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Thursday, June 25, 2020

पीछे हटना तो तय हुआ पर समय सीमा क्या है?



पीछे हटना तो तय हुआ पर समय सीमा क्या है?


गलवान घाटी में भारत तथा चीन के बीच बहुत ही तीखा संघर्ष हुआ, सीमा की रक्षा करते हुए भारत के कई सैनिक शहीद हुए। इसके बाद दोनों देशों में सैनिक तथा कूटनीतिक स्तर पर बातें हुई एवं दोनों ने पीछे हटना मंजूर किया। बातचीत लगभग 11 घंटे चली इस वार्ता में समय सीमा नहीं तय हुई कि कब तक चीन पीछे हटेगा। मंगलवार को भारतीय सेना अध्यक्ष एमएम नरवाने दो दिवसीय दौरे पर लेह पहुंचे। घायल सैनिकों को देखने के लिए अस्पतालों में गए। उन्होंने अग्रिम मोर्चे का भी दौरा किया। वैसे चीन और भारत में पीछे हटने का जो करार हुआ उससे लगता है दोनों देश एक बफर जोन बनाना चाहते हैं। समझौते के अनुसार वहां सेना की संख्या कम करना और सैनिक शिविरों को हटाना भी है। बीजिंग में चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ ली जियान ने कहा कि दोनों देश चाहते हैं कि मतभेद को सही ढंग से सुलझा लिया जाए।


वैसे भारत और चीन सीमा पर मौजूदा विवाद की शुरुआत अप्रैल के तीसरे हफ्ते में हुई थी। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार उस समय वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की सैनिक टुकड़ियों और भारी ट्रकों की संख्या में भारी वृद्धि देखी गई थी। इसके बाद मई महीने में चीनी सैनिकों की गतिविधियां देखी गयीं। चीनी सैनिकों को लद्दाख में सीमा का निर्धारण करने वाली झील में भी गश्त करते देखे जाने की बात भी सामने आई। 2018-19 वार्षिक रिपोर्ट में भारत के रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि सरकार ने सीमा पर 3,812 किलोमीटर सड़क निर्माण के लिये चिन्हित किया है। इसमें से 3418 किलोमीटर लंबी सड़क बनाने का काम बी आर ओ को दिया गया है और परियोजनाएं लगभग पूरी हो गई है। विशेषज्ञों के अनुसार यही निर्माण कार्य दोनों देशों की तरफ से विवाद का असली कारण है, लेकिन एकमात्र वजह नहीं है। यही नहीं पिछले वर्ष धारा 370 को हटानाभारत की विदेश नीति विषय में हुए बदलाव, चीन की आंतरिक राजनीति और कोरोना के इस दौर में विश्व राजनीति में अपना वजूद कायम रखने के लिए चीन के प्रयासों को भी इसमें जोड़कर देखा जाना चाहिए। इससे पहले 1975 में भारतीय सेना के गश्ती दल पर अरुणाचल प्रदेश में एल ए सी पर चीनी सेना ने हमला किया था। उसके बाद देशों के राष्ट्राध्यक्षों में कई मुलाकातें हुईं। ऐसा लगा कि के साथ सीमा पर सब कुछ ठीक हो गया। नरेंद्र मोदी जब से भारत के प्रधानमंत्री बने हैं उनकी चीन के राष्ट्रपति पिछले 6 वर्षों में 18 बार मुलाकात हुई है लेकिन इस संघर्ष के बाद दोनों देशों में तनाव बढ़ता सा दिख रहा है।





चीन और भारत में बातचीत को अगर देखें तो लगता है कि वह बहुत जल्दी और बहुत आसानी से मान गया लेकिन चीन का मनोविज्ञान ऐसा नहीं है कहीं ना कहीं उसके हाथ दब रहे हैं। क्योंकि इस समय हमारे देश में लोकतंत्र की अराजक प्रकृति और प्रधानमंत्री के बयान पर बेवजह भ्रमित करने वाले संदेशों पर मचे बवाल के परिपेक्ष्य में आसान नहीं है कि चीन इतनी जल्दी बातें मान ले।पूरी दुनिया में इस खूनी और क्रूर संघर्ष के जो संदेश पहुंचे दो तरह के थे। पहला की शोषित लोगों के सहारे फली फूली गैर पश्चिमी ताकत जिसे करोड़ों लोगों को दरिद्रता के गर्त से बाहर निकालने के कारण थोड़ा सम्मान मिला है वही चीन भारत पर धौंस दिखा रहा हैऔर वह भी कुछ वर्ग किलोमीटर जमीन के एक विवादित टुकड़े के लिये। ब्रिटेन जैसी औपनिवेशिक ताकतों के साथ किए गए समझौतों अवमानना पूर्ण सहायता के साथ नजरअंदाज करने वाला देश अपने साथी एशियाई महाशक्ति थोड़ी भी संवेदनशीलता नहीं दिखा रहा है। इससे साफ जाहिर है पूरी दुनिया में दोनों पक्ष की जीत के बारे में हुई संवेदनशीलता नहीं है। 1962 की जंग के बाद जवाहरलाल नेहरू अपमानित करने के बारे में उसने एक बार भी नहीं सोचा। सच तो यह है कि नेहरू के बाद के सभी प्रधानमंत्री जानते थे कि भारत अक्साई चिन वापस नहीं दे पाएगा। मोदी भी इस तथ्य को जान चुके थे।


ताजा संघर्ष का दूसरा संदेश दरअसल एक परिणाम है वह कि भारत की सेना में अपना हक जताने को लेकर अधिक आत्मविश्वास है। उसने ड्रैगन को सबक सिखा दिया और वह भी हथियार से नहीं विशुद्ध पराक्रम से। यह कारगिल 2.0 नहीं है बल्कि उसका 21वीं सदी का संस्करण और पाकिस्तान की जगह चीन है। इसका श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को ही जाएगा क्योंकि भारतीय सैनिकों ने छक्के छुड़ा दिया और वह भी के कार्य काल में। भारतीय सैन्य इतिहास में एक निर्णायक मोड़ है। लगता है कि , यहीं थोड़ी जिच होगी।

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