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Tuesday, October 15, 2019

अमर्त्य के बाद अभिजीत

अमर्त्य के बाद अभिजीत

अभिजीत मुखर्जी को 2019 का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार मिला। यह हमारे देश के लिए गौरव की बात है। साथ ही ,हमारे शहर कोलकाता के लिए भी। कोलकाता से जुड़े अभिजीत छठे व्यक्ति हैं जिन्हें यह  गौरवशाली पुरस्कार प्राप्त हुआ है। अभिजीत के पहले रोलैण्ड रॉस को औषधि विज्ञान में , 1913 में रविंद्र नाथ टैगोर ,1930 में सर सी वी रमन को भौतिक शास्त्र में, 1979 में मदर टेरेसा को और 1998 में प्रोफेसर अमर्त्य सेन को अर्थशास्त्र का ही नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था।
           देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने कोलकाता की गरीबी को रेखांकित करते हुए लिखा था:
     कोलकाता के फुटपाथों  पर जो आंधी-पानी सहते हैं
   उनसे पूछो 15 अगस्त के बारे में क्या कहते हैं
       अभिजीत बनर्जी के मन में  कुछ ऐसा ही सवाल उठता रहा। उनका मानना है कि जिस स्थिति में आप रहते हैं और बड़े होते हैं वही तय करता है या आपकी दिलचस्पी क्या होगी। अगर आप 1980 के दशक में लैटिन अमेरिका में पैदा हुए होते तो आप  अर्थ शास्त्री हो गए रहते। क्योंकि, आपकी दिलचस्पी होती है। अर्थव्यवस्था कैसे संकट में पड़ती है और अगर आप कोलकाता में पैदा लिए हैं तो आप  जान लेंगे क्या होती है यह गरीबी और गरीब लोग क्या हैं तथा गरीबी कैसे मिटाई जा सकती है।
अभिजीत कोलकाता में जहां रहते थे वहां पास में ही है स्लम था । वहां के बच्चे गरीबी के कारण स्कूल नहीं जा पाते थे और अभिजीत उन बच्चों के साथ खेलते थे। उनके मन में यह बात थी  कि वे गरीब क्यों है और उनके स्कूल नहीं जाने की वजह क्या है। क्यों पूरे दिन खेलते रहते हैं। यही सवाल था कि  वे गरीब क्यों है इसका उत्तर ढूंढते -ढूंढते अभिजीत नोबेल तक पहुंच गए। अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार पाने वाला यह अभिजीत विनायक बनर्जी बचपन में फिजिक्स पढ़ना चाहता था। बाद में उन्होंने स्टैटिक्स चुना। लेकिन इसमें भी नहीं टिक पाए और प्रेसिडेंसी में अर्थशास्त्र में एडमिशन ले लिया।
यहां एक प्रमुख तथ्य है कि जब कोई यह कहता है फलां आदमी गरीब है तो गरीबी के बारे में अर्थशास्त्र कैसे सोचता है। यकीनन वह पैसे के  बारे में सोचता है भोजन के बारे में नहीं। ऐसा मानना अथवा इस तरह का उत्तर विश्लेषणात्मक नहीं है । लेकिन अर्थशास्त्र के मुताबिक जब कोई गरीब होता है तो उसका व्यवहार कैसा होता है इसकी व्याख्या की जाती है।   यह समझना  महत्वपूर्ण होगा कि एक ही तरह के गरीब लोग अलग-अलग आचरण क्यों करते हैं? उनमें एक ही तरह का व्यवहार क्यों नहीं होता ? यानी  गरीबों और गरीबी को समझना ही अर्थशास्त्र के लिए आवश्यक है। अभिजीत बनर्जी और उनके दो साथियों ने जो कुछ भी किया वह इसी मुद्दे पर  किया। उन्होंने इस गरीबी को दूर करने के लिए किए गए प्रयासों के प्रभाव का अध्ययन किया। एक बड़ा दिलचस्प वाकया इस सिलसिले में हमें अक्सर देखने को मिलता है। जैसे हमारे देश में टीकाकरण मुफ्त है लेकिन महिलाएं  अपने बच्चों को लेकर टीकाकरण के अंदर तक नहीं जाती। बीच में किसी संस्था ने पल्स पोलियो की टीका के साथ एक एक बैग देना आरंभ किया तो टीकाकरण केंद्र पर बच्चों को टीका लगवाने वाली महिलाओं की भीड़ लग गई । अभिजीत बनर्जी और उनकी पत्नी डिफ्लो ने भी कुछ ऐसा ही प्रयोग मुंबई और बड़ोदरा में किया। वहां स्लम्स के कुछ इलाकों में पाठ्य पुस्तकें मुफ्त मिलती थीं। लेकिन ना कोई लेने जाता था ना कोई पढ़ने जाता था।  जैसे ही यह घोषणा की गई कि पाठ्य पुस्तकों के सेट के साथ कुछ और दिया जाएगा बच्चे स्कूलों में जाने लगे। संभवत ऐसा ही प्रयोग पश्चिम बंगाल में कन्या शिक्षा  को बढ़ावा देने के उद्देश्य कन्याश्री  के नाम से किया गया है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि विद्यालयों में छात्र पढ़ने की अपनी जरूरतों के लिए  नहीं जाते बल्कि अगर उसके "साथ और सहयोग" मिले तब वे विद्यालय जाएंगे । यही कारण है कि   भारत सहित सारी दुनिया की सरकारें सामाजिक योजनाओं पर ज्यादा खर्च कर रही हैं।
   मुखर्जी और डिफ्लो के इस शोध से नीति निर्माताओं को लोगों की पसंद को नियंत्रित और निर्देशित करने के लिए जो प्रेरक तत्व आवश्यक हैं उनको समझने में मदद मिलेगी। क्योंकि नीति का प्रकल्प सफलता और असफलता के अंतर को बताता है। इसीलिए इसे विकास का अर्थशास्त्र कहा जा रहा है।
       भारत के बारे में अभिजीत बनर्जी का मानना है यहां के लोग गरीबी के कारण उपभोग में कटौती कर रहे हैं और इसके कारण अर्थव्यवस्था में गिरावट आ रही है तथा यह गिरावट जिस तरह से जारी है उससे लगता है इसे नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा भारत में एक बहस चल रही है कौन सा आंकड़ा सही है । पर सरकार का विशेष तौर पर यह मानना है कि वे सभी आंकड़े गलत हैं जो असुविधाजनक हैं।  लेकिन अब  सरकार यह मानने लगी है की कुछ समस्या तो है और अर्थव्यवस्था बहुत तीव्रता से धीमी हो रही है।  अभिजीत बनर्जी का मानना है यह बहुत तेजी से गिर रही है। उनका मानना है कि फिलहाल मौद्रिक स्थिरता के बारे में न सोच कर मांग के बारे में थोड़ा सोचना जरूरी है। अर्थव्यवस्था में मांग एक बहुत बड़ी समस्या है। अभिजीत बनर्जी उन खास अर्थशास्त्रियों में शामिल थे जिन्होंने नोटबंदी के फैसले का विरोध किया था । नोटबंदी से प्रारंभ में जितने नुकसान का अंदाजा लगाया गया था वह उससे भी कहीं ज्यादा था अभिजीत बनर्जी ने भारत की अर्थव्यवस्था की जमीनी स्तर पड़ताल कर उन्हें लोगों के सामने प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।  साथ में ही उन्होंने उस संदर्भ में विभिन्न समाज और देशों की गरीबी की भी शिनाख्त करने का एक नया नजरिया पेश किया है।


वायु प्रदूषण में डूबता कोलकाता

वायु प्रदूषण में डूबता कोलकाता

दशहरा  और बंगाल की लक्ष्मी पूजा बीत गई और अभी से वायु प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। दीपावली अभी बाकी है। विशेषज्ञों के अनुसार कोलकाता के वायु प्रदूषण की सीमा एक सौ को पार कर चुकी है और आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ने वाले हैं । कोलकाता में प्रातः भ्रमण की जितनी जगह है जैसे  विक्टोरिया मेमोरियल और मैदान का क्षेत्र वहां सबसे ज्यादा प्रदूषण है। विशेषज्ञों के अनुसार यहां 118 से 128 पॉइंट्स प्रदूषण मापा गया है। यह फेफड़े के लिए उतना ही हानिकारक है जितना 27 सिगरेट पीने से होता है। इसके खतरे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक सिगरेट से 22 माइक्रोन पीएम 2.5  का ज़हर निकलता है तो 27 सिगरेट पीने से क्या हो सकता है? वैसे वायु प्रदूषण दुनिया के लगभग सभी बड़े शहरों की समस्या है। पिछले हफ्ते शनिवार को लंदन में वैज्ञानिकों ने लंदन साइंस म्यूजियम के समक्ष प्रदूषण सुधारने के लिए सरकार पर जोर देने उद्देश्य से लेबरेटरी कोट पहनकर प्रदर्शन किया था। लेकिन कोलकाता में ऐसा कुछ नहीं हुआ है  जागरूकता की कोई कोशिश  होती दिख नहीं रही है। यह दिनोंदिन खतरनाक होता जा रहा है। सी एन सीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक महानगर में प्रति एक लाख लोगों पर 19 लोगों को फेफड़े का कैंसर हो रहा है। इसके लिए वायु प्रदूषण जिम्मेदार है और इन 19 लोगों में अधिकांश वही है जो प्रात: भ्रमण के लिए विक्टोरिया या उसके आसपास के इलाकों में लगातार जाते हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट कोलकाता के एक अध्ययन के मुताबिक यहां के लोग सबसे ज्यादा प्रदूषित वायु का सेवन करते हैं। यहां के वायु में विगत 6 वर्षों में नाइट्रोजन ऑक्साइड की मात्रा 2.7 गुनी बढ़ गई है। विशेषज्ञ इसके दिए मोटर कारों की बढ़ती संख्या और एक खास समय में उनका कोलकाता में प्रवेश करना तथा कोलकाता से बाहर जाना बताते हैं।   अब से कुछ साल पहले तक कोलकाता निवासी बसों में सफर करते थे या फिर छोटी मोटी दूरी के लिए पैदल जाते थे इससे वायु प्रदूषण कम होता था। अब  वह बातें खत्म हो गयीं और एक आध किलोमीटर  जाने के लिए भी लोग अपनी गाड़ी का सहारा लेते हैं। इंस्टीट्यूट  फॉर  हेल्थ मैट्रिक्स एंड  इवेलुएशन  द्वारा  संचालित ग्लोबल बर्डन आफ डिजीज के आंकड़ों के मुताबिक बारीक पार्टिकुलेट मैटर 2.5 की भूमिका का दुनिया में ह्रदय रोगों से मरने वाली बीमारियों में पांचवां स्थान है। इसके चलते सांस की तकलीफ बढ़ती रहती है। वस्तुतः डनलप, श्याम बाजार, मौलाली, एस्प्लेनेड और टॉलीगंज जहां 24 घंटे गाड़ियां  चलती हैं, उन क्षेत्रों की हवा में बारीक पार्टिकुलेट मैटर 2.5 की मात्रा अन्य इलाकों से ज्यादा रहती है।  यहां के निवासियों में हृदय रोग ज्यादा शिकायतें आती हैं।
       लेकिन कोलकाता में प्रदूषण का मुख्य कारण केवल यहां चलने वाले वाहन ही नहीं हैं बल्कि इसका अपना एक भूगोल भी है जो प्रदूषण में काफी सहयोग करता है। कोलकाता भारत के पूर्वी क्षेत्र में 22 डिग्री 82 मिनट  अक्षांश एवं 88 डिग्री 20 मिनट देशांतर पर अवस्थित है। यह हुगली के समानांतर बसा हुआ  शहर है । दरअसल कोलकाता बहुत बड़ी निम्न तलीय भूमि है जहां एक बहुत बड़ी आबादी बसी हुई है। 2001 की जनगणना की रिपोर्ट के मुताबिक कोलकाता की जनसंख्या का घनत्व 24,760 व्यक्ति प्रति किलोमीटर है। यह मुंबई के बाद सबसे ज्यादा जनसंख्या है। 2001 के आंकड़े बताते हैं कोलकाता का क्षेत्रफल 1,480 वर्ग किलोमीटर है और यहां से सुंदरबन का डेल्टा महज 154 किलोमीटर दक्षिण में है जो शहर को बंगाल की खाड़ी से अलग करता है। विख्यात भूगोलवेत्ता डॉक्टर पी नाग के मुताबिक कोलकाता शहर कई टोपोग्राफी क्षेत्रों से मिलकर बना है। कोलकाता में 5 भौगोलिक की टोपोलॉजी है । पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण और मध्य कोलकाता। जिसमें 2001 की जनगणना के मुताबिक हावड़ा, हुगली ,उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना और नदिया शामिल है । कोलकाता एक समशीतोष्ण क्षेत्र है। गर्मियों में यहां बहुत ज्यादा गर्मी पड़ती है और वातावरण में आर्द्रता बहुत ज्यादा होती है। यहां का वार्षिक औसत तापमान 26.8 डिग्री सेंटीग्रेड मापा गया है।यहां का अधिकतम तापमान 45 डिग्री सेंटीग्रेड और न्यूनतम तापमान 5 डिग्री सेंटीग्रेड मापा गया है। यहां की हवा में सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रस ऑक्साइड की मात्रा सबसे ज्यादा पाई जाती है और उसका कारण यहां  की भौगोलिक स्थिति है।
       इसे नियंत्रित करने के लिए सबसे जरूरी है यहां की ट्रांसपोर्ट व्यवस्था को सुधारा जाए और ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर पाबंदी लगाई जाए। कोलकाता शहर के आसपास चारों तरफ स्लम्स हैं और वहां बड़ी संख्या में लोग कोयले तथा लकड़ियां जलाकर खाना बनाते हैं। इसके अलावा कोलकाता महानगर के फुटपाथ पर रहने वाले लोग भी कोयले और लकड़ी जलाकर खाना बनाते हैं। इस पर रोक लगाना बेहद आवश्यक है। वर्ना, शहर की हवा की गुणवत्ता दिनोंदिन खराब होती जाएगी और यह यहां के बाशिंदों को हानि पहुंचाएगी।

Monday, October 14, 2019

अर्थव्यवस्था के विभिन्न आयाम

अर्थव्यवस्था के विभिन्न आयाम

देश की अर्थव्यवस्था गड़बड़ा रही है। हालात चिंतित करने वाले हैं। लेकिन, सरकार और उसके नेता इसे मानने को तैयार नहीं हैं। इसके बारे में अलग अलग लोगों के अलग-अलग बयान आ रहे हैं। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि  विकास धीमा पड़ गया है, मौद्रिक घाटा हो रहा है तथा इसके पीछे और भी बहुत कुछ है । ब्राउन यूनिवर्सिटी में ओपी जिंदल लेक्चर के दौरान रघुराम राजन ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था में गंभीर  अस्वस्थता के लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं। रघुराम राजन ने आर्थिक मंदी के कारणों का जिक्र करते हुए कहा कि पहले से चली आ रही समस्याओं में इसकी खोज की जा सकती है। उन्होंने सरकार पर तंज किया कि भारत को अभी पता नहीं है कि विकास के नए स्रोत कहां है।
    उधर हमारे नेता हैं कि देश में आर्थिक मंदी को मानने को तैयार नहीं हैं।  वे इससे जुड़े सवालों के अजीब उत्तर दे रहे हैं। अभी शनिवार को  एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि तीन फिल्मों ने 1 दिन में 120 करोड़ की कमाई की। 120 करोड़ रुपए ऐसे ही देश में आते हैं जिनके अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। उनका मानना है कि देश में कोई आर्थिक मंदी नहीं है। लेकिन, सवाल है कि सच को जाना जाए कि क्या सचमुच आर्थिक मंदी है अथवा नहीं। इस साल जून में समाप्त तिमाही में भारत की जीडीपी पिछले 6 साल में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई थी। उसका स्तर 5 प्रतिशत पर आ गया था। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में देश में व्याप्त आर्थिक मंदी से निपटने  के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में उद्योग और आम आदमी को राहत देने की कई घोषणाएं कीं। उन्होंने कहा कि सरकार आर्थिक मंदी से लड़ने के लिए विशेष उपाय कर रही है। वहीं दूसरी तरफ रविशंकर प्रसाद के बयान कोई दूसरी बात कह रहे हैं। इन  बयानों को सुनकर आम आदमी बुरी तरह कन्फ्यूज्ड है और किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रहा है।
        हर स्तर पर अलग-अलग बातें सुनने को मिलती हैं। अभी दशहरे के मौके पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि आर्थिक संकट है मगर इसे बहुत महत्त्व देने की जरूरत नहीं है। शैतान को ज्यादा तवज्जो क्यों दें। अकेले जीडीपी ही आर्थिक वृद्धि का पैमाना नहीं है। भ्रष्टाचार पर हमला बोलिए, बेकसुरों को परेशान मत कीजिए और स्वदेशी पर विश्वास करें। इससे आर्थिक स्थिति में सुधार आ सकता है। उधर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आये। इसके पहले 2014 में अहमदाबाद आए  थे।  गौर करने की बात है के 2014 से 2019 के बीच आर्थिक संबंधों में कितना बदलाव आया है। अब भक्त मंडली में कोई भी सवाल उठा सकता है की जिन पिंग के दौरे में और कुछ नहीं था जिस पर बात की जाए ? अर्थव्यवस्था की बात  क्यों होती है? यहां सवाल है कि आज कूटनीति का हर पैमाना अर्थव्यवस्था पर आधारित है इसलिए जरूरी है कि इसका ठोस मूल्यांकन हो। आंकड़े बताते हैं कि 2014 से अब तक भारत और चीन के बीच का व्यापार घाटा बढ़ता रहा है। भारत का चीन को निर्यात घटता जा रहा है। चीन में लगातार नौकरियां पैदा हो रही हैं भारत में नौकरियां घटती जा रहीं हैं। इस बीच खबर आई है कि जुलाई 2019 में औद्योगिक उत्पादन 1.1 प्रतिशत रहा। जो विगत 81 महीनों में  सबसे कम था। यह सरकार ने खुद बताया है । यही नहीं इस सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में बेरोजगारी विगत 45 सालों में सबसे ज्यादा हो गई है । प्रधानमंत्री के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने जीडीपी के आंकड़ों पर उंगली उठा कर आर्थिक हालात को और बहस के केंद्र में ला दिया है। अब भाजपा को महसूस हो रहा है कि सचमुच आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। मोदी सरकार के सामने अर्थव्यवस्था एक चुनौती है। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए प्रधानमंत्री ने रिजर्व बैंक पर दवाब डाला। ब्याज दरों में कटौती की। लेकिन, उससे कोई अंतर नहीं आया। समस्या है कि प्रधानमंत्री जी के आर्थिक सलाहकार वही है जिन की सलाह पर 5 साल से नीतियां बनती रही हैं। जिन नीतियों की वजह से हालात यह हुए हैं। उसे ही सरकार लागू करने पर अमादा है। किसी हकीकत को स्वीकार करना और परिस्थितियों का सही आकलन करके सही कदम उठाना दोनों अलग-अलग बातें हैं। सरकार को समझना होगा की मूल समस्या क्या है ? जीएसटी के लागू होने से छोटे और लघु उद्योगों पर कागजी कार्रवाई का इतना बोझ पड़  गया कि  वह उसी के नीचे दब गईं। सरकार ने यदि कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो यकीनन आगे चलकर आर्थिक परेशानियों में डूब जाएगा देश।

Friday, October 11, 2019

पाकिस्तान अपने किरदार से परेशान है

पाकिस्तान अपने किरदार से परेशान है 

अभी हाल में आई एक रपट के मुताबिक पाकिस्तान के 66% लोगों का मानना है कि भारत के साथ कभी भी जंग हो सकती है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सर्वे करने वाली संस्था गैलप के अनुसार अधिकांश पाकिस्तानियों का मानना है कि भारत से कभी भी जंग हो सकती है और उस जंग में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल हो सकता है। अगर ऐसा हुआ तो बहुत बड़ी संख्या में लोग मारे जा सकते हैं। गैलप के सर्वे में पाकिस्तान की उच्च और मध्यम वर्ग के लोगों ने हिस्सा लिया था। हालांकि इस सर्वे में यह नहीं बताया गया है कि कितने लोगों को इसमें  शामिल किया गया था। यहां ध्यान देने की बात है कि  कश्मीर को दिए गए विशेष दर्जे को भारत द्वारा वापस लिए जाने के बाद पाकिस्तान में बेचैनी बढ़ गई है।  यही कारण है क्यों वहां के नेताओं की तरफ से युद्ध की आशंका बार-बार प्रगट की जा रही है। आशंका प्रगट करने वालों में खुद प्रधानमंत्री इमरान खान और रेल मंत्री शेख राशिद भी शामिल हैं। शेख राशिद ने तो यहां तक कह दिया था अक्टूबर-नवंबर जंग हो जाएगी । युद्ध पिपासु पाकिस्तान की जनता  का यह विचार केवल इस लिए है कि वहां आम जनता में बेचैनी है ,भारी परेशानी है। पाकिस्तानी मनोवैज्ञानिकों के अनुसार वहां अवसाद और परेशानी की समस्या दुनिया के किसी भी देश से चार या पांच  गुना ज्यादा है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार पाकिस्तान में 30 साल से कम आयु के अविवाहित युवाओं में और 30 साल से ज्यादा उम्र की विवाहित महिलाओं में आत्महत्या की प्रवृति  लगातार बढ़ती जा रही है ।  अखबारों में प्रकाशित इस रपट के अनुसार देश में जितनी आत्महत्या के सरकारी आंकड़े हैं उससे कहीं ज्यादा ऐसे भी मामले हैं जिनका सरकार के पास कोई डाटा नहीं है। जिन्ना पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सेंटर के मनो चिकित्सकों के अनुसार पाकिस्तान में करीब 33% लोग अवसाद और बेचैनी से ग्रस्त हैं। कुछ इलाकों में तो हालात और खराब हैं। इनमें पाकिस्तान का उत्तरी क्षेत्र शामिल है । इन लोगों के पास न करने लिए कुछ है और ना सोचने के लिए तथा डिप्रेशन के जुनून में ये सिर्फ भारत से जंग चाहते हैं। मनो चिकित्सकों के अनुसार डिप्रेशन खुदकुशी या इस तरह के विचारों का मुख्य कारण है। पाकिस्तान की सबसे बड़ी ट्रेजेडी  है वहां विकास के नाम पर न आर्थिक विकास हुआ और ना ही सामाजिक विकास।  सेना तथा सियासत के बीच गठबंधन के कारण लगातार समाज  की उपेक्षा होती रही है। यही उपेक्षा अवसाद में परिवर्तित हो गई। जिन समाजों में उद्देश्य हीनता और जीवन मूल्यों के प्रति अनिश्चय की स्थिति ज्यादा होती है वहां व्यक्तिगत स्तर पर अवसाद बढ़ता है इसलिए सामाजिक संबंधों को सुधारने के साथ-साथ समाज और विशेषकर नौजवानों में सार्थक उद्देश्य और नैतिक मूल्यों की व्यापक सहमति होनी चाहिए। पाकिस्तान में सार्थक उद्देश्य और नैतिक मूल्यों की व्यापक सहमति का भारी अभाव है इसलिए वहां कुछ कर गुजरने और यूफोरिया में जीने के लिए नौजवानों में एक तरफ नशा और दूसरी तरफ आतंकवाद को अपनाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है । यह  प्रवृत्ति  ना केवल पड़ोसी देशों के लिए  खतरनाक है  बल्कि आत्मघाती भी है। यही कारण है के रावलपिंडी से लेकर राष्ट्र संघ तक पाकिस्तानी हुक्मरान बम और जंग की बात करते नजर आते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब जापान पर परमाणु बम गिराया गया था तो विख्यात दार्शनिक बट्रेंड रसैल ने अपने स्मरणीय भाषण में कहा था कि "जापान पर बम गिराया जाना रणनीतिक नहीं है बल्कि डिप्रेशन का प्रभाव है और आने वाले दिनों में ऐसा कई जगह देखने को मिल सकता है। क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अर्थव्यवस्था लगभग चरमरा गई है और विकास के रास्ते नजर नहीं आ रहे थे । ऐसे में आम जनता के पास खुश होने के लिए बदला लेने और दुश्मन को मार डालने के अलावा कोई विकल्प नहीं था । " जहां तक पाकिस्तान का प्रश्न है तो वहां की आबादी ने कुछ ऐसे लोगों की बहुलता है जिनमें जंग ,हिंसा तथा दमन की प्रवृत्ति जेनेटिक है । ऐसे लोग मोह ,माया, नफासत और विकास की बात कम तथा हिंसा की बात ज्यादा सोचते हैं। यही कारण था कि बंटवारे के समय लाखों लोगों की लाशें उस पार से आई थी। आज ऐसे ही एहसास से पाकिस्तान के वजूद को खतरा पैदा हो रहा है । अगर वहां के नेता तथा समाज के अगुआ लोग अभी नहीं चेते तो बहुत देर हो जाएगी।

Thursday, October 10, 2019

घुसपैठिए और एनआरसी आखिर यह सब क्या है?

घुसपैठिए और एनआरसी आखिर यह सब क्या है?

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बुधवार को कहा कि लोकसभा चुनाव के पहले सभी घुसपैठियों को देश से बाहर निकाल दिया जाएगा। उन्होंने इस भाषण में एनआरसी का भी जिक्र किया। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजिद को आश्वस्त किया कि एनआरसी की चिंता ना करें यह भारत का आंतरिक मामला है। ऐसा लगता है कि भारत सरकार ने एनआरसी को द्विअर्थी बना लिया है। अभी हाल में असम में संशोधित एनआरसी में 19 लाख लोगों के नाम है  अगर यह फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के समक्ष खुद को भारतीय नहीं प्रमाणित कर सके तो उन्हें विदेशी मान लिया जाएगा। अधिकांश लोग बांग्ला भाषी हैं और यह माना जाता है यह बांग्लादेशी हैं तथा गैर कानूनी ढंग से भारत में घुस आए हैं। गृहमंत्री  इन्हें बाहर निकालने की बात कर रहे हैं। असम के बाद बंगाल का भी नंबर है और गृहमंत्री बंगाल  पर अक्सर इसकी चर्चा भी करते हैं। लेकिन, अभी तक ऐसी कोई खबर नहीं है जिससे, समझा जा सके कि इस मामले को लेकर बांग्लादेश सरकार से कोई बातचीत हुई है। प्रश्न उठता है कि जिन्हें विदेशी या घुसपैठिया घोषित कर दिया जाएगा उनका क्या होगा?  गृहमंत्री उन्हें कहां खदेड़ देंगे? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री बताया है कि यह भारत का आंतरिक मामला है विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी कुछ ऐसा ही कहा है। यह बड़ा अजीब लगता है 1 वर्ष से गृह मंत्री लगातार कह रहे हैं कि एनआरसी के माध्यम से देशभर में घुसपैठियों का पता लगाया जाएगा यह घुन हैं और इन्हें खदेड़ दिया जाएगा । लेकिन कहां खदेड़ा जाएगा? कुछ दिन पहले पश्चिम बंगाल में एक चुनाव रैली में गृह मंत्री ने कहा कि एनआरसी के माध्यम से घुसपैठियों का पता लगाकर इन्हें राज्य से निकाला जाएगा। उन्होंने सभी गैर मुस्लिम शरणार्थियों को आश्वस्त किया कि  राज्य छोड़ने के लिए उन्हें बाध्य नहीं किया जाएगा । गृहमंत्री और प्रधानमंत्री की बातें सुनकर ऐसा लगता है कि मोदी सरकार दो अलग अलग भावनाओं से नियंत्रित हो रही है । प्रधानमंत्री विदेश नीति के जादूगर माने जाते हैं और उन्हें विभिन्न देशों में इसका का गौरव हासिल है तथा पश्चिमी देशों में उनका बहुत सम्मान होता है। विश्व मंच पर पड़ोसी देशों के मुकाबले उन्हें ज्यादा प्रमुखता हासिल है। यह एक ऐसी भूमिका है जिसमें मृदु भाषा और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का व्यापक क्षितिज जरूरी है, लेकिन साथ ही यह चौकीदार की सरकार है जो सीमा की निगरानी करता है तथा देश के भीतर के दुश्मनों को चेतावनी देता है कि वह अपनी हरकतों से बाज आएं ।परिणाम स्वरूप पड़ोसी देशों में भारत को लेकर एक खास किस्म का तनाव पैदा हो गया है । यह तनाव गत 5 अक्टूबर को बांग्लादेश विदेश मंत्री शहीदुल इस्लाम के बयान में दिखता है जिसमें उन्होंने कहा है कि "हमारे संबंध अच्छे से भी अच्छे हैं लेकिन फिर भी हमें अपनी आंखें खुली रखनी होंगी। "
            अब यहां दो बातें होती हैं या तो हसीना वाजिद को दिया गया आश्वासन सही नहीं है या फिर गृहमंत्री की बात सही नहीं है। क्योंकि अभी तक एनआरसी की जो भी कसरत हुई है वह बांग्लादेश को दिमाग में रखकर ही हुई है। इसे विभाजन का दर्द भी कहा जा रहा है। क्योंकि विभाजन और आजादी के बाद भारी दंगे के फलस्वरूप यहां पूर्वी सीमा से बहुत बड़ी संख्या में घुसपैठिए आ गए असम के बाद एनआरसी के लिए बंगाल दूसरा परीक्षण स्थल है अब बात आती है कि जिनको घुसपैठिया मान लिया गया या जिन्हें घुसपैठिया घोषित कर दिया गया और उन्हें  बांग्लादेश नहीं  भेजा गया  तो उनका क्या होगा? सरकार की योजना क्या है। असम और कर्नाटक में नए डिटेंशन सेंटर खोले जाएंगे कथित तौर पर महाराष्ट्र सरकार ने नवी मुंबई में इसके लिए जगह भी देख ली है। लेकिन असम में वहां क्या होगा लगभग 20 लाख लोग देश विहीन हैं। यह संख्या कुल भारतीय जेलों की क्षमता से कई गुना ज्यादा है। भारत की सभी जेलों की क्षमता चार लाख 33हजार 33 है और वो पहले से ही भरी हुई है। अगर देशभर में एनआरसी लागू हो कई लाख और लोग इन कैदियों में शामिल हो जाएंगे। सरकार के पास कथित रूप से दूसरा विकल्प है कि इन्हें वर्क परमिट दे दिया जाए। वे भारत में रहें और भारत के लिए काम करें लेकिन उनका राजनीति का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। आश्चर्य नहीं है कि किसी स्पष्ट नीति के अभाव में गृहमंत्री फिलहाल इस पर कुछ ना बोलें लेकिन वे लगातार इस पर बोल रहे हैं ।घुसपैठियों को बंगाल की खाड़ी में फेंक देने की बात करते हैं। अब इसे क्या कहा जाए।
        

Wednesday, October 9, 2019

नई पीढ़ी ,पर्यावरण और शिक्षा के बीच गहरा रिश्ता

नई पीढ़ी ,पर्यावरण और शिक्षा के बीच गहरा रिश्ता

बिगड़ता पर्यावरण  किसी एक देश की जिम्मेदारी नहीं है  और ना ही  ऐसे विचार से  उद्देश्य हासिल हो पाएगा। यह एक  संयुक्त प्रयास है  और संयुक्त प्रयास से ही इसमें सुधार आ सकता है। राष्ट्र संघ के आंकड़े के मुताबिक आज दुनिया भर में लगभग 180 करोड़ लोग 10 वर्ष से 24 वर्ष उम्र के हैं बिगड़ते पर्यावरण के खिलाफ जंग में अगर इन 180 करोड़ नौजवानों की ताकत का उपयोग किया जाए तो बहुत कुछ लक्ष्य हासिल हो सकता है। यह नौजवान बढ़ते तापमान, संसाधनों के अभाव और भयानक मौसम की चुनौतियां से मुकाबले के लिए की जा रही कोशिशों के बड़े भागीदार हो सकते हैं। हाल ही में स्वीडन की ग्रेटा थुनबर्ग की अगुवाई में हुई स्कूलों की हड़ताल यही बताती है। नौजवान इन मुद्दों से खुद को जज्बाती तौर पर जोड़ने में सक्षम हैं। वे ऐसा कर भी रहे हैं। लेकिन, अभी युवाओं को इन मसलों से जुड़ाव विरोध प्रदर्शन तक सीमित है। इस  मामले में अभी युवा संस्थागत प्रयासों से नहीं जुड़ पाए हैं । आखिर ऐसा  क्यों है? इन दिनों स्थाई विकास पर सबसे ज्यादा चर्चा होती है। स्थाई विकास विकास का एजेंडा बहुत ही व्यापक है । इसमें गरीबी हटाओ से लेकर सबको शिक्षा और बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था देने का लक्ष्य शामिल है। इसके तहत 17 लक्ष्य और 169 प्रयोजन तय किए गए हैं। इनमें कुछ मसले ऐसे भी हैं जो किसी आम नौजवान की सोच के दायरे से बाहर हैं। हालांकि ऐसे मामलों पर जागरूकता का विकास अच्छी बात और उससे भी अच्छी बात है उसे फैलाने का प्रयास। लेकिन यह बात समझ में नहीं आती कि आज का एक नौजवान मलेरिया या दिमागी बुखार के खिलाफ जंग में कैसे शामिल हो सकता है, या फिर एक दूर देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने में कैसे योगदान दे सकता है। इसलिए यह जरूरी है कि आम लोगों की व्यक्तिगत पसंद के हिसाब से उन्हें उन लक्ष्यों को पाने के लिए प्रेरित किया जाए। उदाहरण के लिए स्थाई विकास के जो 17 लक्ष्य तय किए गए उनमें शामिल एक लक्ष्य टिकाऊ विकास और खपत भी है। यह संभवतः युवाओं की पसंद का लक्ष्य है। दुनिया में एक बहुत बड़ी आबादी 1995 के बाद पैदा हुई है।  यह पीढ़ी 2020 तक दुनिया के कुल ग्राहकों का 40 प्रतिशत हो जाएगी। इसका मतलब है बहुत जल्द हमारे युवाओं की खपत और खरीदारी में बदलाव की जरूरत है।
         अपनी रोजाना की जीवन शैली में हम कार्बन उत्सर्जन में  बहुत बड़ा योगदान करते हैं। दुनिया भर में जो ऊर्जा उत्पन्न होती है उसका लगभग 29% भाग घरेलू उपयोग के काम में आता है और खानपान के क्षेत्र में 30%  का उपयोग होता है। यानी लगभग दो तिहाई ऊर्जा ऐसे कामों में खर्च हो जाती है जो अनुत्पादक हैं। इसके अलावा कार्बन डाइऑक्साइड का जो उत्सर्जन होता है वह अलग है । आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका और चीन सबसे ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं । 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने 904. 74 टर्न कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन किया जबकि चीन ने उसी वर्ष 499.75 टन कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल में छोड़ा। यही नहीं अमेरिका और चीन दुनिया के सबसे ज्यादा खपत वाले बाजार भी हैं। अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी की एक  रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाला उद्योग ट्रांसपोर्ट सेक्टर है। इसके बावजूद एक मिथक है कि जलवायु परिवर्तन में मानवीय गतिविधियों का हाथ है। इस मिथक को भंग करना होगा और हमारी नौजवान पीढ़ी ही इस मिथक को भंग कर सकती है।
         मनुष्य पैदाइशी खरीदार नहीं होता। मीडिया और असरदार मार्केटिंग की मदद से ग्राहकों का एक बहुत बड़ा बाजार तैयार किया जाता है। प्रचार और असरदार मार्केटिंग के कारण ही हमारे भीतर मोटर कार खरीदने और घूमने जाने इच्छा पैदा होती है। 1 वर्ष के भीतर दुनिया के कुल ग्राहकों में 40% भाग हमारे उन नौजवानों का होगा जिनकी पैदाइश 1995 के बाद हुई।  इसलिए जरूरी है कि हम इन नौजवानों की खरीदारी और खपत की आदतों को बदलें और तभी हम जलवायु परिवर्तन से जुड़े लक्ष्यों को हासिल कर सकेंगे। भारत में 2030 तक लगभग 10 से 25 वर्ष वाली उम्र के 37 करोड़ लोग हो जाएंगे और इससे घरेलू खपत पर भारी असर पड़ने को है। इस अवधि तक एक बहुत बड़ी आबादी गरीबी रेखा से ऊपर चली जाएगी और उनके खर्च करने की क्षमता बढ़ जाएगी। आज भारत में नौजवान लगभग डेढ़ अरब डॉलर खर्च करते हैं 11 वर्ष के बाद यानी 2030 में यही नौजवानों समुदाय 6 अरब डॉलर खर्च करने लगेगा। 15 वर्ष की उम्र के लगभग 90% किशोर ऑनलाइन दुनिया तक पहुंच जाएंगे। यानी ,सोशल मीडिया का दायरा युवाओं को जुड़ने का नया माध्यम उपलब्ध होगा और वैश्विक खपत में भारत बड़ा हिस्सेदार बन जाएगा । आज के नौजवानों को अगर हम समय के अनुसार ढालेंगे तो इसका असर आगे चलकर काफी अच्छा होगा । खासकर उनकी आदतें वैसी नहीं होंगी जैसी पश्चिम के युवाओं की है और वह ज्यादा सृजनशील हो सकेंगे । जब तक हम इसे नहीं ठीक से समझेंगे तब तक जलवायु परिवर्तन और सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल नहीं कर सकेंगे।

Friday, October 4, 2019

पाकिस्तानी युद्धक तत्वों को मिटाना जरूरी

पाकिस्तानी युद्धक तत्वों को मिटाना जरूरी

भारत में दुर्गा पूजा या नवरात्र की शंख ध्वनि से गरबा के उत्साह के बीच जैसे आतंकवादियों के प्रवेश की खबर ने एक विशेष सनसनी पैदा कर दी है। साथ ही पाकिस्तान से संभावित युद्ध की चर्चा फिजा में तैर रही है । कुछ जानकार पाकिस्तान से युद्ध की सूरत में मरने वालों के आंकड़े बताने में जुटे हैं।  बताया जाता है कि अगर युद्ध हुआ और उसमें परमाणु हथियारों का उपयोग किया गया तो 1 सप्ताह से कम समय में पचास  से साढे 12 करोड़ लोग मारे जाएंगे। एक अध्ययन में यह बात कही गई है जिसमें यह भी कहा गया है कि भारत-पाकिस्तान परमाणु युद्ध में जितने लोग मारे जाएंगे उससे कहीं कम लोग दूसरे विश्व युद्ध में मारे गए थे। कोलोराडो बोल्डर विश्वविद्यालय और रुतगर्स विश्वविद्यालय के विश्लेषकों के अध्ययन में पाया गया है। अगर भविष्य में ऐसा हुआ तो उसकी विभीषिका और कुप्रभाव कैसा होगा ? सच क्या होगा? यह अध्ययन साइंस एडवांस पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। जिसमें कहा गया है कि दोनों देशों के बीच कश्मीर को लेकर कई बार जंग हो चुकी है लेकिन इस बार हालात कुछ दूसरे होंगे। दोनों देशों के पास लगभग 500 परमाणु हथियार होंगे अगर ऐसा होता है तो धरती पर पहुंचने वाली सूरज की रोशनी मैं 20 से 35% तक कमी हो जाएगी। तापमान दो से 5 डिग्री सेल्सियस कम हो जाएगा। यही नहीं दुनिया में भुखमरी बढ़ जाएगी। जल की 30% कमी होगी जिसका व्यापक क्षेत्रीय प्रभाव होगा।
कुछ तो पाकिस्तान से युद्ध में होने वाली संभावित विजय की चर्चा में मशगूल हैं। यानी जितने मुंह उतनी बातें । लेकिन कोई इस पर नहीं निगाह कर रहा है कि अगर पाकिस्तान भारत के खिलाफ जंग की घोषणा करता है तो भारत के लिए यह एक अवसर भी बन सकता है । अपनी बीवी की जादूगरी और रावलपिंडी के फौजी मुख्यालय के हुकुम के बीच युद्ध पिपासु पाकिस्तान के प्रधानमंत्री  इमरान खान  ने राष्ट्र संघ में जो कहा और जून के देश में कहां सुना जा रहा है उसमें बहुत बड़ा फर्क है इमरान खान ने जो कुछ भी कहा वह कश्मीर में धारा 370 हटाए जाने की प्रतिक्रिया के रूप में कहा भीतर से बौखलाए  इमरान खान जिन्होंने बारंबार भारत के खिलाफ जिहाद का औचित्य बताया है । उसे उसी रूप में भारत के खिलाफ जंग की घोषणा के रूप में देखा जाना चाहिए कि पाकिस्तान में सेना का एक विंग जेहादी भी हैं और वह अन्य युद्धों में जिहादियों का उपयोग कर चुका है ,इसलिए भारत को कुछ ऐसा सोचना होगा ताकि वह इन जिहादियों को दंडित कर सके। ऐसी हालत में यह युद्ध केवल जम्मू कश्मीर तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे भारत में फैल जाएगा। यह अभी स्पष्ट नहीं हो सका है कि पाकिस्तान युद्ध करता है तो परमाणु युद्ध होगा या नहीं। अभी तक दुनिया में कोई ऐसा तंत्र नहीं विकसित हुआ है जो किसी आतंकी हमले को पूरी तरह खत्म करने में सक्षम हो सके। इसलिए पूरी संभावना है कि पाकिस्तान भारत को उत्तेजित करने के लिए आतंकियों की लगाम ढीली कर देगा । जिससे युद्ध आरंभ करने का ठीकरा भारत के सिर पर फूटेगा और विश्व शक्तियों की हमदर्दी पाकिस्तान के साथ रहे। पाकिस्तान की मामूली गलती  एक बड़े युद्ध में बदल सकती है । भारतीय नेता और अधिकारी आतंकवाद को मानवता के खिलाफ अपराध घोषित करते हैं लेकिन इसका चरित्र उससे ज्यादा खतरनाक है। पाकिस्तान भारत के खिलाफ मानवाधिकार का रोना रो रहा है और धर्मनिरपेक्षता के सद्गुणों का बखान करता फिर रहा है जबकि भारत की तरफ से इसे गलत बताने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है। अब केवल युद्ध ही विकल्प रह गया है और अगर युद्ध होता है तो भारत को इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए और पाकिस्तान के भीतर तैयार हो रहे इन विनाशक तत्वों को सदा के लिए समाप्त कर देना चाहिए।

Thursday, October 3, 2019

शौचालय बने पर उपयोग करने वाले नहीं हैं

शौचालय बने पर उपयोग करने वाले नहीं हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि 2 अक्टूबर को खत्म होने वाले  साठ महीनों में 60 करोड़ से अधिक लोगों के लिए 11 करोड़ शौचालय निर्मित करा दिए गए हैं। दुनिया इसे देखकर सुनकर अचंभित है। बेशक यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। भारत जैसे विशाल देश और विभिन्न आदतों और रिवाजों वाले विशाल आबादी के लिए इतना बड़ा काम करना सचमुच विस्मयजनक है । लेकिन योजना के अभाव में और सहायता की कमी के कारण आंकड़े बताते हैं कि 41% लोगों के घरों में शौचालय नहीं है और वे अभी भी शौच के लिए बाहर जाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण बिहार ,मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में 2014 से अभी भी लगभग 23% लोग बाहर शौच करते हैं। लाखों शौचालय बने लेकिन उसका उपयोग करने वाले लोग नहीं हैं और इसलिए कई तरह के खतरे उपस्थित होने वाले हैं। विभिन्न अध्ययनों से यह पता चला है कीटाणु और विषाणु बड़े लोकतांत्रिक होते हैं यह अमीर और गरीब ऊंची जाति और नीची जात में फर्क नहीं करते। खुले में शौच के कारण विषाणु पेयजल, खाद्य पदार्थ इत्यादि को प्रदूषित कर देते हैं और उसके कारण डायरिया, पेचिश और अन्य तरह की पेट की बीमारियां होती हैं।  फिर इनके माध्यम से कीटाणुओं का प्रसार होता है। सरकार का दावा है कि जब से  यह परियोजना आरंभ हुई तब से 2 अक्टूबर 2019 तक लगभग 11 करोड़ शौचालय निर्मित हो गये। यह सरकारी आंकड़ा है इसकी प्रशंसा बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाऊंडेशन ने भी हाल में की और प्रधानमंत्री को ग्लोबल गोलकीपर का पुरस्कार दिया। लेकिन इकोनॉमिक एंड पॉलीटिकल वीकली के अनुसार खुले में शौच कार्यक्रम के विकास पर राइस फाउंडेशन द्वारा किए गए एक शोध के अनुसार खुले में शौच करने वालों की संख्या 70% से घटकर कर 44% हो गई। यानी ,ऐसे लोग जिनके घर में शौचालय हैं वे अभी भी बाहर जाते हैं। यह कोई नई समस्या नहीं है।   स्वच्छ भारत मिशन के लिए  मुहैया कराई गई  आर्थिक सहायता  और शौचालयों  के निर्माण के रेंडम  मूल्यांकन से पता चलता है की 2009 से 2011 के बीच मध्य प्रदेश के 2 गांव जिनकी आबादी एक ही है वहां एक ही संख्या में शौचालय निर्मित किए गए लेकिन एक में उपयोग करने वालों की संख्या दूसरे के मुकाबले 26% ज्यादा है। इस तरह से सैकड़ों क्षेत्रों में हजारों गांव का सर्वेक्षण किया गया और पाया गया कि जितने शौचालय निर्मित हुए हैं उनका उपयोग नहीं हो पा रहा है । 41% घर ऐसे हैं जहां इनकी सुविधा है लेकिन वे इसका उपयोग नहीं करते। यहां अब एक बहुत बड़ा प्रश्न उठता है की कैसे एक नीति तैयार की जाए जो लोगों को वस्तुतः शौचालय का उपयोग करने के लिए प्रेरित करे? एक शोध के अनुसार शौच से प्रसारित होने वाले कीटाणु जो खाद्य पदार्थों के माध्यम से भीतर जाते हैं उसके प्रति जागरूकता लोगों को शौचालयों के उपयोग के लिए प्रेरित नहीं करती है ।
        शोध से यह  प्रमाणित हुआ है की ऐसे क्षेत्र जहां शौचालयों की कमी है वहां  जागरुकता के साथ-साथ वित्तीय सहायता देने के कार्यक्रम ज्यादा प्रभावशाली हो सकते हैं, खास करके निम्न आय वर्ग के लोगों में। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश का शिवपुरी जिला खुले में शौच से मुक्त हो चुका है लेकिन 2 दिन पहले वहां दलित समुदाय के दो बच्चों को इसलिए पीट-पीटकर मार डाला गया कि वे खुले में शौच कर रहे थे। हमारी मीडिया प्रधानमंत्री को ग्लोबल गोलकीपर का पुरस्कार दिए जाने का जश्न मना रही थी और इधर ये बच्चे अंतिम सांस ले रहे थे। स्वच्छ भारत मिशन की सबसे बड़ी कमी थी कि उसमें शौचालय मुक्त बनाने पर ज्यादा जोर दिया गया देश की संपूर्ण स्वच्छता पर नहीं। विगत 5 वर्षों में मंत्रियों और अफसरों ने शौचालयों की संख्या और आर्थिक सहायता की राशि का ब्यौरा दिया लेकिन किसी ने लोगों में स्वच्छता की  अलख नहीं जगाई । डैन कॉफी और डीन स्पीयर्स ने अपनी किताब "व्हेयर इंडिया गोज: एबंडेंट टॉयलेट्स ,स्टंटेड डेवलपमेंट एंड द कॉस्ट ऑफ कास्ट" में लिखा है कि भारत के लोग बाहर शौच करना ज्यादा पसंद करते हैं क्योंकि शौचालयों को बाद में साफ करने के लिए जो कुछ करना पड़ता है वह देश के उच्च जाति के लोगों को नहीं पसंद है। भारत में ऐतिहासिक रूप से शौचालय अछूत कार्य से जुड़ा था। सुनकर हैरत होगी कि शौचालय जितने ज्यादा बने अछूतों का दमन उतना ही बढ़ गया। इसके तीन उदाहरण तो सब जानते हैं पहला शौचालयों की संख्या बढ़ने के बावजूद स्वच्छता का ढांचा नहीं बदला। खास करके नाली, सेफ्टी टैंक ,स्वच्छता  कर्मी और अन्य उपस्कर। अभी भी शौचालयों की टंकी को आदमी ही साफ करते हैं । ऊंची जाति के हिंदू शौचालय का उपयोग करते हैं लेकिन इसकी सफाई नहीं करते। तीसरा कारण है जो लोग शौचालयों की सफाई से जुड़े हैं उन्हें दूसरा काम नहीं मिलता और आर्थिक रूप से वह काफी साधन हीन हैं। यही कारण है कि हिंदू समुदाय में भी इन दिनों जाति की समस्या बढ़ती जा रही है । प्रधानमंत्री ने बेशक घोषणा कर दी कि भारत  खुले में शौच से मुक्त हो गया लेकिन मध्य प्रदेश के दो बच्चों की लिंचिंग इस घटना की पृष्ठभूमि में अलग ही कहानी कह रही है।

Wednesday, October 2, 2019

मानव निर्मित आपदा है यह

मानव निर्मित आपदा है यह

राजस्थान से लेकर बिहार तक भारी जल जमाव और तालाबों, झीलों में भरे पानी के कारण होने वाली जान-माल की हानि कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है। हालांकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसे प्राकृतिक आपदा बता रहे हैं । वह असली तस्वीर को छिपा रहे हैं। हो सकता है इसका कोई राजनीतिक कारण हो। लेकिन सही तो यह है कि  पर्यावरण परिवर्तन , कुछ साजिशों और कुछ मानवीय गलतियों का खामियाजा भुगत रही है पूरी जनता।
      अगर अगर इसके वैज्ञानिक पहलुओं को देखें तो पता चलेगा कि औद्योगिकरण के कारण वातावरण में एकत्र एयरोसोल के फलस्वरूप मानसून की अवधि में गड़बड़ हो जाती है और जब उत्तर भारत में फसलों की कटाई के बाद तेज हवा चलती है तो वह एयरोसोल फैल जाता है और उत्तरी पश्चिमी भारत पर कहर बनकर टूट पड़ता है। 2 वर्ष पहले भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलुरु और लंदन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के संयुक्त प्रयास से एक शोध के बाद पता चला की एयरोसोल के प्रभाव से बादलों के वर्टिकल स्ट्रक्चर और उनके माइक्रो फिजिकल गुणों में भारी बदलाव आ जाता है और इसके कारण वातावरण में स्थिरता खत्म हो जाती है। इस वर्ष जो बारिश का कहर हम देख रहे हैं वह इसी खत्म हो गई स्थिरता के कारण हुआ है । जब तक मानसून था बादल बरसे नहीं और जब मानसून जाने लगा तो चारों तरफ से बादल जमा होकर टूट पड़े। एक बात तो यकीनन कही जा सकती है की इस शोध से यह पता चला कि हमारी गतिविधियां हमारे लोगों के जीवन और पर्यावरण को प्रभावित कर सकती हैं । शोध परियोजना में हिस्सेदार ब्रिटिश वैज्ञानिक डॉक्टर  ए वोल्गारिकिस के मुताबिक वातावरण में जिओ इंजीनियरिंग स्कीम के तहत सल्फर डाइऑक्साइड का उपयोग भी इस प्रक्रिया को तेज करता है। वातावरण की नवीन स्थिति के तहत शहरों में निर्मित होती गगनचुंबी इमारतें ,फ्लाईओवर पार्क इत्यादि जो विकसित भारत की तस्वीर पेश करते हैं। यहां एक शेर याद आता है
कुछ हुस्न मुजस्सिम की अदा पाए हुए हैं
आईने इसी बात पर इतराए  हुए हैं
हम इसी विकास को देखकर इतराते हैं, उसकी चर्चा करते हैं लेकिन वही हमारी बातों की तलहटी में छिपे गाढ़े भूरे पानी के रूप में मौत की भी तस्वीर नहीं देख पाते।
आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं
सामान सौ बरस का पल की खबर नहीं
गौर से देखें जलजमाव कैसे होता है? जलजमाव वर्षा  का वह पानी है जिसे जमीन सोख नहीं सकती और पहले से भरी नालियां बाहर नहीं निकाल सकती। इसे कोढ़ में खाज की तरह खतरनाक बनाती है शहरों की कूड़ा सफाई व्यवस्था। हर शहर की अपनी विशेष चुनौतियां हैं और यह चुनौतियां शहर के निवासियों द्वारा तैयार की जाती है। यह चुनौतियां जब पर्यावरणीय कारणों से जुड़ जाती हैं तो मौत की तरह घातक बन जाती हैं। जंगल कटते जा रहे हैं गांव सिकुड़ते जा रहे हैं।  शहर दानवाकार होते जा रहे हैं । उसमें आबादी अब क्षैतिज न होकर ऊपर की ओर बढ़ रही है और बहुत ही ज्यादा बढ़ रही है उस शहर से जुड़ी चुनौतियां। जयपुर से लेकर पटना तक जो बरसात जाते जाते कहर बरपा गई उसका कारण यही चुनौतियां हैं। इस बार की मौत और बर्बादी यह सबक दे गई है कि पर्यावरण को सुधारना होगा तथा कचरे को कम करना होगा, क्योंकि कचरा उठाने और उसे निपटाने की भी  सरकार की अपनी सीमा है। हर शहर की एक भौगोलिक व्यवस्था होती है और उस व्यवस्था की एक सीमा होती है। आज विकास के नाम पर हम उस सीमा को लांघते जा रहे हैं । यह सरकार का कर्तव्य है कि शहर वासियों को बताएं कि उस शहर की सीमा क्या है। उस शहर की चुनौतियां क्या हैं? दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एयरोसोल के निर्माण को रोकने की वैज्ञानिक कोशिशें करनी होंगी। बेशक इससे उद्योगीकरण को आघात पहुंचेगा लेकिन मानव समुदाय की मौत से लगने वाली चोट उस आघात से कहीं ज्यादा घातक है।

Tuesday, October 1, 2019

आज भी गांधी प्रासंगिक हैं

आज भी गांधी प्रासंगिक हैं

आज से बिल्कुल डेढ़ सौ साल पहले आज की ही तारीख को महात्मा गांधी का जन्म हुआ था। गांधी भारतीय उपमहाद्वीप के संदर्भ में अब तक के सबसे विवादास्पद व्यक्ति रहे। अलग-अलग विचारधाराओं के लोग उनके स्वभाव और चरित्र की अलग-अलग व्याख्या करते रहे हैं। हर काल में समसामयिक परिस्थितियों  और उपलब्ध सामग्रियों के आधार पर गांधी के चरित्र की व्याख्या की जाती रही है। कोई भी गांधी के काल तक जाकर उनकी व्याख्या नहीं करता। यह गांधी के जीवन की सबसे बड़ी ट्रेजडी  रही है। एक बार कोलकाता में साहित्य नोबेल पुरस्कार विजेता जर्मन लेखक गुंटर ग्रास ने बातचीत के दौरान कहा था "मानव सभ्यता में अरस्तु और बुद्ध के बाद मार्क्स और गांधी ही ऐसी शख्सियतें  पैदा हुईं थी जिनके  विचारों से कोई भी मतभेद रख सकता है लेकिन उनके वजूद को अपने अचेतन से नहीं निकाल सकता।"
    विगत पांच सात वर्षों से गांधी को तरह-तरह से खारिज करने का एक अभियान चला हुआ है। कभी उनके बिंबो को अलग कर उसका अन्य संदर्भ में उपयोग होता है तो कभी उनके व्यक्तित्व को एक दूसरे नजरिए से देखा जाता है । लेकिन यहां भी गांधी हैं।
          आज मॉब लिंचिंग का दौर चल पड़ा है। इतिहास की वीथियों में थोड़ी दूर जाकर अगर देखें तो कुछ ऐसी ही घटना का ब्यौरा मिल जाएगा। बात 13 जनवरी 1897 की है।  बात दक्षिण अफ्रीकी शहर डरबन की है।  अंग्रेजों की 6000 से ज्यादा की भीड़ ने महात्मा गांधी पर हमला कर दिया और उन्हें पीट-पीटकर मार डालने की कोशिश की । वह भी अपने नेता द्वारा उकसाई गई थी। पहले तो भीड़ ने गांधी पर पत्थर और सड़े हुए अंडे बरसाए और इसके बाद लोगों ने उन की पिटाई शुरू कर दी। तभी  एक महिला ने बड़ी मुश्किल से उनकी जान बचाई । गांधीजी अपने मित्र पारसी रुस्तम जी के घर पहुंचे। तब हजारों की भीड़ गांधीजी को मांग रही थी। वे लोग घर में आग लगा देना चाहते थे। उस घर में करीब 20 लोगों की जान जान दांव पर थी। पुलिस ने उन्हें पुलिस की वर्दी पहना कर थाने पहुंचाया। पुलिस ने ही फिर  एक हिंसक गाना गवाना शुरू कर दिया। बाद में जब उग्र भीड़ को इसकी जानकारी मिली कि गांधी तो निकल गए तो  थोड़े खीझ कर वे वहां से चले गए। इस घटना में दो बातें गौर करने वाली हैं कि गांधी को बचाने वाले भी अंग्रेज थे और अंग्रेज पुलिस ऑफिसर भी उन्मत्त भीड़ की हिंसक मानसिकता को भांप कर उससे वह गाना गाने को कहा जिससे हिंसा बाहर निकल जाए। घटना की खबर 22 वर्ष के बाद 10 अप्रैल 1919 को भारत मे पता चली, और इसके बाद गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया। अहमदाबाद से गांधी को गिरफ्तार किया जाने लगा तो  शहर में दंगे हो गए। कई अंग्रेज घायल हुए। अगर इस घटना का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तो हिंसा और अहिंसा का संबंध किसी समुदाय विशेष से नहीं होता। गांधी ने 8 सितंबर 1920 को यंग इंडिया में एक  लिखा था - "लोकशाही बनाम भीड़शाही।" उसमें जो लिखा था, आज  भारत में लगभग यही स्थिति है। इन हालात से हमें छुटकारा नहीं मिल रहा है ना ही बदलाव हो रहा है। यही कारण है   कि सरकार लोगों का ध्यान बांटने के लिए इस डेढ़ सौ वर्ष पर कई कार्यक्रम कर रही है। भीड़ को प्रशिक्षित   करना सबसे आसान काम है। क्योंकि, भीड़ कभी विचारशील नहीं होती। वह आवेश के अतिरेक में कुछ भी कर गुजरने पर आमादा रहती है ।
       आज वक्त की सबसे बड़ी दिक्कत है की हमारे समाज में सामाजिक और राजनीतिक संवाद की प्रक्रिया शिथिल हो गई है। राजनीतिक वर्ग में वह सामर्थ्य ही क्षीण हो गया है और इसीलिए वह अपनी बात मनवाने के उद्देश्य से भीड़ का उपयोग करता है। आज हम एक विचित्र  असंवाद की स्थिति से गुजर रहे हैं। इस  विसंवाद में हमने असभ्यता के औचित्य के लिए बहाने और उस की कहानियां रखी हैं। हमारा सामाजिक ,राजनीतिक और आध्यात्मिक नेतृत्व यह भूल चुका है कि भीड़ को नियंत्रित करना केवल पुलिस का काम नहीं है। भीड़ की स्थिति उत्पन्न ना होने देना सामाजिक और राजनीतिक प्रबोधन का एक सामाजिक उपक्रम है। हम सब उस उपक्रम के पुर्जे हैं, लेकिन लगता है हम इसे भूल चुके हैं। यही कारण है कि हम किसी भीड़ सामने अपना सारा आत्मविश्वास दबाकर  या तो मूकदर्शक बने रहते हैं या फिर उसका हिस्सा बन जाते हैं। यदि आज हम भीड़ की हिंसा की घटनाओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तो संभवत यही निष्कर्ष निकलेगा तो इस हिंसा में शामिल हर आदमी अपने जीवन में अलग-अलग  प्रकार की व्यक्तिगत पारिवारिक आर्थिक और सामाजिक समस्याओं जैसी किसी न किसी समस्या से ग्रस्त है।उसकी यह प्रवृत्ति एक दिन में नहीं बनी है उसका विकास एक लंबी अवधि में हुआ है। जिसमें हमारे मौजूदा राजनीतिक ,आर्थिक और सामाजिक वातावरण के साथ-साथ कई और कारक शामिल होते हैं।
           पीडाबोध से ग्रसित लोगों  की जमात अपनी तमाम समस्याओं के लिए किसी अन्य को जिम्मेदार मानने की प्रवृत्ति से ग्रस्त लोगों की भी हो सकती है और वह भी अपनी व्यक्तिगत भड़ास निकालने के लिए एक तत्कालिक बहाना ढूंढती है। उनकी दबी हुई हिंसा वृत्ति को अनायास किसी  व्यक्ति की तलाश होती है।  मौका देखते ही वह उसकी पूर्ति कर बैठती है। भीड़ को मालूम है कि उसका चेहरा नहीं होता और किसी कायरता पूर्ण हिंसा को छिपाने के लिए इससे बेहतर कोई मौका नहीं होता। आज मानव समाज के तौर पर हम मनुष्यों में क्रोध बढ़ रहा है हालांकि इसके आंकड़े उपलब्ध नहीं है। लेकिन दार्शनिकों ने पाया है कि हिंसा चाहे भीड़ की हो या किसी चरमपंथी संगठन की या फिर सेना की कहीं ना कहीं एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक समस्या भी है और इसके निदान के लिए हमें गांधी और टैगोर जैसों की बात  गौर से सुने और समझने की जरूरत है। भीड़ को देखने और समझने के लिए हमें मानवीय  और वास्तविक वैज्ञानिक नजरिया अपनाना होगा और उस नजरिए को विकसित करना होगा तभी हम उसके दूरगामी समाधान के उपाय का सक्रिय हिस्सा बन पाएंगे। इसीलिए आज के दौर में भी गांधी प्रासंगिक हैं।  गांधी केवल संज्ञा न रहकर विशेषण बन चुके हैं और उस विशेषण की भी हमें आवश्यकता है।

Monday, September 30, 2019

शिक्षित बेरोजगारों की बढ़ती तादाद

शिक्षित बेरोजगारों की बढ़ती तादाद

अंतरिक्ष में विजय पताका फहराने  से लेकर हाउडी मोदी के जश्न तक हम भारतीय अपने कारनामों का बखान करने में मगन थे उसी बीच दो जरूरी रपट सामने आयी लेकिन उन्हें देखा नहीं गया या देखा भी गया तो उस पर  ध्यान नहीं दिया गया। वह रपट थी शिक्षा पर केंद्रित   आठवां वार्षिक सर्वेक्षण 2018- 19। यह रपट मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने जारी किया।  इसी के आसपास एक और रिपोर्ट "सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनामी- ए स्टैटिसटिकल प्रोफाइल ,मई अगस्त 2019।" यह रपट हर साल तीन बार प्रकाशित होती है। अगर इन दोनों रपटों को एक साथ रख कर देखें तो हमारे देश की एक अलग तस्वीर उभरती है। उस तस्वीर में हमारे शिक्षित बेरोजगार नौजवानों का बड़ा विकराल रूप दिखता है। बेरोजगारी का यह रूप आर्थिक मंदी का एक संकेत है और आने वाले दिनों में सरकार के लिए एक विशेष चुनौती बन सकता है। यह बात थोड़ी अजीब लग सकती है लेकिन हकीकत है कि उच्च शिक्षा के जो आंकड़े उपलब्ध है वह अपनी गुणवत्ता में स्कूली शिक्षा के मौजूदा आंकड़ों से भी कमतर हैं । इस बात को भांपकर केंद्र सरकार ने 2011- 12 में "ए आई एस एच डी" स्थापना की थी। आज हमारे पास आंकड़े हैं जिनसे पता चल सकता है कि इस देश में उच्च शिक्षा के कितने और किस प्रकार के संस्थान हैं। प्रत्येक संस्थान में कितने लोगों का नामांकन होता है और उसमें से उत्तीर्ण होने वाले छात्र की संख्या कितनी है। यही नहीं यह आंकड़े बताते हैं कि इन संस्थानों में अध्यापकों और शिक्षण कार्य से जुड़े लोगों की संख्या कितनी है। लेकिन यह भी पढ़ने- पढ़ाने और शोध की गुणवत्ता के बारे में कोई जानकारी नहीं देते। "प्रथम" नाम की गैर सरकारी संस्था "असर" की रिपोर्ट या फिर एनसीईआरटी से प्रकाशित होने वाला ऑल इंडिया स्कूल सर्वे हमारे पास आधार है। यह जानने का कि हमारे पढ़े-लिखे किशोर या नौजवान कितने कुशल हैं हाल में प्रकाशित ए आई एस एच डी 2018 19 की रिपोर्ट में आंकड़ों के पर्दे में हकीकत को पोशीदा करने का एक बड़ा दिलचस्प नमूना सामने आया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि  देश में विश्वविद्यालयों की संख्या 993 तक हो गई है, जबकि 2011- 12 में यह संख्या 642 थी। यानी 8 वर्षों में देश में विश्वविद्यालयों की संख्या में 50% का इजाफा हुआ है। लेकिन अगर गंभीरता से इसे देखें तो पता चलेगा यह 50% निजी विश्वविद्यालय हैं। आलोच्य अवधि के भीतर जो 351 विश्वविद्यालय बने हैं उनमें से 119 को राज्य सरकारों की मान्यता प्राप्त है और यह निजी विश्वविद्यालय हैं। इन निजी विश्वविद्यालयों में शिक्षा की क्वालिटी क्या है इसके बारे में कहीं कोई जिक्र नहीं है। वैसे यह तो साफ पता चलता है कि यह निजी विश्वविद्यालय शिक्षा की दुकानदारी है और शिक्षा इससे  कलंकित होती है। इसलिए इन विश्वविद्यालयों की वृद्धि कोई अच्छी बात नहीं है।
        जहां तक उच्च शिक्षा के संस्थानों में छात्रों के दाखिले का सवाल है आलोच्य अवधि में  कुल तीन करोड़ 74 लाख नौजवानों में इन संस्थानों में दाखिला लिया। और ऐसी पढ़ाई की जिस पढ़ाई की कोई उपयोगिता नहीं है। तीन करोड़ 74 लाख का यह आंकड़ा सुनने में तो बड़ा इंप्रेसिव लगता है लेकिन यह जानकर मन में उदासी भर जाती है कि हमारे देश में 18 साल से 23 साल की उम्र के नौजवानों की संख्या जितनी है उसका महज एक चौथाई हिस्सा ही उच्च शिक्षा के संस्थानों में दाखिला पा सका है। इसका मतलब है कि जिन तीन चौथाई भाग को संस्थानों में होना चाहिए वे वहां नहीं है और यूं ही बेकार बैठे हैं। यह बेकार की जमात जिंदा बम की तरह खतरनाक है। उच्च शिक्षा के हमारे संस्थान हर साल लगभग एक करोड़ छात्रों को डिग्रियां बांटते हैं। जिनमें 59 लाख स्नातक की डिग्री पाने वाले हैं और स्नातक स्तर पर डिग्री पाने वाले इन छात्रों में हुनर या रोजगार पा सकने लायक कौशल बहुत ही कम है। इसे देखते हुए यह साफ जाहिर होता है थे हमारे शिक्षा संस्थानों के सामने दोहरी चुनौती है- एक तो छात्रों की लगातार बढ़ती संख्या एक दूसरे शिक्षा की क्वालिटी।
      अब इन आंकड़ों के बरक्स अगर हम बेरोजगारी पर केंद्रित सीएमआईई की ताजा रिपोर्ट देखते हैं तो संकेत मिलता है कि बेरोजगारी की दर लगातार बढ़ती हुई मई 7.03 प्रतिशत से बढ़कर अगस्त में 8.19 प्रतिशत जा पहुंची। बेरोजगारी का आकलन  जिस पद्धति से किया गया है वह नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़ों के तौर-तरीकों से थोड़ा अलग है, और इन आंकड़ों को अगर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि भारत में बेरोजगारों की संख्या सबसे ज्यादा है। जैसे- जैसे शिक्षा का स्तर बढ़ता जाता है बेरोजगारी बढ़ती जा रही है अशिक्षित लोगों में बेरोजगारी बहुत कम है। बेरोजगारी की यह बढ़ती संख्या देश में खौलते ज्वालामुखी की तरह है।यह ज्वालामुखी किसी भी दिन फट सकती  है। बेरोजगारी के बढ़ते हुए मंजर पर जरा आर्थिक मंदी का रंग देखिए तो साफ दिखेगा कि देश एक बहुत बड़े संकट की ओर बढ़ रहा है । ऐसी स्थिति में कई देशों में दंगे हुए, तनाव हुआ है। बेरोजगारी के मोर्चे पर खराब हो सकती है। देश की स्थिति से बेखबर  हाउडी बोलने में जुटे हमारे नौजवान और हमारी सरकार इसे दूर करने के लिए कोई उपक्रम नहीं कर रही है और अगर कर भी रही है तो यह जनता को दिख नहीं रहा है।

Sunday, September 29, 2019

पाकिस्तानी हुकूमत तैयार रहे

पाकिस्तानी हुकूमत तैयार रहे

भारत में देवी पक्ष की शुरुआत होने वाली थी और उधर संयुक्त राष्ट्र में मोदी जी तथा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान भाषण देने वाले थे। मोदी जी ने स्पष्ट कहा कि "हमारे देश ने युद्ध नहीं बुद्ध दिया है।" यानी शांति का संदेश दिया। शांति के इसी संदेश के आलोक में दुर्गतिनाशिनी महिषासुर  संहारिणी  मां दुर्गा के पद चाप साफ सुनाई पड़ रहे थे। इसके बाद इमरान खान ने जब बोलना शुरू किया तो वे एटम बम का ख्वाब दिखाने लगे। यह अकेले उन्हीं की बात नहीं है। कुछ दिन पहले पाकिस्तान के रेल मंत्री साहब ने पाव आधा पाव एटम बम की धमकी दी थी। एक जमाने में एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन एक डायलॉग मशहूर हुआ था कि" हमारे पास मां है, तुम्हारे पास क्या है ? " अब वह जमाना लद गया अब चल तो रहा है "मेरे पास  आधा पाव का एटम बम है  तुम्हारे पास क्या है?" वह नहीं समझ सके कि जिस देश का हर कंकर शंकर है जो अगर नीलकंठ है तो तांडव करता भी है इमरान खान कुछ ऐसा बोल रहे थे।  उन्हें शायद मालूम हो कि ना हो कि छोटे से देश पाकिस्तान में फिलहाल 10,000 लोग डेंगू से जूझ रहे हैं। यह सरकारी आंकड़ा है और आसानी से समझा जा सकता है डेंगू से आक्रांत लोगों की संख्या इससे कहीं ज्यादा है। अब वहां की सरकार कह रही है कि डेंगू से हालात अगर बिगड़े हैं तो इसमें उसकी क्या गलती है? अब आप ही बताएं कि किसकी गलती हो सकती है? इमरान खान ने ही लोगों को बताया कि  जब काम ठीक से ना हो रहा हो तो समझ जाइए कि इसके लिए भ्रष्ट नेता दोषी हैं। वही तो चुनाव से पहले नवाज शरीफ और शाहबाज शरीफ को डेंगू ब्रदर्स करते थे लेकिन उन्हें 2017 में जब पख्तूनख्वा में डेंगू फैला तो इमरान साहब के पास इसका बहुत उम्दा इलाज था "बरसात खत्म डेंगू खत्म।" आजकल इमरान खान "मिशन कश्मीर" पर लगे हैं और डेंगू शब्द का उच्चारण करने वाले को भारत का समर्थक मानते हैं। क्योंकि एक तरफ वे राष्ट्र संघ में भाषण देने जा रहे हैं और कुछ जाहिल लोग डेंगू -डेंगू चिल्ला रहे हैं तो यह साजिश नहीं है तो और क्या है। वहां की मीडिया  देश के भीतर जो कुछ भी हो रहा है उसके बारे में पॉजिटिव रिपोर्ट करती है- "आल इज वेल" की तर्ज में। इसलिए पिछले वर्ष 10.49  प्रतिशत हो गई मुद्रास्फीति और 10 लाख बेरोजगार हो गए । फिर भी "आल इज वेल।" हमेशा ऐसा नहीं था । जब इमरान खान विपक्ष में थे तो सब गड़बड़ था। अब अचानक सब कुछ रास्ते पर आ गया और कुछ ऐसा लगने लगा है की वजीर ए आजम साहब फिलहाल पाकिस्तान से ज्यादा हिंदुस्तान की फिक्र करते हैं।
        इमरान खान केवल पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नहीं कश्मीर के दूत भी हैं।  वे कश्मीर को लेकर सऊदी अरब ,ईरान और अमेरिका के बीच के झगड़े के सुलह कराने वाले भी हैं। उनके समर्थक कहते हैं की इमरान खान राष्ट्र संघ में कश्मीर का मसला इस तरह उठा रहे हैं या जिस तरह अब  इमरान खान एक ऐसे नेता के रूप में खड़े हैं जो नया पाकिस्तान बनाने के बाद  विश्व नेता बनने की ओर कदम बढ़ा रहे हैं । इन दिनों एटम बम छुपाने की चीज नहीं रह गई। एक नया फैशन चला है आपके पास हथियार है तो उसका प्रदर्शन करें या फिर बन पड़े तो दुश्मन को धमकी दें। इमरान खान परमाणु शक्ति संपन्न देश का शासक होने का दम भरने के बाद उनके  रेल मंत्री पाव भर का एटम बम दिखाते चल रहे हैं। एक जमाने में परमाणु सिद्धांत बड़ा गंभीर विषय था पर आज की सियासत में खासकर पाकिस्तानी सियासत में एटम बम का जिक्र तो ऐसे किया जा रहा है जैसे अब बच्चों के खेलने के पटाखे हो। इस साल  फरवरी में पुलवामा हमले के बाद भारत में पाकिस्तान को टमाटरों  के निर्यात पर पाबंदी लगा दी। वहां के टीवी पत्रकार ने जवाबी हमले का आगाज किया और नारा दिया टमाटर का जवाब एटम बम से देंगे।
        दरअसल, पाकिस्तानी नेता पगला गए हैं । मोदी के कश्मीर बम के बाद अब पाकिस्तानी नेताओं को बड़ा अजीब लगने लगा है। सच कहें तो क्रिकेट में अगर पाकिस्तान भारत के हाथों पिट जाता है तो वहां जो प्रतिक्रिया होती है वह कश्मीर मसले से भी ज्यादा गंभीर होती है । इसका एक मुफीद कारण है कि कश्मीर की हुकूमत पेट्रोल से नहीं कश्मीर कॉज से चलती है। पाकिस्तानी शासन के अभिजात्य वर्ग में हर किसी को यह भ्रम है कि " कश्मीर बनेगा पाकिस्तान" और नेता इसी का फायदा उठाते हैं। पाकिस्तानियों को हर साल कश्मीर को आजाद कराने के लिए 5 फरवरी को छुट्टी मिलती है। इसमें कई तरह की झांकियां निकाली जाती हैं । कश्मीर दिवस का यह मकसद अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है लेकिन भारत की इस नई पहल से यह बात स्पष्ट होने लगी है कि नियंत्रण रेखा एक स्थाई सीमा रेखा बनने जा रही है।  पाकिस्तानी हुकूमत वह दिन देखने के लिए तैयार रहे।

Thursday, September 26, 2019

बातों के सही मायने

बातों के सही मायने 

अरस्तु का मानना था कि "तर्क के जरिए बातों के सही अर्थ तक पहुंचा जा सकता है और यही कारण है कि सदा सत्य की जीत होती है।" लेकिन अब शायद ऐसा नहीं है। अगर हम अपने आसपास से लेकर दूरदराज की दुनिया भर में हो रही घटनाओं को देखें तो इस cvबात का अंदाजा लगाया जा सकता है। आज हमारे नेता लोगों के भीतर की भावनाओं को उभार कर अपना उद्देश्य पूरा कर लेते हैं। जो सत्य, तथ्य  और तर्कों से परे है। दुनिया की ताजा स्थिति यूरोपियन नवजागरण के तार्किक विचारों को कमजोर करने वाली है। उदाहरण के लिए देखें ,ह्यूस्टन में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने एक नारा दिया "अबकी बार ट्रंप सरकार।" सुनने में यह साधारण तौर पर ट्रंप के लिए वोट मांगने का नारा है लेकिन इस नारे का अर्थ और इसकी डायनामिक्स का मोदी जी ने अपने लिए उपयोग किया। यह नारा "हाउडी मोदी" कार्यक्रम में मोदी जी ने दिया लेकिन इरादा अपने लिए उपयोग करने का था। बेशक उन्होंने खुद को 130 करोड़ भारतीयों का प्रतिनिधि बताया। जब उन्होंने कश्मीर से धारा 370 हटाने की बात की तो उसके साथ यह भी कहा कि यह जनता की आकांक्षा थी। इस कार्यक्रम में ज्यादातर लोग यह कह सकते हैं कि  लगभग सभी  भारतीय थे। अब यह पूछा जा सकता है यह मोदी विदेशों में बसे भारतीयों के लिए क्या कर सकते हैं ? अब इस बात को थोड़ा दूसरी तरफ से देखें और पूछें कि यह प्रवासी भारतीय मोदी जी के लिए क्या कर सकते हैं? मोदी जी अपने मतदाताओं को अच्छी तरह जानते हैं ,समझते हैं । उन्हें मालूम है कि समस्त भारतीयों को प्रभावित करने के लिए प्रवासी भारतीयों को भी प्रभावित करना पड़ेगा। प्रवासी  भारतीयों के दिलों में उतरना होगा। एक फिल्म का डायलॉग याद आता है जिसमें हीरो कहता है कि" मैं समझ में नहीं दिल में आता हूं।" एक बार मोदी जी ने न्यूयॉर्क को अपना दूसरा घर बताया था। मोदी जी जब 2014 में सत्तासीन में बहुत से प्रवासी भारतीयों ने उनका समर्थन किया था और उनके लिए प्रचार भी किया था। वह प्रवासी भारतीयों की शक्ति को जानते हैं। यही कारण है कि नरेंद्र मोदी जब भी विदेश  आते हैं तो वहां बसे भारतीयों से मिलना नहीं भूलते। प्रवासी भारतीयों के मन में है चिंता का एक भाव होता है और मोदी जी इस भाव को अपने लिए कैश कराते हैं। आंकड़े बताते हैं कि मोदी जी अपने पहले कार्यकाल में 48 विदेश दौरे पर गए थे जिनमें उन्होंने 93 देशों यात्रा की थी। प्रवासी भारतीय विदेश के चाहे जिस देश में हों उनके मन में अपनी संस्कृति को लेकर एक तड़प होती है। हालांकि भारत में जो कुछ हो रहा है उसको देख -सुनकर वे बहुत खुश नहीं होते लेकिन अपनी संस्कृति की तड़प उन्हें मोदी जी के साथ जोड़ती है। यही कारण है कि बहुत से प्रवासी भारतीयों ने इस चुनाव में मोदी जी प्रचार किया था। मोदी खुद को एक काम करने वाले नेता के रूप से ज्यादा सक्रिय प्रधानमंत्री के तौर पर प्रस्तुत करते हैं।  विदेशों में रहने वाले भारतीयों को भ्रष्टाचार, भारत की गरीबी ,शहरों की अराजकता इत्यादि से बहुत मतलब नहीं है इसलिए वह अपनी संपत्ति और भारतीयों से मिलने वाले इर्ष्यापूर्ण  सम्मान को नहीं छोड़ना चाहते हैं । उन्हें यह मालूम है कि भारत में उन्हें धनवान माना जाता है लेकिन वे भारत नहीं लौटना चाहते। इसके चलते एक मनोवैज्ञानिक विभाजन पैदा हो जाता है। आंकड़ों के अनुसार अमेरिका में 45 लाख भारतीय और उन्हें इस   प्रवास बे भारतीय पहचान हैं। इस प्रवास ने उन्हें भारत से दूर कर दिया है। नरेंद्र मोदी में उन्हें एक शानदार विकल्प नजर आया। इसी कारणवश वे मोदी जी के कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए कहीं भी चले जाते हैं।मोदी जी के रूप में उन्हें एक ऐसा नेता दिखा जो भारत को सम्मान दिला रहा है तथा भारत को सम्मान का मतलब है उनका सम्मान। इससे भारत से उनके जुड़ाव सरलता होती है। विदेशों में बसे भारतीयों के लिए नरेंद्र मोदी एक शानदार भ्रम हैं।  इस भ्रम को बनाए रखने के लिए मोदी जी से चाहे जो बन पड़ता  करते हैं । क्योंकि उन्हीं के चलते अमेरिका में या अन्य दूसरे देशों में उनकी जयजयकार होती है।  इस जय जयकार से भारत में बसे भारतीयों को  गर्व का अनुभव होता है और यही भारतीय उनके असली मतदाता है और यह गर्व चुनाव आने पर वोट में बदल जाता है।

Wednesday, September 25, 2019

हाउडी मोदी : पीएम ने जो चाहा वह पाया

हाउडी मोदी : पीएम ने जो चाहा वह पाया

अमेरिका के ह्यूस्टन शहर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उसमें शामिल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हो इतनी शोहरत मिली कि उसके आगे दुनिया के सभी राजनेता  फीके पड़ गए हैं। इमरान खान तो बेभाव के हो गए। उन्हें कई मौके पर कश्मीर को लेकर ट्रंप की मीठी झिड़की भी सुननी पड़ी।  पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की है संयुक्त उपस्थिति एक तरह से भारत अमेरिका संबंधों  की सशक्त अभिव्यक्ति थी और लोगों तक यह संदेश गया कि दोनों  देशों के संबंध काफी मजबूत हैं और आने वाले दिनों में और भी मजबूत होंगे। ट्रंप और मोदी की एक साथ मौजूदगी ने यह भी संकेत दिया कि कश्मीर के बारे में भारत के निर्णय से अमरीका  को मतभेद नहीं है । यही नहीं उस दिन से आज तक आतंकवाद पर जो बात हुई उससे साफ जाहिर होता है कि दोनों देश के मध्य आतंकवाद एक ऐसा धागा है जो दोनों को उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए जोड़ता है। ट्रंप ने अपने भाषण में कहा कि "आपने कभी भी राष्ट्रपति के रूप में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बढ़िया मित्र नहीं देखा होगा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस हकीकत को जानते हैं।" इसके बाद बड़े सोचे समझे गए जुमले के रूप में ट्रंप ने " रेडिकल इस्लामी आतंकवाद " शब्द का प्रयोग किया और साफ कहा कि वे भारत को रेडिकल इस्लामी आतंकवाद से बचाने के लिए सब कुछ करेंगे। जबकि इस बात से बिल्कुल साफ संदेश जाता है कि भारत हमला करे। उधर नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में पाकिस्तान की तरफ इशारा करते हुए 9/11  और 26/11 की बात कही और कहा वह अब इसके खिलाफ भारत की सुरक्षा करेंगे इससे साफ संकेत जाता है कि वे अब निशाने पर वार करेंगे।
         हाउडी मोदी चीन और पाकिस्तान के लिए भी एक इशारा था। ट्रंप और मोदी हाथों में हाथ डाल घूम रहे हैं ,प्रशंसा बटोर रहे हैं। यह खुद एक कहानी कहता है । इस तरह के  तमाशें का आयोजन  में मोदी के लोगों खास करके राजनीतिक प्रबंधकों को महारत  हासिल है। लेकिन इस बार मोदी जी कई कदम आगे चले गए और अमेरिकी सियासत को अपना बनाकर उन्होंने भारतीयों की भावनाओं का उपयोग किया। जब के वहां 2020 में चुनाव होने वाले हैं। अब अमेरिका में रह रहे भारतीय एवं जो डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक हैं वे अब कितना रिपब्लिकंस की तरफ जाएंगे यह तो समय बताएगा लेकिन यह साफ दिख रहा है अमेरिका भारतीय समुदाय बदल रहा है। ट्रम्प ने अमेरिका के 44 लाख भारतीयों को एक मॉडल बनाया है। एक ऐसा मॉडल जो अमरीकी अर्थव्यवस्था वृद्धि सहयोग करता है। भारत अमेरिका संबंध अभी तक कभी भी इतने घुले मिले नही थे। ट्रम्प ने 2016 में कहा था "अबकी बार मोदी सरकार।" मोदी जी ने 2020 के चुनाव के लिए यही नारा दिया अबकी बार ट्रैम्प सरकार।" सवाल  यह नहीं है कि कश्मीर में जो मोदी सरकार ने किया उसे देखकर अमेरिकी डेमोक्रेट्स को कोई दिक्कत आ रही है। कुछ लोगों ने हिंदू अमेरिकी फाउंडेशन के आक्रामक कार्यों का भी जिक्र किया है । इसमें भारतीय मूल के एक अमेरिकी कांग्रेस सदस्य आर ओ खन्ना का भी जिक्र आया है ।जिसमें उन्हें 230 भारत अमेरिकी संगठनों ने दबाव दिया है कि वह पाकिस्तानी गुट को छोड़ दें। मोदी और ट्रंप आने वाले दिनों में कुछ ठोस विकास को स्वरूप देंगे। यह विकास चाहे सुरक्षा हो या  आतंकवाद विरोधी सहयोग हो और इसे भारत अमेरिकी समुदाय देखेगा तथा इसका असर पड़ेगा।
     

Monday, September 23, 2019

आतंकवाद समर्थक पाकिस्तान पर एक और प्रहार

आतंकवाद समर्थक पाकिस्तान पर एक और प्रहार

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमरीका की धरती पर रविवार को भारतीय संदर्भ में एक नया इतिहास रच दिया। ह्यूस्टन शहर के एनआरजी स्टेडियम मैं रविवार  रात  9.40 बजे जैसे ही मोदी और ट्रंप मंच पर पहुंचे वहां उपस्थित लोगों ने मोदी- मोदी के नारे लगाए। हाउडी मोदी कार्यक्रम में उपस्थित जन समुदाय  और उसके सामूहिक रिस्पांस ने अपने आपमें एक कहानी गढ़ दी। कार्यक्रम की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "हाउडी माय फ्रेंड्स।  यह  जो  माहौल है  उसकी कल्पना नहीं की जा सकती।  आज हम  नए इतिहास के साथ  नई केमिस्ट्री देख रहे हैं । यह  भारत और अमरीका  की बढ़ती सिनर्जी का सबूत है। उन्होंने कहा कि वह अपने इस कार्यक्रम का नाम  हाउडी मोदी है लेकिन मोदी अकेले कुछ नहीं है। मैं 130 करोड़ भारतीयों के हुक्म का पालन करता हूं। जब भीड़ ने कहा हाउडी मोदी उनका का जवाब था, भारत में सब अच्छा है। नरेंद्र मोदी ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। पूरी दुनिया ट्रंप के हर शब्द को फॉलो करती है। उन्होंने कहा कि मुझे उनमें  हमेशा अपनापन दिखता है। इसके साथ ही, उन्होंने एक नया स्लोगन दिया, "अबकी बार ,ट्रंप सरकार।" ट्रंप ने नरेंद्र मोदी को जन्मदिन की बधाई दी और कहा कि हम यहां साझा सपना और बेहतर भविष्य का उत्सव मनाने आए हैं। उन्होंने अमरीका में भारतीय का भी शुक्रिया अदा किया और कहा कि उन्होंने अमरीका के लिए बहुत कुछ किया है । डोनाल्ड ट्रंप ने कहा ट्रंप से अच्छा राष्ट्रपति कोई नहीं हुआ और भारत के लिए मोदी से अच्छा प्रधानमंत्री कोई नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि भारत और अमरीका लालफीताशाही खत्म कर रहे है। ट्रंप ने कहा कि ,मेरे शासनकाल में 60 लाख नई नौकरियों का सृजन हुआ है और 51 वर्षों में अमरीका में बेरोजगारी सबसे निचले स्तर पर आ गयी है। ट्रंप ने कहा सीमा सुरक्षा के लिए दोनों देश साथ-साथ  काम करेंगे। अमरीका और भारत में नई रक्षा साझेदारी होगी । उन्होंने कहा ,इस्लामिक आतंकवाद से हम एकजुट होकर लड़ेंगे।
नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान पर निशाना साधा और कहा कि अशांति के माहौल को चाहने  वाली ताकतें आतंकवाद को पालती हैं। उनका नाम लेने की जरूरत नहीं है। दुनिया उन्हें जानती है। मोदी ने पाकिस्तान का नाम लिए बिना कहा है कि आज आतंकवाद के खिलाफ एक निर्णायक जंग की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अमरीका में 11 सितंबर और मुंबई में 26 नवंबर का भूगोल चाहे जो हो लेकिन दोनों में समानता काफी है।  उसके साजिश करने वाले लोग कहां हैं यह सारी दुनिया जानती है। मोदी ने कहा भारत समस्याओं के पूर्ण समाधान की ओर कदम उठा चुका है। नरेंद्र मोदी ने कहा आज बहुत कुछ बदल रहा है ।  ग्रोथ का दौर आया है और भारत में बहुत कुछ हो रहा है। हमने नई चुनौतियां तय करने और उन चुनौतियों को पूरा करने की ज़िद पकड़ ली है। उन्होंने कहा कि हम  विकास की कोशिश में है और इसके लिए नागरिकों के पक्ष में कल्याणकारी योजनाओं की बहुत जरूरत है। उन्होंने धारा 370 को हटाए जाने की वकालत करते हैं कहा कि वेलफेयर के लिए बहुत कुछ को फेयरवेल देना पड़ता है । हमने कश्मीर में धारा 370 को फेयरवेल दे दिया यही नहीं हमने कई टैक्सेज को भी वेलफेयर दे दिया और और उसकी जगह जीएसटी ला दिया।
         अमरीका में जो कुछ भी हुआ उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत अमरीका के संबंध सामरिक स्तर पर पहुंच चुके हैं। यह संबंधों की प्रगाढ़ता ही है कि 2016 में चुनाव से पूर्व अमरीका के राष्ट्रपति ने अपने देश में कहा था भारत का चुनाव परिणाम चाहे जो हो लेकिन अमरीका के साथ संबंध हो पर उसका कोई असर नहीं पड़ेगा। अमरीका इन संबंधों को चलाए रखने के लिए सक्षम है। हाउडी मोदी कार्यक्रम में ट्रंप की मौजूदगी यकीनन भारत अमरीका की प्रगाढ़ मैत्री का सबूत है और इससे दुनिया को एक संदेश जाएगा ही। चंद मुद्दों पर मतभेद के बावजूद भारत अमरीका अपने सामरिक साझेदारी लेकर एकजुट हैं।

Sunday, September 22, 2019

जादवपुर विश्वविद्यालय : वर्चस्व की लड़ाई का अखाड़ा

जादवपुर विश्वविद्यालय : वर्चस्व की लड़ाई का अखाड़ा

विख्यात दार्शनिक बट्रेंड रसल ने लिखा है कि "किसी भी आदमी या फिर किसी भी भीड़ पर तब तक विश्वास किया जा सकता जा सकता कि वह माननीय ढंग से काम करेगा जब तक  उसके भीतर भय ना हो।"
         रसल की इस उक्ति के संदर्भ में अगर जादवपुर विश्वविद्यालय की घटना को देखें तो बात बिल्कुल सही लगती है। मामला यह था कि  केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एक मीटिंग में शामिल होने के लिए जादवपुर विश्वविद्यालय पहुंचे। उनके साथ हथियारबंद अंगरक्षक भी थे और घंटे भर के बाद नतीजा सामने आया टूटे हुए शीशे बहते हुए खून के रूप में।  हालत यहां तक बिगड़ गई थी कि राज्यपाल को जाकर बाबुल सुप्रियो को छुड़ाना पड़ा। राज्यपाल श्री जगदीश धनखड़ ने बंगाल के इतिहास की गौरव गाथा का जिक्र करते हुए कहा कि वे यहां के सभी विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी हैं और हुए शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देंगे। दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्रियों ने   अलग प्रतिक्रिया व्यक्त की है। एक तरफ जहां राज्य के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी इस घटना में घायल विश्वविद्यालय के कुलपति सुरंजन दास और प्रति कुलपति प्रदीप घोष का हाल चाल पूछने अस्पताल पहुंचे वहीं राज्य के पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी ने कुलपति की आलोचना करते हुए कहा वे पुलिस बुला सकते थे। राज्यपाल महोदय वे जादवपुर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति भी हैं और खुद जाने के बजाय वहां पुलिस भी भेज सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
        इस घटना के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कुछ छात्रों ने वामपंथी  छात्र  संगठन  के लोग विश्व विद्यालय परिसर में  आये और  तोड़फोड़ तथा गुंडागर्दी आरंभ कर दी।  जिससे कई छात्र घायल हो गए। कला संघ कक्ष में जमकर मारपीट हुई और कई छात्र घायल हो गए। जादवपुर विश्वविद्यालय में जो कुछ भी हुआ वह कोई नई घटना नहीं है। तृणमूल कांग्रेस वामपंथी दलों के बीच संघर्ष का लंबा इतिहास है। लोक सभा चुनाव प्रचार के दौरान विद्यासागर कॉलेज  के बाहर अमित शाह की रैली पर तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों ने हमला किया और विद्यासागर की मूर्ति तोड़ दी। 1980 में अलीमुद्दीन स्ट्रीट का लाल हथोड़ा कलकत्ता विश्वविद्यालय पर भी पड़ा था। प्रोफेसर संतोष भट्टाचार्य अपनी किताब " रेड हैमर ओवर कलकत्ता यूनिवर्सिटी" में  वहां के  अपने कार्यकाल का उल्लेख किया है और बताया है कि कैसे लगातार घेराव और मारपीट हुआ करती थी। यही रहस्यमय लाल हथोड़ा जादवपुर विश्वविद्यालय पर भी गिरा है । वाम पंथी दल राज्य में राजनीति को कब्जा करना चाहते हैं और तृणमूल छात्र परिषद ने ऐसा नहीं होने दिया। एक-एक करके सारे विश्वविद्यालय वामपंथियों के हाथ से निकल गए। परंतु जादवपुर विश्वविद्यालय पर तृणमूल छात्र कांग्रेस अपना झंडा नहीं लहरा सका। जो काम तृणमूल छात्र संघ नहीं कर सकता वही अब भाजपा छात्र संगठन करना चाहता है। विगत 5 वर्षों में जादवपुर विश्वविद्यालय में कई बार हिंसक घटनाएं हुईं। 2016 में इसी तरह की घटना घटी थी जब बाहर के कुछ लोग विश्वविद्यालय में “बुद्ध इन  ट्रैफिक जाम" नाम की एक फिल्म दिखाना चाहते थे। शुक्रवार की घटना के बाद 4 प्राथमिकी दर्ज हुई और कोलकाता पुलिस द्वारा स्वप्रेरण मुकदमा भी आरंभ कर दिया गया। घटना के बाद जादवपुर विश्वविद्यालय टीचर्स यूनियन के अध्यक्ष प्रोफेसर पार्थ प्रतिम विश्वास ने लिखा कि जिस कार्यक्रम में बाबुल सुप्रियो को आमंत्रित किया गया था उस में छात्रों की संख्या बहुत कम थी तो फिर यह घटना क्यों घटी समझ में नहीं आता।  क्यों नहीं सत्तारूढ़ दल के मंत्री सामने आकर इस घटना की निंदा कर रहे हैं। छात्र संघ के सदस्य सत्तारूढ़ संगठन के विरुद्ध रहे हैं। बार-बार तृणमूल छात्र संघ इस पर कब्जा करना चाहता था और अब भाजपा ने शुरू किया है । इस बीच राजनीतिक दलों में आरोप-प्रत्यारोप का खेल शुरू हो गया है राज्यपाल धनखड़ जादवपुर विश्वविद्यालय जाने के पहले मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक से बात कर चुके थे। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के बाद कोलकाता ऐसा वामपंथी गढ़ बन गया है जिस पर सभी कब्जा करना चाहते हैं । यह पूरी घटना कब की लड़ाई की घटना है और एक दूसरे में भय पैदा करने की कोशिश है, ताकि उन्हें अपने अनुरूप इस्तेमाल किया जा सके। विधानसभा चुनाव धीरे-धीरे करीब आ रहे हैं और ऐसे में यह सब लगातार होता रहेगा।

Friday, September 20, 2019

यह क्या हो रहा है सरस्वती के मंदिर में

यह क्या हो रहा है सरस्वती के मंदिर में?

जादवपुर विश्वविद्यालय में गुरुवार को केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो के साथ कुछ छात्रों की हाथापाई हो गई। बाबुल सुप्रियो वहां अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की विचार गोष्ठी को संबोधित करने के लिए गए हुए थे। हमलावर छात्रों ने आरोप लगाया ,बाबुल सुप्रियो ने कुछ छात्रों को अपमानित किया है, महिला सहपाठियों अपशब्द कहे हैं और उन्हें धमकी दी हैं। बाबुल सुप्रियो के साथ हुई घटना के बाद राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से बात की और तब मुख्य सचिव मलय कुमार डे से,  और उसके बाद विश्वविद्यालय रवाना हो गए। तृणमूल कांग्रेस ने हालांकि राज्यपाल की इस बात की आलोचना की है। यह बड़ा दुर्भाग्य जनक है कि भाजपा नेता को बचाने के लिए उन्हें जाना पड़ा। इस मामले को लेकर जितने मुंह उतनी बातें हो रहे हैं । गवर्नर ने  कहा बाबुल सुप्रियो  गुरुवार को लगभग 2.30 बजे  जादवपुर विश्वविद्यालय में गए। वहां उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा आयोजित एक विचार गोष्ठी को संबोधित करना था। लेकिन, वहां  विरोधियों ने उनका घेराव कर लिया। घेराव करने वाले  वामपंथी छात्र संगठन के छात्र थे। वे काले झंडे लिए हुए थे और "वापस जाओ - वापस जाओ " के नारे लगा रहे थे। सुप्रियो ने लौटने से इंकार कर दिया और छात्रों से बहस करने लगे। विश्वविद्यालय के कुलपति सुरंजन दास ने बीच-बचाव की कोशिश की और सुप्रिया से कहा वह विचार गोष्ठी के प्रेक्षागृह में चले जाएं।  लेकिन, ऐसा नहीं होने दिया गया। सुप्रियो को घंटे भर तक रोका गया। जब सुप्रियो प्रेक्षागृह में प्रवेश कर गये तब भी बाहर विरोधी नारे लगते रहे। इसके बाद छात्रों में 5 घंटे तक घेराव किया और उन्हें विश्वविद्यालय परिसर से बाहर जाने से रोके रखा। इसपर कुछ छात्रों का कहना है कि सुप्रियो ने  हाथ से बहुत ही खराब इशारे किए। अब हम उन्हें तब तक नहीं जाने देंगे जब तक वो माफ़ी ना मांगे। कुलपति सुरंजंदास ने सुप्रियो से कहा वे प्रेक्षा गृह में जाएं इस पर भाजपा नेता ने कहा कि "अगवानी के समय वह वहां क्यों नहीं थे? एक राजनीतिज्ञ होने के अलावा उनकी एक अलग पहचान भी है। वह एक निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, एक मंत्री हैं।  कुलपति उनकी अगवानी के लिए क्यों नहीं उपस्थित थे।" सुरंजन दास ने कहा उनको आमंत्रित नहीं किया गया था। इस पर मंत्री ने कहा "मैं तो आपके यहां आमंत्रित था। आपको  आना चाहिए था। मुझे पूरा भरोसा है कि आप वामपंथी हैं।  एक केंद्रीय मंत्री आपके परिसर में आ रहा है और आप चाहते हैं यह सब हो।" सुप्रियो ने कुलपति से कहा कि वह पुलिस बुला लें। किंतु कुलपति ने ऐसा नहीं किया। धक्का मुक्की के बाद बाबुल सुप्रीयो कथित रूप से बीमार पड़ गए। उन्हें समीप के अस्पताल में दाखिल कराया गया। सुप्रियो का आरोप है कि "उन पर हमले हुए ,उनका केश  पकड़कर खींचा गया, लात - घूसों से मारा गया। यह जादवपुर विश्वविद्यालय छात्रों से उम्मीद नहीं की जाती थी। अगर उन्हें मेरे आने से कोई समस्या से तो हमसे बात कर सकते थे।" उन्होंने कहा कि "पश्चिम बंगाल में शिक्षा की यही हालत है। उन्होंने मुझे मारा मैं क्यों माफी मांगू। कुछ गुंडे गड़बड़ी पैदा कर रहे हैं उन्हें निकाला जाना चाहिए।"
          अब यहां एक बात आती है कि राज्यपाल को  हस्तक्षेप की क्या जरूरत थी? क्योंकि घेराव दोपहर में भी चलता रहा और राज्यपाल ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पहले फोन किया और उसके बाद मुख्य सचिव इसके बाद वे लगभग 7.00 बजे विश्वविद्यालय परिसर पहुंचे। उन्होंने अपनी गाड़ी में सुप्रियो को बिठाया। लेकिन , छात्रों ने उनका रास्ता रोक दिया। यही घंटे भर तक चलता रहा और राज्यपाल धनखड़ तथा सुप्रियो गाड़ी के भीतर बैठे रहे । लगभग 8.00 बजे जब एक पुलिस टुकड़ी आई और दोनों को दूसरे गेट से बाहर निकाला गया।
राजभवन से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में राज्यपाल ने इसे बहुत गंभीर घटना बताया है।  कहा है कि " एक मंत्री को रोके रखा गया यह राज्य में कानून और व्यवस्था तथा  कानून लागू करने वाली  एजेंसी  के आचरण की स्थिति का प्रतिबिंब है।" इस घटना को लेकर भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने अलग-अलग प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भाजपा के राज्य अध्यक्ष दिलीप घोष ने इसकी तीव्र निंदा की है और कहा है कि बंगाल में  केंद्रीय मंत्री भी सुरक्षित नहीं हैं वरना राज्यपाल को हस्तक्षेप नहीं करना पड़ता। दूसरी तरफ तृणमूल के वरिष्ठ नेता तापस राय ने कहा कि हम ऐसी लोकतांत्रिक पद्धति का समर्थन नहीं करते। तृणमूल  नेता पार्थ चटर्जी ने  यद्यपि राज्यपाल की भी आलोचना की और कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण और दहला देने वाली घटना है। हमारे संविधान के पालक को भाजपा नेता बाबुल सुप्रियो को बचाने के लिए जाना पड़ा।
       जो कुछ भी हुआ और उसका चाहे जो भी कारण हो लेकिन हिंसा की राजनीति कम से कम लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है  और वह भी शिक्षा के केंद्र में । राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता बिल्कुल आम बात है लेकिन एक मंत्री के साथ वह भी शिक्षा संस्थान में मारपीट किया जाना सर्वथा अनुचित है। क्योंकि इससे लोकतंत्र की गरिमा और शिक्षा शालीनता दोनों नष्ट होती है। शिक्षा और लोकतंत्र दोनों हमें शालीन, गरिमा पूर्ण और धैर्यवान बनने की सीख देते हैं। हमारे समाज में  शिक्षा  संस्थान  सरस्वती का मंदिर माना जाता है। हमारे यहां एक बहुत पुरानी कहावत है "विद्या ददाति विनयम।" किंतु  यहां न शालीनता दिख रही है न विनय ना ही धैर्य। यह कैसी शिक्षा पा रहे हैं हमारे छात्र। अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी पर शारीरिक हमला कर गुस्से का इजहार अत्यंत गलत और निंदनीय है।

अब फिर राम जन्मभूमि !

अब फिर राम जन्मभूमि !

अब एक बार फिर अयोध्या विवाद पर बात चली है कई दिनों से इस पर मध्यस्थता की चर्चा चल रही थी। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने अस्वाभाविक तत्परता दिखाते हुए इस मामले को एक महीने के भीतर खत्म कर देने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद भूमि विवाद के जल्दी हल हो जाने की उम्मीद बढ़ गई है। 130 साल पुराने इस मामले में लगता है अब कुछ न कुछ फैसला होकर रहेगा। न्यायालय ने इस पर बुधवार को भी वही करने का प्रस्ताव रखा है।  साथ ही यह भी कहा है कि संबंधित पक्षकार यदि चाहें तो मध्यस्थता के माध्यम से इस विवाद का सर्वमान्य समाधान निकाल सकते हैं। इसके लिए वे स्वतंत्र हैं। अगर यह मामला सुनवाई के स्तर पर 18 अक्टूबर पर खत्म हो गया तो न्यायाधीशों को फैसला लिखने में  लगभग 1 महीना लगता है। और प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई 17 नवंबर को रिटायर कर रहे हैं यानी 18 अक्टूबर तक  सुनवाई पूरी हो जाती है तो उम्मीद है कि 17 नवंबर से पहले इस पर फैसला आ सकता है।
         कानून भी अपने आप में एक अजीब बात है। अचानक यह ऐसा रूप बदल देता है जिससे शक्तिशाली लोग  पसंद नहीं करते। क्योंकि इसके नतीजे वैसे नहीं होते जैसा वे चाहते हैं या कभी सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठ न्यायाधीश समझ नहीं पाते इसका परिणाम क्या होगा? या, उसे नियंत्रित नहीं कर पाते। लेकिन फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठ न्यायाधीशों ने एक साथ मिलकर कुछ ऐसा किया है की उनकी राह में कोई अवरोध ना सके और यह विवादास्पद मामला जल्दी हल हो जाए। लेकिन अब तक जैसा देखा गया है कि यह फैसला या फिर मध्यस्था की अंतिम बातचीत भी इस मामले को नहीं सुलझा सकती। इस फैसले में जो सबसे प्रमुख तथ्य है वह है कि न्यायाधीशों को ऐसी कोई जगह नहीं छोड़नी चाहिए जहां खड़े होकर राजनीतिक दल राजनीति का खेल खेल सकें। यह विवाद बहुत दिनों से चल रहा है लेकिन इसमें जो सबसे महत्वपूर्ण है वह है कि इसमें न जाने कितने लोगों की जानें गईं हैं और न जाने कितने लोगों का राजनीतिक भविष्य चौपट हो गया है। कोर्ट को यह  ध्यान रखना चाहिए फिर ऐसा ना हो।
            सोमवार को अयोध्या मध्यस्थता समिति ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हिंदू और मुसलमान दोनों इस मसले पर बातचीत करना चाहते हैं ताकि इसका सर्वमान्य हल खोजा जा सके। लेकिन सुप्रीम कोर्ट यह जानता है कि इस मामले में जो विवाद है और उसके साथ जो लोग हैं वह पहले भी ऐसे ही मध्यस्था के लिए बैठे थे लेकिन कुछ परिणाम  हासिल नहीं हो सका। अब फिर सुप्रीम कोर्ट को इस चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। बहुतों का मानना है कि यह 2. 77 एकड़ जमीन पर विवाद का सिविल मामला है। लेकिन इसका जो मुख्य मुद्दा है वह धर्म है और यही धर्म दोनों तरफ के लोगों पर दबाव डालता रहता है। अब तो इसमें धर्म के साथ-साथ राजनीति भी घुल मिल गई है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में मध्यस्थता के लिए इंतजार नहीं करना चाहिए। मध्यस्थता समिति ने आवेदन किया है कि इस मामले की सुनवाई चूंकि संविधान पीठ कर रही है इसलिए समानांतर में  मध्यस्थता भी चल सकती है। लेकिन यदि ऐसा होता है तो यह सही नहीं होगा। वास्तविकता से अलग ऐसा भी लगता है कि मध्यस्था से कोई बात नहीं बनेगी। उल्टे सुप्रीम कोर्ट की आलोचना शुरू हो जाएगी। फिर कोई नई बात पैदा होगी तथा मामला लंबा खिंच जाएगा।
             अनाधिकृत रूप से या कहिए गैर सरकारी तौर पर इस मामले को बातचीत के जरिए सुलझाने और सर्वमान्य हल खोजने के के कई बार प्रयास हुए। पहली बार 2017 में भारत के प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर ने इस मामले को धर्म का मामला बताकर दोनों पक्षों के बातचीत करने का विचार प्रस्तुत किया था। लेकिन दोनों पक्षों में इसके प्रति कोई दिलचस्पी नहीं थी और इसलिए मामला शुरू ही नहीं हुआ। इस वर्ष मार्च में कोर्ट ने फिर मध्यस्थता का प्रस्ताव रखा था और 8 हफ्ते का समय दिया था। लेकिन ,कुछ नहीं हो सका तथा प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने स्पष्ट संकेत दिए कि मध्यस्थता के प्रयास निष्फल हो गए।
            अब सवाल उठता है कि क्या मध्यस्थता कामयाब होगी? शायद नहीं। दोनों पक्षों के बीच मोर्चे खुल गए हैं और कोई भी पीछे लौटने को तैयार नहीं है। यदि इस मामले मदरसा से कोई हग निकल दी जाए दो इससे से जुड़े हिंदू पक्ष कुछ ले देकर फैसले को मानने को तैयार भी हो जाते हैं तो क्या भाजपा या संघ इसके लिए तैयार होगी? क्योंकि उन्होने इसी भावुकता पूर्ण मसले पर अपनी राजनीति की बुनियाद रखी है। उसी तरह ऐसा नहीं लगता कि मुसलमान भी मध्यस्थता के फैसले को  मानेंगे और परिणाम स्वरूप दोनों तरफ से दावे और प्रति दावे प्रस्तुत हो जाएंगे। पी वी नरसिंह राव तथा अटल बिहारी वाजपेई जैसे नेताओं ने मध्यस्थता की कोशिश की। लेकिन बुरी तरह पराजित हो गए। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस रास्ते को अपनाया लेकिन कोई नतीजा नहीं मिला। इसे सुलझाने का एकमात्र तरीका कानून है।  सुप्रीम कोर्ट को इस रास्ते को छोड़कर दूसरी राह नहीं अपनानी चाहिए। इस मामले में फैसला क्या होगा यह तो अभी से कहना मुश्किल है।  यह है फैसला चाहे जो जिसके भी पक्ष में हो इस पर एक बार फिर राजनीति शुरू होगी और जो शुरू होगा वह किस करवट बैठेगा यह भी जानना बड़ा कठिन है।
           

Wednesday, September 18, 2019

अबकी बार पीओके

अबकी बार पीओके

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार को कहा कि अब बारी पीओके की है। हाल के वर्षों में पहली बार पीओके को दखल करने की बात सामने आई है और यह बात जम्मू कश्मीर पर 1994 के संकल्प के कि आगे तक जाती है। पाक अधिकृत कश्मीर पर दिल्ली के बदले रुख का संकेत देते हुए विदेश मंत्री ने कहा, भारत पीओके पर एक दिन कब्जा करने की उम्मीद करता है। जयशंकर  राजनयिक रह चुके हैं और अपनी बातों को बहुत  सोच समझकर कहने के लिए विख्यात हैं। हाल के वर्षों में यह पहला वाकया है कि किसी विदेश मंत्री ने पीओके पर कब्जे की बात कही है। मोदी सरकार के एक सौ दिनों के संबंध में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जयशंकर ने एक प्रश्न के जवाब में कहा कि "अब आगे बात केवल पीओके पर होगी कश्मीर पर नहीं। हमारी स्थिति बिल्कुल साफ है कि पीओके भारत का हिस्सा है और हम चाहते हैं कि एक दिन इस पर कब्जा कर लें। उनके इस बयान के पहले सुरक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि  "बात पीओके पर होगी ना कि जम्मू और कश्मीर पर" । हरियाणा में एक रैली में राजनाथ सिंह ने यह बात उठाई थी। आतंकवाद के खिलाफ काम नहीं करने पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की आलोचना करते हुए जयशंकर ने दुनिया का ध्यान पाकिस्तान की ओर आकर्षित करने की कोशिश की। खास करके यह बात कह कर अब पीओके पर कब्जे की बात होगी।
           गृह मंत्री अमित शाह ने गत 6 अगस्त को लोकसभा में कहा कि जब मैं सदन में जम्मू कश्मीर की चर्चा करूंगा तो इसका अर्थ है इसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और अक्साई चीन भी शामिल हैं। 22 फरवरी 1994 को संसद के एक संकल्प में कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का एक अविभाज्य अंग रहा है और रहेगा तथा इसे अलग करने के किसी भी प्रयास का सभी आवश्यक उपायों से विरोध होगा। भारत  अपनी एकता और अखंडता को बनाए रखना की क्षमता रखता है। संकल्प में मांग की गई है की पाकिस्तान जम्मू कश्मीर के उन इलाकों  को खाली कर दें जिसे उसने कब्जा कर रखा है जयशंकर के बयान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के लिए मंच तैयार कर दिया है। समझा जाता है कि इस यात्रा के दौरान जम्मू-कश्मीर का मामला बहुत ज्यादा उठेगा भारत में पाकिस्तान की युद्ध की इच्छा का मुकाबला करने के लिए स्पष्ट आक्रामक कूटनीतिक रणनीति की घोषणा कर दी है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान में एक बयान में कहा था कि भारत से बात करने का कोई अर्थ नहीं है। जयशंकर ने कहा कि वह समझते हैं कि एक वास्तविक समस्या का उत्तर मीठे बोल नहीं हैं। मूल समस्या तो आतंकवाद को खत्म करना है। जिसे उन्होंने तैयार किया है। मुझे दुनिया में कोई एक देश दिखा दीजिए जो यह मंजूर कर ले कि उनका पड़ोसी आतंकवाद को बढ़ावा दे सकता है और वह अपने पड़ोसी से बात करने के लिए तैयार है । हमारा मानना है कि यह बिल्कुल सामान्य है और तर्कसंगत ही है कि इन लोगों का आचरण कई गलतियों से पूर्ण है और उनमें असामान्यता भी है।  विदेश मंत्री ने कहा कि धारा 370 हमारा आंतरिक मामला था। वास्तविक समस्या तो पाक समर्थित आतंकवाद है। मुझे दुनिया में कोई भी एक देश दिखा दीजिए जो अपनी विदेश नीति के हिस्से के रूप में खुल्लम खुल्ला आतंकवाद का इस्तेमाल करता है। जयशंकर ने कहा कि धारा 370 एक अस्थाई व्यवस्था थी जिसका उपयोग घटनाओं के विश्लेषण में भी नहीं होता था और यह प्रावधान वस्तुतः किसी काम का नहीं रह गया था।  संकीर्ण विचार के कुछ लोग इसका उपयोग करते थे और वह भी अपने लाभ के लिए ऐसा करते हुए पूरे क्षेत्र के विकास को बाधित करते थे और  अलगाववाद की भावना भरते थे । उस अलगाववाद का उपयोग सीमा के उस पार से पाकिस्तान किया करता था। उन्होंने कहा कि दुनिया भर के लोग धारा 370 हटाए जाने के मतलब को समझते हैं। अब  इसमें कोई बदलाव नहीं आएगा। लोग कश्मीर पर बहुत कुछ कहते हैं लेकिन इस पर सोचने की जरूरत नहीं है। अंततोगत्वा यह हमारा मसला है और उस पर चमड़ी ही बात चलेगी कश्मीर पर एक अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य की बात का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा हम उनसे पूछते हैं उन्होंने आतंकवाद का मुकाबला किया है। अब आपका क्या उत्तर था। कैसे मुकाबला किया था। वैसी स्थिति में आप क्या करेंगे जब आपके देश का कानून देशभर में अमल में नहीं लाया जा सके। प्रधानमंत्री मोदी का हवाला देते हुए जयशंकर ने कहा कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के रूप में मशहूर हो चुका है जबकि भारत अपनी सूचना तकनीक के कारण मशहूर है ।
        एस जयशंकर की बात से  पाकिस्तान की  हवा बिगड़ गई  और उसने  कुछ ही घंटों के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष घिघियाते   हुए कहा कि नई दिल्ली की बात पर जरा गौर करें। वह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को जबरन दखल करना चाहता है, तो फिर तनाव बढ़ेगा और क्षेत्र की शांति भंग होगी।
      पाकिस्तान चाहे जितना गिड़गिड़ा ले, चाहे जितनी आंखें दिखा ले लेकिन यह सही है कि पीओके पर उसने जबरदस्ती कब्जा किया हुआ है और आज नहीं तो कल उसे पी ओ के  खाली करना ही पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय दबाव के समक्ष भारत झुकने वाला नहीं है और ना ही ऐसी किसी गीदड़ भभकी से डरेगा ।

Monday, September 16, 2019

नौकरी की नहीं काबिल लोगों की कमी है

नौकरी की  नहीं काबिल लोगों की कमी है

केंद्रीय श्रम एवं रोजगार  राज्य मंत्री श्री संतोष गंगवार ने  कहा कि हमारे देश में नौकरियों की कमी नहीं है ,कमी है उत्तर भारत में योग्य उम्मीदवारों की। उन्होंने कहा कि उत्तर भारत से जो लोग रोजगार के लिए आते हैं उनके बारे में अक्सर शिकायत रहती है कि वे उस पद के लिए योग्य नहीं है जिसके लिए उन्हें बुलाया गया है । उन्होंने कहा कि ,मैं वही मंत्रालय देख रहा हूं और रोज प्राप्त आंकड़ों के आधार पर ऐसा कह रहा हूं। उनका यह बयान एक ऐसे वक्त में आया है जब अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है और रोजगार का अभाव होता जा रहा है। अर्थशास्त्री एवं राजनीतिज्ञ इसके लिए केंद्र सरकार की ओर उंगली उठा रहे हैं। सांख्यिकी  और  कार्यक्रम  क्रियान्वयन  मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार अर्थव्यवस्था में यह मंदी उत्पादन और कृषि क्षेत्रों में कम उत्पादन के कारण हो रही है। गंगवार का यह बयान नेशनल सैंपल सर्वे के बयान से ठीक विपरीत है। नेशनल सैंपल सर्वे के बयान में कहा गया था कि  देश में बेरोजगारी की दर विगत 45 वर्षों में सबसे निचले स्तर पर है । 2019 के चुनाव के पूर्व यह रिपोर्ट लीक हो गई थी, तब सरकार ने इसे खारिज कर दिया था। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दूसरी कैबिनेट के शपथ लेने के दूसरे दिन ही सरकार ने जो आंकड़े जारी किए उसमें बताया गया था कि बीते 4 दशकों में बेरोजगारी की दर सबसे खराब है। देश में रोजगार का संकट बढ़ा है। आर्थिक विकास की दर 5% पर आने से वाहन क्षेत्र ,कपड़ा क्षेत्र, चाय उद्योग इत्यादि क्षेत्रों में लगातार छटनी की खबर मिल रही है। ऐसे में केंद्रीय मंत्री गंगवार की बात काफी प्रतिक्रियाओं को आमंत्रित कर रही है। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने सोशल मीडिया पर सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि" 5 साल से ज्यादा आपकी सरकार है। नौकरियां पैदा हुई नहीं और जो नौकरियां थी वह आर्थिक मंदी के चलते खत्म हो गईं। " प्रियंका गांधी ने ट्वीट में यह भी लिखा कि "आप उत्तर भारतीयों का अपमान करके बच निकलना चाहते हैं लेकिन यह नहीं चलेगा।"
        संतोष गंगवार ने शनिवार को यह बयान दिया था और रविवार दोपहर आते-आते उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि जो बयान उन्होंने दिया था उसका संदर्भ दूसरा था। उन्होंने माना कि कौशल में कमी है और सरकार ने कौशल विकास इसीलिए शुरू किया है ताकि बच्चों को अनुरूप ट्रेनिंग दी जा सके। कुछ दिन पहले एक रिपोर्ट में बताया गया था कि हमारे देश में नौकरियां किस तरह लगातार घट रही हैं। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट में भी यह बताया गया है कि 2016 के बाद लगातार नौकरियां कम हुई हैं। संतोष गंगवार के बयान के बाद सोशल मीडिया पर यह सवाल उठाए जा रहे हैं कि "कौशल विकास तो 2014 में आरंभ हुआ तो फिर उसका क्या हुआ, स्किल इंडिया क्या फेल कर गया?"
       दो हफ्तों में शायद यह तीसरा मौका है जब इसी केंद्रीय मंत्री ने अपने बयान से विवाद पैदा कर दिया और खुद उसमें घिर गए। गुरुवार को केंद्रीय रेल और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने 5 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था के बारे में कहा कि जो  आप टीवी पर देखते हैं  उस हिसाब किताब में मत पड़िए। "ऐसे गणित से आइंस्टीन को गुरुत्वाकर्षण की खोज में मदद नहीं मिली थी।" इसके पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ऑटो सेक्टर में मंदी का कारण नौजवानों की सोच में बदलाव को बताया। वित्त मंत्री ने कहा कि नौजवान वाहन खरीदने के बदले उबर- ओला का प्रयोग कर रहे हैं। संतोष गंगवार का यह बयान नौकरी खोजने वाले नौजवानों के जख्म पर नमक रगड़ने की तरह है। जिस मंत्रालय का काम ही नौजवानों को नौकरी दिलाना है उस मंत्रालय का ऐसा बयान देश के बेरोजगार युवकों पर क्या असर दिखाएगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन इस तरह के बयान निराशा ज्यादा उत्पन्न करते हैं और सरकार को खासकर एक कल्याणकारी सरकार को इससे बचना चाहिए।

Sunday, September 15, 2019

मोदी दो के 100 दिन में शाह सबसे ताकतवर होकर उभरे

मोदी दो के 100 दिन में शाह सबसे ताकतवर होकर उभरे

पिछले एक हफ्ते में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत- नेपाल के बीच पाइपलाइन का उद्घाटन किया , स्वदेशी करण से परहेज करने वाले अपने पूर्व प्रिंसिपल सेक्रेट्री नृपेंद्र मिश्रा को बाय-बाय कहा ,प्लास्टिक अलग करने वाली महिलाओं के साथ बैठे, मथुरा में पशु आरोग्य मेला में पशुओं में मुंह और खुर रोग "मुंह पका" बीमारी के उन्मूलन  की विशाल परियोजना  का श्री गणेश करने के पहले  गायों को चारा खिलाया। उन्होंने कहा  कि कुछ लोग ऐसे हैं जो "ओम और गाय" का नाम सुनते ही ऐसा महसूस करते हैं जैसे उनके बिजली का करंट लग गया । मोदी जी ने इतना कुछ कहा, इतना कुछ किया लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा जिससे पता चले कि उनका मंत्रिमंडल अर्थव्यवस्था को सही करने के लिए कुछ कर रहा है।  अब जबकि गाय  और पशु की उपमा सामने आई तो मोदी जी कह सकते हैं उन्होंने बिगड़ैल भारतीय अर्थव्यवस्था सिंग पकड़कर पराजित किया और तेजी की ओर रुख किया। वस्तुतः भारतीय अर्थव्यवस्था की इस खराब दशा के बारे में कभी भी मनमोहन सिंह से बात नहीं की गई। मोदी जी ने अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए मनमोहन सिंह 5 सूत्री फार्मूले को अखबारों में जरूर पढ़ा होगा लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय से किसी ने भी उन्हें फोन नहीं किया । उल्टे भारतीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारतीयों पर आरोप लगाया वे ओला -उबर में सफर करते हैं और गाड़ियां नहीं खरीद रहे हैं इसलिए ऑटोमोबाइल सेक्टर में मंदी आ गई है। यही नहीं वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने दिल्ली में व्यापारियों के बोर्ड को संबोधित करते हुए ट्वीट किया हे "गणित में गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत खोजने के लिए आइंस्टीन को कोई मदद नहीं की।" सोशल मीडिया में बात बढ़ गयी और गोयल को बाद में स्पष्टीकरण देना पड़ा कि उन्हें गलत ढंग  से उद्धृत किया गया है ।
     मोदी जी की दूसरी पारी के 100 दिन पूरे हो गए और ऊपर जो कुछ भी कहा गया यह उनके मंत्रिमंडल की प्रतिभा के उदाहरण थे। अब यहां जो सबसे गड़बड़ है वह है कि मोदी जी खुद बहुत बड़े कम्युनिकेटर हैं जबकि उनके अधिकांश मंत्री प्रेस से बात करना नहीं चाहते है । अधिकांश मंत्रियों के अपने चहेते पत्रकार हैं जिसके माध्यम से वे सकारात्मक खबरें प्रसारित करते हैं।  जब वे बोलते हैं, ऐसा ही पीयूष गोयल ने किया, तो कहा जा सकता है कि टीवी वगैरह ना देखें।
            यह भी स्पष्ट है कि विगत 100 दिनों में जो सबसे ताकतवर इंसान  उभरा है वह है गृह  मंत्री अमित शाह। उन्होंने संसद में मोर्चा संभाला। धारा 370 और 35ए को खत्म करने की घोषणा की । नागरिकता अधिनियम को पेश किया जिससे 19 लाख लोगों के नाम अगर हटा दिए जाते हैं तो सभी हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता प्राप्त हो जाएगी। पिछले हफ्ते गुवाहाटी में उत्तर पूर्वी काउंसिल के  68 वें सत्र को संबोधित करते हुए अमित शाह ने घोषणा की कि हमारी सरकार धारा 371 का सम्मान करती है इसलिए वह इसमें कोई भी बदलाव नहीं करेगी। शाह इस बात को बखूबी जानते हैं फिर अगर भाजपा को उत्तर पूर्वी क्षेत्र में सत्ता में रहना है तो वह इससे खिलवाड़ नहीं कर सकते, दूसरी तरफ मुस्लिम बहुल कश्मीर में उनका दांव इतना कमजोर है तब भी उन्होंने पीडीपी से पल्ला झाड़ लिया और तब से राष्ट्रवादी एजेंडे पर काम करना शुरू कर दिया। निश्चित रूप से  कश्मीर और यू ए पी ए विधेयक तथा तीन तलाक को आपराधिक कार्य घोषित करने के मामले में यकीनन मोदी सामने थे लेकिन इन 100 दिनों में जो सबसे महत्वपूर्ण था वह था कि अमित शाह किस तरह से सामने आए । मोदी और उनके मामले में थोड़ा फर्क था। मोदी के बारे में सब जानते थे यही चुनाव जीत सकते हैं। अमित शाह सदा मोदी से एक कदम पीछे रहते थे और यह भी स्पष्ट हो गया कि मोदी के बाद पिछली कतार में शाह ही हैं।  बात यह है कि शाह ने धारा 370 और धारा 371 को अलग कर दिया है । धारा 370 के माध्यम से कश्मीर को विशेष दर्जा हासिल था जब कि धारा 371 से उत्तर पूर्वी राज्यों को भी कुछ विशेष अधिकार हासिल हैं, खास करके जनजातीय समुदाय के लिए कानून बनाने का अधिकार   हासिल है । शाह ने पिछले हफ्ते गुवाहाटी में उत्तर पूर्व जनतांत्रिक गठबंधन को संबोधित करते हुए कहा कि  धारा 370 एक अस्थाई व्यवस्था थी जब कि धारा 371 संविधान में एक विशेष प्रावधान है। उन्होंने कहा यह नॉर्थ का अधिकार है इसे कोई नहीं छीन सकता।
            लेकिन यहां यह स्पष्ट नहीं हो सका की एनआरसी और नागरिकता संशोधन विधेयक पर शाह का जो जुझारूपन है वह मोदी की बातों से प्रतिध्वनित नहीं होता है।  जबकि मोदी को कश्मीर और असम के हालात के बारे में विदेशी समुदाय को स्पष्ट करना पड़ता है। शाह ने पिछले रविवार को उत्तर पूर्वी काउंसिल की मीटिंग में कहा कि वे असम या देश के किसी भी भाग में एक भी घुसपैठिए को नहीं आने देंगे उनकी इस भाषण के कुछ ही घंटों के बाद जिनेवा में राष्ट्र संघ मानवाधिकार आयोग के आयुक्त मिशेल बेसलेट ने कहा की वे कश्मीर को लेकर ही चिंतित नहीं है बल्कि असम में एनआरसी पर भी उन्हें चिंता है। यहां सवाल उठता है कि क्या शाह मोदी जी के लिए कई मोर्चे खोल रहेगा हैं क्या प्रधानमंत्री को अपने गृह मंत्री से करना पड़ेगा कि वह थोड़ा कम बोलें और प्राथमिकता के तौर पर अर्थव्यवस्था को सुधारने दें। अब आगे क्या होगा यह कुछ ही हफ्तों में पता चल जाएगा।

Friday, September 13, 2019

हमारी भाषा हमारे आत्म अन्वेषण का आयुध है

हमारी भाषा हमारे आत्म अन्वेषण का आयुध है

आज हिंदी दिवस है। हिंदी दिवस से एक बात याद आती है कि दो दिन पहले राष्ट्रीय ग्रंथागार कहने पर एक विदुषी महिला ने हैरत जाहिर की कि यह क्या है? यह बताए जाने पर कि यह नेशनल लाइब्रेरी का हिंदी है वह चौंक गई। हिंदी को  नारों की भाषा  समझने  वाले ऐसे बौद्धिक वातावरण में हिंदी में बहस बड़ा ही अजीब लगता है ,और एक प्रश्न भी सामने खड़ा होता है कि ऐसे वातावरण में हिंदी के विकास के लिए इतना श्रम क्यों? क्योंकि हिंदी या कहें हमारी भाषा हमारे आत्म अन्वेषण का एक  आयुध है। उसी के माध्यम से हम अपने भीतर की बातों को बाहर प्रगट करते हैं। मातृभाषा मनुष्य की देह का एक का अदृष्य अंग है। अथवा, कह सकते हैं कि यह हमारी ज्ञानेंद्रिय है जो हमें आत्मदृष्टि देती है। चाहे आप कितने भी विद्वान हों, कितनी भी भाषाओं के पारंगत हो लेकिन आप का भाव बोध आपकी अपनी ही भाषा में होता है। मां को आप चाहे जो कहें लेकिन उसे आप अपनी भाषा में ही महसूस करते हैं। भाषा और आत्मबोध का यह संबंध मनुष्य को समस्त जीव जंतुओं से अलग कर देता है। अपने अधूरेपन को पहचान कर मनुष्य में संपूर्णता का स्वप्न में आता है और यही पहचानना आत्मबोध है, जो अपनी ही भाषा में होता है। किसी भी संस्कृति की पहचान केवल उसकी यथार्थता से नहीं होती बल्कि उसके सपनों से भी उसकी विशेषता उजागर होती है।  उन सपनों की बुनावट में भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक संस्कृति के जो सपने हैं यह बहुत हद तक उसकी स्मृतियां निर्धारित करती हैं।  शब्द में उन्हीं सपनों का संकेत हुआ करता है और वे शब्द आपकी भाषा के मूल अक्षर हैं। इसीलिए कोई भी भाषा कभी मरती नहीं उसे मारने का चाहे जितना प्रयास किया जाए। वह संस्कृति के सपने में हमेशा जीवित रहती है। हमारे अवचेतन में लगातार प्रवाहित रहती है। यही कारण है कि हमारा एहसास, हमारी अनुभूतियां वगैरह हमारी अपनी भाषा में ही होती हैं। हम सीखी हुई  या थोपी हुई भाषा में उसे अनुभूत नहीं कर सकते। भले ही अभिव्यक्त कर सकते हैं। यही कारण था कि मैक्स मूलर जैसे भारतविद को सदा यह महसूस होता था कि "जब तक भारत में संस्कृत या उससे पैदा हुई भाषाएं परस्पर संवाद और आत्म चिंतन के लिए जीवित रहती हैं तब तक भारत की सांस्कृतिक अस्मिता बची रहेगी। उसके रहते भारतीय सभ्यता को मृत स्मारकों की तरह नहीं देखा जा सकता।" उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में भारत की राष्ट्रीय चेतना इसी सांस्कृतिक अस्मिता के भीतर से प्रस्फुटित हुई। संस्कृत और भारतीय भाषाओं के भीतर जातीय स्मृतियों की एक ऐसी विपुल संपदा सुरक्षित थी जो एक संजीवनी की तरह अतीत से बहकर भारत की चेतना को आप्लावित करती थी। हमारी राष्ट्रीयता के बीज इसी चेतना में निहित थे। यही कारण था कि मेकाले ने चेतावनी दी थी कि "हम भारत में पश्चिमी संस्कृति का प्रभुत्व तब तक नहीं कायम कर सकेंगे जब तक भारतीय शिक्षा पद्धति में संस्कृत भाषा को पूरी तरह से निष्कासित नहीं कर लेते।" जिस वैचारिक स्वराज की बात भारतीय दार्शनिक के सी भट्टाचार्य ने उठाई थी उसका गहरा संबंध है एक जाति की भाषाई अस्मिता से है।  यही भाषाई अस्मिता हमारी संस्कृति का सत्य थी। सच तो यह है और कहिए सच तो यही है कि अन्य भाषा जिसे हम बहुत विकसित कहते हैं वह खिड़की से बाहर देखा गया एक बाह्य जगत है। किसी ऐतिहासिक दबाव और या दमन के कारण जब अपनी भाषा से उन्मूलित हो जाते हैं तो ठीक उसी अनुपात में अगर खिड़की से बाहर जाकर देखें तो बाहर देखा गया परिदृश्य धुंधला नजर आता है। भाषा भीतर के सच और बाहर की यथार्थ के बीच एक सेतु है और यह सच तथा यथार्थ दोनों एक दूसरे से अलग नहीं हैं। बस केवल वैचारिक सुविधा के लिए हम उसे दो अवधारणाओं के रूप में देखते हैं।
       यहां आकर भाषा के दो रूप हमारे सामने उभरते हैं या कहिए उनके दो चरित्र। एक जो हम बोलते हैं जिनमें हमारा संवाद होता है और दूसरा भाषा का तात्विक स्वरूप जो सतह के नीचे कायम रहता है लेकिन हमेशा सतह के ऊपर बोले गए शब्दों में प्रतिध्वनित होता है। भाषा के  इसी आंतरिक स्वरूप और उसके व्यवहारिक चरित्र के बीच एक संबंध होता है जो हमेशा गतिशील रहता है। यह मानव समाज के विकास के साथ चलता है और उसका स्वरूप निर्मित करता है। जहां तक हिंदी का प्रश्न है वह ऐतिहासिक काल से बदलती हुई आज की स्वरूप तक पहुंची है और कह सकते हैं यह आगे बढ़ती हुई हमारे सामूहिक अनुभव और अस्मिता के रूप में ढल गई है।आज हिंदी के विकास की आवश्यकता इसलिए है कि वह हमारी सामूहिक अस्मिता का एक बिंब बन गयी है और वह बिंब हमारी स्मृतियों के साथ जुड़ा है।  हमारे सपनों के साथ भी जुड़ा है। जब हम अपने विचारों को किसी दूसरी भाषा में व्यक्त करते हैं तो एक हद तक स्वयं हमारे विचार उस भाषा के प्रत्यय द्वारा अनुशासित होने लगते हैं । ऐसे में भाषा  माध्यम नहीं रह जाती है वह शक्ति का साधन बन जाती है। हम उस भाषा में अपने विचार को व्यक्त कर सकते हैं लेकिन ठीक उसी रूप में जिसमें वह करवाना चाहती है।  प्रश्न भाषा के प्रभुत्व के रूप में सामने आता है। क्योंकि दूसरी भाषा में हम कहना कुछ चाहते हैं लेकिन वह भाषा वही कहवाती है जो वह चाहती है। 19 वीं शताब्दी में राष्ट्रीय जनमानस को जिस राष्ट्रीय भावना ने आलोकित किया था उसमें हिंदी के रूपकात्मक बिंबों का महत्वपूर्ण योगदान था। आज जब भारत को कुछ भारतीय इतिहासकार ही महज एक संघ बताते हैं और भारत राष्ट्र को एक काल्पनिक उपज की संज्ञा देते हैं उस समय वे भारतीय भाषाई और सांस्कृतिक पीठ को बिल्कुल भुला देते हैं। स्वतंत्रता प्राप्त करने की भारत की लालसा केवल राजनीतिक उद्देश्यों से उत्प्रेरित नहीं थी उसके पीछे अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को सबके समक्ष लाने की आकांक्षा भी थी। यही आकांक्षा हमारी भाषा को स्वरूप देती थी। आज हम उसी भाषा के लिए बार-बार प्रयास करते हैं और यह बताते हुए गर्व महसूस होता है कि हम लगातार विकसित हो रहे हैं। विख्यात भाषाविद जीएन देवी के अनुसार आज हिंदी दुनिया की सबसे तेज बढ़ती हुई भाषा है और इसका विकास उत्तरोत्तर हो रहा है। हिंदी दिवस के रूप में हम उसी विकास को अपनी ऊर्जा प्रदान करते हैं और हमें पूरा यकीन है कि हम वह लक्ष्य हासिल करके रहेंगे जिसके लिए हमने संकल्प किया है।

Thursday, September 12, 2019

जम्मू कश्मीर का परिसीमन और उसका प्रभाव

जम्मू कश्मीर का परिसीमन और उसका प्रभाव

अब से कोई 11 वर्ष पहले 2008 में चौथी बार परिसीमन हुआ था जिसमें कई राज्य छूट गए थे। उधर 2001 की जनगणना रिपोर्ट को गुवाहाटी हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी और इसलिए 2008 में उत्तर पूर्वी राज्यों का परिसीमन नहीं हो सका। मणिपुर के मामले में भी एक मुकदमा लंबित था। झारखंड का परिसीमन हुआ पर रांची हाई कोर्ट ने उसे लागू नहीं होने दिया।  कारण बताया कि अनुसूचित जनजातियों के लिए सुरक्षित विधानसभा सीटों यह संख्या पहले के मुकाबले कम कर दी गई हैं। जम्मू और कश्मीर का परिसीमन नहीं किया गया क्योंकि वहां अलग संविधान था और परिसीमन आयोग यह गठन का अधिकार राज्य सरकार के पास होता है अतएव राष्ट्रीय परिसीमन आयोग को जम्मू कश्मीर की सीमाओं छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। अब जबकि जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटा ली गई और वहां अलग संविधान नहीं रहा तो  यह तर्क दिया जा रहा है की जम्मू कश्मीर के परिसीमन की शुरुआत होनी चाहिए। लेकिन 2008 में जिन राज्यों का परिसीमन नहीं हो सका था वहां भी यह प्रक्रिया अभी लंबित है।  ऐसे में जम्मू कश्मीर के परिसीमन की मांग से कई सवाल उठते हैं। पहला सवाल कि अगर वहां परिसीमन किया जाता है तो राज्य पर क्या असर पड़ेगा? क्योंकि, जम्मू और कश्मीर आजादी के बाद से अभी तक भारत के लोकतांत्रिक राजनीति के मुख्यधारा में नहीं था और वहां की जनता का राजनीतिक आचरण वैसा नहीं है जैसा देश के अन्य भागों का है। लोकतंत्र या कहें आधुनिक लोकतंत्र के संदर्भ में जम्मू कश्मीर के राजनीतिक आचरण का समाज वैज्ञानिक अध्ययन अभी तक हुआ नहीं है। उसकी सोच कुछ दूसरे प्रकार की है। वैसे तो कहा जाता है की परिसीमन का उद्देश्य राज्य के सभी विधानसभाओं और लोकसभा क्षेत्रों का आकार एक समान होते हैं जिससे एक मतदाता और एक वोट कर समीकरण कायम रहे । परिसीमन का उद्देश्य संभवत संसदीय क्षेत्रों के आकार में समानता बनाए रखना है ताकि अचानक जनसंख्या में वृद्धि के कारण विभिन्न स्थानों पर अलग अलग कारणों से बढ़ी वोटरों की संख्या में असमानता ना रहे। शहरी क्षेत्रों में खासकर मेट्रोपॉलिटन क्षेत्रों में जनसंख्या में वृद्धि हुआ करती है। यह वृद्धि जन्म और मृत्यु के समीकरण से कहीं ज्यादा होती है। जिसका कारण होता है शहरों में आजीविका के साधनों का जन्म मृत्यु दर से तालमेल नहीं होता। इसी तरह पहाड़ों से आजीविका की अनुपस्थिति के कारण जनसंख्या घटने लगती है । अब ऐसे में कुछ विधानसभाओं  या संसदीय क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या असंतुलित हो जाती है। परिसीमन आयोग का काम है कि सभी विधानसभा क्षेत्रों और संसदीय क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या को सामान बनाकर रखे। उनका आकार कमोबेश समान हो। जम्मू कश्मीर के परिसीमन से भी यही उम्मीद की जाती है। लेकिन प्रवास के सामान्य कारणों को देखा जाए तो यह पहले से ही कहा जा सकता है जम्मू कश्मीर विधानसभा क्षेत्रों की संख्याओं में काफी असंतुलन है। अब नए परिसीमन से जम्मू कश्मीर विधानसभा क्षेत्रों की संख्या में बदलाव आ सकता है।
            जम्मू और कश्मीर में कुल 87 विधानसभा क्षेत्र हैं । जिनमें 46 कश्मीर में 37 जम्मू में और लद्दाख में केवल चार सीटें हैं । फिलहाल कश्मीर में वोटरों की संख्या 87,778 है जबकि जम्मू में 91,593 यानी कश्मीर की तुलना में जम्मू में लगभग 5हजार से ज्यादा वोटर हैं। लद्दाख विधानसभा क्षेत्रों के आकार छोटे छोटे हैं और यहां तुलनात्मक तौर पर कम वोटर हैं। अब जब परसीमन होगा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं नए रूप में होंगी तो यकीनन जम्मू क्षेत्र में सीटों की संख्या बढ़ेगी। जबकि कश्मीर में सीटों की संख्या घटेगी। इन दोनों क्षेत्रों में भाजपा, पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस के जनाधार अलग-अलग हैं। I इस परिसीमन का प्रभाव भी राजनीति पर और उन पार्टियों के जनाधार पर पड़ेगा। जम्मू में सीटें बढ़ने से प्रत्यक्ष तौर पर भाजपा को लाभ होगा । अगले कुछ सालों में उसका जनाधार वहां काफी मजबूत हो जाएगा। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 3 सीटें मिलीं और उसे 46.4% वोट प्राप्त हुए थे। भारत के चुनावी इतिहास में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा था इससे स्पष्ट हो जाता है कि कश्मीर में अपना जनाधार बढ़ाए बिना भी भाजपा राज्य की राजनीति में अपना मुख्य स्थान बना सकती है । उधर पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस कश्मीर की पार्टी हैं और उनका जनाधार कश्मीर में ही मजबूत है। कश्मीर में सीटों की संख्या घटने से राज्य में पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस की संभावनाओं पर सीधा आघात लगेगा।
       इस वर्ष के लोकसभा चुनाव में कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस को 3 सीटें मिली थी लेकिन जम्मू क्षेत्र में उसे केवल 7.9% वोट मिले थे 2014 में पीडीपी को जिन सीटों पर विजय मिली थी वह उसके हाथ से निकल गईं। इसका प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक रहा। उसे महज 2.4% वोट मिले । कांग्रेस का जनाधार भी घट सकता है। पिछले चुनाव में उसे 28.5% वोट मिले थे फिर भी जम्मू और कश्मीर दोनों क्षेत्रों में पार्टी का जनाधार लगभग समान है। लिहाजा परिसीमन के बाद जनसंख्या बदलेगी तब भी कांग्रेस के समीकरण पर कोई विशेष असर नहीं पड़ेगा। लेकिन यह तय है उसके सामने चुनौतियां आएंगी इसलिए उसे सावधान रहना होगा। धारा 370 हटाए जाने के बाद भाजपा के बढ़ते वर्चस्व के कारण वहां बाहरी ताकतों  के  हर प्रयास के बावजूद सामाजिक  परिवर्तन सकारात्मक होगा और यह स्थिति जम्मू के विकास में जहां सहायक होगी वहीं भारतीय जनता पार्टी के शक्तिशाली होने में भी मददगार होगी। अगर संक्षेप में कहें तो परिसीमन के बाद वहां उभरी नई स्थिति भारत देश के पक्ष में होगी और भाजपा उसका कारक कही जाएगी। यह ताजा समीकरण भारत के अन्य हिस्सों पर भी राजनीतिक बदलाव की प्रक्रिया को तीव्र करेगा।

Wednesday, September 11, 2019

पाकिस्तान को भारत की कड़ी फटकार

पाकिस्तान को भारत की कड़ी फटकार

जिनेवा में मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की बैठक में भारत में पाकिस्तान को जमकर फटकार लगाई और कहा की पाकिस्तान मनगढ़ंत बातें कह रहा है। भारत ने यह भी साफ कर दिया कि चूंकि कश्मीर का मसला भारत का आंतरिक मसला है इसलिए  वह इस मसले पर किसी तरह का विदेशी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेगा। इसके पहले पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने परिषद में अपना भाषण पेश किया था । परिषद में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे विदेश मंत्रालय की सचिव (पूर्व ) विजय ठाकुर सिंह ने मंच संभाला और पाकिस्तानी विदेश मंत्री की धज्जियां उड़ा दीं। उन्होंने कहा कि भारत मानव अधिकारों को बढ़ावा देने वाला है और उसकी रक्षा में दृढ़ विश्वास करता है। उधर पाकिस्तान आतंकवाद का जनक है और वह वैकल्पिक कूटनीतिक तौर पर भारत के विरुद्ध आतंकवाद का संचालन करता है। भारतीय प्रतिनिधि ने जोर देकर कहा कि जो लोग किसी भी तौर पर आतंकवाद को बढ़ावा देने और उसे वित्तीय समर्थन मुहैया कराने में लगे हैं वास्तव में वही मानवाधिकार का हनन कर रहे हैं। उन्होंने परिषद को बताया धारा 370 पर संसद में बहस के बाद ही फैसला लिया गया। इसे पूर्ण रूप से भारत की जनता का समर्थन है। पाकिस्तान चारों तरफ घूम-घूम  कर पीड़ित होने का ढोल पीट रहा है जबकि सच यह है कि वह खुद मानवाधिकार का हनन करता है और उसका अपराधी है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि कुछ लोग मानवाधिकार की आड़ में दुर्भावनापूर्ण राजनीतिक एजेंडे   के लिए इस मंच का इस्तेमाल करते हैं । असल में यही लोग मानवाधिकार के अपराधी हैं। यह लोग अन्य देशों में अल्पसंख्यकों के मानवाधिकार पर ढोल पीटते हैं जबकि सच यह है कि वह खुद अपने मुल्क में ही मानवाधिकार का व्यापक हनन करते हैं। जनता को पैरों तले रौंद देते हैं। विजय सिंह ठाकुर ने कहा कि कश्मीर के बारे में जो निर्णय किया गया है उस निर्णय से लैंगिक भेदभाव सहित संपत्ति पर अधिकार और स्थानीय निकायों में प्रतिनिधित्व खत्म होगा और बाल अधिकारों को संरक्षण हासिल होगा । घरेलू हिंसा रुकेगी । शिक्षा ,सूचना और काम के अधिकार का कानून लागू होगा तथा शरणार्थियों के खिलाफ भेदभाव नहीं रह जाएगा। जम्मू और कश्मीर में वर्तमान प्रतिबंधों को स्पष्ट करते हुए भारतीय प्रतिनिधि ने कहा इस सीमा पार से आतंकवाद का भारी खतरा है और इसलिए नागरिकों की सुरक्षा के उद्देश्य से यह सावधानी पूर्ण कदम उठाया गया है।
        कश्मीर पर पाकिस्तान को हर मंच पर मात मिल रही है और वह बौखला गया है और अपनी बौखलाहट में वह तरह तरह के बयान दे रहा है । संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार परिषद जेनेवा में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कश्मीर पर अपनी बात के दौरान कह दिया कि "भारतीय राज्य जम्मू एवं कश्मीर।" कुरैशी ने भारत पर आरोप लगाते हुए कहा कि भारत यह बताने की कोशिश कर रहा है कि कश्मीर में जिंदगी सामान्य हो गई है। अगर जिंदगी सामान्य है तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया, अंतरराष्ट्रीय संगठन, एन जी ओ, सिविल सोसायटी यह लोगों को कश्मीर में क्यों नहीं प्रवेश करने दिया जा रहा है ताकि वह खुद हकीकत देख लें। कुरैशी ने कहा कश्मीर में कर्फ्यू हटते ही हकीकत सामने आ जाएगी तब दुनिया देखेगी वहां क्या हो रहा है।
         इसके पहले भी भारत ने साफ कह दिया था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और इसका कोई राष्ट्रीय या राजकीय धर्म नहीं है। अल्पसंख्यकों की हिफाजत इसकी राजनीतिक व्यवस्था का एक खास हिस्सा है। दरअसल पाकिस्तान ने भारत में अल्पसंख्यकों से बर्ताव को लेकर भारत की आलोचना की है संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 27 मई सत्र में भारत के अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा ,भारत के संविधान में अल्पसंख्यकों अधिकारों को बनाए रखने की व्यवस्था है और उसके लिए कई  प्रावधान हैं। भारत में जाति या धर्म को लेकर भेदभाव नहीं किया जाता। यहां बोलने और अभिव्यक्ति की पूरी आजादी है और वह आजादी संविधान द्वारा दी गई है। रोहतगी ने कहा कि हम शांति और अहिंसा पर विश्वास रखते हैं । भारतीय संस्कृति में प्रताड़ना की कोई जगह नहीं है। उन्होंने अफस्पा का जिक्र करते हुए कहा यह अधिनियम केवल अशांत इलाकों में लागू है और यह इलाके बहुत कम हैं। एक के बाद एक सभी अंतरराष्ट्रीय मंच पर कश्मीर को लेकर पाकिस्तान को कोई सहयोग नहीं मिलने से वह दिनों दिन मायूस होता जा रहा है और यह मायूसी बौखलाहट में बदलती जा रही है। पीओके में घटी घटनाओं से यह साफ पता चलता है।  पाकिस्तान अपनी बौखलाहट में "कुछ भी" कर सकता है इसलिए भारत को सतर्क रहना चाहिए।