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Tuesday, December 3, 2019

यह सूरत बदलनी चाहिये

यह सूरत बदलनी चाहिये 

हो गई है पीर पर्वत सी अब पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

हैदराबाद बलात्कार कांड को लेकर देशभर में भारी गुस्सा व्याप्त है जो बिल्कुल जायज है लेकिन इसका प्रतिफल क्या होगा मोमबत्तियां और हैशटैग्स के बीच गुस्से का यह तूफान  उमड़ कर खत्म हो जाएगा। थोड़े से सरकारी आश्वासन आएंगे थोड़े से नारे लगेंगे और फिर सब कुछ सामान्य हो जाएगा। निर्भया कांड की गति सबने देखी है।
        इन दिनों अखबार देखिए। सुर्ख़ियों में या तो महंगाई होगी या अपराध होगा या घृणित बलात्कार की इस तरह की घटनाएं होंगी। इसके अलावा शायद ही कोई सकारात्मक या प्रेरणादायक खबर मिले। इन दिनों खबरों की परिभाषा ही यही हो गई है। होगी भी क्यों नहीं? अखबार तो हमारे समाज का दर्पण है और समाज की जो तस्वीर है वही इसमें दिखती है।
लेकिन, ऐसा कब तक चलता रहेगा। इसे रोकना होगा। राज्यसभा में और सरकारी स्तर पर इस पर गंभीर बातें होंगी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह कहा कि सरकार कानून में संशोधन करने जा रही है। और भी कई तरह के आश्वासन आए, आ रहे हैं और आएंगे। लेकिन यहां जो सबसे महत्वपूर्ण है वह है रेप की घटनाएं क्यों बढ़ रही हैं? इसका मनोविज्ञान क्या है?
हमारे देश का पुरुष समाज आरंभ से ही वर्चस्वशाली  रहा है और इन दिनों चूंकि महिलाएं उनसे प्रतियोगिता करने लगी हैं तो पूरे समाज को एक खास किस्म की अव्यक्त ईर्ष्या मिश्रित क्रोध होने लगा है और  यही कारण है कि वह नारी जाति को दंडित करने की कोशिश करने लगता है।  ताकि, उसकी तनाव भरी उत्तेजना समाप्त हो सके।
हाल में "अमेरिकन सोसायटी आफ क्रिमिनोलॉजी " में पढ़े गए पेपर के अनुसार बलात्कार घटनाओं के दोषी अधिकांश  लोग खुद को इसके लिए दोषी नहीं मानते। उनके अंदर इसका कोई भय नहीं होता और वह सारा दोष उन लड़कियों पर मढ़ते हैं जो इनके कुकर्म का शिकार हुई हैं। बहुत कम ऐसे लोग हैं जो स्वीकार करते हैं कि गलत काम हो गया। वे इसका औचित्य बताते हैं कि शराब के नशे में या ड्रग्स के नशे में ऐसा हुआ ,इसे रोका नहीं जा सका। विख्यात समाजशास्त्री पार्थ चटर्जी ने अपनी पुस्तक " ए पॉसिबल इंडिया " में  इसे संयुक्त परिवार टूटने का फल बताया है। उनके मुताबिक जो परिवार टूटते हैं  उसके संयुक्त परिवार के घर में दादा दादी भाई बहन और पूरा कुनबा रहता था लेकिन जैसे ही परिवार टूटता है यह बिखर जाता है और बच्चा एक अलग परिवेश में रहने लगता है जिसमें परिवार नाम की कोई चीज नहीं होती और महिला के नाम पर मां तथा बहुत हुआ कामवाली बाई आती जाती है। बच्चे के मन में स्वाभाविक जिज्ञासा उत्पन्न होती है महिला शरीर के बारे में। हुआ जिज्ञासा धीरे धीरे बलवती होने लगती है  और फिर वही जिज्ञासा इस अपराध के मूल में सक्रिय रहती है। मनोवैज्ञानिक डेल पोल्स ने इसे मैकियावेलियानिस्म, साइकोपैथी और रोजाना की सैडिज्म ,खास करके क्रूरता का आनंद लेने का भाव बताया है। अब प्रश्न है कि हमारे समाज में उत्पन्न होने वाले ये  भाव कैसे खत्म होंगे? इसके लिए सबसे जरूरी है आरंभिक शिक्षा और धीरे-धीरे विकसित होने वाले बच्चों के भीतर परिवार और समाज के प्रति स्नेह के भाव का आरोपण।  समाज में ऐसा करने वालों को सरकार के स्तर पर ऐसी सजा मिली जिसके भय से लोगों के मन में इस तरह की भावना नहीं आये ।यह कथन बिल्कुल सही नहीं है। अभी हैदराबाद कांड में जो कुछ भी हुआ उसके प्रति गुस्सा इतना है कि अच्छे-अच्छे लोग यह कहते सुने जा रहे हैं कि दोषियों को जनता के हवाले किया जाना चाहिए । यहां प्रश्न यह नहीं है के जिसने इस कांड को अंजाम दिया है उसे समाप्त कर दिया जाए बल्कि कोशिश हो कि अपराध का भाव सुधर जाए । अपराधी सुधर जाए ताकि उससे लोगों को समाज में सबक मिले। लेकिन ऐसी स्थिति में कानून से बचने और दबंग मर्दाना समाज  चोर दरवाजा खोज सकता है।
    इसके लिए सबसे जरूरी है कि दोनों तरफ से सुधार की प्रक्रिया आरंभ की जाए और इसमें केवल सरकार नहीं समाज को भी अपनी भूमिका अदा करनी पड़ेगी जिससे महिलाओं में यह डर खत्म हो जाए कि अकेला निकलना खतरनाक है। जब तक मर्दाना वर्चस्व नहीं समाप्त होगा तब तक इन घटनाओं को रोकना मुश्किल है। और इस वर्चस्व को समाप्त करने के लिए कानून नहीं समाज में दो तरफा प्रयास करने की जरूरत है। एक तरफ से मर्दों में यह भाव भरा जाए कि महिलाएं या लड़कियां आपके बराबर की हैं। आपका कोई वर्चस्व नहीं है। दूसरी तरफ स्त्रियों को या लड़कियों को इतना सशक्त बनाना होगा की वे ऐसी किसी भी स्थिति से जमकर मुकाबला कर सकें और इसके लिए जरूरी है कि वह आत्म निर्भर हों तथा ताकतवर हों। धीरे धीरे इस ओर कदम बढ़ रहे हैं।
केवल हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है यह सूरत बदलनी चाहिए


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