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Friday, January 12, 2018

सिनेमा घरों में राष्ट्रगान की बाध्यता खत्म

सिनेमा घरों में राष्ट्रगान की बाध्यता खत्म

अब सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाने की बाध्यता के अपने पहले आदेश को वापस ले लिया है। क्या यह इतना असार था? 1962 में चीन की लड़ाई के बाद यह शुऱू किया गया था। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने इसकी बाध्यता समाप्त कर दी है तो यकीनन सिनेमाघरों में और मल्टीप्लेक्सेज में इसे बजाना बंद कर दिया ​जायेगा। जबसे यह शुऱु हुआा था तबसे यही चल रहा था कि कभी कोई हुक्म आता कि इसे बजाना है और कभी हुक्म आता कि नहीं बजाना है। सिनेमा घरों में या मल्टीप्लेक्सेज में राष्ट्रगान बजने पर खड़े नहीं होने पर चंद अजनबियों के हाथों मार खाने और नहीं खाने के बीच भी एक बारीक सी रेखा थी। बजा तो खड़े हो जाइये तो ठीक नहीं बजा तो चलते बनिये। ... और जब बजा तो खड़े हो कर चलते बनिये तों मार खाइये। जब आप टी वी देखते हैं या घर में सिनेमा डाउनलोड करके देखते हैं तो ऐसा कुछ भी नहीं होता। या, गणतंत्र दिवस के दिन राष्ट्रीय ध्वज फहराने के बाद जब राष्ट्रगान होता है और कोई नहीं खड़ा होता है तब भी काई मार पीट नहीं होती। तब सिनेमा घरों में ऐसा क्या है कि राष्ट्रगान बजने पर नहीं खड़े होने से मारपीट होने लगती है। एक अंतर दिखता है कि सिनेमा घरों में एक  दर्शक एक भीड़ का हिस्सा है और इक अकेले इंसान के तौर पर आपकी शिनाख्त गुम हो जाती है, उसका कोई मूल्य नहीं होता। इस पूरे विवाद में यही सबसे प्रधावशाली संदेश है। जब कोई एक भीड़ का हिस्सा होता है और अस समय इस तरह के नियम लागू किये जाने से क्या होता है? बात शुरू करने के लिये ध्वनि प्रदूषण को ही लें। अगर आप किसी ऐसी जगह में रहते हैं जहां त्योहारों के समय लाउडस्पीकर को बजने से या स्थस्च्मिस्जिद में लाउडस्पीकर बजने नहीं रोका जा सकता है तो आप चुप रहते हैं। लेकिन अगर आप थोड़े सम्पनन हैं और ऐसी जगह में रहते हैं जहां अगर थोड़ा शोर होता भी है तो कांच की खिड़कियों को बंद कर आराम से रह सकते हैं। यानी , आपका पैसा आपके लिये शांति खरीदता है। अब देखिये भीड़ में क्या होता है? जब नेट बैंकिंग का रिवाज नहीं था तो हम हर काम के लिये , चाहे वह बिजली का बिल जमा करना हो या रेल का टिकट लेना हो हम सब देर तक कतार में खड़े रहते थे। आपकी जल्दीबाजी का कोई महत्व नहीं था और आपके आगे खड़ा आदमी बस इसी बात पर यकीन करता था कि आप शांति से उसके पीछें खड़े रहेंगे। अगर कोई बाहर का आदमी उसमें घुसने की कोशिश करता था तो कुछ हद तक सामूहिक विरोध का प्रदर्शन होने लगता था। लोग उसके विरोध में क्रोध का प्रदर्शन करने लगते थे। इन कतारों में खड़े लोग बेवजह बहस में उलझ जाते थे कई बार झगड़े भी हो जाते थे।  यही बात भीड़ भरी ट्राम और बसो में भी देखने को मिलती है। लोग जो सीट बैठे होते हैं उनकी हर गतिविधि पर खड़े लोग नजर रखते हैं और अंतरराष्ट्रीय सियासत से लेकर सड़क पर मौजूद गड्ढों और सड़क जाम तक पर बहस करते सुने जा सकते हैं। यानी भरोसा पारस्परिक शारीरिक दूरी के आधार पर तय होता है। ट्रेन की लम्बी यात्रा में सहयात्री दोस्त बन जाते हैं और बहुत विश्वसनीयता के साथ एक दूसरे के सामानों की निगरानी करते हैं, लेकिन जैसे ही वे ट्रेन से उतरते हैं सबकुछ भूल जाते हैं। लेकिन जब आप अपनी कार में होते हैं या हवाई जहाज में सफर करते होते हैं तो ऐसा कुछ नहीं करते। काई चाय पीते वक्त नहीं पूछता कि आप चाय पीयेंगे या कोई आदमी किसी अंजान को अंकल आंटी नहीं कहता। यहां तक कि छोटे से घर में संयुक्त परिवार में प्रेम और आज्ञाकारिता भी कुछ इसी तरह है। लेकिन उनहीं में से दोबाई जब एक ही बिल्डिंग मेंअलग अलग फ्लैट खरीद  लेते हैं तो न वैसी आज्ञाकारिता होती है और ना वह प्रेम दिखता है। यही मनोविज्ञान सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के वक्त खड़े होने का होता है। ऐसे नियम कुछ खास सामाजिक आर्थिक वर्ग के समुदाय के साथ ही लागू होता है। ऐसा वर्ग जो सामाजिकता और सामूहिकता में आनंद लेने को बाध्य होता है। परम्परागत तौर पर हमारे देश में सामूहिक मनोरंजन का साधन कीर्तन- सत्संग, गरबा , पूजा, रामलीला इत्यादि है। ऐसे में हम एक दूसरे को देख कर सिर हिलाते हैं और यह संदेह बी करते हैं कि सामने वाला दिखावा तो नहीं कर रहा है। बाबऔं द्वारा लड़कियों का शोषण भी इसी मनोविज्ञान का हिस्सा है। प्रवचन कर रहे बाबा को वहां मौजूद भीड़ सामूहिक तौर पर " सुपरनेचुरल "  मानने लगती है और यहीं उस भीड़ के लोग ठगे जाते हैं। जिनके सामर्थ्य हैं वे सिनेमा घरों में नहीं जाते बल्कि सिनेमा देखना हो तो घर में इंटरनेट से डाउनलोड करके देख लेते हैं तो ऐसे लोगों के साथ राष्ट्रगान की बाध्यता का कोई रोना नहीं है। यहां कहने का मतलब है कि जैसे- जैसे सम्पन्नता बढ़ेगी और पसंदगी नापसंदगी के विकल्प बढ़ेंग वेसे - वैसे निजता बढ़ने लगेगी। अगर , बुरा न मानें तो रास्ट्रगान पर खड़ा होना और खड़ा रहना कोई सद्गुण नहीं है और ना रहा है और जबतक यह बाध्यतामूलक ना हो या मजबूरी ना हो। सिनेमााारों मे राष्ट्रगान बजाते समय खड़े होने का नियम एक ऐसा आरोपण था जिसका सामूहिक दायित्व के आधार पर ही पालन हो सकता है ओर सामूहिक दायित्व का भाव विकास के साथ विघटित होने लगता है। 

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