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Thursday, August 1, 2019

तीन तलाक के आगे भी जारी रहेगा संघर्ष

तीन तलाक के आगे भी जारी रहेगा संघर्ष

संसद ने तीन तलाक विधेयक को मंजूरी दे दी। अब यह कानून बन जाएगा और तीन तलाक बोलकर या लिखकर अपनी बीवियों को तलाक देने वाले सजा के भागीदार होंगे। अब से करीब 2 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे और संवैधानिक करार दिया था।  तब से नरेंद्र मोदी की सरकार इसे खत्म करने के प्रयास में लगी थी । अब मुस्लिम महिलाओं को इस कुरीति से निजात मिल गई। लेकिन सरकार का जो रुख है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि तीन तलाक मंजिल नहीं है एक शुरुआत है। इसके आगे निकाह हलाला और बहु विवाह जैसे मामले भी हैं और यह मामले फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। तीन तलाक से संबद्ध विधेयक के कानून बन जाने के बाद मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी में एक दहशत खत्म हो जाएगी । यही नहीं पहले की स्थिति में अगर गलती से उसे तीन तलाक बोल - लिख कर तलाक दे दिया जाता था तो उसे दूसरी शादी करके फिर उससे तलाक लेकर पहले शौहर पास आना होता है। जिसे  निकाह हलाला कहते हैं। यह भयानक मानसिक त्रासदी है। तीन तलाक से संबद्ध विधेयक कानून बन जाने के बाद महिलाओं को इस मानसिक त्रासदी  से मुक्ति मिल जाएगी।
     सबसे पहले यह मामला 2016 में सुप्रीम कोर्ट में गया। इस मानवीय समस्या पर गंभीरता से विचार करते हुए प्रधान न्यायाधीश जे एस खेहर ने 23 अगस्त 2017 को तीन तलाक को  असंवैधानिक कहा था। इस फैसले के बाद अचानक छोटी-छोटी बात पर तलाक देने की घटनाएं सामने आने लगी। इन घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में  महिलाओं के संगठनों ने मांग शुरू कर दी। इन महिलाओं को इस उत्पीड़न से बचाया जाए संसद ने विधेयक बना दिया, जो जल्दी ही कानून का दर्जा प्राप्त कर लेगा। 
     लेकिन, मुस्लिम महिलाओं की मानसिक वेदना यहीं खत्म नहीं हुई है। अभी निकाह हलाला बाकी है इसके खिलाफ भी कई याचिकाएं संविधान पीठ में लंबित हैं। इनमें महिलाओं के बुनियादी हकों की हिफाजत के साथ बहुविवाह प्रथा का विरोध किया गया है इस पर रोक लगाने की मांग करते हुए   दावा किया गया है कि इन प्रथाओं से संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 में प्रदत्त मौलिक अधिकार का हनन हो रहा है।
         अब निकाह हलाला और बहुविवाह प्रथा के विरुद्ध भी मुस्लिम महिलाएं खड़ी हो गई हैं। इस प्रथा को चुनौती देते हुए कहा गया है कि यह आईपीसी की धारा 494 के तहत अपराध है। लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ की वजह से यह प्रावधान मुस्लिम समुदाय पर लागू नहीं हो रहा है। इस कारण से विवाहित मुस्लिम महिला के पास ऐसा करने वाले अपने पति के खिलाफ शिकायत का रास्ता नहीं बचता है। याचिका में मुस्लिम विवाह विच्छेद कानून 1939 को असंवैधानिक और संविधान के अनुच्छेद 14 ,15, 21 तथा 25 में  अधिकारों का हनन करने वाला घोषित करने का अनुरोध किया गया है । 
लेकिन बात ही खत्म नहीं हो जाती। तीन तलाक विधेयक के पास हो जाने हैं के बावजूद इसका प्रचंड विरोध जारी है । कुछ लोगों का कहना है कि इस विधेयक पर विचार करने से पहले यह ध्यान देना जरूरी है कि विभिन्न धर्मों में परिवारों के भीतर महिलाओं के हालात क्या हैं । 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि शादीशुदा महिलाओं का प्रतिशत मुसलमानों में 87.8 है जबकि हिंदुओं में 86. 2 ईसाइयों में 83.7 और अन्य अल्पसंख्यकों में 85.8 है। मुसलमानों में विधवाओं की संख्या अन्य सभी धर्मों से कम केवल 11.1%  है। हिंदुओं में 12.9 ,ईसाइयों में 14.6 और अन्य अल्पसंख्यकों में 2.3 प्रतिशत है। सिर्फ एक मामले में , तलाकशुदा मामले में फर्क है। मुस्लिमों में जहां 0. 49 प्रतिशत तलाकशुदा हैं वहीं हिंदुओं में सिर्फ 0. 22% हैं।
     इसका विरोध करने वालों का दावा है कि यह विधेयक जहां इंस्टेंट तलाक पर रोक लगाता है वहीं एक गड़बड़ी भी है। इसके कानून बनने के बाद एक तरफ जहां तीन बार तलाक बोलने से तलाक नहीं होता वहीं इसके बाद पति को सजा का प्रावधान भी है। महिला के रक्त संबंधी द्वारा शिकायत किए जाने पर पति को बिना वारंट के गिरफ्तार किया जा सकता है। ऐसे में बड़ी अजीब स्थिति हो जाएगी। तलाक और शादीशुदा होने के बीच महिलाएं फंस जाएगी।  पति जेल में और उसकी बीवी बाहर । इससे तो वैवाहिक स्टेटस का सवाल उठने लगता है। पति जेल में रहेगा तो वह अपनी बीवी को कोसेगा। शादी तोड़ने के लिए दवाब बनाएगा इससे समाज में एक खास किस्म की मजबूरी बढ़ेगी।
इन सबके बावजूद निकाह हलाला और बहु विवाह के खिलाफ आवाज उठाने वाली मुस्लिम महिलाओं का कहना है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत शादियां उनके मौलिक अधिकार का हनन करती हैं। उम्मीद की जाती है कि सती प्रथा, देवदासी प्रथा और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं पर अंकुश लगाने के बाद मुस्लिम महिलाओं को इन प्रथाओं के तहत मानसिक त्रासदियों से मुक्ति दिलाने के लिए कानून में संशोधन के पूर्ववर्ती सरकारों  के प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए मोदी सरकार भी मुस्लिम महिलाओं को मानसिक यातना उसे मुक्ति दिलाने के लिए कदम आगे बढ़ाएगी। मुस्लिम महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए मोदी सरकार का यह संघर्ष जारी रहेगा और आने वाले दिनों में बहु विवाह तथा निकाह हलाला पर रोक लग सकती है।

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