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Sunday, February 2, 2020

सब की आकांक्षाओं का बजट

सब की आकांक्षाओं का बजट

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार को अपना दूसरा बजट पेश किया। अपने बजट भाषण में उन्होंने कहा "यह देश की आकांक्षाओं को पूरा करने वाला है।" वित्त मंत्री ने कहा कि ,हमारे देश की अर्थव्यवस्था बेहद मजबूत है और जनता को मोदी सरकार पर पूरा भरोसा है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण दूसरी बार बजट पेश करने वाली भारत की पहली वित्त मंत्री हैं। इसके पहले इंदिरा गांधी ने एक बार 1970 का बजट पेश किया था। वित्त मंत्री ने अपने भाषण में कहा , 'इस सरकार को मिला यह प्रचंड जनादेश सिर्फ राजनीतिक स्थिरता के लिए नहीं ,देश के हर नागरिक की उम्मीदों और आकांक्षाओं को पूरा करने वाला है और यह बजट उन्हीं उम्मीदों और आकांक्षाओं को पूरा करने की दिशा में उठाया गया कदम है। 2014 से 2019 के बीच मोदी सरकार ने आर्थिक नीतियों में बहुत बड़ा बदलाव किया। अब अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है ,महंगाई काबू में है और बैंकों में भी सुधार हुआ है।'
     वित्त मंत्री का कथन सही है। क्योंकि जीएसटी की वजह से ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक में फायदा हो रहा है। यानी, इस पर खर्चे कम पड़ रहे हैं और खर्चे कम पड़ने से चीजों की कीमतें  काबू में है।  इससे लोगों के पास पैसे बच रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक आम आदमी अपने परिवार के मासिक खर्च का लगभग 4% हिस्सा बचा पा रहा है। यही नहीं सरकार ने 60 लाख नए टैक्स दाता जोड़े हैं ।  सरकार ने लोगों के पास सीधा फायदा पहुंचाने का प्रयास आरंभ किया है। जिससे बीच की दलाली खत्म होती जा रही है और लोग सीधे सरकार से जुड़ रहे हैं।  "मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सिम गवर्नेंस" का जो सरकार का नारा है वह यहां साफ दिखाई पड़ने लगा है। कई कल्याणकारी योजनाएं जैसे, आयुष्मान ,उज्ज्वला, इंश्योरेंस प्रोटेक्शन तथा सस्ते मकानों जैसी योजनाएं लोगों को सीधा लाभ पहुंचा रही हैं। यह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच रही है। देश में 27.1 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आए। वित्त मंत्री ने कहा कि हमारी सरकार किसानों की मदद कर रही है। बजट में जो प्रावधान हैं उसके अध्ययन से पता चलता है कि इस बार 6. 11 करोड़ किसानों पर फोकस किया गया है। वित्त मंत्री के अनुसार किसानों के बाजार को उदार बनाने की जरूरत है। कृषि उपज लॉजिस्टिक में ज्यादा निवेश की जरूरत है। बजट में इसके लिए 16 एक्शन प्वाइंट्स बनाए गए हैं। 20 लाख किसानों को सोलर पंप लगाने में सरकार मदद करेगी।
        लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इस बजट से बहुत उम्मीदें थीं। सब से बड़ी उम्मीद तो यह थी कि अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने वाले रोड मैप सामने आएंगे और उम्मीदें पूरी होंगी। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता है। वित्त मंत्री के दावों के बावजूद कर संग्रह में धीमापन आया है जिससे विनिवेश की प्रक्रिया को आरंभ  किया जा रहा है। इस कारणवश सरकार की खर्च करने क्षमता बहुत कम हो गई है। अगर सरकार के खर्च करने की क्षमता में थोड़ी वृद्धि आती तो अर्थव्यवस्था में भी तेजी आ सकती थी। लेकिन ऐसा शायद नहीं हो सका है। बजट से उम्मीदें तो बहुत थी लेकिन वह बाधाओं के बोझ से दबा हुआ है। इसमें इरादे और प्रस्ताव भरे हुए हैं। राजकोषीय घाटा है। इस घाटे के बावजूद योजनाओं में खर्च करने के लिए सरकार जो पैसा दे रही है वह बहुत कम है। मध्यावधि में स्थाई आजीविका के जरिए अधिक से अधिक लोगों को आय अर्जित करने में सक्षम बनाकर अर्थव्यवस्था में वृद्धि की जा सकती है जिससे प्रधानमंत्री का सबका साथ सबका विकास वादा पूरा होता है।  यहां तक कि ऊंची विकास दर वाले वर्षों में भी अर्थव्यवस्था में नई नौकरियां नहीं पैदा होती। इकलौता बजट हमारी संरचनात्मक समस्या को हल नहीं कर सकता है। यह संकट इस बजट में भी है।  प्रावधानों से नौकरियां पैदा होंगी लेकिन उनकी संख्या उतनी नहीं होगी जितनी जरूरी है।
     देश में डॉक्टरों की कमी है। इस कमी को पूरा करने के लिए और अस्पताल बनाने के लिए प्रोत्साहित करने की योजना है।  नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस के तहत  रेजिडेंट डॉक्टरों की पर्याप्त क्षमता होगी। इसके अलावा युवाओं में रोजगार की क्षमता बढ़ाने के लिए डेढ़ सौ उच्च शिक्षा वाले संस्थानों में मार्च 2021 से अप्रेंटिसशिप कोर्स की शुरुआत होगी। साथ ही, देश में शहरी स्थानीय निकायों में इंटर्नशिप के अवसर दिए जाएंगे जिससे 1 साल में इंजीनियर तैयार हों। बजट में मोबाइल फोन और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सामानों के निर्माण को लेकर प्रोत्साहन करने पर भी बल दिया गया है। जिससे फैक्ट्री की नौकरियां पैदा हो सकें। लेकिन इसमें क्या क्या होगा उसके बारे में बाद में बताया जाएगा। सरकार इलेक्ट्रिक सामानों और उससे निवेश के लिए अधिक नीतियों की घोषणा कर सकती है। जो अभी नहीं हो सकी है। इस बजट में जो सबसे बड़ी खुशखबरी है  बैंकों में रखे पैसों को लेकर बीमा की रकम है । पहले धोखाबाजी या घाटे के कारण बैंक बंद होने  जमा करने वालों को केवल  एक लाख रुपए देने का वादा था जो बढ़ाकर  5 लाख कर दिया गया है।

      सारे तर्कों के बावजूद बजट से बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं बनी। बाजार रूठते नजर आए । ऐसा लगा कि बजट एक साधारण और नियमित किस्म की कवायद है और वार्षिक लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है। जो बड़ी घोषणाएं हैं वह बाजार को नहीं पसंद आई। अमीरों पर चोट करने और इस तरह से गरीबों में काल्पनिक संतुष्टि का भाव भरने वाली यह कौन आए हैं इसके अलावा बजट में कुछ नहीं मिला। ऐसा लगता है कि अब आर्थिक सुधार किस्तों में आएंगे। इसके फैसले सरकार कभी भी ले सकती है। बजट में रक्षा क्षेत्र के आवंटन को बढ़ाया नहीं गया है। इसका मतलब है रक्षा क्षेत्र में कुछ खास होने वाला नहीं है। जबकि रक्षा पेंशन काफी बढ़ चुका है। वित्त आयोग खरीदारी के लिए निरंतर उपलब्ध एक कोष की स्थापना  और संभवतः रक्षा शेष लगाने के विचार के अध्ययन के लिए कमेटी गठित करने को कह रहा है। अब इसकी घोषणा होगी। यह घोषणा किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में हो जाएगी और कोई भी आलोचना का जोखिम भी उठाएगा क्योंकि रक्षा की बात है। इस बजट में एक ही बात साहसिक कही जा सकती है। वह है निजीकरण के बढ़ाने की चर्चा। मोदी जी सुधारों के पक्ष में आर्थिक जोखिम नहीं उठाएंगे। बाजार के किरदार और पैसे वाले इस बात से अभ्यस्त हो चुके हैं। आय और संबंधित अपनी प्राथमिकताओं को बाजार अनुमानों पर हावी होने देंगे तो और तार्किक अपेक्षाएं निर्मित होंगी । इसलिए 1 फरवरी की सुर्ख़ियों से बाहर निकल कर पूरे साल की बड़ी तस्वीर देखने की की कोशिश होनी चाहिए।


Friday, January 31, 2020

आज केंद्रीय बजट

आज केंद्रीय बजट 

नागरिकता के कानूनों और अर्थव्यवस्था की सुस्ती के बीच आज हमारा केंद्रीय बजट पेश होगा। जब देश का पहला बजट पेश हुआ था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने  कहा था कि बजट देश के विकास का दर्शन है। यह केवल लेखा-जोखा नहीं बल्कि वित्तीय क्षेत्र के नियमों और सुधारों की  टैक्स पॉलिसीज से जुड़े सुधार और पूंजी प्रवाह के संदर्भ में भारत के खुलेपन का इजहार भी है।
      आज जो बजट पेश होने वाला है उसकी सबसे बड़ी मुश्किल है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पास बहुत सीमित विकल्प हैं। वित्त मंत्री को अर्थव्यवस्था की हालत की चिंता करनी है और मुद्रास्फीति के विकास ,निवेश, रोजगार ,भुगतान संतुलन इत्यादि संकट का भी सामना करना है। इसके अलावा वित्त मंत्री को सार्वजनिक कर्ज के बोझ को अव्यावहारिक स्तर पर ले जाए बिना मांग बढ़ाने की मुश्किल को खत्म करने वाले राजकोषीय घाटा पहले से ही बढ़ा हुआ है। यदि विकास दर सरकार द्वारा लिए गए कर्ज  से नीचे चली जाती है तो सार्वजनिक खर्च की मात्रा ऐसी हो जाएगी जिसे ढूंढना मुश्किल है। वर्तमान में जीडीपी विकास दर 7.5% रहने की संभावना है। 10 वर्षीय बांड पर 6.6 प्रतिशत रिटर्न मिल सकता है इसलिए अभी  इतना है कि  उसे ढोया जा सकता है
        इन दिनों बजट से जुड़े बहस का एक मुख्य मसला है बजट का स्वरूप कैसा होना चाहिए। उसे विस्तार वादी होना चाहिए अथवा नहीं। अधिकांश लोग यह कहते पाए गए हैं कि सकल घरेलू उत्पाद के विकास में गिरावट हुई है और मौद्रिक नीति की अपनी सीमाएं हैं । पर उन्हें चिंता इस बात की है कि अधिक   सार्वजनिक कर्ज ऐसा हो जाएगा जिसका वहन करना मुश्किल है । इसके बाद कर्ज के मुकाबले जीडीपी का अनुपात विस्फोटक स्तर तक पहुंच सकता है। यह चिंता अथवा यह कथन बहुत अनुचित नहीं है। अगर राजकोषीय घाटा बढ़ता है तो ब्याज दरों के बढ़ने का खतरा हो जाता है। यदि ब्याज दर जीडीपी विकास की दर से  ऊपर जाता है तो सार्वजनिक कर्ज की स्थिति को दर्शाने वाला जीडीपी तथा सार्वजनिक खर्च के अनुपात का समीकरण  असंतुलित हो जाता है और बढ़ने लगता है।
          अब ऐसी स्थिति में केवल मांग को बढ़ाना ही एकमात्र विकल्प दिखता है। इसके लिए मौद्रिक नीतियां एकमात्र औजार हैं । बजट निर्माताओं के हाथ में। लेकिन वर्तमान स्थिति में यह कोई सरल नहीं है । हालांकि, अर्थशास्त्र का मानना है कि खाद्य पदार्थों और उसे भी खासकर सब्जियों की महंगाई के Fकारण बड़ी बनी जय मुद्रास्फीति स्थाई नहीं है लंबीअवधि के नहीं है बल्कि अल्पकालिक है। परंतु रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति   में ढिलाई बरतने के लिए साथ ही अधिक विस्तारवाद पर कोई चर्चा करने से पहले हमें मौद्रिक नीति का प्रभावी संचरण सुनिश्चित करने के उपाय करने होंगे । बैंकिंग और बॉन्ड मार्केट में सुधारों समेत इन सुधारों पर काफी समय से विचार किया जा रहा है लेकिन इस दिशा में कदम बढ़ाने के पहले वित्त मंत्री को इस कानून बदलने होंगे।
           जीडीपी विकास में धीमा पन ,कर संग्रह में कमी, विनिवेश में कमी और जीएसटी की समस्याओं के कारण राजकोषीय पहल कदमी के विकल्प बहुत कम हैं।  अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक निवेश पर सरकारी खर्च बढ़ाना उचित रहेगा लेकिन सीतारमण को ऐसा करने के लिए कुछ नए तरीके ढूंढने होंगे। ताकि राजकोषीय घाटे बहुत बढ़ ना  जाएं। इसके साथ ही बाजार का भरोसा फिर से हासिल करने के लिए उन्हें सरकारी घाटे और कर्ज को लेकर पारदर्शी होना होगा । अकाउंटेंट जनरल महालेखा परीक्षक के अनुसार पिछले वर्ष राजकोषीय उत्तरदायित्व तथा बजट प्रबंधन अधिनियम के  निर्धारित लक्ष्य से अधिक था, संभवत जीडीपी के 2 प्रतिशत अंक अधिक था। वैसे तो राजकोषीय विस्तार अर्थव्यवस्था में सुस्ती के द्वारा नहीं किया जाना चाहिए पर उन आंकड़ों के आधार पर चर्चा बेकार है जिन पर लोग यकीन ही नहीं  करते। इसलिए वित्त मंत्री के सामने पहली चुनौती है कि  बजट में  इन अंको को कम करना और लोगों को यकीन दिलाना कि उन्होंने राजकोषीय अनुशासन अपनाने के लिए यह सब किया है । क्योंकि वह इसके लिए प्रतिबद्ध हैं। अब सवाल उठता है कि क्या वित्त मंत्री राजकोषीय घाटे में बहुत ज्यादा विस्तार किए बिना मांग बढ़ाने के लिए कदम उठा सकते हैं । यह सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य है। लेकिन, टैक्स और नियामक प्रक्रियाओं को आसान बना कर पहला कदम उठाया जा सकता है। जिससे कि निजी निवेश हतोत्साहित हुआ है निवेशकों में उत्साह को कम करने वाले टैक्स अधिकारियों की बढ़ी हुई ताकत में से कुछ पर पुनर्विचार किया जा सकता है । यह महत्वपूर्ण है कि टैक्स दरों में किसी तरह की वृद्धि का प्रस्ताव नहीं किया जाए। क्योंकि, इससे अनिश्चितता बढ़ती है। टैक्स आधार कम होता है। विकास दर नीचे जाता है। टैक्स की दरों को बढ़ाकर और टैक्स अधिकारियों को अधिक ताकत देकर राजस्व बढ़ाने की रणनीतियां सफल हो जाती हैं। इसके विपरीत की रणनीति से निवेशकों के विश्वास को आघात लगता है और जीडीपी घटती है। वास्तव में यह कम टैक्स दर और टैक्स अधिकारियों के अधिकारों में कटौती की वैकल्पिक रणनीति अपनाने का वक्त है।


Thursday, January 30, 2020

हम यातना गृह में रहने के लिए बाध्य होने वाले हैं

हम यातना गृह में रहने के लिए बाध्य होने वाले हैं 

एक नए अध्ययन से पता चला है कि हवा में तैरते पार्टिकुलेट मैटर (बारीक कण) के कारण बढ़ते हुए प्रदूषण से भारत में औसतन 3.2 वर्ष उम्र कम हो गयी  है। अध्ययन में बताया गया है की दिल्ली समेत कई शहरों में आम भारतीयों की उम्र घट रही और लगभग 66 करोड़ भारतीय यानी भारत की पूरी आबादी का आधा हिस्सा इससे प्रभावित है। हाल के अखबारों में तो यह भी लिखा गया था कि कोलकाता वासियों की उम्र 3.5 वर्ष तक घट गई है। अगर इनका हिसाब निकाला जाए तो हमारे देश में 2.1 अरब जीवन वर्ष कम हो गए। जिन लोगों की या बड़े शहरों में जिन इलाकों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है वहां प्रदूषण और ज्यादा है।  वहां उम्र और ज्यादा घट रही है। शिकागो विश्वविद्यालय के अध्ययन के मुताबिक भारत में वायु प्रदूषण की समस्या अमीरों द्वारा पैदा की गई है और सरकार इन पर कठोर कार्रवाई नहीं कर सकती। क्योंकि इससे कारोबार प्रभावित होंगे और मध्यवर्गीय लोगों के लिए दिक्कतें पैदा होने लगेंगी।  लेकिन जरा सोचिए अगर प्रदूषण कम होगा तो काम करने वाले लोग कम बीमार पड़ेंगे और इससे उनकी कार्य क्षमता बढ़ेगी। हवा में तैरते 2.5 माइक्रोन के पार्टिकुलेट मैटर फेफड़े में प्रवेश कर जाते हैं और फेफड़े की विभिन्न बीमारियों तथा सांस की दिक्कतें पैदा करते हैं। ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज की एक रिपोर्ट के मुताबिक सर्दियों के समय कोलकाता में हर तीन में से एक बच्चा प्रदूषण के कारण बीमार पड़ता है और उसके इलाज पर खर्च होता है। अध्ययन में बताया गया है की 54.5% भारतीय बारीक पार्टिकुलेट मैटर (पीएम 2.5) के आगोश में रहते हैं। इस अध्ययन से पता चलता है की प्रदूषण केवल शहरों की समस्या नहीं है ग्रामीण इलाकों में भी इसका प्रकोप है और उसका कारण है गांव में उपयोग की जाने वाली जलावन तथा जैव इंधन। शहरी इलाकों में प्रदूषण का मुख्य कारण है परिवहन तथा उद्योग धंधे।
        शिकागो विश्वविद्यालय द्वारा हाल में जारी किए गए एक अध्ययन "एयर क्वालिटी इंडेक्स" के मुताबिक 1998 से 2016 के बीच भारतीय क्षेत्र में प्रदूषण 72% बढ़ गया है और इससे आगे भारतीयों का जीवन प्रभावित हो रहा है। भारत में गंगा के मैदानी इलाके में सबसे ज्यादा प्रदूषण है। इसमें बिहार ,चंडीगढ़, दिल्ली ,हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल आते हैं। विश्लेषकों का मत है कि 1998 में जो लोग भारत के गंगा के मैदानी इलाके से बाहर रहते थे उनके जीवन में 1.2 साल कम हो गए थे 2016 में यह बढ़कर 2.6 वर्ष हो गए। अगर भारत प्रदूषण को नियंत्रित करने में कामयाब होता है और प्रदूषण  कम से कम एक चौथाई कम हो जाता है तो भारतीयों की औसत उम्र 1.3 साल बढ़ जाएगी। जो लोग गंगा के मैदानी इलाके में रहते हैं उनकी उम्र मोटे तौर पर 2 वर्ष बढ़ जाएगी।
        अध्ययन में दिखाया गया है कि प्रदूषण मानव समाज के लिए चुनौती बन गया है खास करके हमारे देश भारत में। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक आज मनुष्य ऐसे हालात में ऐसे वायुमंडल में रहने के लिए विवश है, जहां वायु की गुणवत्ता बहुत ही खराब है, कम से कम मानकों के नीचे है। भारत में स्थिति यह है कि 2016 में हमारे देश में लगभग एक लाख 10 हजार बच्चे प्रदूषण के कारण मौत की गोद में सो गए।  इससे भी अधिक विचारणीय है कि विषय है कि अब से कुछ साल पहले तक बीजिंग दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर था लेकिन अब वह नहीं है। अब भारत के एक नहीं 14 शहरों ने उसकी जगह ले  ली है जिसमें सर्दियों में दिल्ली और कोलकाता की हालत सबसे ज्यादा खराब हो जाती है। प्रदूषित शहरों के मामले में सर्दियों में जिस दिल्ली की सबसे ज्यादा चर्चा होती है वह छठे नंबर पर है ,एक नंबर पर कानपुर और उसके बाद क्रमशः फरीदाबाद वाराणसी गया पटना ,दिल्ली और लखनऊ है। यह सूची हमें चिंतित करती है। वहीं, दूसरी तरफ एक उम्मीद की किरण दिखाई देती है। अगर चीन इस पर नियंत्रण पा सकता था और पा सकता है तो हम क्यों नहीं। हमें देश हित में ठोस कदम उठाने चाहिए और इसके लिए केवल सरकार ही जिम्मेदार नहीं है। कई बार आम आदमी भी इस समस्या को बढ़ाने में योगदान करता है हम केवल समस्या को मानकर और सरकार पर दोष लगा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। हमने कभी नहीं सोचा कि हमें भी इसका ख्याल रखना चाहिए आखिर वाहन व्यक्तिगत रूप से इस्तेमाल  किए जाते हैं तो क्यों नहीं हम उससे होने वाले प्रदूषण को रोकें। क्यों चौराहे पर खड़ा सिपाही जब आपकी गाड़ी की पॉल्युशन रिपोर्ट मांगता है तो हम उसे मुट्ठी में कुछ पैसे देते हैं? बेशक इससे तात्कालिक लाभ तो होता है । हमें तात्कालिक उपायों के साथ- साथ दीर्घकालिक उपायों पर भी जोर देना होगा। लेकिन गांव में समस्या तो  है वहां लोगों को जागरूक बनाना होगा। अगर हम प्रदूषण को नहीं रोक सके तो हमारे देश खासकर हमारे शहर गैस चैंबर में बदल जाएंगे और हम उस गैस चेंबर में रहने के लिए मजबूर हो जाएंगे। पूरा शहर धीरे धीरे गैस चेंबर से भरे यातना गृह  में बदलता जा रहा है। हमें उस यातना गृह में रहने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।


Wednesday, January 29, 2020

जरा गांधी को याद करें

जरा गांधी को याद करें 

इन दिनों नागरिकता को लेकर कई आंदोलन चल रहे हैं। उसमें छात्रों की भूमिका स्पष्ट दिखाई पड़ रही है। मंगलवार को कोलकाता विश्वविद्यालय में  राज्यपाल को नहीं प्रवेश करने दिया गया। उनका कार्यक्रम रोक दिया गया। यही हालत दिल्ली, बनारस, अलीगढ़ में भी सुनने को मिलती है। छात्रों के आंदोलन से हालात असंतुलित हो रहे हैं विभिन्न आंदोलनों में  छात्रों को  जोड़ना  और सरकार के खिलाफ उनके  उपयोग की घटनाएं कोई नई नहीं है। लगभग आधी सदी पहले 1970 में  गुजरात में  नवनिर्माण आंदोलन हुआ था। आज के प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी  उस समय  छात्र के तौर पर उस आंदोलन में शामिल हुए थे।  इसके बाद  1974 में  जयप्रकाश नारायण का आंदोलन हुआ।  जिसमें छात्र शक्ति ने  जमकर भाग लिया अब सीएए के विरोध में बात उठ गई ।  शुरू के दिनों को छोड़ दें तो यह आंदोलन लगभग शांतिपूर्ण है। लेकिन खतरे दिखाई पड़ रहे हैं कि इसे यानी इस आंदोलन को गैरकानूनी बना दिया जाए। इसके बरक्स गांधी शहीद दिवस के अवसर पर यह याद करना जरूरी है कि गांधी बेशक राष्ट्रपिता नहीं रहे हों या कहें इन दिनों उनको ऐसा मानने से इनकार किया जा रहा है , लेकिन गांधी कायम हैं। यकीनन, अहिंसक नागरिक आंदोलन के अगुआ तो वह  रहे ही हैं। आज जो लोग सीएए- एनआरसी का विरोध कर रहे हैं उन पर जिहादी ,राष्ट्र विरोधी, पाकिस्तान समर्थक इत्यादि का ठप्पा लग रहा है। शाहीन बाग से पार्क सर्कस तक के प्रदर्शनकारियों पर आरोप है कि उन्होंने यातायात को बाधा पहुंचाई और लोगों को आवागमन दिक्कतों से मुकाबिल होना पड़ा। यहां प्रदर्शनकारी राजनीतिज्ञों की आर्थिक मदद से मैदान में डटे हैं।
   अब से कुछ हफ्ते पहले तक जो लोग गांधी जी की बात करते थे और और बीते  2 अक्टूबर को गांधी जन्मदिन मना चुके थे वे अब गांधी के आलोचक बने हुए हैं ।  जितने भी लोग आलोचक हैं उनमें से कोई भी  पीछे लौटकर गांधी के काल में पहुंचकर उस समय की सामाजिक,  आर्थिक और राजनीतिक स्थिति का विश्लेषण नहीं करते। सब आज के दिन के आईने में गांधी को देखना चाहते हैं। लेकिन, यह तो सच है कि गांधी हमारे अवचेतन में कहीं न कहीं मौजूद हैं और वहां से वह लगातार दस्तक देते रहते हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक के विचारक  गुंटर ग्रास के अनुसार "गांधी एक ऐसे व्यक्ति थे , बेशक दुनिया उनके अस्तित्व को खारिज कर दे   लेकिन उन्हें चिंतन से या दर्शन से बाहर नहीं निकाला जा सकता । " बेशक कुछ वर्षों से गांधी को खारिज करने का अभियान चला हुआ है। कभी उनके विरोध में हमसे अलग कर दूसरे बिंबों के साथ जोड़ दिया जाता है, मनोवैज्ञानिक तौर पर यह बिंब जुड़ी हुई यादों को संजो कर आते हैं और हम उन्हीं बिंबों के माध्यम से उस व्यक्ति को पहचानते हैं, जिससे वह जुड़ा हुआ है। आहिस्ता- आहिस्ता बिंबों को या तो नजरअंदाज किया जा रहा है अथवा खारिज। एक जमाने में बच्चों को "ग" से गणेश पढ़ाया जाता था और वह बच्चा गणेश के चित्र को देखते ही "ग" को याद कर लेता था। आहिस्ता - आहिस्ता सेकुलरवादियों ने " ग से गमला पढ़ाना शुरू किया और अब बच्चे ग से गमला पढ़ते हैं लेकिन गणेश के 'ग' को भूलना मुश्किल है। गणेश का अस्तित्व आज भी है। उसी तरह आप चाहे बिंबों को कितना भी खारिज कर दें जो बिम्ब दर्शन में समा गए, विचारों में समा गए उन्हें खारिज नहीं कर सकते।
    यही कारण है अब उनको छोड़ उनके व्यक्तित्व को एक दूसरे नजरिए से देखा जा रहा है। लेकिन यहां भी गांधी हैं। अब जरा मॉब लिंचिंग के दौर को देखें । 13 जनवरी 1897 की डरबन की घटना बहुतों की याद होगी। जब लगभग 600 मजबूत फौजियों के साथ अंग्रेजों ने गांधी पर हमला कर दिया। जमकर पीटा गया उन्होंने बड़ी मुश्किल से रुस्तम जी फारसी के घर में शरण ली। अंग्रेजों ने भीड़ को पुलिस की वर्दी पहना कर घर पर हमला करवा दिया। किसी तरह गांधी बच गए। 22 वर्षों के बाद 10 अप्रैल 1919 भारत में यह बात पता चली और गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया। जब गिरफ्तारी हो रही थी अहमदाबाद शहर में दंगा भड़क गया और कई अंग्रेज घायल हुए। अगर इस घटना का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तो निष्कर्ष निकलेगा की हिंसा का संबंध किसी जाति विशेष से नहीं होता। 8 सितंबर 1920 को गांधी ने यंग इंडिया में दिखाता लोकशाही बनाम भीड़शाही आज भारत में लगभग यही स्थिति है । हालात अभी भी नहीं बदले। भीड़ को प्रशिक्षित करना सबसे सरल काम है। क्योंकि ,कभी भीड़ विचारशील नहीं होती और वह आवेश के अतिरेक में कुछ भी कर बैठती है
        आज हमारी सबसे बड़ी दिक्कत है कि समाज में सामाजिक और राजनीतिक संवाद की प्रक्रिया धीमी हो गई है। राजनीतिक वर्ग चाहे वह सत्तारूढ़ हो अथवा विपक्ष  संवाद से अलग रहना चाहता है या तो उसके  संवाद योग्य कुछ है ही नहीं। यही कारण है  कि राजनीतिज्ञ अपनी बात मनवाने के लिए भीड़ का उपयोग करने लगे हैं। आज हम एक विचित्र असंवाद की स्थिति में रह रहे हैं। हमारे नेता चाहे वह सत्तारूढ़ दल के हों या विपक्ष के समझ नहीं पा रहे हैं की भीड़ को नियंत्रित करना केवल पुलिस का काम नहीं है। ऐसी स्थिति उत्पन्न ना होने देना समाजिक और राजनीतिक प्रबंधन का एक सामाजिक उपक्रम है और हम सब उस उपक्रम के पुर्जे हैं। कभी भीड़ की हिंसा की घटनाओं का अगर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तो प्राप्त होगा कि उसने शामिल लगभग हर आदमी किसी न किसी मानसिक सामाजिक, आर्थिक या पारिवारिक समस्या से ग्रस्त है और उसकी यह प्रवृत्ति  एक दिन में नहीं बनी है उसका विकास एक लंबी अवधि में हुआ है जिसमें हमारे मौजूदा राजनीतिक आर्थिक और सामाजिक वातावरण के साथ साथ कई और कारक शामिल हैं।  बोध से ग्रसित लोगों की जमात अपनी तमाम समस्याओं के लिए इसी अन्य को जिम्मेदार मानने की प्रवृत्ति से ग्रस्त है। वह भी अपनी भड़ास निकालने के लिए किसी एक तात्कालिक बहाने की खोज में रहती है। भीड़ को मालूम है कि उसका कोई अपना चेहरा नहीं है और किसी कायरता पूर्ण हिंसा को छिपाने के लिए इससे बेहतर कोई मौका नहीं है।
हिंदू महासभा द्वारा प्रकाशित स्वातंत्र्यवीर सावरकर खंड 6 इस 296 में लिखा गया है कि 1937 में हिंदू महासभा के खुले अधिवेशन में वीर सावरकर ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि  भारत को अब एक  समशील राष्ट्र नहीं कहा जा सकता । यहां दो राष्ट्र है हिंदू और मुसलमान । कहने का अर्थ है गांधी दोषी नहीं थे बंटवारे के।उन्हें इंकार करने की कोशिशें हो रही है

आज मानव समाज के तौर पर हम मनुष्यों में क्रोध बढ़ रहा है हालांकि इसके आंकड़े अभी उपलब्ध नहीं हैं लेकिन दार्शनिकों ने पाया है कि हिंसा चाहे भीड़ की या किसी चरमपंथी संगठन या फिर सेना की हो कहीं न कहीं एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक समस्या भी है।  इसके  निदान के लिए हमें गांधी और टैगोर जैसे लोगों को सुनने और पढ़ने और समझने की जरूरत है।


Tuesday, January 28, 2020

जरा अपने बच्चों के बारे में भी सोचें

जरा अपने बच्चों के बारे में भी सोचें 

भारत में सीएए और एनआरसी को लेकर प्रचंड बवाल है। पूरा भारत अशांत है। ऐसे में एक सवाल है कि जिस देश में इस तरह के मामूली हालात पर इतना उपद्रव हो सकता है बसें जलाई जा सकती हैं ,धरने दिए जा सकते हैं वहां कोई कैसे निवेश करेगा? लोग सरकार को दोषी बता रहे हैं कि निवेश नहीं हो रहा है। अर्थव्यवस्था बिगड़ती जा रही है। बेरोजगारी बढ़ रही है। जरा गौर करें की आखिर ऐसे मुल्क में कोई क्यों पूंजी लगाएगा जहां पूंजी की हिफाजत ना हो? जहां बात बात में बर्बादी हो जाए ,जहां किसी भी मामूली बात पर बंद- धरने - हड़ताल इत्यादि हो जाएं। जो लोग इस तरह के काम में शामिल हैं या जो इसका समर्थन कर रहे हैं वह जरा सोचें तो कि क्या भविष्य का भारत कटोरा थमा हुआ भारत होगा? लेकिन, उनकी कोशिश तो इसी दिशा में ले जाने की है। सरकार क्या कर सकती है। सरकार सिर्फ व्यवस्था बना सकती हैं लेकिन उस व्यवस्था को मानने और उस व्यवस्था के अनुरूप चलने में जनता की सबसे बड़ी भूमिका होती है।
      अब देखिए नागरिकता संशोधन कानून को लेकर सारे देश में विरोध चल रहा है। शाहीन बाग से कोलकाता के पार्क सर्कस तक किसने यह करंट लगाया है। इससे जहां अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंच रहा है वहीं डर का भी एक माहौल पैदा ले रहा है। कभी किसी ने सोचा है 2 मिनट शांत बैठ कर कि इस डर के माहौल का असर क्या होगा? शायद नहीं। अगर सोचा होता तो यह स्थिति पैदा ही नहीं लेती।
      कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सरकार ही अर्थव्यवस्था में सुधार करने में नाकामयाब  रही और इस नाकामयाबी के कारण व्यवसायिक समाज में डर पैदा हो गया।  उससे नुकसान होने लगा। लेकिन यह तो रातोंरात  नहीं हुआ। सरकार ने सुधारने की कोशिश की या नहीं की इस प्रश्न पर विचार करने से पहले यह सोचना जरूरी है कि क्या यह समस्याएं पहले नहीं थीं? क्या कृषि क्षेत्र की समस्याएं पहले नहीं थीं? हां , सरकार के कुछ कदमों से कई समस्याओं का इजाफा हुआ है। जैसे, बैंक के एनपीए बढ़े हैं इसके लिए कुछ कदम तो उठाए गए हैं लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक ने जिन उपायों को बताया है उसे पूरी तरह लागू नहीं किया जा सका। इसका भी एक कारण है। सरकार की जिम्मेदारी आर्थिक से ज्यादा सामाजिक है और जबकि रिजर्व बैंक का दृष्टिकोण सदा आर्थिक होता है। आर्थिक कदमों का सामाजिक प्रभाव की गणना किए बगैर सरकार अगर कदम उठाती है तो उसका असर उलटा भी पड़ सकता है। अब उदाहरण के लिए देखें, अपनी सीमित आय में किसी को कुछ पैसे बचाने हैं। जाहिर है उसे खर्च कम करने होंगे और बचाये जाने वाले खर्चों में खाने के खर्चे भी शामिल होंगे। खाने में उचित खुराक नहीं लेने से पोषण की समस्या बढ़ेगी  और उसके बाद बीमारियां बढ़ेंगी।  फिर, उपचार के लिए कर्ज लेने होंगे और इसका नतीजा होगा की भविष्य पर असर पड़ेगा। जब कुपोषण की समस्या बढ़ेगी और उसका विस्तार होगा तो सबसे ज्यादा आलोचना सरकार की होगी। क्योंकि सामाजिक खुशहाली की जिम्मेदारी सरकार की है। लेकिन रिजर्व बैंक के साथ यह संकट नहीं है। अब देखिए जो लोग कहते हैं कि बैंकों के एनपीए बढ़ेंगे अगर कंपनियां दिए हुए कर्ज़ों को लौटा नहीं सकेंगी तो उसका असर बैंक कर्मचारियों पर पड़ेगा। क्योंकि, कर्ज देने वाले बैंक  के खिलाफ रिजर्व बैंक और सीवीसी की जांच शुरू होगी और कहीं न कहीं दोष पाए जाने पर उस कर्मचारी की सेवाएं तक खत्म हो सकती हैं। बेकारी बढ़नी शुरू हो जाएगी। दूसरी तरफ, जिन लोगों ने कर्ज लिया है अब लौटा नहीं पा रहे हैं वह अपने कामकाज बंद करके दूसरे देश में जाकर बैठ जाते हैं और फिर उस काम में लगे लोगों के साथ समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं। कहां से पैसे आए? इसका एक बड़ा दिलचस्प उदाहरण है। सरकार पर दबाव पड़ रहा है कि वह टैक्स कम करे। सरकार टैक्स कम करती है तो खर्चों की आपूर्ति के लिए उसे बाहर से कर्ज लेना पड़ेगा और उस कर्ज को चुकाने के लिए फिर उसे सरकारी कंपनियों का विनिवेश करना होगा यानी  दोबारा संकट। पिछले साल के बजट पर गौर करें सरकार ने जो बजट प्रस्ताव दिए उन्हें थोड़े दिनों के बाद पूरी तरह बदल दिया गया। ऐसे में जिसके पास निवेश करने की क्षमता भी है वह यह सोचकर निवेश करने से झिझक रहा है । ऐसे में व्यापार और अर्थव्यवस्था की स्थिति ठीक नहीं है और सरकार ने जो कदम उठाया है उस समस्या का हल नहीं होता है। अब इन सभी समस्याओं का सामना करती अर्थव्यवस्था पर नागरिकता संशोधन कानून का असर क्या पड़ेगा। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी का कहना है अधिनायकवाद और आर्थिक समृद्धि के बीच किसी तरह का रिश्ता नहीं है। लेकिन, सवाल है कि आखिर इस तरह का माहौल अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाता है या नहीं ।
        यह तो सर्वविदित है कि लंबे समय तक चलने वाले विरोध प्रदर्शन का उस देश और उस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। क्योंकि, इससे निवेश का माहौल खराब हो जाता है। भारत में अभी गनीमत है कि स्थिति इतनी नहीं बिगड़ी है लेकिन तब भी सामाजिक अशांति और हिंसा ग्रस्त माहौल का असर तो होता ही है। सीरिया, लेबनान, अल्जीरिया और अन्य अरब देशों की अर्थव्यवस्था को देखकर आसानी से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। पाकिस्तान इसका एक उदाहरण है। वहां का जीडीपी लगातार घट रहा है। इसका कारण है कि विकास के मदों से धन की कटौती करके आंतरिक सुरक्षा और फौज पर ज्यादा खर्च करने पड़ते हैं को ज्यादा कर देना पड़ता है और कर्ज हर सरकार के वक्त तरक्की की राह में बाधक होता है। ऐसे में विदेशी तो क्या घरेलू निवेशक भी पूंजी नहीं लगाना चाहते।
     ऐसे में सबसे ज्यादा जरूरी है सरकार का प्रदर्शनकारियों से संवाद शुरू करना। लेकिन किससे किससे किया जाए। जैसी कि खबर मिल रही है इस प्रदर्शन की डोर कई गुप्त हाथ खींच रहे हैं और उन गुप्त हाथों की पड़ताल तथा उनकी कलाई पकड़ना संभव नहीं है।  जब तक इसका समाधान नहीं होता किसी का भला नहीं होगा। जो लोग इस प्रदर्शन में शामिल हैं वह यह नहीं समझ रहे कि हमारा भविष्य कैसा होगा और अपने बच्चों के लिए कौन सा भारत बना रहे हैं? जरा सोचिए।


Monday, January 27, 2020

सी ए ए उपद्रव के पीछे सीआईए का हाथ

सी ए ए उपद्रव के पीछे सीआईए का हाथ

कोलकाता: भारत को विश्व नेता के रूप में उभरते देखकर सीआईए ने इसे सबक सिखाने की ठानी और बड़ी चालाकी से उसने देश भर में सी ए ए  और उससे जुड़े  अन्य मामलों में  अपने  लोगों को भड़का कर अशांति फैला दी। हालांकि, इसका ठीकरा कई संगठनों के सिर पर  फूटा लेकिन  इन सारे उपद्रव के पीछे सीआईए  की भूमिका है। रॉ के एक उच्च पदस्थ सूत्र ने बताया कि भारत को असंगठित कर उसे संकट में डालने के लिए सीआईए ने यह सब किया है। भारत के बड़े शिक्षा संस्थानों में एक विशिष्ट विचारधारा के छात्र संगठन के मशहूर नेताओं को भारी रकम देकर पालने और  उनके माध्यम से  देश के नेताओं  की स्थिति  की पूरी रिपोर्ट हासिल करने में जुटी इस संस्था ने  बड़ी सफाई से भारत में उपद्रव करवा दिया। पहले छात्रों को भड़काया, छात्रों ने आंदोलन किए और उसके माध्यम से समाज के एक वर्ग को भड़का दिया। भारतीय विदेशी खुफिया विभाग रॉ की काउंटर इंटेलिजेंस विंग के बड़े अफसरों और कूटनीतिक हलकों के अनुसार देश की सभी बड़ी यूनिवर्सिटीज में सीआईए के गुर्गे  बैठे  हैं और जानबूझकर वहां से बाहर नहीं जाते हैं। क्योंकि उन्हें हर महीने मोटी रकम दी जाती है और इतना ही नहीं विदेश यात्राओं पर भी ले जाया जाता है। इनमें से कई छात्र नेताओं को सीआईएए से अपने संबंधों के बारे में जानकारी तक नहीं है। उनके तार किसी अन्य माध्यम से उनसे जुड़े हुए हैं। रॉ के अनुसार पिछले हफ़्तों में  जो फसाद  हुए उसमें सीआईए के एजेंटों की बहुत बड़ी भूमिका थी।
     कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक इस उपद्रव के लिए  लोगों के एक वर्ग को भड़काने  और उन्हें  हिंसा पर आमादा करने   के काम में  सीआईए ने बहुत बड़ी रकम खर्च की है। रॉ के काउंटर इंटेलिजेंस विंग के एक वरिष्ठ अनलिस्ट के मुताबिक   देश के  बड़े विश्वविद्यालयों में जो उपद्रव हुए उन का स्वरूप एक ही था और विरोध का रंग भी एक ही था। यही नहीं, अन्य स्थानों पर जो विरोध हुए उन विरोधियों में कश्मीर के पत्थरबाजों की गतिविधियों में भी समानता थी ऐसा लग रहा था कि उन्हें इसके पहले कहीं से कोई प्रशिक्षण मिला था। जैसे ही सरकार को यह खबर मिली उसने उपद्रवियों पर बल प्रयोग को रोक दिया और मामला धीरे-धीरे सीमित होता गया। लेकिन यह मसला अभी और भड़कने वाला है। भारतीय खुफिया सूत्रों के अनुसार 8 फरवरी के बाद इसकी  सुनगुन फिर शुरू होगी  और  यदि सरकार  बल प्रयोग करती है तो यह उपद्रव और बढ़ेंगे। लगभग 1500 हथियारबंद आतंकी बांग्लादेश सीमावर्ती क्षेत्रों में टुकड़े टुकड़े में फैले हुए हैं भारत में उपद्रव होते ही  वह प्रवेश कर जाएंगे। सबसे खतरनाक तथ्य तो यह है की इन सारी करतूतों में कुछ विशेष राजनीतिक संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका है लेकिन इसका दोष पूर्ववर्ती सिमी और उससे जुड़े संगठनों पर मढ़ा जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक नेपाल और बांग्लादेश से हथियारों की कई बड़ी खेप भारत के विभिन्न शहरों में पहुंच चुकी है और इसका समय आने पर उपयोग किया जाएगा। यद्यपि हथियारों के भंडार पर खुफिया सूत्रों की नजर अभी तक नहीं है लेकिन लगभग उन क्षेत्रों को घेर लिया गया है जहां यह भड़क सकते हैं। हथियारों के भंडार की पड़ताल इसलिए नहीं हो पा रही है कि इसे टुकड़े-टुकड़े में कई जगहों पर पहुंचाया गया है इसमें कुछ भूमिका नक्सलियों की भी है। अभी 1 महीने पहले कोलकाता में एक वाणिज्य दूतावास में नक्सलियों के बड़े नेताओं और महावाणिज्य दूत के साथ लंबी बैठक भी हुई थी। उस बैठक में क्या चर्चा हुई यह तो पता नहीं चल पाया लेकिन अंदाजा लगाया जा रहा है कि नक्सलियों को धन तथा हथियार मुहैया कराने की तैयारी है। जहां तक  पता चला है नक्सली कथित रूप से देश को मध्य भाग से दक्षिण भाग तक एक कॉरीडोर के रूप में विभाजित करना चाहते हैं और अगर गौर करें तो दिल्ली से लेकर कर्नाटक तक उपद्रव का सबसे ज्यादा प्रभाव है। सरकार को यह खबर प्राप्त हो चुकी है तथा उन्हें कुचलने की तैयारी चल रही है। देश के विश्वविद्यालयों में खासकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में इनकी मौजूदगी का स्पष्ट असर दिखाई पड़ रहा है। सरकार इसे शांतिपूर्वक मुकाबले के लिए तैयार है लेकिन कभी भी कुछ हो सकता है।


शांति हर सवाल का जवाब .

शांति हर सवाल का जवाब 

अभी दो दिन पहले गणतंत्र दिवस का समारोह पार हुआ है और इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने " मन की बात" कार्यक्रम में कहा कि हम 21वीं सदी में हैं। यह सभी ज्ञान विज्ञान और लोकतंत्र का युग है। क्या आपने किसी ऐसे स्थान के बारे में सुना है जहां हिंसा से जीवन बेहतर हुआ है। प्रधानमंत्री ने कहा कि हिंसा से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। शांति हर सवाल के जवाब का आधार होना चाहिए। उन्होंने लोगों से अपील की कि एकजुटता से हर समस्या का समाधान का प्रयास होना चाहिए। भाईचारे के जरिए विभाजन और बंटवारे की कोशिश को नाकाम करें।
       प्रधानमंत्री का इशारा यकीनन देश में चल रहे अलगाववाद और उपद्रव की ओर था उन्होंने शांति की अपील की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में लगभग सभी मंचों पर प्रशंसा है । "मूड ऑफ द नेशन" के एक सर्वे में मोदी जी देश के सर्वश्रेष्ठ शासनाध्यक्ष हैं। इनके बाद इंदिरा जी का नंबर है। मोदी जी को सर्वे में 34% भारतीयों का समर्थन मिला है जबकि इंदिरा जी को 16 प्रतिशत और अटल बिहारी वाजपेई को 13% भारतीयों ने बेहतरीन प्रधानमंत्री बताया है। यद्यपि मोदी जी के बारे में जो भारतीय जनता का समर्थन मिला है वह अगस्त में कहीं ज्यादा था अब 3% कम हो गया है। जबकि इंदिरा जी रेटिंग 2% बढ़ी है। इसका मुख्य कारण है अभी हाल में हुए सीए ए के आंदोलनों का सामाजिक प्रभाव। इस प्रभाव से मोदी जी के शांति दूत की छवि घटी है और इंदिरा जी की इसलिए बढ़ी है कि उन्होंने समान स्थितियों में बल प्रयोग करके आंदोलनों को दबा दिया। यानी हमारा देश स्पष्ट रूप से यह चाहता है यह जो आंदोलन चल रहे हैं इन को किसी भी तरह दबाया जाए। यही नहीं मोदी जी के बारे में जो नई राय बनी है उसके लिए आर्थिक विकास ,बेरोजगारी, किसानों की पीड़ा इत्यादि भी कारण है।
      मोदी के विरोध में बोलने वालों के पास एक मजबूत पॉइंट है कि इकोनॉमिस्ट  पत्रिका ने ताजा अंक  में लोकतंत्र सूचकांक में भारत का स्थान 10 सीढ़ियों नीचे गिरा दिया। लेकिन यह सूचकांक विशुद्ध नहीं है। इसमें कई त्रुटियां हैं। हालांकि यह समाचार कोई बहुत बड़ा नहीं है। इंटेलिजेंस यूनिट की का अध्ययन पांच बातों पर आधारित बताया जाता है पहला चुनावी प्रक्रिया और बहुलतावाद, सरकार का कामकाज ,राजनीतिक भागीदारी , राजनीतिक संस्कृति और नागरिक स्वतंत्रता। विख्यात पत्रिका  द कन्वर्सेशन  के ताजा अंक में इस बात का जिक्र करते हुए  रेखांकित किया गया है कि "आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय रणनीति में    आजकल विभिन्न देशों की राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया के विश्लेषण को बहुत महत्व दिया जाता है। क्योंकि, इसमें निवेश से जुड़े जोखिम के आकलन में मदद मिलती है।" दरअसल निवेश की वास्तविक दुनिया में लगाए गए धन पर मुनाफे को उतना महत्त्व नहीं दिया जाता जितना महत्व निवेश से जुड़े जोखिम की चिंता को दी जाती है। यही कारण है दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भारत जैसी लोकतांत्रिक परंपरा और सामूहिक निर्णय संस्कृति वाले देश के बजाय उन देशों में भारी निवेश कर रही है जो कहीं ही कम लोकतांत्रिक हैं। पश्चिमी देशों के अमीरों को अविकसित देशों के तानाशाहों और स्वेच्छाचारी शासकों के साथ सौदा करने में आसानी होती है। विकसित देशों और उनकी सरपरस्ती में काम करने वाले संस्थानों में चीन को सबसे ज्यादा तरजीह दी जाती है लेकिन क्या कोई चीन को लोकतांत्रिक परंपराओं वाला श्रेष्ठ देश कह सकता है? शायद नहीं। अधिनायक वादी देशों को तरजीह दिए जाने के पीछे संभवत ये तर्क है कि उनकी व्यवस्थाएं ज्यादा जटिल नहीं होती या वहां निर्णय प्रक्रिया भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों के मुकाबले बहुस्तरीय नहीं होती। इसलिए निवेशकों का शीर्ष नेतृत्व से तत्काल संपर्क हो जाता है। ऐसी पृष्ठभूमि व्यवसाय और निवेश के बड़े अवसरों के लिए लोकतंत्र के महत्व पर उपदेश दिया जाना बड़ा अजीब लगता है। भारत की अपनी एक लोकतांत्रिक व्यवस्था है और वह उसका पालन करता है साथ ही अंतरराष्ट्रीय व्यवसायों के लिए उसके अपने मजबूत संस्थागत ढांचे हैं इसका उल्लेख राष्ट्र संघ तक ने किया है।
        इनदिनों एक फैशन हो गया है यह कहना कि  बहुधर्मीय भारत को उग्र राष्ट्रवादी हिंदू राष्ट्र में बदलने के लिए  प्रयास चल रहा है। लेकिन अगर हकीकत देखें तो यह बात सही नहीं प्रमाणित होती है। भारत में ऐसा कोई प्रयास नहीं चल रहा है जो उसे राष्ट्रवादी हिंदू राष्ट्र में बदल दे। अगर इसका इशारा सीए ए और एनआरसी की तरफ है तो यह निहायत ना जानकारी है। सबसे पहली बात कि यह किसी की नागरिकता लेने के लिए नहीं कुछ लोगों को नागरिकता देने के उद्देश्य से बनाया गया है। दूसरी बात है कि, सी ए ए के  पर्दे में जो उपद्रव हो रहे हैं उसका उद्देश्य कुछ दूसरा है। उसका स्वरूप राजनीतिक है। ऐसे में सरकार को दोष दिया जाना  ना केवल बरगलाना  है बल्कि सच से अलग है।