यता देने की बात हो या सिल्क रूट की। चीन ने 1962 में पंचशील का ढिंढोरा पीटते हुए हिंदी चीनी भाई भाई का राग अलापते हुए भारत पर हमला कर दिया था। आज फिर भारत के साथ विवाद शुरू हुआ है। पाकिस्तान दूतावास के दो अफसरों को निकाले जाने के अलावा नेपाल का नक्शा विवाद यह सब चीन की शह पर हो रहा है। हांगकांग से लेकर काठमांडू तक कई विवाद में चीन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में शरीक है। हांगकांग में चीन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। चीन के प्रस्तावित राष्ट्रगान विजय के खिलाफ आवाजें फिर उठने लगी हैं। इस विधेयक के पारित हो जाने पर चीन के राष्ट्रगान का अपमान करना अपराध में हो जाएगा। चीन ने हांगकांग के लोगों की बुनियादी आजादी केकई अधिकारों को छीनने के लिए कानून बना रहा है। हांगकांग में चीन विरोधी प्रदर्शनों का यह दूसरा दौर है।


इधर भारत में वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब चीन ने पक्की सड़क बना ली है। इस सड़क के जरिए भारी वाहनों का आना जाना हो सकता है। यह सड़क भारत के गोगरा पोस्ट के करीब है और खबर है कि यहां पर सोने की खान हो सकती है। 3 सप्ताह में बनाई गई 4 किलोमीटर लंबी सड़क आगे जाकर चीन की और सड़कों से मिल जाती है।


हजारों सैनिक चीन से सटी 646 किमी लंबी सीमा व वास्तिक नियंत्रण रेखा पर तैनात हैं, जहां अभी तक इक्का-दुक्का जवान ही नजर आता था। इनकी तैनाती को रक्षात्मक रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है।चीन सीमा पर खतरे से निपटने की खातिर जवानों की तैनाती और सैनिक साजो-सामान ही नहीं, बल्कि सेना व वायुसेना चीन सीमा पर अधिक से अधिक हवाई पट्टियों और एयर बेसों को सक्रिय करने में भी जुटे हैं। पहले ही दौलत बेग ओल्डी व फुकचे हवाई पट्टियों को खोला जा चुका है तथा खोली गई कुछेक स्थानीय हवाई पट्टियों को एडवांस लैंडिंग ग्राऊंड में बदलने का काम चल रहा है। रक्षाधिकारियों के बकौल दोनों सेनाएं एक-दूसरे के सामने खड़ी हैं। कहीं पर दोनों के बीच फासला कुछ मीटर का है। भारतीय पक्ष इस बार आक्रामक मूड दर्शा रहा है। हालांकि उच्च स्तर पर कोशिश टकराव टालने की हो रही है, पर बावजूद इसके माहौल ठंडा नहीं हुआ है। मामला पूरी तरह निपटने तक भारतीय सेना अपने तोपखानों को पीछे नहीं हटाएगी।


मई के शुरुआती दिनों से ही पूर्वी लद्दाख में तनाव कायम है और इस बीच उसने वास्तविक नियंत्रण रेखा के समीप एक अस्थाई सड़क निर्माण कर लिया जो सड़क प्राकृतिक संसाधनों से भरे पहाड़ों तक जा सकती है।


यह पहाड़ वास्तविक नियंत्रण रेखा के इस पार भारत में है और इससे हम आसानी से चीन की नियत का अंदाजा लगा सकते हैं। भारत के पास इन पहाड़ों तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है। गोल्ड माउंटेन के नाम से विचार इन पहाड़ों के समीप ही चीन ने बनकर भी बनाए हैं। चीन हमेशा इस क्षेत्र में अपना दावा करता है हालांकि भारत दोनों के सैनिकों की पेट्रोलिंग जारी है और गलवान यह समीप चीनी फौजियों के कारण तनाव भी।


भारत को परेशान करने और भारत से नेपाल का अति प्राचीन संबंध बिगड़ने के लिहाज से चीन ने भारत नेपाल सीमा विवाद पर नेपाल की पीठ ठोक दी है। नेपाल की संसद में बहुत ही महत्वपूर्ण है संविधान संशोधन विधेयक पेश हुआ है। हालांकि मधेसी पार्टी में इस विजय विरोध किया है। जरा गौर करें 6 महीने पहले भारत ने एक नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था जिसमें जम्मू और कश्मीर राज्य को 2 केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू कश्मीर और लद्दाख के रूप में दिखाया गया है। इस नक्शे में लिंम्पियाथुरा, काला पानी और लिपुलेख को भारत ने अपना हिस्सा बताया है। अब नया विधायक आने वाला है और इसके बाद दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण हो जाएंगे। भारत के दरवाजे पर नेपाल चीन के साथ मिलकर एक नया दुश्मन खड़ा हो जाएगा। भारत में हाल में मानसरोवर जाने के लिए लिपुलेख से होकर एक नई सड़क का उद्घाटन किया था। नेपाल इससे नाराज है।





उधर, पाकिस्तान ने भारत में फिर से जासूसी का खेल शुरू कर दिया है। उसके दो राजनयिकों को भारत की पुलिस ने सुरक्षा सूचनाएं जुटाने के आरोप में पकड़ा और सरकार ने उन्हें देश छोड़ने का हुक्म दिया। डिप्लोमेटिक इम्यूनिटी के अंतर्गत इससे ज्यादा कुछ किया भी नहीं जा सकता। जवाब में पाकिस्तान ने भी भारत के दो राजनयिकों को विदेश मंत्रालय में बुलाकर अपना विरोध दर्ज किया और देश छोड़ने का आदेश दिया। हांगकांग से लेकर इस्लामाबाद तक अशांत क्षेत्र कायम हो चुके हैं और किसी न किसी रूप में भारत पर इसका प्रभाव पड़ रहा है। आज के दौर में जब कोरोनावायरस से निपटने में लापरवाही को लेकर पूरी दुनिया में भारत चीन की किरकिरी हो रही है उस पर तमाम दबाव डाल रहे हैं वैसे में भारत के खिलाफ एक नई अशांति पैदा कर चीन ने इस दबाव को कम करने की कोशिश की है। पहले चीन की हरकत हांगकांग में देखें। यहां जो विरोध के स्वर उठ रहे हैं वह चीन की हठधर्मिता के बारे में स्पष्ट बता रहे हैं। इस मामले को लेकर कई देशों ने अपनी चिंताएं जाहिर की हैं और अमेरिका ने तो सख्त कदम उठाने का संकेत दिया है। स्पष्टतया वैश्विक रुझान हिंद- प्रशांत और उससे आगे क्षेत्रों में अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिए प्रयासरत चीन के शांतिपूर्ण उभार से प्रतिद्वंद्विता में वृद्धि और नए शीत युद्ध की शुरुआत के संकेत मिलते हैं। भारत को स्थिति पर नजर रखने की जरूरत है और सावधान रहने की भी जरूरत है।

Monday, June 1, 2020

लॉक डाउन को लेकर जितने मुंह उतनी बातें



लॉक डाउन को लेकर जितने मुंह उतनी बातें


सरकार ने आज से लॉक डाउन की अवधि फिर बढ़ा दी लेकिन इस बार पिछली बार के मुकाबले कुछ ज्यादा सुविधाएं दी गई हैं। लेकिन लॉक डाउन को लेकर तरह-तरह की बातें हो रही हैं। एक राज्य राजस्थान जहां कोविड-19 का प्रकोप कुछ ज्यादा ही है वहां मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने लॉक डाउन के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज किया कि यह भारत में अब तक की सबसे असंवेदनशील सरकार है। संभवत वे इमरजेंसी के काल को भूल गए। उसी तरह जब 1 जून से लॉक डाउन की अवधि बढ़ाई गई तो कई तरह की आलोचनाएं सामने आईं। इनमें सामाजिक और आर्थिक स्थितियों को सामने रखकर यह बताने की कोशिश की गई कि लॉक डाउन का फैसला पहले ही गलत था और अब और खराब हो गया। लेकिन, यहां यह तुलना करना जरूरी है कि कुछ दिनों तकलीफ लॉकडाउन के तहत हुई है और आगे भी होगी वह ज्यादा दुखदाई है या फिर हमारी आंखों के सामने अपने प्रिय जनों की मौत का वह दृश्य। लोगों की जिंदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं है और लॉक डाउन को पूरी तरह खोला जाना वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी गलत है। माइक्रोबायोलॉजी में नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक पीटर चार्ल्स डोहार्टी ने भारत जैसे घनी आबादी वाले देश में लॉक डाउन को हटाया जाना चिंताजनक है। बेशक किया आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयां पैदा करेगा। उन्होंने कहा कि यदि सब कुछ ठीक-ठाक जाता है और सब की जांच को पाती है तो सितंबर अक्टूबर तक इसकी वैक्सीन बन सकती है लेकिन फिर भी यह उस तथ्य पर निर्भर है कि वैक्सिंग बनाने में कितना वक्त लगेगा और फिर भारत जैसे विशाल देश में उसे सब जगह पहुंचाने में कितना समय लगेगा। वैज्ञानिक ने कहा कि कोरोना वायरस इन्फ्लूएंजा की तरह अपनी शक्ल नहीं बदलता और ना ही अपना चरित्र तब भी यह जरूरी नहीं है कि सब जगह एक ही तरह की वैक्सीन काम आएगी। उन्होंने कहा कि लॉक डाउन का मामला व्यावहारिक विज्ञान का मसला है क्योंकि से आर्थिक और सामाजिक विषमताएं जुड़ी हैं। उन्होंने कहा कि संख्या बढ़ने की और उसके प्रसार की सीमा को नियंत्रित करने की उम्मीद इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपने आसपास से कैसे जुड़े रहते हैं और जांच की संख्या कितनी है। और भारत में इसकी आबादी को देखते हुए ऐसा सोचना भी मुश्किल है। फिर भी आर्थिक समस्याओं को देखते हुए सरकार ने जो आज से लॉक डाउन में छूट की बात कही है वह निहायत प्रशंसनीय है। केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को कहा है कि वे लॉक डाउन की गाइडलाइंस का पूरी तरह पालन करें और कंटेनमेंट जोन को छोड़कर अन्य स्थानों पर 8 जून से मॉल रेस्टोरेंट और धार्मिक स्थल खोलें जा सकेंगे। केंद्र सरकार ने स्पष्ट कहा है कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए तय किए गए गाइडलाइंस मे जो बंदिशे लगी है उन्हें कम नहीं किया जा सकता और कंटेनमेंट एरिया के बाहर के हालात आकलन के आधार पर जरूरत के अनुसार गतिविधियों पर रोक लगा सकते हैं।


भारत इतना बड़ा और इतनी ज्यादा जनसंख्या का विविधता पूर्ण राष्ट्र है कि यहां अगर सही आंकड़े उपलब्ध ना हो तो इस तरह की महामारियों का अचूक उपचार नहीं हो सकता। केवल कुछ शहर और राज्य ऐसे हैं जो आंकड़ों का प्रकाशन कर रहे हैं और उन्हीं के आधार पर सरकार को निर्णय लेने चाहिए। जो राज्य सरकारें केंद्र सरकार की आलोचना कर रही हैं उन्हें पहले अपने दामन में देखना चाहिए कि क्या वे वैज्ञानिक नियमों का पालन कर रहे हैं? आईसीएमआर की यह ड्यूटी है कि वह देश को जानकारी दें कि हालात क्या हैं। लेकिन ऐसा होता नहीं है उल्टे यह बात मीडिया में फैलाई जाती है प्रधानमंत्री विशेषज्ञों की सलाह को लेकर चिंतित हैं और उन्हें पछतावा हो रहा है लॉक डाउन बढ़ाने का। सूचनाओं के इस घटाटोप में आम आदमी को सही सूचना मिलनी मुश्किल है। पिछले सात दशकों में स्वास्थ्य के नाम पर बेहद खर्च किए गए लेकिन कुछ नहीं हो सका। अभी हालात यह हैंं कि स्वास्थ्य सेवा अभी भी पर्याप्त नहीं है और सारा दोष केंद्र सरकार पर मढ़ा जा रहा है। हम केवल इतना ही जानते हैं कि कितने लोगों की टेस्टिंग हुई उसमें कितने पॉजिटिव पाए गए और बाद में कितने नेगेटिव हो गए और कितने लोगों की मौत हुई। यह नहीं पता चल पाता है कि रोगियों को कितने दिनों तक अस्पताल में रखा गया और किस तरह के क्लीनिकल प्रबंधन को काम में लिया गया। अस्पताल चूंकि राज्य के अधीन होते हैं इसलिए उस पर केंद्र सरकार अपना जोर नहीं लगा सकती और अगर कोशिश भी करती है तो उसे राज्य के मामले में दखलअंदाजी का दोषी करार दिया जाता है।


सामाजिक स्थितियों के कारण रोगियों की जनसांख्यिकी के बारे में किसी को कुछ मालूम है सिवा उनकी उम्र और लिंग के। इस महामारी की प्रकृति को समझने के लिए यह जानना जरूरी होगा कि मरीजों या मरने वालों में या मरने वालों में गरीबों और हाशिए पर पड़े समुदायों का प्रतिनिधित्व औसत से अधिक है । उदाहरण के लिए अमेरिका में एफ्रो अमेरिकन और ब्रिटेन में अश्वेतो पर कोविड-19 की मार ज्यादा पड़ी है।





ऐसी स्थिति में अगर सरकार लोगों की आदतें बदलने के लिए क्रमिक रूप से लाॅक डाउन को बढ़ाते हुएअनुशासन लाने के लिए कुछ करती है तो इसकी आलोचना नहीं होनी चाहिए क्योंकि इसका उद्देश्य देश की जनता की जीवन रक्षा है।

Saturday, May 30, 2020

मोदी जी के 365 दिन



मोदी जी के 365 दिन


आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे दौर के 365 दिन पूरे हुए। भारत के इतिहास में यह कोई बड़ी बात नहीं है। भारतीय लोकतंत्र में 1 साल के वक्त गुजरना कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि सरकार की अवधि 5 साल की होती है। इसमें बड़ी बात यह है कि यह 2 वर्ष कैसे गुजरे और इन 2 वर्षों में सरकार ने जो सपने देखे थे जो वायदे किए थे उनमें कितने पूरे हो सके और कितने यूं ही रह गए।इसके अलावा कोई काम ऐसे हैं जो इस स्थिति के अनुसार किए गए। फैसले से पीछे जिनका विरोध भी हुआ। मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान ऐतिहासिक असर करने वाले भी फैसले लिए जिनमें आत्मनिर्भर भारत अभियान भी एक है। महत्वपूर्ण रहा कश्मीर से धारा 370 को हटाया जाना और तीन तलाक को खत्म किया जाना सबसे महत्वपूर्ण है। महामारी के दौरान बिगड़ी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए मोदी जी ने 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की। इस फैसले की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 21वीं सदी की भारत हो यह सब का सपना ही नहीं जिम्मेदारी है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा था आत्मनिर्भरता के रास्ते पर चलना होगा। इसके लिए इकॉनमी इंफ्रास्ट्रक्चर सिस्टम डेमोग्राफी और डिमांड जैसे कम हो को मजबूती देने का आह्वान भी किया। मोदी सरकार ने कश्मीर में धारा 370 को निष्प्रभावी बनाने के साथ-साथ राज्य को दो हिस्से में बांटने का भी काम किया। इस फैसले का महत्त्व इसी से जाना जा सकता है जब से भारत आजाद हुआ तब से अब तक एक विधान और एक निशान नहीं था। मोदी जी ने फैसला लेकर एक देश एक विधान और एक निशान लागू कर दिया। यह फैसला भारत के इतिहास सदा याद किया जाता रहेगा। भारत में कश्मीर को दो हिस्से में बांटने के अलावा कोई इतना महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कार्य नहीं हुआ था जिसे भारत के इतिहास में सदा याद रखा जाए। मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से निजात दिलाने का कदम नहीं उठाया। मुस्लिम विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक 2019 को संसद के दोनों सदनों से पारित करवाया। यही नहीं नागरिकता संशोधन कानून को भी मोदी सरकार में इसी कार्यकाल में अमलीजामा पहनाया। 10 जनवरी 2020 को इसे पूरे देश में लागू कर दिया गया। इस कानून से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में रह रहे लाखों हिंदू बौद्ध सिख पारसी ईसाई और यहूदी लोगों को भारत की नागरिकता मिल सकती है। इसका प्रचंड विरोध हुआ लेकिन सरकार ने अपना फैसला नहीं बदला हां इतना जरूर कहा किसी भी अल्पसंख्यक नागरिकता नहीं छीनी जाएगी। यू ए पी ए यानी गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम विधेयक 2019 भी इसी दौर में पारित हुआ।


एक देश एक राशन कार्ड जैसा ऐतिहासिक निर्णय भी इसी दौर में किया गया। इस योजना के तहत पूरे देश में एक ही राशन कार्ड पर कोई भी व्यक्ति कहीं से भी राशन उठा सकेगा। यह योजना 1 जून से आरंभ होगी और इसके अंतर्गत बिहार उत्तर प्रदेश पंजाब तेलंगना महाराष्ट्र गुजरात हरियाणा राजस्थान कर्नाटक मध्य प्रदेश झारखंड गोवा त्रिपुरा हिमाचल प्रदेश और दमन दीव पहले ही जुड़ चुके हैं। इससे ना केवल भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी बल्कि रोजगार के लिए कहीं दूसरी जगह जय लोगों को मिलने वाली सब्सिडी भी उन्हें मिलती रहेगी अब गरीबों को सब्सिडी वाले राशन से वंचित नहीं होना पड़ेगा।


इसी के साथ आर्थिक क्षेत्र में भी एक क्रांतिकारी परिवर्तन किया गया। 10 सरकारी बैंकों का विलय कर चार बड़े बैंक बनाए गए। इससे बैंकों के बढ़ते एनपीए से राहत मिलेगी।


5 साल की अवधि को पूरा कर दूसरे दौर में चुनाव को जीत कर आना अपने आप में सनद है कि सरकार ने पहले दौर में लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने का प्रयास किया और यह प्रयास न केवल दिखा बल्कि देशवासियों को विश्वसनीय भी लगा। नरेंद्र मोदी ने अपने शासन के दूसरे दौर का बागडोर संभालते कुछ वायदे किए थे जैसे अर्थव्यवस्था को गति देकर उसे 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना , सबके लिए मकान , सबके लिए स्वास्थ्यऔर जल सुरक्षा। जरा गौर से देखें तो लगेगा इन तीनों में अन्योन्याश्रय संबंध है। लेकिन इसका थोड़ा विश्लेषण करें तो निष्कर्ष मिलेगा तीनों एक होते हुए भी अलग अलग हैं। इन्हें एक मान कर एक साथ मूल्यांकन करना गलती होगी। जैसे अर्थव्यवस्था में भारी सुधार होने के बावजूद जल सुरक्षा संभव नहीं है। आर्थिक स्थिति चाहे जितनी मजबूत हो अगर पानी नहीं है तो उसे प्राप्त करना बहुत कठिन है। क्योंकि यह जीवनशैली से जुड़ी आदत है उसी तरह स्वास्थ्य भी जीवनशैली पर निर्भर एक अवस्था है। मोदी जी ने इन्हें बड़ी बारीकी से परखा और फिर इसकी उपलब्धता की कोशिश में लग गए। इसलिए आइए पहले सबके लिए आवास के उनके वायदे को देखते हैं।


जब मोदी सरकार ने दूसरे दौर की कमान संभाली तो उन्होंने एक करोड़ 13 लाख घरों की जरूरतों को महसूस किया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1 वर्ष बीतते बीतते लगभग 27 लाख घर तैयार हो गए यानी देश के लगभग 27 लाख बेघर लोगों के सर पर छत हो गई। कोशिशें अभी जारी हैं। गांव में 2 करोड़ घरों की जरूरतों का आकलन किया गया और इनमें लगभग 20 लाख घर तैयार हो चुके हैं। इसमें बड़ी बात यह है यह सारे घर सभी जरूरी सुविधाओं से जैसे पानी, बिजली इत्यादि से युक्त हैं। इसका मतलब है करीब करीब 50 लाख बेघर लोगों को रहने लायक घर मिला। यह मानव संसाधन हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में जुट जाएगा।


यही हाल स्वास्थ्य में सुधार की कोशिशों का भी है। इतनी बड़ी आबादी और इसमें तरह-तरह की आदतें जीवनशैली इत्यादि के बाद भी सरकार ने जो आयुष्मान भारत योजना आरंभ की और गांव के लिए मोदी जी ने मोदी केयर योजना की मंजूरी दी उसकी सारी दुनिया की नजर गई। आलोचकों का कहना है कि इससे केवल निजी अस्पतालों को ही लाभ मिल रहा है। बेशक यह बात है लेकिन उसका कुछ कारण भी है। निजी अस्पतालों में जो उपकरण और विशेषज्ञ हैं वह अभी सरकारी अस्पतालों मैं नहीं हैं। फिलहाल, हमें जनता के स्वास्थ्य को देखना है किसी योजना के गुण या अवगुण को नहीं। इस दिशा में भी प्रधानमंत्री ने कदम उठाया है और पूरे देश में लगभग 1 लाख 50,000 हेल्थ सेंटर खोलने की योजना बनाई है जिनमें 8000 काम भी करने लगे हैं।





मोदी सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को 5 खरब डालर तक पहुंचाने योजना बनाई थी। यद्यपि कोविड-19 जैसी महामारी के कारण हमारी अर्थव्यवस्था को आघात लगा है और 5 खरब डालर तक पहुंचना अब संभव नहीं लग रहा है। फिर भी कोशिश जारी है क्योंकि अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा योगदान सेवा क्षेत्र का होता है और यह क्षेत्र बेरोजगारी के कारण ठंडा पड़ गया है।

Thursday, May 28, 2020

भारत चीन सीमा पर बर्फ पिघली



भारत चीन सीमा पर बर्फ पिघली


भारत चीन के बीच संबंधों में तनाव आ गया था और ऐसा लग रहा था कि बस जंग होने वाली है। लेकिन भारत का जवाबी रुख देखकर चीन थोड़ा नरम पड़ गया और भारत में चीनी राजदूत सुन वेइडोंग ने कहा कि मतभेदों का असर द्विपक्षीय संबंधों पर नहीं पड़ने देना चाहिए और आपसी विश्वास बढ़ाया जाना चाहिए। यह भाषा कूटनीतिक है और समझने वाली है अगर कोई पक्ष संबंधों पर असर नहीं डालना चाहता तो फिर मतभेद होंगे ही क्यों? झूठ बोलना चीन के डीएनए में शामिल है। 1960 के दशक में हिंदी चीनी भाई भाई और पंचशील के नारों की गुहार करता चीन भारत में घुस आया था और भारत को काफी हानि उठानी पड़ी थी। उस समय लद्दाख में चीन का जिओ पॉलीटिकल वर्चस्व था। आज भारत की तैयारी देखकर चीन ने यह समझ लिया कि यह मोदी का भारत है और मुंह तोड़ जवाब मिलेगा। वैसे भी चीन दुनिया भर में अपने विरोध के कारण बहुत ज्यादा उग्र नहीं हो सकता। क्योंकि उसने देख लिया चीनी तैयारी के खिलाफ भारत तो तैयार है ही अमेरिका भी मध्यस्था करने को खड़ा है। यही कारण था चीनी राजदूत ने सैन्य गतिरोध कहा कि बातचीत के जरिए मतभेद सुलझाए जाने चाहिए। चीन के राजदूत ने कहा हमें मूल निर्णय का पालन करना चाहिए कि दोनों देशों के पास एक दूसरे के लिए अवश्य हैं दोनों को एक दूसरे से कोई खतरा नहीं है। हमें एक दूसरे के विकास के लिए सही तरीके से देखने और रणनीतिक विश्वास बढ़ाने की जरूरत है। चार मोर्चा पर भारत और चीन आमने सामने है। पिछली 5 और 6 मई को पेंगोंग त्सो में दोनों सेनाओं के बीच तनाव बढ़ने के बाद क्षेत्रों के साथ-साथ उत्तरी सिक्किम और उत्तराखंड के कई अन्य विवादित क्षेत्रों में भी दोनों देशों ने अपनी फौज बढ़ा दी थी। चीनी राजदूत ने कहा और भारत को अच्छे पड़ोसी चाहिए और एक साथ मिलकर आगे बढ़ना चाहिए चाहिए। राजदूत ने कहा दो प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के रूप में भारत और चीन को निवेश उत्पादन क्षमता और अन्य क्षेत्रों में व्यवहारिक सहयोग मजबूत करना चाहिए तथा सामान्य हितों का विस्तार करना चाहिए।


इस पूरे गतिरोध की वजह भारत द्वारा लद्दाख में अक्साई चिन की गलवां घाटी में महत्वपूर्ण सड़क का निर्माण है जिसे लेकर आपत्ति जता रहा है। गत 5 मई को वहां तैनात भारतीय और चीनी सेनाओं में जमकर मारपीट हुई इसमें डंडे और रॉड्स का खुलकर उपयोग हुआ। दोनों तरफ के कई सैनिक घायल हो गए। दरअसल , गद्दाख में निर्मित दार- श्योक- दौलत बेग ओल्डी रोड मैदानी इलाका ग्लवान घाटी तक जाता है। इस सड़क को सीमा सड़क संगठनने बनाया है। सीमा सड़क संगठन भारत सरकार की एजेंसी है और वह पड़ोसी मित्र देशों के सीमाई इलाके में बनाता रहा है। चीन की इन हरकतों के पीछे उसकी घबराहट भी है। भारत में उस क्षेत्र में 3023 किलोमीटर लंबी 61 सड़कों निर्माण की योजना बनाई है। इन सड़कों को रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इनमें से 2305 किलोमीटर सड़क का काम पूरा हो चुका है और बाकी पर काम तेजी से चल रहा है। चीन का कहना है भारत वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सड़क का निर्माण कर रहा है जबकि भारत का कहना है कि वह अपनी सीमा के भीतर सड़के बना रहा है और किसी मूल्य पर इसे बंद नहीं किया जाएगा। हालांकि, फिलहाल, अस्थाई तौर पर सड़क बनाने का काम रोक दिया गया है लेकिन दोनों देशों ने सीमा पर सैनिकों की गश्त बढ़ा दी है। भारत ने कहा कि चीनी सेना लद्दाख सिक्किम में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गश्त में बाधा डाल रही है। भारत ने बीजिंग के उस दावे का खंडन किया है जिसमें उसने कहा है भारतीय सेना के चीनी सीमा में घुसपैठ के कारण तनाव बढ़ा है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि सीमा पर सभी गतिविधियां चीन की तरफ से हैं भारत तो सदा बहुत जिम्मेदाराना रुख अपनाता है। लेकिन भारत अपनी संप्रभुता और सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।


भारतीय विदेश मंत्रालय के बयान से 1 दिन पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने खराब स्थिति की कल्पना करते हुए अपनी सेना को युद्ध की तैयारी में तेजी लाने का हुक्म दिया और कहा कि सेना पूरी दृढ़ता के साथ संप्रभुता की रक्षा करे। लेकिन भारत के जवाब के बाद उसका और उसने कहा कि हम बातचीत और विचार-विमर्श के माध्यम से मसलों को सुलझाने में सक्षम हैं। चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा कि दोनों देशों ने सीमा संबंधित तंत्र और कूटनीतिक माध्यम स्थापित किए है। हालांकि कुछ टिप्पणीकार चीन की सकारात्मकता देख रहे हैं जबकि यह एक भुलावा भी हो सकता है। कौटिल्य ने अपनी विश्व विख्यात पुस्तक अर्थशास्त्र में लिखा है कोई भी जीव अगर स्वभाव के विपरीत कार्य करें तो उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए।

Wednesday, May 27, 2020

बंद होती दुनिया की सीमाएं और लौटते भारतीय



बंद होती दुनिया की सीमाएं और लौटते भारतीय





कई वर्षों से भारत का वैश्वीकरण हो रहा है लेकिन भारतीय समुदाय पहले ही वैश्विक हो गया है। गूगल से लेकर छोटे-मोटे कामों तक दुनिया के लगभग हर देश में भारतीय जुड़े हुए हैं। औपनिवेशिक काल से ही भारत के लोग विदेशों में पहुंच गए हैं। मृत्युंजय कुमार सिंह ने अपनी ताजा पुस्तक गंगा रतन बिदेसी में गिरमिटिया मजदूरों के विदेश जाने की कथा बयान करते हुए लिखा है कि भारत से मजदूरी के लिए विदेशी सरकार इन मजदूरों को विभिन्न देशों में भेज रही थी। यही कारण था औपनिवेशिक काल में भारतीय समुदाय ने कई देशों में अपनी उपस्थिति दर्ज की थी लेकिन पिछले 50 वर्षों में इसमें भारी गति आई है। भारतीय कामगार खाड़ी के देशों में जाने देंगे हमारे डॉक्टर इंजीनियर चार्टर्ड अकाउंटेंट और अन्य पेशेवर अमेरिका जाने लगे, भारतीय छात्रों ने पढ़ाई के लिए विदेशों का रुख किया।


एशिया के हम परिंदे आसमा है जद हमारी


जानते हैं चांद सूरज जिद हमारी जद हमारी





उस समय से आरंभ हुआ यह प्रवाह अब एक करोड़ 75 लाख तक पहुंच गया है। यह संख्या दुनिया के सबसे बड़े प्रवासी समुदाय की है। यदि इसमें भारतीय मूल के लोगों को भी जोड़ दिया जाए तो यह संख्या 3 करोड़ से ऊपर हो जाएगी। हम भारतीय जिन्हें विदेशों में देसी कहा जाता है वह हांगकांग से कनाडा तक और न्यूजीलैंड से स्वीडन तक छाए हुए हैं। प्रवासी भारतीय समुदाय के बारे में बहुत व्यापक अध्ययन और लेखन हो चुका है। प्रवासी भारतीयों ने हर क्षेत्र में बेहतरीन प्रदर्शन किया है। वे विदेशों में प्रधानमंत्री, सीनेटर और सांसद चुने गए हैं। अरबपति व्यापारी और कई कंपनियों के सीईओ भी हैं।


हम वही जिसने समंदर पर बांध साधा


हम वही जिनके लिये ना दिन- रात की बाधा


हम हैं देसी मगर हां हर देश में छाए हुए हैं





1960 के दशक में अमेरिका और ब्रिटेन में अवसर पैदा हुए और भारतीयों ने इसका लाभ उठाया। वर्तमान में अमरीका में भारतीय मूल के लोग चालीस लाख से ज्यादा है जिनमें 5 लाख से ज्यादा छात्रों की संख्या है। प्रवासन की यही स्थिति कनाडा ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी है। के देशों में प्रवासन का स्वरूप थोड़ा अलग है। यहां ब्लू कॉलर से लेकर वाइट कलर तक के कामगार हैं। साड़ी के देशों में भारतीयों की कुल संख्या 80 लाख से ज्यादा है। यहां 25 लाख से ज्यादा काम करने वाले अकेले केरल के हैं। लेकिन इन लोगों को वहां की नागरिकता हासिल नहीं है।


कोविड-19 ने भारतीयों के प्रसार पर न केवल रोक लगा दी है बल्कि इसकी दिशा उल्टी कर दी है। लोग स्वदेश लौट रहे हैं। भारतीय प्रवासन पहले तो आर्थिक कारणों से और फिर पारिवारिक एकीकरण से प्रेरित रहा है। हाल के वर्षों में भारतीय छात्रों में दुनिया भर के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में दाखिला लेना शुरू कर दिया था। अचानक कोविड-19 के विस्फोट से अनेक देशों ने अपनी सीमाएं बंद कर दी हैं और कई देश लगातार बंद कर रहे हैं। भारतीयों की एक बड़ी आबादी स्वदेश लौटने को मजबूर हो गई है। अभी तक तो देश के दूसरे शहरों में मजदूरी कर रहे हैं प्रवासी मजदूरों की व्यथा कथा ही मीडिया में आई है लेकिन कभी इन प्रवासियों के बारे में किसी ने सोचा नहीं कि यह लोग जब लौटेंगे तो क्या होगा?इसके गंभीर नतीजे सामने आएंगे। जिंदगियां बाधित होंगी, अर्थव्यवस्था पर आघात लगेगा और विदेशों से भेजे जाने वाले धन की मात्रा बहुत घट जाएगी। अब तक जो दुनिया हमें इतनी खुली खुली लग रही थी दुनिया ने हमारे दरवाजे बंद करने शुरू कर दिए हैं। कोविड-19 ने भारतीय प्रवासियों के जीवन को बुरी तरह बाधित किया है। अनेक भारतीयों की नौकरी चली गई। वे रोजगार के लिए चिंतित हैं। खाड़ी के देशों में तीन लाख लोग अपनी नौकरियां गंवाने के बाद भारत लौट रहे हैं। यदि हालत अमेरिका ब्रिटेन सिंगापुर और कनाडा की भी है। दूसरे भारत की यात्राएं भी बाधित हुई। जरा सोचिए, छात्र जो साल में एक दो बार भारत आ ही जाते हैं वह अटके पड़े हैं। न जाने अंतरराष्ट्रीय उड़ाने कब नियमित होंगी और वह आसानी से घर लौट सकेंगे। जिन भारतीयों की नौकरी चली गई और जो भारतीय वहां फंस गए हैं वे बुरी तरह चिंतित हैं। अगर किसी भी तरह से भारत सरकार की सहायता से स्वदेश आ भी गए तो करेंगे क्या, रहेंगे कैसे? जिन्होंने प्रवासी नागरिक का दर्जा हासिल कर लिया है वे भी देख रहे हैं कि उनके आने पर पाबंदियां लग सकती हैं। वह पढ़ रहे छात्रों को अपने भविष्य पर पुनर्विचार करना होगा।





यही नहीं यह भारतीय जो धन भेजते हैं वह 2019 के आंकड़ों के मुताबिक लगभग 83 अरब डालर से ज्यादा है अब यह धन का प्रवाह खतरे में पड़ गया है और किस कारण हमारी अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। महामारी ने हमारे भारतीय समाज के कई पहलुओं को प्रभावित किया है । आज तक का सारा कारोबार खुली स्वागत करती हुई दुनिया पर निर्भर था और अब उस दुनिया के दरवाजे बंद होते दिख रहे हैं। हमारे प्रवासी समुदाय को भारत आकर अपने अस्तित्व के संकट से गुजरना होगा।

Tuesday, May 26, 2020

भारत चीन सीमा पर फिर तनाव


 भारत चीन सीमा पर फिर  तनाव

 बड़ा अजीब संयोग है,  जवाहरलाल नेहरू आज 56 वीं  पुण्यतिथि है।  नेहरू पर चीन से पराजय  का दाग कुछ ऐसा लगा हुआ है उसका राजनीतिक लाभ भी उठाया जाता है।  मेजर जनरल बीएम कौल  ने  अपनी पुस्तक द हिमालयन ब्लंडर  में  स्पष्ट लिखा है कि  भारत चीन का युद्ध बेशक रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण है लेकिन आने वाले दिनों में इसका सियासी  लाभ भी उठाया जाएगा।  अब फिर चीन ने  लद्दाख की सीमा पर अपनी फौजों की उपस्थिति बढ़ा दी है और उससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया है।  पहले तो बातचीत के जरिए मामले को सुलझाने की कोशिश की गई लेकिन बात नहीं और अब खबर है कि नियंत्रण रेखा पर चीनी फौज की तादाद बढ़ती जा रही है। पूर्वी लद्दाख में सेना में अतिरिक्त टुकड़ियां तैनात कर दी हैं और 24 घंटे क्षेत्र की निगरानी चल रही है। यहां तक कि चीन ने उत्तराखंड के उस पार मध्य क्षेत्र  के गुलडोंग  में बड़ी संख्या में   सेना उतार दी है।  जवाब में भारत को भी उस क्षेत्र में तैनाती करनी पड़ी है।  खबरों को मानें  तो चीनी सेना की तैनाती  विगत कुछ दिनों से चल रही है और इसी कारण से मजबूर होकर वहां भारत  ने अपनी सेना उतारी है। खबर है कि हारसिल  क्षेत्र में भी  चीन ने भारी संख्या में फौज  लेकिन वहां का इलाका इतना दुर्गम है कि  पेट्रोलिंग  कठिन है। इसलिए  वहां भी   ड्रोन का उपयोग किया जा रहा है ताकि पूरे क्षेत्र पर 24 घंटे नजर रखी जाए और स्थिति की समीक्षा की जा सके। 
यहां यह बता देना प्रासंगिक होगा कि भारत चीन के बीच अक्सर पेंगोंग सो  झील के विवादास्पद क्षेत्र में जोर आजमाइश होती है।  भारत और चीन के बीच सीमा पर विवाद है इसलिए इसे वास्तविक नियंत्रण रेखा कहते हैं।   यह इलाका  पश्चिमी,  मध्य और  पूर्वी 3 क्षेत्रों में बंटा है। विवाद इस बात का है कि भारत का दावा है कि नियंत्रण रेखा 3488 किलोमीटर लंबी है चीन इस बात पर अड़ा हुआ है कि यह  रेखा केवल 2000 किलोमीटर लंबी है।  यानी,   1488 किलोमीटर  क्षेत्र का विवाद है।  दोनों देशों की सेना इस इलाके में गश्त करती रहती है और एक दूसरे पर वर्चस्व कायम करने की कोशिश करती है जैसा कि इस महीने के शुरू में सिक्किम के नाथूला में हुआ था। मई में ही दो बार भारत और चीन की   सेना में विवाद हुआ झड़पें  हुई जिसमें दोनों पक्षों के सैनी  घायल हुए।  दरअसल चीन की सीमा 14 देशों से  सटी हुई है।  इनमें नेपाल और पाकिस्तान जैसे देश को इसने एक तरह से गुलाम बना  लिया है। पश्चिमी क्षेत्र में पूर्वी लद्दाख का इलाका आता है और  काराकोरम  इस इलाके में है। हिमाचल प्रदेश की सीमा इसी विवादास्पद क्षेत्र में है। 2017  के 19 अगस्त को  डोकलाम में भारत चीन के फौजियों में हाथापाई हो गई थी जिसमें कई लोग घायल हो गए थे ।भारत पश्चिमी क्षेत्र में अक्साई चीन पर अपना दावा करता है जो फिलहाल चीन के कब्जे में है 1962 में भारत के साथ युद्ध में चीन ने इस पूरे इलाके पर कब्जा कर लिया था।   इसी जंग की तोहमत  अभी भी नेहरू पर लगती है।  दूसरी तरफ पूर्वी क्षेत्र में चीन  का कहना है  कि अरुणाचल प्रदेश उसका है क्योंकि  यह तिब्बत का हिस्सा है।  तिब्बत और अरुणाचल के बीच  मैक महोन रेखा है  और चीन उसे नहीं मानता ।  चीन का कहना है 1914 में  जब ब्रिटिश भारत और तिब्बत में समझौता हुआ था तो वह वहां शामिल नहीं था इसलिए वह इस समझौते के तहत बनाई गई मैक महोन  रेखा को नहीं मानेगा।  दरअसल यह बात है 1914 में तिब्बत एक स्वतंत्र राष्ट्र था लेकिन बेहद कमजोर था  तेनजिंग शुंडे    के मुताबिक तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश क्षेत्रों में लिथियम की खान होने की  संभावना है इसलिए चीन  उस पर नजर गड़ाए हुए हैं और तरह तरह के विवाद पैदा कर  रहा है।  अभी जैसे हाल में उसने नेपाल भारत सीमा विवाद हवा दे दी।  कहा जा सकता है कि चीन अरुणाचल प्रदेश में   मैकमहोन  रेखा को नहीं मानता और न अक्साई चीन पर  भारत के दावे को मानता है। यह  एक ऐसा  विवाद है  जिसके चलते दोनों देशों के बीच कभी सीमा निर्धारण नहीं हो सकता इसलिए यथास्थिति बनाए रखने की दृष्टि से वास्तविक नियंत्रण रेखा जैसी शब्दावली का उपयोग हो रहा है।  हालांकि  यह भी अभी स्पष्ट नहीं है  क्योंकि दोनों देश नियंत्रण रेखा को अलग-अलग मांगते हैं।  इस पर कुछ इलाके ऐसे हैं जहां भारत और चीन  की सेना में तनाव की खबरें अक्सर आती हैं। वैसे अनुमान है कि शुक्रवार को  पीपुल्स कांग्रेस की शुरुआत हो रही है और जब तक यह खत्म नहीं होगी तब तक शायद ही  यह तनाव खत्म हो।  दोनों देशों में  तल्खी इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि दोनों  देशों के नेता एक दूसरे देश का नाम तक नहीं ले रहे।  2 दिन पहले चीन के विदेश मंत्री वांग येई  ने  अपने लंबे प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत का जिक्र  तक नहीं किया।  इसे देखकर भारत ने भी चीन का नाम लेना बंद कर दिया है। डोकलाम के बाद पहली बार इतना तनाव देखा गया है। चीन इस इलाके में लगातार खुद को मजबूत कर रहा है।  चीनी सैनिकों ने विगत एक पखवाड़े में ग्लवान घाटी में  अपनी उपस्थिति बढ़ाता जा रहा है। सूत्रों के अनुसार  इस क्षेत्र में  उसने लगभग एक सौ तंबू और बनकर बनाने के बड़े औजार भी जमा कर लिए हैं।  भारत में पिछले हफ्ते इस पर गंभीर आपत्ति जताई थी।  परंतु चीन पर कोई असर नहीं पड़ा।  परमाणु शक्ति संपन्न दो देशों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है।  वैसे युद्ध की संभावना बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन 1962 उदाहरण को भुलाया नहीं जा  सकता। भारत को पूरी तरह सचेत और तैयार रहना पड़ेगा और चीन को यह बता देना होगा इस बार पंचशील वाले नेहरू नहीं हैं बल्कि आर पार का फैसला करने वाले नरेंद्र मोदी  हैं।  इतना ही नहीं भारत की  सेना 1962  वाली नहीं है।

Monday, May 25, 2020

नौकरशाही ने प्रधानमंत्री को निराश किया



नौकरशाही ने प्रधानमंत्री को निराश किया


कोरोनावायरस के फैलने से रोकने के लिए दुनिया के कई देशों ने लॉक डाउन जैसी व्यवस्था लागू की। इस कारण भारत में जो तबाही हुई और जो व्यापक कोहराम मचा उसका उदाहरण इतिहास में नहीं है। लॉक डाउन के बाद से लाखों लोग सड़कों पर हैं । देश की आबादी बहुत बड़ा भाग शहरों से गांव के बीच चल रहा चलता जा रहा है। यद्यपि, सरकारों ने उन्हें लाने या घर भेजने का भरसक बंदोबस्त किया। लेकिन, इतनी बड़ी आबादी को आसानी से स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। एक प्रश्न है कि कोरोना संकट इस दौर में जिस मानवीय त्रासदी को और जिस पलायन को भारत ने झेला है वह सिर्फ भारत में ही क्यों हुआ? ना तो भारत दुनिया का सबसे गरीब देश है ना सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है और ना ही यहां के सर्वोच्च नेता नरेंद्र मोदी की नेक नियती में कोई कमी है। इसके बावजूद इतनी बड़ी आबादी सड़कों पर कैसे आ गई और वह अभी भी कायम है। इसके लिए हमें भारतीय लोकतंत्र और नौकरशाही के रिश्तों का विश्लेषण करना होगा और उसके बरक्स संसद की भूमिका की जांच करनी होगी। भारत की जो लोकतांत्रिक व्यवस्था है वह हमने ब्रिटेन से लिया है। इसके अनुसार हमारी कार्यपालिका संसद के प्रति जवाबदेह है। कार्यपालिका में दो तरह की व्यवस्था है एक तो निर्वाचित और दूसरी चयनित। निर्वाचित व्यवस्था के अंतर्गत प्रधानमंत्री इत्यादि आते हैं और व्यवस्था के अंतर्गत ब्यूरोक्रसी आती है। ब्यूरोक्रेसी का सर्वोच्च पद कैबिनेट सेक्रेटरी का होता है और प्रधानमंत्री उसके ऊपर होते हैं। अब अगर कहीं व्यवस्था कारगर नहीं होती तो कार्यपालिका के दोनों अंगों की समीक्षा होनी चाहिये। क्योंकि इनका आपसी तालमेल से ही व्यवस्था का सृजन होता है। भारत में कोरोना वायरस का कहर एक ऐसे वक्त में हुआ जब पूरी दुनिया में दक्षिण पंथ का उभार का दौर चल रहा था और यह नेता अपनी भाषण शैली और विरोधियों पर तीखे प्रहार के लिए जनता के एक हिस्से के साथ भावनात्मक संबंध बना लेते हैं और इस जन समूह में उनके कार्यों की समीक्षा नहीं होती। विख्यात इतिहासकार डॉ बी बी मिश्र ने अपनी पुस्तक ब्यूरोक्रेसी इन इंडिया में लिखा है कि ब्यूरोक्रेट्स, संसद और न्यायपालिका मिलकर सरकार पर अंकुश लगा सकती है लेकिन दक्षिण पंथ के उभार में यह तीनों आजाद नहीं रह पाते। भारत में शासन व्यवस्था ब्रिटेन की नकल है लेकिन कोरोना संकट के काल में ब्रिटिश संसद लगातार काम करती रही जबकि इसके विपरीत भारत में संसद मौन रही। संसद स्थगित कर दी गई। कार्यपालिका जो कर रही है या कार्यपालिका ने जहां भूल की है यह कौन पूछेगा। ऐसा नहीं प्रधानमंत्री का लोगों से संवाद नहीं हो पा रहा है। लेकिन, उस संवाद में खिलाड़ी शामिल हैं। कोई भी महामारी एक साथ पब्लिक हेल्थ और कानून व्यवस्था का विषय है और यह दोनों विषय राज्यों के कार्यक्षेत्र में आते हैं। इस नाते उचित होता कि लॉक डाउन की घोषणा के पहले मुख्यमंत्रियों से परामर्श लिया जाता लेकिन यह बाद में हुआ। इस बीच मंत्रिमंडल की भी लगातार बैठकें नहीं हुई। इसलिए अपनी तमाम नेकनियती के बावजूद प्रधानमंत्री जमीनी हकीकतों से पूरी तरह वाकिफ हो पाए। उन्हें इस बात का अंदाज ही नहीं लगा लॉक डाउन के बाद जनता पर क्या असर होगा। इतना ही नहीं इस दौरान ब्यूरोक्रेसी की भूमिका भी घटी हुई दिखाई पड़ी। गृह और स्वास्थ्य मंत्रालयों के फैसलों के बारे में प्रेस ब्रीफिंग करने का जिम्मा जॉइंट सेक्रेटरी स्तर के अफसरों को दिया गया। यह मझौले दर्जे के अफसर हैं। इससे साफ पता चलता है कि कोरोनावायरस से निपटने के लिए प्रधानमंत्री पूरी तरह से नौकरशाही पर निर्भर हैं। समाजशास्त्री मैक्स वेबर के अनुसार नौकरशाही में संस्था को चलाने वाले विशेषज्ञ होने चाहिए। जिन्हें हर बात को लीगल और रैशनल तरीके से सोचना चाहिए। लेकिन कोरोना काल में भारतीय ब्यूरोक्रेसी अपनी भूमिका नहीं निभा सकी। वैसे भी नौकरशाही किसी भी अत्यंत जटिल मसले पर तुरंत और जरूरत के हिसाब से फैसले नहीं कर सकती। ऐसे में सबसे आसान प्रक्रिया में बंधे रहकर काम करना होता है।





अब जबकि लोकप्रिय नेता चुनकर आ रहे हैं तो वे हर चीज के विशेषज्ञ तो होते नहीं इसलिए विशेषज्ञता के लिए सदा नौकरशाही पर निर्भर करते हैं जबकि नौकरशाही के चयन और चरित्र ऐसा होता है जहां विशेषज्ञ तो होते नहीं। ऐसे ही नौकरशाही पर हमारा कोरोना संकट निर्भर है। हमारे अफसर मंत्रियों को खासकर प्रधानमंत्री को सलाह देने के काम में लगे रहते हैं और शायद यह अनुमान नहीं लगा पाते कि अचानक लॉक डाउन करने से करोड़ों लोगों पर संकट आ जाएगा और लोग सड़कों पर निकल आएंगे। प्रधानमंत्री के साथ भी यही हुआ। अब खबरें मिल रही हैं वे चिंतित हैं और इस संकट से निपटने के लिए राज्यों को अधिकार दे रहे हैं। प्रधानमंत्री की नेकनियती में कहीं दोष नहीं है लेकिन यह भी सच है कि कोई एक आदमी सभी बातों का विशेषज्ञ नहीं हो सकता। कहीं ना कहीं उससे चूक हो जाती है।