CLICK HERE FOR BLOGGER TEMPLATES AND MYSPACE LAYOUTS »

Wednesday, March 9, 2011

आखिर ऐसी गलती क्यों हुई?



हरिराम पाण्डेय
जो लोग अपनी गलती नहीं मानते और उसे सुधारने के लिये प्रस्तुत नहीं रहते वे अक्सर उत्साहहीन और नैतिक तौर पर निर्बल हुआ करते हैं। यह कितना दुखद है कि हमारे प्रधानमंत्री जी ने जिस तरह राज्य सभा में स्वीकार किया कि पी जे थॉमस की नियुक्ति निर्णय की भूल थी। श्री सिंह ने राज्य सभा में कहा कि वे थॉमस के खिलाफ चल रहे मामलों से अनभिज्ञ थे , यही नहीं उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय में तत्कालीन राज्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के मत्थे दोष मढ़ दिया कि उन्होंने यह जानकारी नहीं दी थी। जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार घिरने लगी, ऐसे में सहयोगियों को बदनाम करना कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा ही नजर आता है। देश का इतिहास गवाह है कि भ्रष्टाचार से निपटना इस बात पर निर्भर नहीं करता कि सरकार कितनी पार्टियों से मिलकर बनी है, यह तो सरकार चलाने वालों की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर होता है। अबतक शायद ही किसी ने ऐसी इच्छाशक्ति दिखाई है। लगता है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इस मामले में औरों से अलग नजर नहीं आ रहे हैं। सी वी सी की नियुक्ति में प्रधानमंत्री का तर्क बेवजह है। इसके लिये वे सीधे जिम्मेदार हैं। उनका यह कहना कि यह निर्णय की गलती थी एकदम बेमानी है। प्रधानमंत्री के बारे में लोगों का यह कहना है कि वे बेहद नम्र और सुलझे हुए इंसान हैं , बिल्कुल सही नहीं है। प्रधानमंत्री जी के 'बिहेवियर पैटर्नÓ को देख कर ऐसा नहीं लगता। उससे तो लगता है कि वे जिद्दी इंसान हैं। सीवीसी की नियुक्ति का मसला देखें या भारत अमरीका परमाणु समझौते की बात हो या बढ़ते बाजार भाव का सब जगह उनकी छवि एक जिद्दी इंसान की रही है। यही नहीं प्रधानमंत्री अगर यह स्वीकार करते कि उनके आसपास ऐसे लोग हैं जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं, शायद उनकी इस बेबाकी से आम जनता में ये भरोसा पैदा होता कि हमारे नेता में दम है। राजनीतिक परिस्थितियों से जूझ रहे अपने नेता पर लोगों का भरोसा हमेशा के लिए खरा बैठता और शायद हम एक नये भारत के निर्माण की नींव रखते। लेकिन मनमोहन सिंह ने ये हिम्मत भी नहीं दिखायी। दिखाते भी कैसे, आखिरकार पार्टी और दस जनपथ के बीच, खुद उनका क्या कद है। सत्ता चलाने के लिए और सत्ता में बने रहने के लिये, एक पार्टी और उसके तमाम तंत्र की जरूरत होती है। एक नेता की जरूरत होती है, जो कम से कम हमारे प्रधानमंत्री खुद को नहीं मानते। तो फिर क्या गलत कहा मनमोहन सिंह ने, बतौर इंसान वो भी तो हमारी तरह ही हैं, कमजोर और मजबूर। भ्रष्टाचार से निपटने के लिए मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार की आहुति दे दी होती, तो शायद कांग्रेस का कद ऊपर उठ गया होता, लेकिन सरकार बचाने के लिए भ्रष्टाचारियों को पनाह देने की करतूत कांग्रेस को महंगी पड़ सकती है। फिर भले ही पार्टी मनमोहन सिंह जैसी साफ-सुथरी छवि वाले नेता को आगे क्यों न कर रही हो। हां ये हमारे देश और हम सबों का दुर्भाग्य जरूर है कि हमें एक अदद नेता नहीं मिला। अब अगले चुनाव तक हमें इसी तरह कमजोर बने रहना होगा।

Tuesday, March 8, 2011

गांव तो सरकार के लिये कुछ हैं ही नहीं!


हरिराम पाण्डेय
सरकार की निगाह में देशवासियों का लगता है कोई वजूद ही नहीं है। सरकार देशवासियों के स्वास्थ्य को लेकर जरा भी चिंतित नहीं है, खास कर गांवों में रहने वाली आबादी को तो वह तरजीह ही नहीं देती। वैसे मुंह से कहने के लिये हमारे मंत्री चाहे जो कहें पर इस बार के बजट में स्वास्थ्य के लिये प्रावधान को देखकर ऐसा नहीं लगता। सरकार ने सेंट्रली एअर कंडीशंड अस्पतालों जिसमें उससे ज्याद बेड्स हैं, पर सेवा कर लगा दिया। जबकि उसमें महामारियों या छूत की बीमारियों की रोकथाम का कोई प्रावधान नहीं है। यही नहीं गांवों में तड़पते- बिलखते करोड़ों लोगों को प्रारंभिक चिकित्सा सुविधा भी मयस्सर नहीं है। यद्यपि भारत ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है लेकिन अब यह जनसंख्या वृद्धि की तुलना में पिछड़ता जा रहा है। पिछले एक दशक में जनसंख्या में 16 प्र.श. की वृद्धि हुई है जबकि प्रति हजार जनसंख्या में बीमार व्यक्तियों की संख्या में 66 प्र.श.। इस दौरान प्रति हजार जनसंख्या पर अस्पताल में बेडों की संख्या मात्र 5.1 प्र.श. बढ़ी। देश में औसत बेड घनत्व (प्रति हजार जनसंख्या पर बेड की उपलब्धता) 0.86 है जो कि विश्व औसत का एक तिहाई ही है। चिकित्साकर्मियों की कमी और अस्पतालों में व्याप्त कुप्रबंधन के कारण कितने ही बेड वर्ष भर खाली पड़े रहते हैं। इससे वास्तविक बेड घनत्व और भी कम हो जाता है।
स्वास्थ्य सुविधा के उपर्युक्त आंकड़े राष्ट्रीय औसत के हैं। ग्रामीण स्तर पर देखें तो इसमें अत्यधिक कमी आएगी। आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में जहां देश की 72प्र.श. जनसंख्या निवास करती है, वहां कुल बेड का 19 भाग तथा चिकित्साकर्मियों का 14 भाग ही पाया जाता है। ग्रामीण स्वास्थ्य उपकेंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्साकर्मियों की भारी कमी है। इन केंद्रों में 62 प्र.श. विशेषज्ञ चिकित्सकों, 49 प्र.श. प्रयोगशाला सहायकों और 20 प्र.श. फार्मासिस्टों की कमी है। यह कमी दो कारणों से है। पहला जरूरत की तुलना में स्वीकृत पद कम हैं, दूसरे, बेहतर कार्यदशा की कमी और सीमित अवसरों के कारण चिकित्साकर्मी ग्रामीण क्षेत्रों में जाने से कतराते हैं। इससे ग्रामीणों को गुणवत्तायुक्त चिकित्सा सेवा नहीं मिलती और वे निजी क्षेत्र की सेवा लेने के लिए बाध्य होते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2004 के अनुसार 68प्र.श. देशवासी सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं को नहीं लेते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि यहां ठीक ढंग से इलाज नहीं होगा। सरकारी स्वास्थ्य सेवा तुलना में अत्यधिक महंगी होने के बावजूद बहुसंख्यक भारतीय निजी चिकित्सालयों की सेवा लेते हैं।
1983 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति ने चिकित्सा क्षेत्र में निजी भागीदारी को प्रोत्साहित किया। इसके बाद निजी स्वास्थ्य सेवा का तेजी से विस्तार हुआ। आज देश में 15 लाख स्वास्थ्य प्रदाता हैं जिनमें से 13 लाख निजी क्षेत्र में हैं। समुचित मानक और नियम-विनिमय की कमी ने निजी स्वास्थ्य सेवा को पैर फैलाने का अवसर दिया। चूंकि निजी स्वास्थ्य सुविधाएं अधिकतर नगरीय क्षेत्रों में स्थित हैं इसलिए ग्रामीण एवं नगरीय स्वास्थ्य सुविधाओं की खाई और चौड़ी हुई। निजी स्वास्थ्य सेवा इतनी महंगी होती है कि 70 प्र.श. देशवासी उसे वहन करने में सक्षम नहीं होते। यद्यपि सरकार ने विभिन्न प्रकार की स्वास्थ्य बीमा योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन केवल 12 प्र.श. देशवासी ही स्वास्थ्य बीमा कराते हैं।

करोड़ों का सवाल


हरिराम पाण्डेय
अरब में लोकतंत्र के आंदोलन और उसके प्रति अमरीकी रुख को समन्वित रूप से देखने पर एक सवाल उठता है कि एक तरफ अमरीका या उसके शांति नोबेल पुरस्कार विजेता राष्टï्रपति बराक हुसैन ओबामा अरब की सरकारों को हटाने के लिये आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं, क्योंकि वहां की सरकारें बेहद भ्रष्टï और अमानुषिक हैं, दूसरी तरफ उतनी ही भ्रष्टï और अमानुषिक पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान की सरकारों को वही अमरीका अरबों डालर की मदद दे रहा है। दरअसल खुद को अक्लमंद तथा विकसित सोच वाला समझने के दंभ में आतंकित अमरीका ने 9/11 के बाद मुस्लिम विश्व विचारों की जंग शुरू कर दी जैसा इसने शीत युद्ध के दौरान कम्युनिस्ट ब्लॉक किया था और सफलता पायी थी। वहां यह जंग इसलिये सफल हुई कि सत्ता का सरोकार इंसानी वजूद और हक से जुड़ा था। लेकिन मुस्लिम विश्व में इसके नाकामयाब होने के दो मुख्य कारण हैं- पहला कि यह पूरी जंग धार्मिक मान्यताओं के मुकाबिल थी और दूसरा कि इस काम के लिये अमरीका ने जिन देशों पर भरोसा किया था वे ही आतंकवाद के पैरोकार निकले। अमरीका को आशा थी कि वैचारिक युद्ध की बिगुल बज उठेगा तथा कट्टïरपंथ एव अलकायदा को इस्लाम के भीतर से ही चुनौतियां मिलने लगेंगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं, क्योंकि मुस्लिम देशों के भ्रष्टï शासकों को कट्टïरपंथ मुफीद आता है और वे उसकी हिफाजत करते हैं। अरब शासकों के पास लादेनवाद का विकल्प है ही नहीं। हार कर वहां की जनता ने यह कदम उठाया। यह कार्य उन लोगों ने लादेनवाद के विकल्प के रूप में नहीं किया है, बल्कि अपना मुकद्दर बदलने की ललक से किया है, इसीलिये अलकायदा की बोलती बंद है। यह बहुत बारीक तथ्य है और आज की जनता को इसे समझ लेना जरूरी है। अधिनायकवादी सत्ता का आधुनिक अलकायदाई जवाब और कुछ नहीं, बल्कि मध्ययुगीन खिलाफत पर आधुनिकता का मुलम्मा है, इसीलिये इसे ट्यूनिशिया से यमन तक चारों तरफ जनता ने आंदोलन की लगाम अपने हाथों में ले रखी है।
अप्रैल 6 युवा आंदोलन, इखवान-अल-मुसलमीन और अलबरदेई के समर्थक गुटों के इस नजरिए को ट्यूनीशिया में जनविद्र्रोह के हश्र को देखते हुए समझा जा सकता है, जहां राष्ट्रपति जाइन अबिदीन बेन अली के भागने के बाद उनकी तानाशाही का हिस्सा रहे लोग सत्ता तंत्र पर काबिज हो गए। अब मिस्र पर सारी दुनिया की निगाहें हैं। ट्यूनीशिया से उठी लहर मिस्र में उथल-पुथल पैदा करने के बाद अब बहरीन, यमन, जॉर्डन, अल्जीरिया से ईरान तक पहुंच चुकी है। पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के इन देशों में मुक्ति की जैसी चाहत का इजहार हो रहा है, वह अभूतपूर्व है, लेकिन इस नवजाग्रत चेतना का परिणाम क्या होगा, यह बड़ा प्रश्न है। इसका उत्तर शायद मिस्र से ही मिले। मिस्र में वास्तविक लोकतंत्र की नींव पड़ी तो इससे उस पूरे इलाके में एक नये युग का सूत्रपात हो सकता है।
हो सकता है कि आगे चलकर यह आंदोलन धार्मिक कट्टïरपंथियों के हाथों में पहुंच जाय, लेकिन अभी तो यह तय है कि लोग 21 सदी के लोकतंत्र की ललक से इसमें कूदे हैं न कि 7वीं सदी की व्यवस्था में सडऩे के लिये। इसलिये बाहरी मदद से अरब की दुनिया के आंदोलन में बहुत कुछ नहीं किया जा सकता है। उन्हें अपनी मदद खुद करनी होगी।

सत्ता की बिसात : एक तरफ फाइल, दूसरी तरफ सांसद



हरिराम पाण्डेय
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस और द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) में तकरार हो गयी और दोनों का 6 वर्ष पुराना गठबंधन टूट गया। हुआ यह था कि कांग्रेस ने अचानक अपना रुख बदला और वह विधानसभा चुनाव में अधिक सीटों की मांग करने लगी। इस अचानक बदलाव के कारण शनिवार की रात द्रमुक ने पार्टी से अपना रिश्ता तोड़ लेने का निर्णय किया। इसके फलस्वरूप अब द्रमुक केंद्र सरकार से अपने सभी मंत्रियों को हटा लेगा। केंद्र में द्रमुक के 6 मंत्री हैं, जिनमें 2 कैबिनेट मंत्री हैं और चार राज्यमंत्री हैं। द्रमुक का कहना है कि कांग्रेस उसे संप्रग से बाहर धकेलना चाहती है जबकि द्रमुक ने मनमोहन सिंह सरकार को मुद्दों पर आधारित समर्थन देने का वायदा किया है। लेकिन रात में ही जैसा द्रमुक के नेता टी आर बालू ने कहा कि द्रमुक अपने फैसले पर दुबारा विचार भी कर सकता है। उनके कहने का निहितार्थ था कि मुद्दों पर आधारित समर्थन रोका भी जा सकता है। जबकि कांग्रेस के नेता कह रहे हैं कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है बात चल रही है। लेकिन कांग्रेस का रवैया देख कर यह समझा जा सकता है कि कांग्रेस ने इस मामले को खत्म करने का भार भी द्रमुक पर ही डाल दिया है। उसका मानना है कि द्रमुक ने बैठक बुला कर गठबंधन से अलग होना तय किया और वही इसका निपटारा करे। द्रमुक का यह फैसला ऐसे वक्त पर आया है जब 13 अप्रैल के चुनाव के लिये नामांकन पत्र दाखिल करने में महज एक पखवाड़ा रह गया है। अभी जो स्थिति है और द्रमुक के साइक को देख कर ऐसा नहीं लगता है कि मामला खत्म हो जायेगा, क्योंकि कांग्रेस का रवैया ऐसा है मानों वह द्रमुक को बोझ समझती है और द्रमुक कांग्रेस को बोझ समझती है। अब ऐसी स्थिति में कहीं गठबंधन कायम रह सकता है। द्रमुक के इस समर्थन वापसी के बाद केंद्र सरकार एक बार फिर आकड़ों के गणित में उलझी हुई है। द्रमुक के नेता टीआर बालू ने यह कह कर बातचीत का विकल्प खुला रखा है कि अगर कांग्रेस बातचीत करना चाहती है और 60 सीटों पर समझौते के लिए तैयार है तो पार्टी केंद्र से मंत्रियों की वापसी के मुद्दे पर पुनर्विचार कर सकती है। ऐसी खबरें हैं कि कांग्रेस अपने कुछ वरिष्ठ नेताओं को द्रमुक नेतृत्व से एक बार फिर बातचीत करने के लिए कहेगी। दूसरी तरफ राजनीतिक हलकों में कई तरह के कयास भी लगाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि कांग्रेस द्रमुक को छोड़ कर जयललिता से भी केंद्र सरकार के लिए समर्थन ले सकती है। उल्लेखनीय है कि जब द्रमुक नेता और केंद्र में दूरसंचार मंत्री ए राजा पर कार्रवाई की बात आयी थी तो जयललिता ने एक टीवी चैनल से साक्षात्कार में कहा था कि अगर द्र्रमुक यूपीए से समर्थन वापस लेगी तो अन्नाद्रमुक केंद्र को पूरा समर्थन दे सकती है। दूसरी तरफ यह भी अनुमान लगाया जा रहा है ए राजा पर कार्रवाई के बाद से ही दोनों दलों के रिश्तों में खटास आ गयी थी और वह केंद्र सरकार पर उस फाइल को कमजोर करने पर दबाव दे रहा था पर सरकार झुकने को तैयार नहीं थी इसलिये यह कदम उठाकर उसने दबाव की रणनीति बनायी है। यही कारण है कि उसने समर्थन देने की बात को बाजार में छोड़ दिया है। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने कहा है कि द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) के समर्थन वापसी के बाद भी केन्द्र की संप्रग सरकार को कोई खतरा नहीं है।
द्रमुक की समर्थन वापसी के बाद केन्द्र सरकार के वजूद को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में यादव ने आज यहां संवाददाताओं से कहा ''केन्द्र सरकार को कोई खतरा नहीं है और यह अब भी अल्पमत में नहीं है.ÓÓ उन्होंने कहा कि सपा का संप्रग सरकार को दिया गया समर्थन आगे भी जारी रहेगा।
यह पूछे जाने पर कि क्या केन्द्र सरकार में शामिल होने का निमंत्रण पाने पर सपा उसे स्वीकार करेगी, यादव ने इस सवाल को काल्पनिक बताते हुए कोई उत्तर देने से मना कर दिया।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि हाल-फिलहाल सपा के सरकार में शामिल होने के बारे में कोई बातचीत नहीं हुई है।
गौरतलब है कि लोकसभा में सपा के 22 सदस्य हैं और 18 सांसदों वाले द्रमुक के समर्थन वापस लेने के बाद सपा के केन्द्र सरकार में शामिल होने की अटकलें तेज हो गयी हैं।
यादव ने यह भी कहा कि रही द्रमुक के समर्थन वापसी की बात, तो दोनों दलों के नेताओं के बीच बातचीत अब भी चल रही है और मतभेद दूर भी हो सकते हैं।
सपा मुखिया ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संप्रग सरकार को उनकी पार्टी बाहर से समर्थन दे रही है और वह जारी रहेगा।
यादव ने सवालों के जवाब में कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से उनकी मुलाकात होती रहती है और अभी तीन दिन पहले भी उनसे बातचीत हुई थी, मगर वह देश के सामने उपस्थित अन्य समस्याओं और सदन की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने के बारे में थी।

Friday, March 4, 2011

लाखों फूंके जाएंगे अरबों के घोटाले पर


हरिराम पाण्डेय
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के लिए संसदीय जांच समिति (जेपीसी)का गठन किया जा चुका है। इसमें ऐी कोई व्यवस्था नहीं ह कि जिस पर जुर्म साबित हो उससे समिति का खर्चा भी वसूला जायं यह समिति सरकारी खर्चे यानी महंगाई पीडि़त भारतीय जनता के टैक्स से चलेगी। यानी हमारा और आपका रुपया इसमें लगेगा। विडम्बना देखिये कि इस जांच में जनता की कोई भागीदारी नहीं है। अब हमारे लाखों रुपये खर्च कर इस घोटाले से पर्दा उठाने की कोशिश करेगी। अब चूंकि गरीबों का पैसा इसमें लग रहा ह तो हम भारत की जनता कुछ सवाल तो इस समिति से पूछ ही सकती है। सवाल है कि क्या इससे वह पाया जा सकेगा, जिसकी इससे उम्मीद की जा रही है? कुछ और खुलासे करने के बजाय, क्या वह असली मकसद को पा सकेंगे? क्या इस 'कीमतीÓ जेपीसी से कुछ और पाने की उम्मीद की सकती है? और सबसे अहम बात यह कि आखिर क्यों नहीं इसे पारदर्शी बनाते हुए इसमें पब्लिक की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाए?
इससे पहले भी दो चर्चित घोटालों पर जेपीसी का गठन हो चुका है। एक 1990 में शेयर घोटाले में और दूसरी 2003-2004 में एक शीतल पेय में पेस्टिसाइड्स की जांच के लिए।
शेयर घोटाले पर गठित जेपीसी का हाल हम सभी जानते हैं। तब चेयरपर्सन ने कई गोपनीय तथ्य गैरजरूरी प्रेस ब्रीफिंग कर लीक कीं। यह अक्सर देखा गया कि मीडिया को एक खास मकसद से मसालेदार टिप्स दी गईं।
जेपीसी के बाद इस पर खूब हंगामा हुआ। स्टॉक मार्केट रेग्युलेटर मजबूत हुए, लेकिन इन सबके बावजूद कई बड़े स्टॉक मार्केट घोटाले हुए। जिसका खामियाजा आम आदमी और छोटे निवेशकों को भुगतना पड़ा।
फरवरी 2004 में शीतल पेय में कीटनाशी पर बनी जेपीसी ने अपनी जांच में सेंटर फॉर साइंस ऐंड इन्वाइरनमेंट की उस स्टडी की तस्दीक की जिसमें बताया गया था कि देश में बिक रहे शीतल पेय के टॉप 12 ब्रैंड्स में खतरनाक स्तर तक कीटनाशी मौजूद हैं। लेकिन हुआ क्या? मेरा मानना है कि जेपीसी की यह पूरी कवायद बस खानापूर्ति है। जेपीसी के अधिकतर सदस्यों के लिए यह सम्मानजनक काम भर है।
यह क्यों नहीं हो सकता जैसा कुछ ने सुझाया भी है कि इसमें पब्लिक की भागीदारी भी हो। आमतौर पर इसमें राजनीतिज्ञ ही शामिल रहते हैं। एक-दूसरे को संतुष्ट करने के उनके रवैये से पब्लिक के सामने बहुत कम चीजें सामने आ पाती हैं। हमें इसे क्यों स्वीकार करना चाहिए?
सब लोग े जानते हैं कि घोटाले क्यों होते हैं। इसके लिए इरादतन बनाई गई नीतियां और उनमें छोड़े गयी अंधी गलियां जिम्मेदार हैं। ये वीथियां तथ्यों से छेड़छाड़ करने, जुबानी ऑर्डर देने और विवेकाधीन अधिकारों के दुरुपयोग की ताकत देती हैं।
सवाल तो यह है कि जो लोग इस खेल के मास्टर हैं, वे इस गंदगी को दूर करने में दिलचस्पी दिखाएंगे? कभी नहीं। इन सब से बचने के लिए जरूरी है कि इसमें पब्लिक की भागीदारी भी हो। जांच में मिले तथ्य पब्लिक फोरम में रखें जाएं। इससे संचालन में कुछ दिक्कतें आ सकती हैं, इतने सारे विचारों और सुझावों को साथ रखना थोड़ा मुश्किल जरूर है, लेकिन यह असंभव नहीं है।
जब हम इसमें होंगे और जानेंगे कि आखिर ये घोटाले होते कैसे हैं, क्यों नहीं कमिटी को इसकी जांच के लिए थोड़ी और शक्ति देने और अंधी गलियों को बंद करने के तरीके सुझाने की सिफारिश कर सकते, जिससे इन घोटालों को जड़ से खत्म किया जा सके, या कम से कम तो किया ही जा सके। जनता के पैसे से चलने वाली कमिटी जनता फंड की लूट को भी क्यों नहीं बेनकाब करती? वह अपने आपको केवल एक घोटाले तक ही क्यों सीमित रखती है?
वैसे लगता नहीं है कि इस कमिटी से कुछ होगा या जांच में कोई खास बात निकल कर आयेगी या कोईै सुधार होगा। अलबत्ता इस फैसले का एक सकारात्मक पहलू यह है कि संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चलेगी और बजट सत्र में व्यवधान नहीं पड़ेगा।

Thursday, March 3, 2011

भारतीयों को भ्रष्टï बनाया गया है

हरिराम पाण्डेय
2-जी घोटाले में ही केवल भ्रष्टïाचार नहीं है। यह बात दूसरी है कि इसे सियासी लाभ के लिये इतना तूल दिया गया कि पूरा मुल्क हिल गया। भ्रष्टïाचार की सड़ांध क्या क्रिकेट से नहीं आती? 11 नालायक छोकरे इसे खेलते हैं और पांच में से तीन मैच हार जाते हैं लेकिन शोहरत और दौलत बटोर लेते हैं। हाल में आई पी एल की नीलामी हुई दुनिया भर ने उसे टेलीविजन पर देखा। खिलाडिय़ों की बिक्री देख कर लगता था कि वे असबाब हों या ढोर हों या पुराने जमाने के गुलाम हों जिनकी बोलियां लग रहीं हों। कई तो बिके ही नहीं और कई अनाप- शनाप दामों में बिक गये। क्रिकेट ने देश के अन्य खेलों का सत्यानाश कर दिया। इसने मीडिया और विज्ञापन विश्व को मोह लिया है लिहाजा एक उभरती महाशक्ति भारत अन्य खेलों में बहुत पिछड़ गया। आज दुनिया में फुटबॉल में इसका 145वां , बास्केट बॉल में 232वां स्थान है। और दूर कहां जायेंगे चीन को ही देखें यह फकत 30 वर्षों में दुनिया में खेलों में अग्रणी हो गया। विज्ञापनों की जहां तक बात है दूसरे देशों में खिलाड़ी केवल खेल का विज्ञापन करते हैं, लेकिन यहां तो खिलाड़ी कीटनाशक से दूषित शीतल पेय और सोडा के परदे में शराब तक का विज्ञापन करते हैं। क्या इसे भ्रष्टïाचार नहीं कहेंगे? वही हालात फिल्म उद्योग का है। अभिनेताओं को महान मान लिया गया है जबकि वे कुछ नहीं हैं। अधिकांश अभिनेता और फिल्में विदेशी सिनेमा की नकल होती हैं और ये कहे जाने वाले महान लोग किसी एक्टिंग स्कूल से संस्कारित होकर नहीं आते बल्कि बड़े परिवार और रसूख से प्रवेश करते हैं। यही हाल उद्योगों का भी है। एक मोटर सायकिल बनाने वाली कम्पनी एकदम ताजा तकनीक के नाम पर विज्ञापन करती है जबकि सच यह है कि वह तकनीक पश्चिमी दुनिया में 80 में ही त्याग दी गयी। विज्ञापनों को ध्यान से देखें तो उनमें तकनीक का खुलासा नहीं किया जाता है बल्कि कोई मशहूर अभिनेता सुन्दरियों के साथ फर्जी स्टंट का प्रदर्शन करता है। भारतीयों में गोरे होने की ललक है और इस ललक को क्रीम बनाने वाले भुनाते हैं। चार दिनों में गोरा बना देने का दावा करके लोगों को ठगना नहीं है? क्या यह भ्रष्टïाचार का स्वरूप नहीं है? इसके अलावा भी भ्रष्टïाचार के कई गूढ़ स्वरूप हैं मसलन, बैंकों से धोखाधड़ी , रिश्वतखोरी, टैक्स की चोरी वगैरह। यह कितनी दुखद बात है कि बैंक अपने ग्राहकों की ठगी से बचने के लिये पहले इंतजाम करता है ,व्यापार बाद में। अदालत में जहां घूस लेने के मामले पर सुनवाई चलती है वहीं जज के सामने घूस का लेन- देन होता है। इस सबके बावजूद भारतीयों को इस प्रकार के भ्रष्टïाचार के लिये क्षमा किया जा सकता है। क्योंकि हिंदूकुश से लेकर 26/11 के मध्य लगभग 20 शताब्दियों में भारतीयों के मन में आतंक बैठा दिया गया है। इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका के अनुसार इस अवधि में लाखों भारतीयों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस नरमेध में केवल हिंदू नहीं थे बल्कि आज के 95 प्रतिशत भारतीय मुसलमानों के पूर्वज भी थे जिन्हें काट डाला गया या धर्म बदल देने के लिये बाध्य किया गया। सीरियाई ईसाई थे जो भारत की मुख्य धारा से जुड़ गये थे उन्हें पुर्तगालियों ने भारत में आकर जबरन कट्टïर ईसाइअत अपनाने पर बाध्य कर दिया और ईसाई धर्म को दो भागों में विभाजित कर दिया। अरबी सैनिकों ने भारत से बौद्ध धर्म को समूल उखाड़ फेंकने का प्रयास किया और बहुत हद तक कामयाब भी रहे। लिहाजा भारतीयों के साइक में आतंक घर कर गया। उन्हें जाने के लिये झूठ बोलने और गलत तंत्र का इस्तेमाल करने की आदत पड़ गयी। यह आदत आजादी के बाद भी कायम रही। इसे रोकने के लिये क्या किया जा सकता है? इसके लिये अच्छा वेतन और दोषी पाये जाने पर बेहद कठोर सजा। वैसे भारत सरकार को चीन का अनुकरण करने की जरूरत नहीं है जहां भ्रष्टïाचार के दोषी पाये जाने वाले राजनीतिकों को गोली मार दी जाती है। पर इतना तो जरूर है कि राजा जो अरबों रुपये के घोटाले से लांछित है उसे कम से कम दस साल जेल में बामशक्कत सजा तो मिलनी ही चाहिये। इससे लोगों के मन में शासन के प्रति विश्वास पैदा होगा और आम आदमी को भी लगेगा कि हमें ईमानदार होना चाहिये। सच तो यह है कि हम भारतीय महान परम्परा के लोग हैं। उन्हें आतंकित कर भ्रष्टï बनने पर बाध्य किया गया है। यह एक बीमारी है। इससे निजात तब ही मिल सकती है जब हम शासन की बागडोर सही आदमी के हाथों में सौंपें।

Wednesday, March 2, 2011

चीन का बढ़ता खतरा



हरिराम पाण्डेय
खबर है कि अधिकृत कश्मीर में चीन ने अपनी गतिविधियां फिर से शुरू कर दी हैं। चीन पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में अपने मजदूरों के लिए एक कालोनी का निर्माण कर रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय के आकलन के मुताबिक पीओके और गिलगिट-बालटिस्तान में करीब 17 परियोजनाओं पर चीन के हजारों मजदूर काम कर रहे हैं। इसमें करीब 14 प्रोजेक्ट तो पीओके में ही चल रहे हैं। भारत सरकार को मिली जानकारी के अनुसार पाकिस्तान में करीब 122 चीनी कंपनियां सक्रिय हैं। इनमें से ज्यादातर पीओके और गिलगिट-बालटिस्तान में भी अलग-अलग प्रोजेक्ट के तहत काम कर रही हैं। चीन की यह 'हरकतÓ ऐसे समय पर सामने आयी है जब हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अगले महीने बीजिंग के दौरे पर जाने वाले हैं। मनमोहन सिंह ब्राजील, रूस, भारत और चीन (ब्रिक) देशों के गुट में दक्षिण अफ्रीका का स्वागत करने के सिलसिले में होने वाली बैठक में हिस्सा लेने चीन जा रहे हैं। उम्मीद है कि पीएम की इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच संबंधों में मधुरता आएगी। वैसे चीन की हालिया दो-चार बड़ी हरकतों पर अगर बारीकी से विचार करें तो स्पष्टï होगा कि हमारा पड़ोसी नया कुछ भी नहीं कर रहा। नई बात बस यह है कि इसकी शिद्दत को हमने अब जाकर हमने महसूस किया है। भारत और चीन के बेहद जटिल संबंधों को थोड़ी और गहराई से देखें तो पता चलता है कि जब भी वह भारत के अन्य बड़े शक्तिशाली देशों से संबंधों को गहरा होते देखता है तो वह भारत पर अपना कूटनीतिक और रणनीतिक दबाव बढ़ाना शुरू कर देता है। दुनिया के बड़े देशों को यह दिखाने की कोशिश करता है कि भारत उसके सामने बहुत मामूली देश है। मसलन जब से भारत ने अमरीका के साथ संबंधों पर बहुत ज्यादा ध्यान देना शुरू किया तो दूसरे बड़े मुल्कों से कुछ दूरी बन गयी। चीन को दोनों बातें नागवार लगीं। एक तो भारत की अमरीका से नजदीकी और दूसरा भारत उसकी अनदेखी कर अमरीका से पींगें बढ़ाएं, ये दोनों सूरतें चीन को अपने हितों के माफिक नहीं लगतीं, इसलिए उसके ताजा कदम इसी नीति का हिस्सा हैं। हमारी सारी सीमाओं पर तनाव बनाए रखना उसकी इसी रणनीति का हिस्सा है। चीन ऐसा इसलिए भी कर रहा है कि आर्थिक, सामरिक और राजनयिक रूप से हम उससे बहुत पीछे छूट गए हैं। भारत उससे पीछे ही बना रहे, इसके लिए वह हमें अपने पड़ोसियों के जरिये भी घेर रहा है। पाकिस्तान के साथ उसने सांठगांठ की हद तक घनिष्ठ संबंध बना रखे हैं। पाकिस्तान के आणविक हथियारों में चीन का योगदान खुद पाकिस्तान के योगदान से ज्यादा है। उसकी शक्ति संतुलित एकांगिक और सुनियोजित है, जबकि हमने अपने देश के भीतर जो राजनीतिक प्रणाली विकसित की है, उससे हम कमजोर और विभाजित हुए हैं। इसी के चलते साहसिक कदम उठा पाने में हम असमर्थ रहते हैं।
वैसे भी आजकल विश्व में बात-बात पर युद्ध की भाषा नहीं बोली जा सकती। बड़े-बड़े देश भी अपनी बात मनवाने के लिए बातचीत करते हैं और कई दौर की बातचीत और राजनयिक दबावों से अनुचित लाभ भी प्राप्त कर लेते हैं। हमारा देश इस मामले में काफी भावुक मुल्क है। उदाहरण के लिए 1962 के चीनी आक्रमण के बाद हमने प्रस्ताव पारित किया कि जब तक चीन हमारे भू-भाग को वापस नहीं देता, तब तक उससे कोई बातचीत ही नहीं होगी। हालांकि बाद में हमें विवश होकर उससे बातचीत शुरू करना पड़ी। इससे यह सिद्ध होता है कि संबंध कितने ही खराब क्यों न हों, पर संवाद चलते रहना चाहिए और संबंध विच्छेद नहीं होना चाहिए। अगर हम चीन को उसी की भाषा में जवाब देना चाहते हैं तो हमें यह जान लेना होगा कि उसकी दुखती रग तिब्बत है और जिस दिन हम तिब्बत के मसले को लेकर चीन को घेरना शुरू कर देंगे, उस पर दबाव बनने लगेगा। जब हम उसे कटघरे में लाना शुरू करेंगे तो वह निश्चित रूप से बचाव की मुद्रा में आ जाएगा। दुर्भाग्य से अभी हम ऐसा नहीं कर रहे हैं। अगर नेपाल और तिब्बत की नीति को हम थोड़ा स्पष्ट शब्दों में दुनिया के सामने रखेंगे, तो चीन अपनी हेकड़ी दिखाना बंद करेगा।