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Thursday, September 21, 2017

असमानता ही समस्याओं का मूल

असमानता ही समस्याओं का मूल

19 शताब्दी के आरम्भ में हीगल ने लिखा था कि गरीबी लोगों में अनैतिकता को जन्म देती है. हीगल का मानना था कि गरीबी की अवस्था कोई दोष नहीं है यह औद्योगिक समाज की देन  है. अति उत्पादन तथा  कम खपत  के फलस्वरूप समाज व्यवस्था में बदलाव आता है. इस बदलाव के बाद खुद समाज अपने सदस्यों को ऊपर आने से रोकने लगता है.उन्हें सिविल सोसाइटी की एकजुटता के लाभ से वंचित कर दिया जाता है और तदन्तर वे गरीब लोग समाज के कचरे के रूप में तब्दील हो जाते हैं. हीगल के अनुसार जब एक बड़े समूह का जीवन स्तर एक ख़ास स्टार से नीचे आ जाता है तो वह अच्छ और बुरे का ज्ञान खो देता है, इमानदारी और आत्म सम्मान का भाव खो देता है.  हमारे वांग्मय में भी लिखा है कि “ बुभुक्षितः किम ना करोति पापं .” गरीबी एक सामाजिक फिनोमिना है. समाज गरीबी की उत्पति में शामिल रहता है और गरीबी दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियां पैदा करती है, पीड़ा को बढ़ाती हैं और इसके बाद इंसान गंभीर तौर पर अनैतिक हो जाता है. इसके गरीबों की बड़ी संख्या स्थानीय सामाजिक व्यवस्था के लिए ख़तरा  बन जाती है क्योकि गरीब समाज के लाभ नहीं हासिल होने की कारण दुखी और  गुस्से में रहते है . इससे साफ़ लगता है कि समाज ने अपने लोगों पर जो गरीबी का जो बोझ रख दिया है वह साड़ी समस्याओं का मूल है. भारत की ही स्थिति देखें, आंकड़े बताते हैं कि यहाँ 1922 तक आय की असमानता चरम पर थी. समाज के एक प्र्तातिशत लोग 22 प्रतिशत आय पर कब्ज़ा किये बैठे थे. ये आंकड़े सत्ता में बैठे उन लोगों को संकेत दे रहे हैं बुनियादी मानवीय स्वतन्त्रता में कटौती कर रहे हैं, जात्ती पांति की सियासत कर रहे हैं और विरोध को निर्ममता से दबा दे रहे हैं. आज भी हज़ारों भारतीय की गरीबी मन को बेहद दुखी कर देने वाली है. देश में आज भी ऐसे गरीब हैं जिस की स्त्र्हित्री पर भरोसा नहीं हो सकता है. फ़र्ज़ करें कि कोई गरीब है यानि वह उन संसाधनों को हासिल नहीं कर सकता जो अन्य हासिल कर सकते हैं. यानि गरीबी असमानता की पहचान है.

  अब गरीबी केवल आंकड़ों की बात नहीं है यह उस समाज का बिम्ब भी है जिसमें हम जी रहे हैं. अगर समाज की अर्थ व्यवस्था इसका कारण है तो उस व्यवस्था को दूर करने की मांग की जा सकती है, वंचित समूह को इसका हक है. लेकिन अगर उन्हें न्याय नहीं मिला तो यही गरीबी धीरे धीरे जड़ पकड़ने लगती है और यह उनका मुकद्दर बन जाता है.वे अच्छा जीवन नहीं जी न सकते समाज उन्हें नज़रंदाज़ कर देता है, गरीब चुनाव को छोड़ कर राजनीती के लिए भी व्यर्थ  हो जाते हैं. वे समाज में उस स्तर पर सुविधाओं का उपभोग नहीं कर सकते ना समाज की गतिविधियों में हिस्सेदार हो सकते हैं जिस तरह से अन्य  लोग होते हैं, हालांकि वे भी उसी समाज का हिस्सा है. असमानता का सबसे ज्यादा प्रभाव बुनियादी लोकतान्त्रिक नियमों पर पड़ता है. अत्यंत गरीब मजबूरी के कारन लोकतान्त्रिक नियमों को भंग करते हैं और अत्यंत आमिर अपनी अमीरी बढाने के लिए समानता के नियम जैसे लोकतान्त्रिक नियमों को भंग करते  हैं. एक आधार पर खड़े लोगों में दूसरे की तुलना में कुछ ना कुछ समानता होती है. जैसे की इतिहास बनाने की क्षमता. हर आब्द्मी दूसरे की तुलना  में अपना इतिहास बना सकता है. लेकिन यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण है कि हर आदमी को अपनी क्षमता पर भरोसा रहता है. बराबरी का सिद्धांत नैतिकता जैसे लोकतान्त्रिक सिधान्तों को जन्म देता है.किसी भी आदमी के साथ जाती, नस्ल या लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता लेकिन गरीबी इस भेदभाव को बढ़ा देती है. समाज में असमानता बढ़ने  लगती  है और इसी के साथ बढ़ने लगती हैं विभिन्न तरह की समास्याएं.इनका सीधा राजनितिक प्रभाव पड़ता है. इससे समाज का सामूहिक जीवन प्रभावित होने लगता है. इसके फलस्वरूप अशुभ का अवघटन  आरम्भ होता है.  वह राजनीती के रूप में दिखने लगता है. कुछ लोग समानता हासिल करने के लिए सत्ता के साथ हो जाते हैं कुछ उसके विरुद्ध खड़े हो जाते हैं. गायों की हिफाज़त के नाम पर गौकुशी करने वालों को कटा जाने लगता है , विरोध में बोइलने के लिए पत्रकार को गोली मार दी जाती है. ये सब असमानता से उतपन्न दुर्गुण हैं. यह देश में कई सौ वर्षों की सामाजिक असमानता का परिणाम है. इसी असमानता को समाप्त करने की आशा में  कम्युनिज्म के नाम पर जितने लोग मारे गए उतने आज तक दुनिया के किसी युद्ध में नहीं मारे गए.इससे ज़ाहिर होता है की आर्थिक खुशहाली सामाजिक  समानता का प्रमुख कारण है. अब आर्थिक समानता हासिल करने के लिए खून खराबा होना शुरू होता है, अपराध बढ़ने लगते हैं और लोकत्रांत्रिक नैतिकता घटने लगती है. इसे रोकना होगा और इसके लिए ज़रूरी है की देश में सत्ता आर्थिक न्याय की और प्रवृत हो.       

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