CLICK HERE FOR BLOGGER TEMPLATES AND MYSPACE LAYOUTS »

Monday, October 1, 2018

गांधी की आज भी ज़रूरत है 

गांधी की आज भी ज़रूरत है 
परमाणु बम के लिए पथ प्रशस्त करने के बाद जब विख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने उसके विनाशक परिणाम के बारे में सोचा तो द्रवित हो उठा। मानवमात्र से प्रेम के अपने आंतरिक गुणों के कारण वह बेचैन हो उठा।उसने अपनमे इस शांतिवाद को किसी भी बौद्धिक सिद्धांत से अलग बताया है। इंस्टीन ने 1931 में महात्मा गांधी पत्र लिखा जिसमें उन्होंने गांधी की बेहद प्रशंसा की। आइंस्टीन ने कहा , " आपने अपने कार्यों से यह प्रदर्शित किया है कि बगैर हिंसा के भी विजयी हुआ जा सकता है ,. यहां तक कि उनपर भी विजय पाई जा सकती है जिन्होंने हिंसा को अपना रखा है। मेरा यकीन है कि गांधी का नज़रिया हमारे काल के सभी राजनीतिज्ञों से ज्यादा प्रबुद्ध है। हमें उनके उद्देश्यों के आधार पर काम करने का प्रायस करना चाहिए । हमें अपने हितों के लिए हिंसा का सहारा नहीं लेना चाहिए बल्कि जो बुरा  है उसमें शरीक नहीं होना चाहिए।" 
आज जबकि दुनिया भर में हिंसा, सम्प्रदायवाद, शस्त्रप्रयोग का चलन बढ़ रहा है गांधी की प्रासंगिकता और बढ़ती जा रही है। हमारे देश में राजनीतिक तौर पर कुछ हो रहा है जिससे लगता है कि उन्हें प्रसंघीन बना कर धीरे - धीरे व्यर्थ कर दिया जाय इसीलिए उनके प्रतीकों को एक- एक कर अन्य बिम्बों से जोड़ा जा रहा है। लेकिन यह विडंबना है कि जहां हमारे देश में गांधी को व्यर्थ करने की साजिशें चल रहीं हैं वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गांधी प्रासंगिकता बढ़ रही हैं। 2014 में विख्यात पत्रिका टाइम ने गांधी के नमक सत्याग्रह को दुनिया का अबतक सबसे प्रभावशाली आंदोलन कहा है। विख्यात कवि, गायक और उपन्यासकार मृत्युंजय  कुमार सिंह  ने अपने भोजपुरी उपन्यास " गंगा रतन विदेसी " में भोजपुरी में  कहा है , जिसका हिंदी तर्जुमा है कि " नमक आंदोलन से बही असहयोग की हवा जिसने अंग्रेज़ सरकार को नाकों चने चबवा दिया।" एक चुटकी नमक में कितनी ताकत है यह गांधी जी ने अंग्रेजों को दिखा दिया।  यही नहीं 2013 में अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफ्रीकी महाद्वीप के 50 देशों के युवा नेताओं से अपील की थी कि " आज के बदलते परिवेश में गांधी जी स्वे प्रेरणा लेनी की ज़रूरत है।" लेकिन, भारत में बात ही दूसरी है यहां आज़ादी के संघर्ष की पृष्ठभूमि में जाकर अनर्गल आरोपों और तथ्यों के सहारे गांधी को दोषी ठहराया जा रहा है। गांधी मानते थे कि " मनुष्य इसलिए मनुष्य है कि उसमें विवेक है । मनुष्य की अपनी अंतरात्मा भी है जो सबमें है। मनुष्य की स्वतंत्रता और स्वायत्तता एकांगी नहीं होती।" आज हमें चयन की आज़ादी है। एक समय था जब हम पूर्व निश्चित दायित्व में बंधे थे और हम कैसा बनें यह दूसरों की आशाओं पर निर्भर करता था। आधुनिक मनुष्य इसमें नियंत्रण की झलक देखता था इसलिए वह इसे छोड़ने लगा और इस छोड़ने को हम  आधुनिकता कहने लगे, आज़ादी कहने लगे । पर हम आज़ाद हो सके क्या? आज एक नया और बड़ा ही खौफनाक दबाव है। यह दबाव है बाज़ार के बढ़ते वर्चस्व का जो हमारे काम, हमारी पसंद, ज्ञान, विज्ञान, रिश्ते, जीवन शैली सब कुछ तय करने लगा है। नियंत्रण के उपाय और औज़ार आज और तेज हो गए हैं। ऐसी स्थिति के बावजूद गांधी के मानवतावादी दृष्टिकोण पर सियासत हो रही है। सियासी जमात और नकली समाजसेवियों के लिए गांधी एक ब्रांड हैं। लेकिन इन्हें गांधी के लिए जो अंतिम व्यक्ति था उसकी पीड़ा नहीं दिखती।गांधी का चश्मा उनसे अलग हो गया, चरखे पर बैठा कोई दूसरा नज़र आता है। अहिंसा की बात पृष्ठभूमि में चली गयी। प्रतीकों को गौण करने की इस साजिश का मनोविज्ञान कुछ दूसरा है।
       आज गांधी को मजबूरी से जोड़ दिया गया है और एक कहावत बन गयी है " मज़बूरी का नाम महात्मा गांधी।" ऐसे में गांधीजी के बंदर याद आते हैं। जिनका संदश है, बुरा  मत कहो, बुरा मत देखो और बुरा मत सुनो। लेकिन आज मॉबलिंचिंग , ऑनरकिलिंग इत्यादि के परिप्रेक्ष्य में गांधी अगर होते तो क्या वे चुप रहते? क्या बसे इससे विचलित नहीं होते? गांधी जी ने भी अगर बुराइयों को नहीं देखा होता तो उन्होंने विद्रोह की नहीं चुनी होती। बुरे को बुरा कह कर ही उन्होंने आज़ादी की लौ जलाई। बुरे का यदि विरोध नहीं होगा तो लोकतंत्र निरीह हो जाएगा, बेक़सूर लोग मारे जाएंगे। विरोध करने वाले चुप हो जाएं इसीलिए गांधी को व्यर्थ बनाया जा रहा है, क्योंकि भारतीय  प्रेरणा के स्रोत वह भी हैं।

उसी को मार डाला जिसने सर ऊंचा किया सबका 
न क्यों गैरत से सर नीचा करें हिन्दोस्तां वाले

0 comments: