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Friday, January 19, 2018

तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है 

तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है 

सरकार ने किसानों के लिये औपचारिक कर्ज यानी सरकारी एजेंसियों द्वारा ​दिये जाने वाले कर्ज की सीमा को बड़ा दिया है तब भी किसान महाजनों के कर्ज में दब कर आत्महत्याएं करने के लिये मजबूर हो रहे हैं। एक तरफ सरकार ने खेती के लिये कर्ज की सीमा को बढ़ा कर 10 लाख करोड़ कर दिया है। यह सीमा पिछले साल से 11 प्रतिशत ज्यादा है। लेकिन सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि हर साल 12 हजार किसान अपनी जिंदगी खत्म कर रहे हैं। कर्ज में डूबे और खेती में हो रहे घाटे को किसान बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। कृषि ऋण में वृद्धि के बावजूद वे क्यों ले रहे हैं कर्ज यह एक माकूल सवाल है। 2013 के आंकड़े बताते हैं कि कुल कृषि ऋण में सूदखोर महाजनों की हिस्सेदारी नौ प्र​तिशत बढ़ी है। किसानों को आसानी से और कम से कम व्याज दर पर  कर्ज हासिल हो जाय जिससे वे समय पर बीज ओर खेती के सामान इत्यादि खरीदने के लिये किसान क्रेडिट कार्ड योजना आरंब सरकार ने आरंभ की थी , साथ ही फसल बीमा योजना भी आरंभ की गयी थी। लेकिन इसका अपेक्षित लाभ नहीं प्राप्त हो सका।  भारत में सबसे ज्यादा श्रम शक्ति खेती में ही लगी है ओंर तब भी खुशहाली नहीं आती। इसका मुख्य कारण है पैदावार में बढ़ती लागत, भंडारण की घटती सहूलियत एवं बाजार तक पहुंच में कमी। इन मु​श्किलों के कारण लगभग दस प्रतिशत किसान ऐसे हैं जो खेती पसंद ही नहीं करते। सरकारी आंकड़ों को ही मानें तो देश में ग्रामीण क्षेत्रों में जितने परिवार हैं उनमें 57.8 प्रतिशत खेती पर ही निर्भर हें ओर इनतें 69 प्रतिशत किसानों के पास मामूली खेत हैं और उसी पर वह सारा पसीना बहा कर अपने परिवार का गुजर बसर करता है। देश में 72.3 प्रतिशत ग्रामीण परिवार खतिहर मजदूर के तौर पर या छोटी मोटी खेती करने अपना गुजारा करते हैं। इसके कारण किसान खेती छोड़ रहे हैं। 1951 की जनकाणना के अनुसार 71.9 प्रतिशत ग्रामीण आबदी कृषि क्षेत्र में ही लगी थी लेकिन 2011 की जनगणना में यह अनुपात घट कर 45.1 प्रतिशत पर आ गया।। इस कमी का मुख्य कारण कृषि उत्पादकता में कमी और लागत में वृद्धि।  जहां तक उत्पादकता में कमी का सवाल है तो यह प्रतिकूल मौसम और खेतों में लगातार बढ़ती उरवर्क की मात्रा जिम्मेदार है। ये कुछ ऐसे कारक हैं जो मामूली किसान के वश से बाहर हैं। पर्यावरण असंतुलन के कारण मौसम लगातार अनि​​श्चित होता जा रहा है और रासायनिक उर्वरकों के लगातार उपयोग से खेतो की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है। कार्बनिक खादों का उपयोग जैसे गोबर की खलाद या हरित खाद इनका एक मात्र है जो बहुत तेजी दुर्लभ हो रहा है। गो वंश का अनवरत विनाश और मुश्किलें पैदा रहा है। इसके कारण गांवों से तेजी से श्रम शक्ति का विस्थापन हो रहा है और खती छोड़ रहे हैं। उनका मानना है कि खेती मे मजदूरी के लिये मोहताज होना पड़ता है। दूसरी तरफ किसानों के जीवन स्तर में सुधार के लिये सरकाकिी ओर से कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। कहने के लिये सरकार ने किसानों के लिये कई यागेजनाएं लागू कर दीं हैं लेकिन वे आकाश कुसुम हैं। मामूली किसान उन तक पहुंच नहीं पाता या बड़ी मुश्किल से पहुंचता है। औपचारिक ऋण देने वाली संस्थओं की प्रक्रिया इतनी जटिल और उलझी हुई है कि किसान उनहें समझ ही नहीं पाता  नतीजा यह होता है कि स्थानीय महाजनों से उसे कर्ज लेना होता है जो आगे चल कर जान लेवा बन जाता है। 2012 के प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक 85 प्रतिशत छोटे किसान गैर संस्थागत ऋण बाजार जैसे सथानीय साहूकार या कथित मित्रों से कर्ज लेते हैं जो औपचारिक कर्ज से लगभग 100 गुना ज्यादा वसूलते हैं। 2011- 2012 के आंकड़े बताते हैं कि 82 प्रतिशत छोटे किसान कर्जे में फंसे थे और यह उनकी निराशा का मुख्य कारण था जो उन्हें आत्म हत्या की राह पर ले जाता है। 

उधर जम्हूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो 

इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है 

 सरकार ने इस ​स्थिति से उबरने के लिये कई योजनाएं लागू जरूर की हैं पर इनका लाभ बड़े किसान ही उठाते हैं, छोटे किसानों तक उनकी पहुंच होती ही नहीं है। दूसरी योजना सरकार की थी फसल बीमा योजना। जिसे लागू तो कर दिया गया पर किसानों को उसकी जानकारी ही नहीं है। आंकड़ों के अनुसार ब्हिार के 49 प्रतिशत , राजस्थान के 37 प्रतिशत पंजाब के 67 प्रतिशत और हरियाणा के 42 प्रतिशत किसानों को इसके बारे में कोई जानकारी ही नहीं है। बढ़ती जनसंख्या के कारण खेत सिकुड़ रहे हैं और छोटे खेतों तथा संसाधन के अबाव के कारण फसलों के विविधिकरण की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है ओर सरकार का ध्यान मुख्यत: धान , दाल तथा गेहूं  पर ही अतएव दूसरी फसलों को प्रोत्साहन नहीं मिलता।  

  खेती अपने देश में राज्य का विषय है और यह सरकार का कर्त्तव्य है कि वह अपने किसानों की पहुंच आवश्यक सुविधाओं तक कराये। सरकार यकीनन कुछ कदम तो उठाती है पर उसकी जानकारी आम लोगों को नहीं होती। किसानों की चिंताओं को दूर करने के लिये योजनाएं ही जरूरी नहीं हैं उनका प्रभावी ढंग से लागू होना भी जरूरी है।

लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में 

ये गांधीवाद के ढांचे की बुनियादी खराबी है 

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