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Wednesday, August 24, 2016

जन्माष्टमी : छित्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत

आज जन्माष्टमी है, यानी कृष्ण के जन्म का दिन। वैसे हमारी धार्मिक मनीषा में कृण का सवरूप या तो गीता के उद्गाता के रूप में या रास रचैया के रूप में। लेकिन का स्वरूप का विस्तार के गीता के उद्गाता के रूप में कुछ ज्यादा ही है। दुनिया के सारे दर्शन एकांतबोध में उभरे हैं। केवल  गीता का दर्शन ही  युद्ध के तनाव के कोलाहल में जन्मा। थेल्स, पाइथागोरस, अरस्तू, सुकरात और कांट की ध्वनियों में  श्रीकृष्ण की गीता के दर्शन  हैं। कपिल तो उनके पहले हुए ही थे। गीता में कपिल के सांख्य के साथ वेदांत भी है। गीता दरअसल अधूरे मनुष्य के संपूर्ण हो जाने का दर्शन है। यहां यह पूछा जा सकता है कि आज के दौर में जब राजनीतिक, सामाजिक और आपराधिक गतिविधियों का उत्ताल स्पष्ट है तो ऐसे समय में गीता की बात करना कहां तक तर्कसंगत है। लेकिन अगर समाज विज्ञान के चश्में से देखें तो पता चला चलेगा कि आज के हालात ठीक वैसे ही हैं जैसे हमारे प्राचीन ग्रथों में महाभारत काल के बताये गये हैं।  गीता के गायक श्रीकृष्ण हैं, श्रोता अर्जुन, पर दोनों केवल वक्ता या श्रोता ही नहीं हैं, बल्कि  अर्जुन केवल प्रश्नकर्ता है। श्रीकृष्ण हरेक प्रश्न का उत्तर समझाने के लिए अनेक विकल्प भी सुझाते हैं। मार्क्सवादी चिंतक डॉ. रामविलास शर्मा ने महाभारत को इतिहास और महाकाव्य कहा है। श्रीकृष्ण यदुगण के नायक थे। डॉ. शर्मा के अनुसार सामाजिक विकास के क्रम में गण टूट कर जन बन रहे थे। वैदिक साहित्य में पांच मुख्य जन हैं। ये हैंसंहिता,  ब्राह्मण,  उपनिषद् , वेदांग एवं सूत्र-साहित्य।

यदु प्रमुख जनसमूह हैं। श्रीकृष्ण इसी गण और जन की रचना हैं। श्रीकृष्ण प्रकृति सृजन की चरम उपलब्धि हैं। आपने गौर किया होगा कि महाभारत के काल में धर्माचरण बिगड़ गया था। धर्म क्या है? धर्म एक आचार संहिता है, रूल आफ् कंडक्ट है।  उस काल में धर्मराज भी जुआरी हो गये थे।  श्रीकृष्ण की घोषणा है कि ‘संभवामि युगे युगे’ यानी जब-जब धर्म का आचरण में बिगड़ता है , परम सत्ता बार-बार संभालती है। कृष्ण ते परमसत्ता के लिए ‘मैं’ शब्द का प्रयोग किया है। यह ‘मैं’ नया नहीं है। एक तरफ वे धर्म के प्रति एकनिष्ठ दिखते हैं तो दूसरी तरफ गीता के अंत में सभी धर्म छोड़ने की अपील भी करते हैं। श्रीकृष्ण धर्म अतिक्रमण के भी नायक हैं। यही अतिक्रमण आज सर्वधर्म समभाव है। आज यही सर्वधमं समभाव ही हमारे देश का हमारे समाज का सबसे बड़ा मसला है। आज हमारे समाज की मांग हे कि कट्टर धार्मिकता का अतिक्रमण किया जाय। गीता इस बात का सबूत है कि तर्क और  प्रतितर्क हमारे राष्ट्रजीवन की परम्परा है। तर्कशील लोकतंत्र  की व्यवस्था को जन्म देने का दावेदार  पश्चिमी जगत भी जानता है कि लोकतंत्र भारत का सहज स्वभाव है। पश्चिम का जनतंत्र का उदय अत्याचारपूर्ण अधिनायकवादी राजतंत्र की प्रतिक्रिया स्वरूप आया है। लोकतंत्र भारत का सहज स्वभाव है। भारतीय संस्कृति स्वभाव से ही 'आध्यात्मिक पंथनिरपेक्ष' है। राजनीति और राज्य व्यवस्था में पंथनिरपेक्षता की वकालत के रूप में ही कृष्ण ने गीता के अंत में धर्म को छोड़कर उनमें एकाकार हो जाने को कहा था। वैदिक काल के ऋषि तर्क करते थे और उपनिषद काल तर्क काल है ही। फिर तो बहस का ही माहौल बना। शंकर-पार्वती, अष्टावक्र-जनक, अर्जुन-कृष्ण , यम-नचिकेता, सूत-शौनकऔर काक भुसुण्डी -गरूड़ जैसे पक्षी भी तर्क करते हैं। इसी पंथनिरपेक्ष जन-गण-मन व्यवस्था की सनातन संस्कृति का यह राष्ट्र है। आज हमारा राष्ट्र कट्टरपंथ और कुतर्क के ऐसे दोराहे पर खड़ा है जो राह विनाश के द्वार तक जाती है। ऐसे में कृष्ण का वह संदेश समस्त भारतीयों के लिये है कि ‘उठो अर्जुन, युद्ध करो और बुराइयों का विनाश कर दो ’  और तस्मादज्ञानंसम्भूतं ह्रत्सथं ज्ञानासिनात्मन:।

 छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।

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