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Tuesday, June 12, 2018

आतंकवाद की नई श्रेणी

आतंकवाद की नई श्रेणी

माओवादी आतंकवाद या नक्सलवाद से करोड़ों  भारतीय बहुत ज्यादा चिंतित नहीं हैं क्योंकि इससे उनके जीवन पर सीधा प्रभाव पड़ता है।  लेकिन पिछले कुछ दिनों में जो कुछ हुआ उससे आतंकवाद के शब्दकोश में एक नया शब्द जुड़ गया। यह नया शब्द है शहरी माओवाद। यह आतंकवाद की नई श्रेणी है।  हाल में भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में पुणे पुलिस ने 4 लोगों को गिरफ्तार किया है और संदेह है कि उनके माओवादियों के साथ संबंध हैं। खास करके जब यह पता चला  कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या का षड्यंत्र रचा गया और उसका तरीका ठीक वही होगा जिस तरह से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्या की गई थी। जिस दिन से इस तरह की नई दिल्ली  एक मकान से चिट्ठी बरामद हुई है उस दिन से यह डर पैदा हो गया है कि भारत के विभिन्न दुश्मनों के बीच एक तालमेल है। भारत की सीमा जिसमें कई जगह ऐसी गुंजाइश है कि यहां से आर पार जाना या  आना संभव है और यह भी शंका है कि देश के भीतर आतंकियों के स्लीपिंग सेल्स बन रहे हैं तब से खतरा और बढ़ गया है। देश के भीतर से देश को खतरा है इस पर अभी तक ध्यान नहीं है। माओवाद और नक्सलवाद तो हमारे बुद्धिजीवी वर्ग का एक हिस्सा मानसिक समर्थन देता है,  उसके उद्देश्य और कारणों को सही बताता है दूसरी तरफ देश की बहुत बड़ी आबादी इस पर ध्यान ही नहीं देती क्योंकि इससे उसका कोई लेना-देना नहीं है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री की हत्या की धमकी वाला पत्र भी बहुत ज्यादा ध्यान नहीं आकर्षित कर सका और नक्सलियों के आंदोलन का समर्थन करने वाले समूह मैं इसे खारिज कर दिया।  हलाकि इस पत्र की सत्यता कि कई सबूत है और ऐसे कामकाज देश के लिए बेहद हानिकारक है। हमारे देश का एक वर्ग माओवाद और नक्सलवाद के समर्थन को अभिव्यक्ति की आजादी की संज्ञा देता है और इसके खिलाफ किसी प्रकार की करवाई को तानाशाही की संज्ञा देता है। 1960 में नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ आदर्शवादी आंदोलन जल्दी ही क्रांति के आह्वान में बदल गया।  माओ त्से तुंग के सिद्धांतों से प्रभावित नौजवान छात्र इस पर काबिज हो गए उनका दावा था कि लड़ाकू किसानों के साथ मिलकर सत्ता को पलट देंगे। आंदोलन 14 राज्यों में फैल गया। शक नहीं है इस तरह के विद्रोह को विदेशी ताकतें पैसा और मदद देती हैं ताकि भारत की आंतरिक सुरक्षा क्षतिग्रस्त हो सके। जरा सोचिए किसानों और गांव के लोगों के पास उम्दा हथियार तथा गोली बारूद  की अबाध आपूर्ति कैसे होती है, कहां से होती है। वर्ग संघर्ष के अलावा कई और मसायल जैसे किसानों की आत्महत्या, विशेष आर्थिक क्षेत्र का विरोध, जातिवादी राजनीति , मूल्य वृद्धि इत्यादि हैं जो इस तरह के आंदोलनों को खाद पानी देते हैं। आरंभ से लेकर आज तक भारत को क्षति पहुंचाने के यह तरीके नौजवानों का शोषण और उन्हें इस आंदोलन में शरीक कर रहे हैं। अगर आप इस तरह के आंदोलनों के इतिहास को देखें तो पता चलेगा तो उसके केंद्र में सदा से छात्र रहे हैं।  चाहे वह चीन का कम्युनिस्ट आंदोलन हो या दक्षिणपंथी कट्टरवादी इस्लाम हो या वामपंथी उदारवाद का विकास हो सब में छात्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 2011 की सीरिया के दारा का उदाहरण ले जिसे सीरिया क्रांति की चिंगारी कहा जाता है। 2013 14 मई मिस्र में भी कुछ ऐसा ही हुआ 2017 के तेहरान आंदोलन का उदाहरण सब जगह इसके केंद्र में छात्र ही रहे हैं। और अगर हम यह सोचते हैं कुि इन घटनाओं को भारत में नहीं दोहराया जाएगा तो हम भूल कर रहे हैं। चाहे वह दक्षिणपंथी इस्लाम   अथवा अति वामपंथी माओवाद हो सब में छात्रों को कट्टरपंथी बनाने की प्रक्रिया हमारे विश्वविद्यालय परिसरों में चालू है। चाहे वह इंडियन मुजाहिदीन हो या सिमी या माओवादी अथवा नक्सली सारी स्थितियों में छात्रों को ही विश्वविद्यालय होते कृषि किया जाता है उनमें कट्टरता भरी जाती है। भारत को सीमा के भीतर के इन खतरों से निपटना होगा और इन भर्तियों को रोकना होगा वरना एक खोई हुई पीढ.ी हमारे सामने होगी।

      यह कोई कल्पना नहीं है।  इसके उदाहरण है कि भारत शुरू से यह सोचता है  कि शत्रु सीमा के बाहर बैठा है। पुणे पुलिस ने जिन 5 लोगों को गिरफ्तार किया है  उनमें एक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पूर्व छात्र रहा है और दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व व्याख्याता  एस ए आर जिलानी का साथी भी रह चुका है। उल्लेखनीय है कि गिलानी को 2011 में संसद पर हमले के आरोप में गिरफ्तार भी किया गया था।

      शहरी माओवादी या नक्सली देश  की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरनाक  हैं। शत्रु देशों में इनके मददगार ही हैं।  यह सब देश को अस्थिर करना चाहते हैं चाहे वह जातिवादी झगड़ा हो या कश्मीर का अलगाववाद  हो या खालिस्तानी आंदोलन को फिर से भड़काना हो सब जगह इनका उपयोग होता है। अगर अभी से सरकार और समाज सचेत नहीं होते हैं तो यह भीतर-ही-भीतर भारत को समाप्त कर देगा।  वह दिन चले गए जब शत्रु सीमा के बाहर खड़ा रहता था, आज तो हम दुश्मन के साथ उठते बैठते हैं । वह बिल्कुल हमारे पड़ोस में बैठा हुआ है। यह आतंकवाद की नई श्रेणी है इसके लिए सरकार को नई तरह से व्यवस्था करनी होगी।  राजनीतिक मतभेद चाहे जो हो , हमें जब राष्ट्र को सामने रखकर सोचना होता है तो सही सोच की जरूरत है।


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