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Wednesday, November 13, 2019

अभी भी मौका है

अभी भी मौका है 

महाराष्ट्र में विधानसभा को निलंबित कर दिया गया है और राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया है। इसका मतलब है की वहां सत्ता के जितने भी दावेदार हैं वह किसी भी वक्त अपेक्षित  समर्थन के  सबूत लेकर राज्यपाल का दरवाजा खटखटा सकते हैं। विशेषज्ञों का मत है कि चुनाव के बारे में चुनाव आयोग की अधिसूचना को नई विधानसभा के रूप शिवसेना और कांग्रेस के बीच सुरती एनसीपी की यह गति शरद पवार की राजनीतिक शास्त्रीय प्रतिगामी माना जा सकता है अब ऐसे हालात नगर चुनाव होते हैं तो बीजेपी के लिए मैदान खुला हुआ है भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी लेकिन सरकार नहीं बना पाए और इसके कारण शिवसेना विचारधारा से विपरीत जाकर सरकार बनाने की कोशिश में लग गई भाजपा इस नई स्थिति को चुनाव प्रचार के दौरान खूब भुना सकती है बाकी दल इस सियासी हालात को कैसे फोन आएंगे यह तो कहीं कोई योजना स्पष्ट नहीं दिख रही है लिया जाएगा। 1994 में एसआर बोम्मई के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उन परिस्थितियों के बारे में व्यवस्था दी थी जहां अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू करना जरूरी हो जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद ऐसे परिदृश्य बन सकते हैं कि राष्ट्रपति विधानसभा भंग कर सकते हैं और जल्द चुनाव कराने के लिए कह सकते हैं या विधानसभा को निलंबित रखकर राजनीतिक पार्टियों को सरकार बनाने के राज्यपाल के समक्ष दावा पेश करने की अनुमति दे सकते हैं। अब यह राज्यपाल की प्राथमिकता है कि वह राज्य में सरकार बनने देते हैं अथवा नहीं।
       ऐसा बहुत कम होता है की चुनाव के पूर्व राजनीतिक दलों में जो गठबंधन हुआ और जिस गठबंधन के बल पर बहुमत हासिल हुआ वह सरकार नहीं बना सका। भाजपा और शिवसेना के गठबंधन ने महाराष्ट्र में बहुमत हासिल किया लेकिन यह गठबंधन सरकार नहीं बना सका और वहां राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। भाजपा और शिवसेना में यह राजनीतिक समझौता लगभग तीन दशकों से चला आ रहा है। वहां स्थानीय निकायों में, प्रांतीय सरकार में और यहां तक कि केंद्र में भी दोनों पार्टियां शासन में शामिल हैं। दोनों के आदर्श बहुत मिलते जुलते हैं । खासकर हिंदुत्व के मामले में और इसी के कारण इनके रिश्ते भी बड़े मजबूत हैं। अब खटपट शुरू हुई है और महाराष्ट्र में सरकार बनाने के मौके दोनों चूकते जा रहे हैं। "नई भाजपा" फिलहाल विजय रथ पर सवार है लेकिन उस के लिए यह आत्म निरीक्षण का वक्त है। कुछ साल पहले तक भाजपा को कांग्रेस से विपरीत  समझा जाता था । समझा जाता है कि इस पार्टी में लचीलापन है और गठबंधन में आई दरार को पाटने का हुनर भी है। 1996 में जब 13 दिन की सरकार के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई बहुमत हासिल करने से चूक गए थे तब से इस पार्टी के बारे में कहा जाता था यह राजनीतिक विभाजन कर अपना वर्चस्व बढ़ा रही है। लेकिन इस दौरान इसने खुद को इतना काबिल बनाया कि किसी भी गठबंधन के साथ निभा सके।  अब थोड़ा बदलाव आ रहा है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की कमान में कई चुनाव जीतने के बाद अब पार्टी में धीरे-धीरे पुराना लचीलापन खत्म होता जा रहा है।  दूसरों के साथ गठबंधन करने की उसकी इच्छा समाप्त होती जा रही है। महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव के नतीजे भारी बहुमत से भाजपा के दूसरी बार लोकसभा चुनाव जीतने के बाद आए।  यह नतीजे अपने आप में एक संदेश भी हैं। वह कि कोई भी पार्टी मतदाताओं का स्थाई विश्वास नहीं पा सकती है और यह लोकतंत्र के लिए एक अच्छी बात है।
       महाराष्ट्र में जो कुछ भी हुआ शिवसेना के साथ उसके बाद कहा जा सकता है कि महाराष्ट्र में भाजपा ने अपना आखिरी पत्ता खोल दिया। वहां राष्ट्रपति शासन लागू हो चुका है । लेकिन एक सवाल जो सबके मन में आता है कि जब राज्यपाल ने एनसीपी को मंगलवार की रात 8:30 बजे तक का समय दिया तो दोपहर आते-आते हैं उनका मन क्यों बदल गया? शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की गोटी किसने बिगाड़ दी। अब यह देखना जरूरी है कि इस सारे गेम में किसने सबसे ज्यादा खोया?
जहां तक शिवसेना का प्रश्न है उसने मुख्यमंत्री पद की मांग की थी लेकिन वह नहीं हो सका। अब यहां तो वह सत्ता से बेदखल हो गए और केंद्र में भी मंत्री पद जाता रहा। उधर एनसीपी कांग्रेस के हाथ में सत्ता की लगाम दिखने से आदित्य ठाकरे के करियर का शानदार आगाज होते होते रुक गया। हालांकि शिवसेना सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है लेकिन शायद ही उसे कुछ हासिल हो पाएगा।
       दूसरी तरफ दुविधा के संक्रमण से पीड़ित कांग्रेस एक बार फिर फैसला नहीं कर पाई। कांग्रेस ने इस सारी प्रक्रिया को विशेषकर राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की प्रक्रिया को लोकतंत्र का अपमान बताया है। कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि राज्यपाल संवैधानिक प्रक्रिया का मखौल उड़ा रहे हैं। सुरजेवाला ने कहा कि चुनाव के पहले सबसे बड़े गठबंधन को सरकार बनाने के लिए बुलाना चाहिए था इसके बाद चुनाव से पहले बने दूसरे गठबंधन को बुलाना चाहिए था और राज्यपाल सिंगल पार्टियों को बुला रहे थे। उन्होंने कांग्रेस को क्यों नहीं बुलाया? सुरजेवाला का आरोप है राज्यपाल ने समय का मनमाना आवंटन किया। भाजपा को 48 घंटे दिए और शिवसेना को 24 घंटे तथा एनसीपी को 24 घंटे भी नहीं। जो लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं उससे ही लगता है कि महाराष्ट्र  कांग्रेस चाहती थी कि सरकार को समर्थन दे दिया जाए लेकिन सोनिया गांधी ने ऐसा कुछ नहीं किया और मामला धरा का धरा रह गया। अब हो सकता है आने वाले दिनों में कांग्रेस में टूट-फूट हो।
       जहां तक एनसीपी की बात है तो शरद पवार को कांग्रेसियों से बातचीत के लिए अधिकृत किया गया था और कांग्रेस के सुशील कुमार शिंदे के साथ एनसीपी की बातचीत चल रही थी।  बात चलती रही और उधर बात बिगड़ गई। अब क्या भाजपा को यह भनक लग गई कि शायद शिवसेना ,एनसीपी और कांग्रेस में बात बन जाए और उसने अपना पत्ता चल दिया ।
वैसे महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा विधायक दल के नेता देवेंद्र फडणवीस का मानना है कि सरकार न बनने के कारण राष्ट्रपति शासन लगना दुर्भाग्यपूर्ण है। क्योंकि महागठबंधन के पक्ष में स्पष्ट जनादेश था। उन्होंने उम्मीद जताई है की जल्दी ही स्थिर सरकार बनेगी साथ ही उन्होंने अस्थिरता से होने वाले खतरों को लेकर आगाह किया है।

शिवसेना और कांग्रेस के बीच झूलती एनसीपी की यह गति को शरद पवार की राजनीतिक प्रक्रिया का प्रतिगामी माना जा सकता है। अब ऐसे हालात अगर चुनाव होते हैं तो बीजेपी के लिए मैदान खुला हुआ है। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी लेकिन सरकार नहीं बना पाई और इसके कारण शिवसेना विचारधारा से विपरीत जाकर सरकार बनाने की कोशिश में लग गई। भाजपा इस नई स्थिति को चुनाव प्रचार के दौरान खूब भुना सकती है बाकी दल इस सियासी हालात को कैसे भुनाते हैं यह तो कहीं कोई योजना स्पष्ट नहीं दिख रही है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सरकार बनाने के मौके अभी भी हैं बशर्ते राजनीतिक तालमेल हो और उस तालमेल के पक्के सबूत हों। उनके साथ राज्यपाल से पार्टियां मुलाकात करें और राज्यपाल को यह विश्वास दिलाने में कामयाब हो सकें कि सरकार कायम रहेगी। अगर ऐसा नहीं होता है यह मौका भी हाथ से निकल जाएगा तथा चुनाव की रणभेरी बज उठेगी जो ऐसी स्थिति में लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है।


Tuesday, November 12, 2019

हिंदू राष्ट्र से लेकर आर्थिक गतिरोध तक

हिंदू राष्ट्र से लेकर आर्थिक गतिरोध तक 

शनिवार को देश की सबसे बड़ी अदालत ने फैसला दिया ,राम मंदिर वहीं बनेगा जहां 1992 तक बाबरी मस्जिद थी। यह फैसला बहुत ही महत्वपूर्ण है और आस्था एवं देश को  तीन दशकों से  नियंत्रित करने वाली सियासत के दोराहे के चतुर्दिक घूम रहा है। अब कानूनी जंग खत्म हो गयी और देखना है कि इस बिंदु से वह कौन से दिशा होगी जिधर आने वाले दिनों में भारतीय राजनीति अपना कदम बढ़ाएगी। 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो हिंदू राष्ट्रवाद हाशिए पर खड़ा एक विचार था। 1947 के बाद के कुछ दशकों तक हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी जनसंघ की  लोकसभा में बहुत मामूली उपस्थिति थी और यह पार्टी कुछ ही राज्यों में सिमटी हुई थी। जनसंघ से पार्टी का नया रूप बदलकर भारतीय जनता पार्टी हुआ और 1984 के लोकसभा चुनाव में इसे केवल 2 सीटें मिलीं। 1980 के दशक के आखिरी दिनों में राम जन्मभूमि का आंदोलन आरंभ हुआ और पूरे देश की राजनीतिक फिजां अचानक बदल गई। हिंदुत्व मुख्य हो गया। इस आंदोलन को व्यापक समर्थन मिला। भाजपा ने एक कदम और आगे बढ़ाया और आंदोलन का उग्र स्वरूप सामने आया। बाबरी मस्जिद ढहा दी गई । इसके बाद राज्यों में हिंदुत्व की लहर फैल गई।  गौ मांस विरोधी कानून सख्त हो गया, धर्म परिवर्तन पर कठोर अंकुश लग गया तथा धर्मनिरपेक्षता मजाक की बात हो गई । भारतीय संघ ने  नई दिशा की तरफ कदम बढ़ाना शुरू किया वह कदम था हिंदू आईडियोलॉजी के लक्ष्य को प्राप्त करना।
        अब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया और  इस फैसले ने एक तलाश है राम जन्मभूमि के आंदोलन को स्वीकृति दे दी यह समझने के लिए कि धर्म और सत्ता किस तरह आपस में घुल मिल गई फैसले को समझना जरूरी है सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर बनाने के लिए किसी निजी संस्था को आदेश नहीं दिया है, बल्कि मोदी सरकार द्वारा गठित एक ट्रस्ट को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस जमाने में जो आदर्श, जो आईडियोलॉजी हाशिए पर थी और उस आईडियोलॉजी की बात करने के लिए या सत्ता के गलियारे हैं उस बात को सुने जाने के लिए चरमपंथी आंदोलन का रास्ता अख्तियार किया गया था। वह आज भारत का सहज ज्ञान हो गया है। भाजपा ने हिंदू राष्ट्र बनाने के लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाना शुरू किया। हिंदुत्व के विकास में भारतीय जनता पार्टी के विकास अंतर्निहित हैं। जबकि 1986 में कोर्ट के आदेश पर बाबरी मस्जिद का ताला खुलवा कर वहां  पूजा करने के लिए  अनुमति दिए जाने के रूप में राम जन्मभूमि के आंदोलन को वस्तुतः कांग्रेस ने हवा दी थी लेकिन देखते ही देखते भाजपा ने उस पर कब्जा कर लिया है और ऐसा जन आंदोलन आरंभ किया जो बाबरी मस्जिद को जाता है। पड़ा और आज वहां मंदिर बनने जा रहा है जहां बाबरी मस्जिद थी। महज दो दशक बाद भाजपा को लोकसभा में साधारण बहुमत मिला और उसके बाद धीरे-धीरे उसकी पकड़  भारत राष्ट्र पर मजबूत होती गई। हमारे लिए यानी देश की जनता के लिए बहुत ही संतोष का विषय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल में राम मंदिर का मामला सुलझ गया। अब भाजपा एक ऐसी पार्टी नहीं है जिसे लोकसभा में केवल बहुमत हासिल है बल्कि एक ऐसी पार्टी बन गई है जो देश का विचार गढ़ रही है। जैसा कांग्रेस में 1947 के पहले और बाद में किया था अब जब भारत राष्ट्र का इतिहास दोबारा लिखा जाएगा तो यह काल स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। इन सारी स्थितियों से उभरकर एक निष्पत्ति सामने आती है वह है कि हिंदुत्व का विकास मुस्लिम विचारधारा को हाशिए पर धीरे-धीरे लाने के बाद ही हुआ और या आगे भी जारी रहेगा ,उदाहरण के लिए 2014 में लोकसभा में मुसलमानों का अनुपात 1951 के बाद सबसे कम था। सामाजिक आर्थिक आंकड़े भी बताते हैं की मुस्लिमों की आर्थिक स्थिति आज तक बहुत खराब थी। यहां तक कि दलितों के मुकाबले भी वह अच्छी नहीं थी। कानून भी बने तो वह भी कुछ ऐसे जो मुस्लिमों को अलग-अलग करने वाले थे। जैसे अपनी पत्नी को छोड़ने के लिए केवल मुस्लिम ही दंडित किए जाएंगे। इधर अर्थव्यवस्था की हालत यह है कि गरीबों को जीवन यापन करना कठिन होता जा रहा है। गरीब रोटी का एक टुकड़ा नहीं मांग सकते हैं ।  पर सिक्किम मिल रहा है ,पीओके का झुनझुना बजाने को मिल रहा है। इस तरह की कई चीजें प्राप्त हो रही हैं। 2019 में तो कमाल ही हो गया। भाजपा के मन में यह बात थी कि अगर मंदिर बनता है या मंदिर के पक्ष में फैसला होता है तो यह भारत के लोगों का ध्यान आर्थिक गतिरोध तथा सामाजिक दुरावस्था से विचलित कर देगा। भाजपा जो चाहती थी वही हुआ। चारों तरफ  बात चल रही है कि अगले ही कुछ वर्षों में मंदिर का निर्माण हो जाएगा। यहां वास्तविकता यह लग रही है की बाबरी मस्जिद की जगह पर राम मंदिर बनाने का मुख्य लक्ष्य भारतीय राजनीति के दायरे में एक नई स्थिति का सृजन करना है जो अति राष्ट्रवाद के पर्दे में सारी कमियों को छुपा दे। शनिवार को जो फैसला आया फिर ठीक उसी दिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मुस्लिम पर्सनल लॉ समाप्त किए जाने की बात शुरू कर दी। अब केवल अयोध्या ही नहीं था हिंदुत्व विचारधारा के लोगों से अगर बात की जाए तो वह बताते हैं कि बहुत से मंदिर हैं जिन्हें तोड़कर मस्जिदें  बनाई गई है और आने वाले दिनों में इन मस्जिदों पर बात हो सकती है। वैसे उम्मीद नहीं है कि बहुत जल्दी इन चीजों के बारे में भी भाजपा बात करें लेकिन यह आवश्यक है कि जब जरूरत हुई तो यह पत्ते भी फेंके जा सकते हैं।


Monday, November 11, 2019

सहमी हुई है खुशी चारों तरफ

सहमी हुई है खुशी चारों तरफ 

सोमवार के अखबारों की सुर्खियां देशभर में सहमी हुई  खुशी की ओर इशारा कर रही हैं। ऐसे हालात के बरअक्स मंदिर फैसले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देश के नाम संबोधन को अगर देखें तो पता चलेगा भाषण बड़ा ही मधुर था।  नरेंद्र मोदी का घोर विरोधी भी उस भाषण में कोई कमी नहीं निकल सकते। उस भाषण से तीन सुर थे। पहला की एक लंबे समय के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आखिर मामले को निपटा ही दिया और इसी के साथ एक विभाजन कारी मसला खत्म हो गया। अब समय है नकारात्मकता को भूलकर आगे बढ़ा जाए । सचमुच अगर देश  को अब तरक्की करनी है और एक समावेशित समाज के रूप में खुद को प्रस्तुत करना है तो यह जरूरी है। प्रधानमंत्री के भाषण से एक दूसरा स्वर यह निकला कि 9 नवंबर को ही बर्लिन की दीवार गिराई गई थी। बर्लिन की दीवार एक बिंब है जिसने शीत युद्ध के दौरान दुनिया को बांट दिया था। बर्लिन की दीवार गिराए जाने का बड़ा ही दिलचस्प उदाहरण है। मंदिर की रोशनी में यह बात उन्होंने अयोध्या के प्रसंग में नहीं बल्कि करतारपुर साहब के प्रसंग में कही। करतारपुर के गलियारे उद्घाटन भी 9 नवंबर को हुआ। इसने भारत और पाकिस्तान के बीच एक धार्मिक सेतु का निर्माण किया। इसके लिए भारत और पाकिस्तान दोनों ने अपने झगड़ों को भुलाकर मिलकर काम किया था। मोदी जी के भाषण से तीसरा स्वर सामने आता है वह है कि अब सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर बनाने के लिए हरी झंडी दिखा दी। अब देश के सभी नागरिकों को राष्ट्र निर्माण में खुद को लगा देना चाहिए। उन्होंने भाषण के आखिर में ईद उल मिलाद की बधाई भी दी। इसमें हिंदू मुस्लिम एकता का स्वर साफ सुनाई पड़ रहा था।
     दूसरी बार सत्ता में आने के बाद मोदी और भाजपा सरकार ने अपने हर उस वादे को पूरा कर दिया जो वह अभी तक अपने मतदाताओं से खासकर हिंदू मतदाताओं से करती आ रही थी। उन्होंने मुस्लिम मतदाताओं के लिए भी समान आचार संहिता जैसे तीन तलाक पर रोक इत्यादि का काम खत्म कर दिया। अब सवाल है कि आगे क्या हो? बाकी करने के लिए क्या बचा है? 2014 में जब मोदी जी आए थे तो उन्होंने कई वादे किए थे, जैसे अच्छे दिन, विकास और रोजगार, अधिकतम शासन न्यूनतम सरकार इत्यादि। लेकिन पिछले 3 साल से अर्थव्यवस्था - रोजगार की स्थिति बिगड़ती जा रही है। 2019 में हिंदू राष्ट्रवाद और गरीबों के खाते में करोड़ों रुपए डाले  और देश के करोड़ों वोटरों को अपनी आर्थिक तंगी को भूल जाने के लिए फुसलाने में सफल हो गए। इसके बल पर जनादेश हासिल हो गया। लेकिन अब?
        आगे बढ़ने के पहले कुछ ऐसी बातें चिंतनीय है जिनका असर आगे हो सकता है। 5 जजों की पीठ ने अयोध्या का फैसला दिया है। बेशक इस फैसले में वजन है लेकिन यह सामूहिक और प्रतियोगिता मूलक दावों  के रास्ते आड़े आएगा। यह फैसला सांप्रदायिक शिनाख्त तथा आस्था पर प्रभाव भी डाल सकता है। यहां जो सबसे मूलभूत प्रश्न है वह है  कि क्या इसके बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा? वह जो हो रहा है वह सब बंद हो जाएगा। लेकिन शायद ऐसा नहीं होगा ? आने वाले दिनों में हो सकता है कि इस मामले को लेकर अदालत में अपील ना हो या कोई याचिका दायर ना हो पर पूरी संभावना है कि देश भर में ऐसे कई स्थल हैं जिनकी सूची तैयार होगी और उनके लिए भी इसी तरह के मामले आरंभ होंगे और अयोध्या का फैसला उसका आधार बनेगा। वैसे देश थक चुका है मंदिर मस्जिद विवाद  और सांप्रदायिक भेदभाव से। अब जरूरत है कि कोर्ट के फैसले के बाद यह सब खत्म हो जाए और सब लोग मिलजुल कर सौहार्दपूर्ण ढंग से देश के निर्माण में जुटे जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा है ।
         अब देश में अमन कायम करने के लिए सरकार को कश्मीर में पाबंदियों में रियायत देकर हालात हो सामान्य बनाने की कोशिश करने के  साथ  ही पाकिस्तान से तनाव कम करने और कुछ ऐसा करने की जरूरत है कि लोग उसके नाम से उग्र ना हों। सरकार को बालाकोट में बमबारी, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे जुमलों को इस्तेमाल कर आक्रामकता को बढ़ावा नहीं देना चाहिए । सरकार को  चाहिए कि सब देश की खुशहाली के लिए काम करें और जनता को यह महसूस  होने दें सब बराबर हैं। किसी से कोई भेदभाव नहीं है और देश खुशहाली की ओर बढ़ रहा है। बेरोजगारी खत्म हो रही है जब तक ऐसा नहीं होगा तनाव कायम रह सकता है।


Sunday, November 10, 2019

भारत की भूमि पर एक सदी का सबसे बड़ा फैसला

भारत की भूमि पर एक सदी का सबसे बड़ा फैसला 

104 वर्षों से विवाद में फंसे राम मंदिर का 9 नवंबर 2019 को फैसला हुआ। सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया। 9 नवंबर बड़ा ही ऐतिहासिक दिन है इस दिन कई दीवारें गिरीं और आस्था के माध्यम से दिलों को मिलाने के लिए कई नए पुल बने। इतिहास को देखें इसी दिन यानी 9 नवंबर को ही बर्लिन की दीवार गिराई गई थी और जर्मनी एक हो गया था। इसी दिन करतारपुर साहिब कॉरिडोर खोला गया और भारत और पाकिस्तान के सिखों के दिल मिल गए। यही नहीं 104 बरस पुराने अयोध्या विवाद इसी दिन खत्म हुआ और इस फैसले से भारत के इतिहास में शांति और सौहार्द का एक नया सुनहरा पृष्ठ जुड़ गया।
      पूरे मामले में जो सबसे दिलचस्प तथ्य है वह है सुप्रीम कोर्ट द्वारा रामलला विराजमान को एक पक्ष स्वीकार किया जाना। 1989 में जब बर्लिन की दीवार गिराई गई थी उसी वर्ष हिंदू पक्ष में रामलला विराजमान को भी इस विवाद को मिटाने के लिए एक पक्ष बनाने का फैसला किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस फैसले के बाद दो बहुत ही महत्वपूर्ण बातें कहीं। एक तो उन्होंने कहा यह राम रहीम नहीं भारत की भक्ति का वक्त है और दूसरी बात राष्ट्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कही कि आपसी सद्भाव तथा सौहार्द बनाए रखें। पहली बार मोदी जी ने कोई चुनौतीपूर्ण बात नहीं कही ,नाही किसी को ललकारते हुए कुछ ऐसा कहा जिससे किसी को बुरा लगे। उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों को एक होकर राष्ट्र निर्माण में आगे आने का आह्वान किया।
      इस पूरे मामले में जो सबसे महत्वपूर्ण तत्व है वह है सुप्रीम कोर्ट ने माना कि रामलला का भी हक बनता है और उनकी भी हैसियत है। धर्म और आस्था के इस इंटरप्ले में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आज के युग में बहुत मायने रखता है। राम हमारी संस्कृति के न केवल अगुआ थे बल्कि आपसी सौहार्द के ज्वलंत प्रतीक भी थे।
       वक्त और फैसले का कुछ ऐसा सामंजस्य रहा कि अब तक विरोध में खड़े मुस्लिम समाज  के नेता भी अपना सुर बदलते दिखे और उनका नजरिया भी शांति सौहार्द तथा राष्ट्रीयता का दिखा। शाही इमाम अहमद बुखारी ने स्पष्ट कहा किस देश में शांति रहनी चाहिए यह हिंदू मुस्लिम बंद किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, फैसला मुसलमानों के पक्ष में नहीं आया है लेकिन इसे माना जाएगा और इसे मानने के लिए देश के मुसलमान भी तैयार हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री के बयान पर उम्मीद जाहिर की कि मुल्क में सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ेगा। अब इस फैसले को चुनौती नहीं दी जानी चाहिए। कोर्ट का फैसला मान लिया जाना चाहिए। इस फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जमीयत उलेमा ए हिंद के  मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि यह फैसला हमारी अपेक्षा के अनुकूल नहीं है लेकिन सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च संस्था है उन्होंने देशवासियों से अपील की इस फैसले को हार जीत की दृष्टि से ना देखें और भाईचारा बनाए रखें।
       ऊपर रामलला की चर्चा की गई थी यह चर्चा इसलिए भी आवश्यक है कि पहली बार किसी अदालत ने राम को एक सामाजिक अस्तित्व माना है और इसी अस्तित्व के कारण हमारे समाज में समरसता और सौहार्द के लक्षण स्पष्ट होने लगे हैं।  मानव जीवन में एक धारावाहिकता है और मनुष्य में सामाजिक रूप से जीवन और अनुभूति के स्तर पर गुणात्मक विकास होता रहा है। यह मनुष्य का एक समग्र मनोविज्ञान है इस मनोविज्ञान के बाद ही जातियों तथा धर्मों का अस्तित्व आरंभ होता है। यही कारण है कि हर विद्वेष के बाद मनुष्य कर्म प्रयोजन और सापेक्षवाद के स्तर पर इतिहास की चीज बन जाता है। इस प्रकार परस्पर वार्ता के स्तर पर मानव जीवन में एक अजस्रता होती है इसीलिए व्यक्ति और समाज में अटूट संबंध होता है। अभी तक धार्मिक बिंब या प्रतीक चिन्ह इस संबंध को कायम रखने का प्रयास करते थे। कई बार कामयाबी भी मिली और कई बार नहीं। लेकिन इस फैसले में रामलला को शामिल किए जाने से सबसे बड़ी उपलब्धि हुई है वह है विषय और अर्थ जो कभी पृथक थे वह आपस में जुड़ गए और भविष्य का पशु व्यवहार भी अर्थ क्रियात्मक हो गया। जो इतिहास था उसमें व्यक्ति और समाज की भूमिका पृथक थी लेकिन इस फैसले के बाद मानव विकास के इतिहास में समय लगता है लेकिन यहां व्यक्ति और समाज दोनों ही समान रूप से प्रधान हो गए और इसमें कोई प्राथमिक नहीं रह गया। मनुष्य की की मानवीय प्रवृत्ति सामाजिक होती जा रही है और मनुष्य अनेक मनुष्य के साथ एक सामान्य जीवन में भागीदार होना चाहता है। यही कारण है कि सांप्रदायिक तनाव से युक्त हमारे समाज में अचानक समरसता और सौहार्द की शुरुआत होती दिख रही है और यह शुभ लक्षण है। इस देश के भविष्य के लिए राम मंदिर का फैसला धार्मिक या आस्था का स्तर पर चाहे जो हो लेकिन सामाजिक स्तर पर उसकी यह भूमिका प्रशंसनीय है और देश के सभी नागरिकों तथा नेताओं को इस स्थिति को और मजबूत करने के प्रयास करने चाहिए। यही कारण है कि इसे यहां इस सदी का भारत भूमि पर सबसे बड़ा फैसला कहा गया है।


Friday, November 8, 2019

देश को अयोध्या के फैसले का इंतजार

देश को  अयोध्या के फैसले का इंतजार 

जैसी उम्मीद है एक हफ्ते के भीतर चार दशकों  से चल रहे अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाएगा।  बहस इस बात पर नहीं है कि फैसला किस पक्ष के लिए होगा या फैसले में क्या होगा? चिंता इस बात की है कि फैसले के बाद क्या होगा ? देश का हर आदमी चाहता है कि शांति बनी रहे और कोर्ट का फैसला मान लिया जाए। अयोध्या में भी भारी चिंता व्याप्त है। पूरा शहर धड़कते दिल से तरह-तरह की आशंकाओं के बारे में अनुमान लगा रहा है। जैसी कि खबरें हैं पूरा अयोध्या शहर किले में तब्दील हो गया है। राज्य सरकार की पुलिस के अलावा केंद्र सरकार ने भी चार हजार अर्धसैनिक बलों को वहां भेजा है । रेलवे ने अपने पुलिस कर्मियों की छुट्टियां रद्द कर दीं हैं। प्रशासनिक स्तर पर किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने की पूरी तैयारी है। जगह-जगह पुलिस पैदल चलने वालों को और मोटरसाइकिल सवारों को चेक कर रही है उनकी तलाशी ली जा रही है। राम मंदिर जन्मभूमि के भीतर भी चारों तरफ आगंतुकों पर नजर रखी जा रही है। अयोध्या के बाहर धार्मिक और राजनीतिक स्तर पर विचार अलग-अलग लेकिन लगभग सभी चिंतित हिंदुओं में विचार है कि राम जन्मभूमि स्थल उन्हें सौंप दिया जाना चाहिए। मायावती ने ट्वीट कर कहा है समस्त देशवासी  अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हर हाल में सम्मान करें । इसके अलावा मायावती ने केंद्र और राज्य सरकारों से भी अपनी संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारी निभाने और जनमानस के जानमाल  की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है।
            सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर मामले में सुनवाई पिछले महीने खत्म हो चुकी है। अब देशभर की निगाहें  इस मामले में कोर्ट के इस फैसले पर टिकी हुई है। फैसला आने से पहले लोगों में सद्भाव बनाए रखने के लिए सरकारों की तरफ से भी प्रयास हो रहे हैं। पंचकोशी परिक्रमा से लेकर अलग व्यवस्था की गई है। ड्रोन से अयोध्या शहर की निगरानी की जा रही है। अजोध्या को लेकर स्थानीय प्रशासन ने शांति समितियां बनाई हैं। इन समितियों में शामिल लोग जिले के गांव में जाकर लोगों से शांति और प्रेम बनाए रखने की अपील कर रहे हैं। बाहर के जिलों में दर्जनों की संख्या में अस्थाई जेल बनाए गए हैं । स्कूल और अन्य निजी बिल्डिंग्स को अस्थाई जेल के लिए चिन्हित किया गया है। अयोध्या के हर इलाके में अर्धसैनिक बलों की तैनाती है। गृह मंत्रालय ने इस फैसले को देखते हुए सभी राज्यों को सलाह दी है कि वे सतर्क रहें। कुछ लोगों का मानना है फैसला 13 से 16 नवंबर के बीच किसी भी दिन हो सकता है। ज्यादा संभावना 13 नवंबर या फिर 14 नवंबर को है। सुप्रीम कोर्ट के कैलेंडर को अगर देखा जाए तो वहां कार्य दिवस 7 और 8 नवंबर ही हैं। इसके बाद 9, 10, 11 और 12 नवंबर को छुट्टी है। 13 नवंबर को कोर्ट खुलेगा। 16 नवंबर को शनिवार और 17 नवंबर को रविवार है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई 17 नवंबर को रिटायर कर जाएंगे यानी  फैसला 15 नवंबर के पहले हो जाना चाहिए।
         अगर इस मामले पर कोई ठोस फैसला नहीं आता और इस फैसले को देश के अधिकांश लोग मानने से इनकार कर देते हैं तो स्थिति बहुत जटिल हो जाएगी। भारत का विभिन्न जातियों में बटा समाज अपने-अपने नजरिए से पूरी स्थिति का विश्लेषण करने लगेगा और वह विश्लेषण एक प्रतिक्रिया को जन्म देगा जिससे व्यापक अंतर्विरोध पैदा हो जाएगा। भारतीय जनता पार्टी की मौजूदा राजनीति कई तरह के परम्यूटेशन और कंबीनेशन से जुड़ी है। जो अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है। अयोध्या का मामले का फैसला हिंदुओं के पक्ष में हो या ना हो यह आने वाले दिनों की सियासत की नई दिशा तय कर सकता है। देखना यह है कि वह दिशा किधर जाएगी। इस बारे में अभी से कुछ भी कहना बहुत जल्दीबाजी होगी। जो कुछ भी होगा वह वक्त बताएगा।
       


Thursday, November 7, 2019

रक्षक ही अरक्षित है

रक्षक ही अरक्षित है 

समय की विडंबना है कि हमारी रक्षा के लिए बनाई गई पुलिस खुद अरक्षित है। हम रोज  पुलिस के साथ  राजनीतिज्ञों  और उनसे जुड़े हुए लोगों के दुर्व्यवहार देखते हैं, सुनते हैं, अखबारों में पढ़ते हैं  और  यह कह कर  टाल देते हैं  कि ऐसा  तो होता ही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है अभी हाल में दिल्ली में एक अद्भुत घटना हुई है। दिल्ली प्रदेश के पुलिस कर्मचारियों ने कमिश्नर के कार्यालय के समक्ष उपस्थित होकर मांग की उनकी सुरक्षा हो। ऐसा कोई दूसरा उदाहरण है भारतीय पुलिस के इतिहास में नहीं । झगड़ा किस बात का हुआ कि बात यहां तक आ गयी। तीस हजारी कोर्ट के समीप पार्किंग के विवाद को लेकर वहां कानून की हिफाजत करने वाले वकीलों ने पुलिस की पिटाई कर दी। उनका दावा है कि पुलिस ने गोलियां चलाई जिससे  वकील घायल हो गए और उसी की प्रतिक्रिया के स्वरूप यह सारा बवाल हुआ। इसके बाद दिल्ली की सभी अदालतों के वकील हड़ताल पर चले गए । अजीब बात है! अब अगर इस घटना की समुचित जांच हो तभी हकीकत सामने आएगी। लेकिन अगर इस पूरी घटना को अपराध शास्त्रीय दृष्टिकोण से विश्लेषित करें तो दो प्रवृतियां उभरकर सामने आ रही हैं । पहली कि , हमारा समाज तत्काल न्याय चाहता है और वह न्याय भीड़ की कार्रवाई द्वारा मुहैया कराया जा रहा है।  दूसरा, पुलिस के उच्चाधिकारी और साधारण पुलिसकर्मी के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं।
        हमारे समाज में कानून की प्रतिष्ठा समाप्त होने के कई उदाहरण हैं इनमें सबसे महत्वपूर्ण है कानून को लागू करने में ढिलाई और पक्षपातपूर्ण ढंग से कानून को लागू करने की प्रवृत्ति। कई मामले तो ऐसे भी देखे गए हैं जिसमें पुलिस खुद कानून की परवाह नहीं करती। खुल्लम-खुल्ला लोग कानून का उल्लंघन करते हैं और या तो अपने रुतबे की धौंस  दिखाकर या फिर पुलिस कर्मचारियों से सांठगांठ करके मामला रफा-दफा कर दिया जाता है। हालात धीरे-धीरे बिगड़ते गए और अब विश्रृंखलता पैदा हो गई। हालात बेकाबू होने लगे हैं । लिंचिंग करने वाली भीड़ के लोग कैमरे के सामने डिंग मारते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है हमलावरों को पिछले हमले के बाद कोई सजा नहीं मिली। वह कानून के पंजे से बचा लिए गए। यह सब राजनीतिज्ञों के सहयोग से होता है । क्योंकि अपराधी उनकी पार्टी के सदस्य होते हैं। अब यह जो बचने की और बचा लिए जाने की प्रक्रिया है वह चारों तरफ फैल गई है । कुछ दिन पहले बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार को मार डाला गया  क्योंकि वह गौ रक्षकों की भीड़  से एक कथित गौ हत्यारे को बचाना चाहते थे। जहां तक पुलिस का पक्ष है तो उसे देखने से ऐसा लगता है कि केवल कानून हीनता ही मुख्य कारण नहीं है या कि चुनौती नहीं है बल्कि उनके अधिकारियों की प्रभावहीन भूमिका भी इसमें सहयोग करती है।
             यह स्पष्ट होता जा रहा है कि पुलिस के बड़े अधिकारियों का पूरी तरह राजनीतिकरण हो गया है। यहां तक कि वे अक्सर अपनी मुश्किलों के लिए राजनीतिक वर्ग को दोष देते हैं । लेकिन वरिष्ठ अधिकारी राजनीतिक सांठगांठ से ही काम करते हैं। क्योंकि इससे उनके कैरियर को लाभ होता है।  अच्छी जगह नियुक्ति होती है। वरिष्ठ अधिकारी खासकर आईपीएस अधिकारी पुलिस सुधार की बात करते हैं लेकिन उसकी बात कभी नहीं करते या उसमें कोई दिलचस्पी नहीं लेते हैं जो उनके अधिकार क्षेत्र में है । वे पुलिस कर्मचारियों के रहन सहन और कामकाज की स्थिति को सुधारने में कोई दिलचस्पी नहीं लेते। वह हथियारों के आधुनिकीकरण ,संचार व्यवस्था में सुधार और आधुनिक औजारों की बात करते हैं। लेकिन कभी भी ट्रेनिंग के स्तर की बात नहीं करते।
       अभी समय आ गया है कि पुलिस के बड़े अधिकारियों को पुलिस में सुधार की बात गंभीरता से उठानी होगी। क्योंकि पुलिस एक सेवा है पुलिस  बल नहीं है।


Wednesday, November 6, 2019

पाकिस्तान को कश्मीर से नहीं अफगानिस्तान से ज्यादा खतरा है

पाकिस्तान को कश्मीर से नहीं अफगानिस्तान से ज्यादा खतरा है

कश्मीर का मसला क्षेत्रीय और ग्लोबल एजेंडे से मिट नहीं सकता लेकिन पख्तून का सवाल है जो पाकिस्तान के और इस उपमहाद्वीप के भविष्य को हमेशा शंकित करता रहेगा सदा भयभीत करता रहेगा। हरदम एक प्रकार का भय बना रहेगा। जमायत उलेमा ए इस्लाम के नेता मौलाना फजलुर रहमान का आरोप है पाकिस्तानी सत्ता भारतीय एजेंडे को आगे बढ़ाने में लगी है। मौलाना ने कहा है कि इमरान खान ने ही कहा था कि "अगर मोदी दोबारा सत्ता में आ जाते हैं तो कश्मीर का विवाद खत्म हो जाएगा।" रहमान का कहना है कि इमरान खान अयोग्य हैं और उन्होंने कश्मीर को बदलाव से रोका नहीं। इस्लामाबाद में भारत पर चारों तरफ से आरोप लगाए जा रहे हैं । पाकिस्तानी सत्ता ने आरोप लगाया कि अफगानिस्तान और तालिबान के झंडे इस देश में चारों तरफ लहराए जा रहे हैं। मौलाना ने इसे फालतू बात कहते हुए नकार दिया। हालांकि मौलाना ने अपने समर्थकों से कहा है कि वे तालिबान का झंडा नहीं लहराएं। लेकिन  उन्होंने जनता को यह भी स्मरण दिलाया कि पाकिस्तान और अन्य देशों की सरकारें तालिबान को गले लगा रही हैं।
     चाहे जो हो, मौलाना और इमरान दोनों तालिबान के समर्थक रहे हैं। इस्लामाबाद में यह माना जा रहा है भारत एक खतरा है तथा तालिबान दोस्त। इस जुमले में एक कटु सत्य है जो पाकिस्तानी नहीं देख पा रहे हैं और ना समझ पा रहे हैं । पाकिस्तान को सबसे बड़ा खतरा अफगानिस्तान से है, कश्मीर से नहीं। कश्मीर के बारे में जो पाकिस्तान में बड़बोला पन चल रहा है और दिल्ली के प्रति जो खीझ पैदा हो रही है वह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना महत्वपूर्ण अफगानिस्तान में गृह युद्ध की संभावनाएं हैं। अरसे से भारत और पाकिस्तान दोनों मुल्कों में एक रहस्य को हवा दिया जा रहा है कि जब तक कश्मीर पर पूर्ण नियंत्रण नहीं होगा तक तक भारत या पाकिस्तान के राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया संपूर्ण नहीं होगी। एक दूसरी कहानी है कि जम्मू कश्मीर क्षेत्रीय सुसंगति हकीकत को विचलित कर देती है । यहां कई विविधता पूर्ण क्षेत्र एक जगह आ जुटे हैं। तीसरी बात यह घूम रही है कि कश्मीर का जियोपोलिटिकल महत्व ऐसा है कि यह दुनिया का सबसे खतरनाक परमाणु युद्ध का स्थल बन गया है। यह रहस्योद्घाटन वाशिंगटन में परमाणु अप्रसार के समर्थकों ने किया था ।  ये लोग सदा भारत और पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रमों को खत्म करने में जुटे रहते थे। इस इस कथा से पाकिस्तान ने एक नया सबक सीखा। उसने परमाणु की अपनी रणनीति के माध्यम से दुनिया को ब्लैकमेल करना शुरू किया और दुनिया के विभिन्न देशों ने परमाणु के आतंक के दबाव में दिल्ली को यह समझाना शुरू किया कि वह अपनी जमीन छोड़ दे । एक और कहानी बीच में जुड़ती है, जिसके अनुसार भारत और पाकिस्तान में विवाद का मुख्य विंदु कश्मीर है । लेकिन किसी भी तरह से यह स्पष्ट नहीं है कि यदि भारत पाकिस्तान के साथ कश्मीर का मसला हल कर ले तो रातों-रात पाकिस्तान-भारत  दोस्त हो जायेंगे। भारत और पाकिस्तान के  विवाद की चड़ बंटवारे की विरासत में गहराई तक घुसी हुई है। यही नहीं बात तो यह भी चलती है कि  भारत कश्मीरियों को मुक्त कर दे और यदि रावलपिंडी अंतरराष्ट्रीय समुदाय को  इतने दबाव में डाले कि उनके चलते भारत कश्मीर छोड़ने पर मजबूर हो जाए। पाकिस्तान से अपने विवाद में अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप को लेकर दिल्ली भी भीतर -भीतर आतंकित थी।  इस मामले में  दिल्ली की तरफ से पाकिस्तान को सिर्फ एक रियायत मिली की 1947 -48  में यह मामला राष्ट्र संघ में ले जाया गया।
       कई युद्ध और सैनिक कार्रवाई  के बाद भी कश्मीर का मसला हल नहीं हो सका। अब कहा जाता है कि इस उपमहाद्वीप के उद्भव में कश्मीर मुख्य रहा है । कश्मीर यकीनन पाकिस्तान के लिए एक अत्यंत भावना प्रधान मसला रहा है। दोनों देशों में यह विभाजन की ऑडियोलॉजिकल विरासत रहा है। रावलपिंडी के सेना मुख्यालय के लिए यह 1971 के बदले का आधार भी रहा है। कश्मीर भारत-पाक के बीच राजनीति का मुख्य आधार भी है।
           उपमहाद्वीप पर कश्मीर में गतिरोध और अफगानिस्तान के प्रभाव की तुलना करें तो इतिहास में अब तक उपमहाद्वीप पर जितने बड़े सैनिक अभियान हुए हैं वह अफगानिस्तान की तरफ से हुए हैं। आज के जमाने में या कहें कि पिछले 4 दशकों में अफगानिस्तान ने दुनिया को क्या दिया? 1978 में सोवियत कब्जे के दौरान सोवियत सेना के खिलाफ पाकिस्तान समर्थित जिहादी दुनिया के हर कोने से एकत्र किए गये और उन्हीं के माध्यम से पाकिस्तान की हुकूमत ने  जन समुदाय को कट्टर इस्लाम की घुट्टी दी। पाकिस्तान में तालिबान और अल कायदा का विकास हुआ। अमेरिकी फौज पर लगातार हमले होते रहे और अब अमेरिका वहां से बाहर निकलना चाहता है और यह  तालिबान की वापसी का एक संभावित वक्त है। कश्मीर का गतिरोध कायम रहेगा लेकिन यह अफगानिस्तान की रणनीति है जो क्षेत्रीय व्यवस्था को एक बार फिर गड़बड़ाएगी और इसका सबसे बुरा असर पाकिस्तान पर पड़ेगा। कश्मीर में फिलहाल जो हालात हैं उससे भारत में बहुत कुछ नहीं बिगड़ेगा सिवा इसके कि पाकिस्तान प्रत्यक्ष रूप में भारत पर हमला कर दे और यह आशंका लगातार बनी हुई है। यही नहीं ,अगर इमरान खान को सत्ता से हटा दिया गया और वहां मौलाना सत्ता में आ गए तो एक बार अपनी लोकप्रियता को प्रदर्शित करने के लिए मौलाना जरूर भारत की तरफ रुख करेंगे। लेकिन इससे कुछ होने वाला नहीं है उल्टे पाकिस्तान में कट्टर इस्लामीकरण   की मांग बढ़ जाएगी जो आने वाले वक्त में विश्व के लिए खतरा बन सकती है।


Monday, November 4, 2019

महानगरों में बढ़ता प्रदूषण और उससे उत्पन्न समस्याएं

महानगरों में बढ़ता प्रदूषण और उससे उत्पन्न समस्याएं 

राजधानी दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बुरी तरह खराब हो चुका है और देश के सबसे पुराने महानगर कोलकाता में भी हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। कोलकाता में काली पूजा दिवाली और भाई दूज के बाद हालात बिगड़े हैं। पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्ययनों के अनुसार उत्तर कोलकाता में एयर क्वालिटी इंडेक्स 233 हो गया है यानी  पार्टिकुलेट मटेरियल  का प्रतिशत  2.5  के स्तर पर पहुंच गया है। 201 से 300 तक की स्थिति बहुत खराब मानी जाती है और इससे आचरण संबंधी और तरह-तरह की सांस की बीमारियां होती हैं ।
यह आज हिंसा से विश्वपर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, उससे कर्म में असन्तुलन उपस्थित हो गया है। इससे बचने के लिए वेद-प्रतिपादित सात्त्विक भाव अपनाना पड़ेगा।
‘स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्या चन्द्र मसाविव। पुनर्ददताsध्नता जानता संगमेमदि।।’
(ऋग्वेद 2.11.4)
इसी से ऋग्वेद (1.555.1976) के ऋषि का आशीर्वादात्मक उद्गार हैः 'पृथ्वीः पूः च उर्वी भव।' अर्थात्, समग्र पृथ्वी, सम्पूर्ण परिवेश परिशुद्ध रहे, नदी, पर्वत, वन, उपवन सब स्वच्छ रहें, गांव, नगर सबको विस्तृत और उत्तम परिसर प्राप्त हो, तभी जीवन का सम्यक् विकास हो सकेगा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए वैज्ञानिक शोधों के अनुसार भी यह प्रतिपादित होता है।प्रदूषण के बढ़ने के साथ-साथ अपराध वृत्ति भी बढ़ती जाती है। यह तो सर्वविदित है सिगरेट पीने से जितने लोगों की मौत होती है उससे कहीं ज्यादा मृत्यु प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारियों से होती है। कोलोरेडो विश्वविद्यालय की एक टीम के शोध के अनुसार धुआं और ओजोन इंसानी आचरण में भयंकर परिवर्तन करते हैं और जितना ज्यादा प्रदूषण होगा इंसानी आचरण खास करके हिंसक आचरण में वृद्धि होती जाएगी। शोध के अनुसार अगर सर्दी का मौसम है तो यह हालात और बिगड़ जाते हैं। एफ़बीआई के अपराध के आंकड़े और अमेरिका में विगत 8 वर्षों में वायु प्रदूषण के अध्ययन से पता चला है कि दोनों में एक आंतरिक संबंध है। जैसे -जैसे प्रदूषण बढ़ता है अपराध वृत्ति भी बढ़ती जाती है। शोध में पता चला है कि प्रत्येक घन मीटर में 10 माइक्रोग्राम वृद्धि हिंसक अपराधों में 1.4% की वृद्धि कर देता है । शोधकर्ताओं ने पाया है कि 0.01 पीएम यानी पार्ट पर मिलियन की वृद्धि से  1.15% हमलावर आचरण में वृद्धि होती है। शोधकर्ताओं के मुताबिक पार्टिकुलेट स्तर में 10% की गिरावट प्रतिवर्ष अपराध रोकथाम में 1.4 अरब डालर की बचत कर सकता है। लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के शोधकर्ताओं ने पिछले साल सुझाव दिया कि वायु प्रदूषण और अपराध में संबंध का कारण कॉर्टिसोल हार्मोन की वृद्धि से उत्पन्न तनाव  है।
         वायु प्रदूषण के लिए अंतरराष्ट्रीय क्वालिटी का स्तर 50 से कम होना अच्छा माना गया है। किंतु लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स मुताबिक 35 का आंकड़ा अपराध में 2.8% की वृद्धि करता है। कोलकाता में यह आंकड़ा इस समय काफी बढ़ा हुआ है। शोध के मुताबिक फिलहाल जो नियामक हैं उससे कहीं कम स्तर पर भी प्रदूषण होने से अपराध वृत्ति बढ़ रही है। अपराधों में रोकथाम और समाज में अपराध वृत्ति में कमी के लिए जरूरी है कि वायु प्रदूषण के स्तर को कम किया जाए। पिछले साल किए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि वायु प्रदूषण जहां ज्यादा होता है वहां भ्रष्टाचार बढ़ता है और नैतिकता दूषित होती है।
सदर्न कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की एक  टीम के अध्ययन के अनुसार इसका सबसे ज्यादा असर किशोरों   पर पड़ता है। पार्टिकुलेट स्तर में वृद्धि का सीधा संबंध टीनएजर्स के आचरण खास करके और सामाजिक आचरण से होता है ।
कोलकाता में जैसे-जैसे वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है छात्रों में मानसिक विकृति और अस्पतालों में भीड़ बढ़ती जा रही है। यह तो एक नमूना है। अगर प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं किया गया तो तरह - तरह की विकृतियां उत्पन्न होंगी और इससे समाज एक बार फिर  असंतुलित हो जाएगा।
पर्यावरण को स्वच्छ-सुन्दर रखने का आग्रह सिर्फ भावनात्मक स्तर पर किया गया हो, ऐसी बात नहीं है। वैज्ञानिक अनुसन्धान के सन्दर्भ में भी सात्विकता की भावना से अनुप्राणित होकर गहरे मानवीय सम्बन्ध की स्थापना पर पर्याप्त बल दिया गया है। उदाहरणार्थ, ऋग्वेद (1.164.33) में वैज्ञानिक अनुसन्धान की प्रक्रिया में भी सूर्य को पिता, पृथ्वी को माता और किरण-समूह को बन्धु के समान आदर देने का स्पष्ट निर्देश है। आज तो गलत प्रतिस्पर्धा के कारण विश्वपर्यावरण विषाक्त बनता जा रहा है। प्रशीतन एवं वातानुकूलन के कृत्रिम प्रयास पारिस्थिति के लिए अभूतपूर्व संकट उत्पन्न कर रहे हैं।


Sunday, November 3, 2019

राष्ट्रीयता के बदलते मायने

राष्ट्रीयता के बदलते मायने 

कभी आपने गौर किया है कि राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद में फर्क क्या है ? शायद किसी ने इस ओर सोचा नहीं है या उस पर सोचने का वक्त नहीं मिला है। हाल के दिनों में राष्ट्रवाद बड़ी सफाई से राष्ट्रीयता में प्रवेश कर गया है। यानी, जो राष्ट्रवादी है वही राष्ट्र का नागरिक है, बाकी सब इस देश के नहीं हैं। राष्ट्र राज्य , सिंहासन, राष्ट्रगान इत्यादि के प्रतीक हमारी चेतना से लगभग ओझल हो चुके हैं वैसे कायम जरूर है विलुप्त नहीं हुए हैं। अगर मनोवैज्ञानिक तौर पर देखें तो आधुनिक राष्ट्र राज्य शक्तिशाली हो गया है । इसलिए इन प्रतीकों का महत्व अब स्मृति केंद्रित हो गया है। जरा सोचिए झंडा क्या है. अगर नेपोलियन की बात करें  तो झंडा महज कपड़े का एक टुकड़ा है जिसे कुछ ज्यादा महत्त्व दे दिया गया है। नेपोलियन के बाद से वक्त बहुत बदल गया है और बदलते वक्त के साथ प्रतीक भी बदल गए हैं आज यह सवाल कि झंडा क्या है ,इसलिए उठाया जा रहा है कि पिछले कुछ महीनों से कई जगह झंडो की बात चली । जिसमें कुछ तो बहुत ही झकझोरने वाले  थे। वे थे कश्मीर में एक ध्वज निरस्त हो गया और दूसरा है नगालैंड में रक्तरंजित बगावत को खत्म करने की जल्दी।  शांति वार्ता अब आखरी पायदान पर है और ऐसे ही सवाल पर आकर अटक गई है । नगा क्रांति की बात चल रही है। इससे एक बात स्मृति में आती है। इसे लेकर दोनों पक्ष क्या कहते हैं यानी क्रांतिकारी नगा और सरकार जहां तक खबर है दोनों मानते हैं कि दोनों ने एक दूसरे के साथ बुरा किया है। हिंसा से कुछ मिलने वाला नहीं है। लेकिन बात झंडे पर अटक गई है ।  नगा पक्ष अभी भी पृथक झंडे की मांग कर रहा है और मोदी सरकार यह मांग नहीं मान रही है। मामला है नागालैंड की राजधानी कोहिमा में भी तिरंगा लहराने की है। बात यहां तक आ गई है कि  सरकार कह रही है कि वे अपने सांस्कृतिक और सामुदायिक अवसरों के लिए बेशक अपना झंडा रख सकते हैं। लेकिन नगा आंदोलनकारी इसे मानने को तैयार नहीं है उनका कहना है यह तो एक एनजीओ वाली बात हुई।  आप विशेष अवसरों के लिए अपना झंडा रख सकते हैं। समझौता वार्ता ऐसी होनी चाहिए कि दोनों थोड़े थोड़े असंतुष्ट रहें। कम से कम यह तो कहा जाए कि दोनों  कुछ ऐसी बातें मानते जो भी नहीं मानना चाहते थे। नगा नेताओं को झंडेवाली अपनी शर्त  पर समझौता करना अपमानजनक महसूस हो रहा है । दूसरी तरफ राष्ट्रवाद का ढोल बजाने वाली मोदी सरकार के लिए भी यह विकल्प  है क्योंकि अभी हाल में श्रीनगर में जम्मू कश्मीर का झंडा उतारे जाने का जश्न सरकार मना चुकी है और इसे सरदार पटेल के जन्मदिन की श्रद्धांजलि के तौर पर पेश किया। राष्ट्रवाद को रेखांकित करते हुए जो चीज एक बड़े राज्य से छीन ली गई एक छोटे आदिवासी राज्य को कैसे सौंपी जा सकती है?
        नरेंद्र मोदी की चिंतन धारा और अटल बिहारी वाजपेई की चिंतन धारा में एक बुनियादी फर्क है। अटल जी से एक बार जब सन्मार्ग ने एक बार पूछा  था की भारत सरकार संविधान के ढांचे के अंतर्गत वार्ता के लिए अड़ी है तो इसमें कश्मीरी अलगाववादी कैसे शामिल होंगे? बाजपेई जी ने ऐसा उत्तर दिया था सब लाजवाब हो गए  थे। उनका कहना था कि हम इंसानियत के ढांचे के अंदर बात करेंगे। लेकिन नरेंद्र मोदी ने ऐसा कुछ  भी कभी नहीं कहा है। उन्होंने राष्ट्रवाद को एक कठोर स्वरूप दे दिया है और इस तरह का राष्ट्रवाद कभी भी लचीला नहीं हो सकता। यही कारण है कि किसी राज्य के झंडे को उतारना एक वक्त में जश्न बन जाता है ।  जब कोई  राज्य अपने खुद के झंडे मांग करता है तो उसका प्रतिकार किया जाता है जबकि एक अन्य राज्य, कर्नाटक, के झंडे को बमुश्किल बर्दाश्त किया जाता है। सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाना बंद नहीं किया गया है उसे ऐसा करने की हिम्मत ही नहीं है जबकि इससे संबंधित आदेश सुप्रीम कोर्ट वापस ले चुका है। जब कोई राष्ट्रगान के बजने के दौरान अपनी सीट से खड़ा नहीं होता तो उसे परेशान किया जाता है। इसका मतलब है कि नई पीढ़ी के भारतीय एक दूसरे को यह जताना चाहते हैं कि वह केवल देश भक्त ही नहीं राष्ट्रवादी भी हैं।
      1960 के दशक आज तक हम जिस खौफजदा माहौल में रह चुके हैं शायद आज का नौजवान उसकी कल्पना नहीं कर सकता। 1961 से  लेकर 1971 तक का भारत ने चार बड़ी और कई छोटी-छोटी लड़ाइयां लड़ी है। 1961 में गोवा का युद्ध और 71 में बांग्लादेश का युद्ध। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि  1971 का युद्ध अगले 5 दशक के लिए आखरी युद्ध होगा और इस अंतराल में भारत  अलगाववादी राजनीतिक आंदोलनों को खत्म कर देगा। ऐसा  2014 के बाद नहीं हुआ अगर आप इतिहास देखेंगे 2003 में ऑपरेशन पराक्रम खत्म हुआ था और भारत उस मोड़ पर दबाव की रणनीति का प्रयोग किया। यानी, आज से 15 साल पहले ही भारत अपने शिखर पर पहुंच चुका था और वहां से उसे लौटना आसान नहीं है। लेकिन यहां भी एक बात कहनी जरूरी है कि आज की हमारी राजनीति हमारी सामाजिक समरसता को अगर खत्म नहीं करती है। भारत बिल्कुल सुरक्षित है। आज का भारत इतना ताकतवर और महत्वपूर्ण हो गया है कि उसे दबाया नही जा सकता है ना उसकी जमीन हड़पी जा सकती है। लेकिन शायद हमारी विचारधारा ऐसी नहीं है । हम आज चिंतित हैं और हमारे चिंतित होने का मुख्य कारण है कि इस सरकार के कुछ आलोचक जो लगातार आरोप लगा रहे हैं कि भारत ने कश्मीर मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण कर दिया। लेकिन शायद इससे कोई विचलित नहीं हुआ है। कश्मीर में धारा 370 हटाने के बाद से अब तक शायद ही किसी देश ने इस बदलाव को रद्द करने के लिए कहा है । सबने इसे भारत का आंतरिक मामला माना है। बेशक यह हमेशा नहीं हो सकता। कश्मीर में स्थिति बहुत जल्दी सामान्य होनी चाहिए इसके नेताओं को ज्यादा दिनों तक कैद में नहीं रखा जा सकता। संचार संवाद पर से रोक हटाने होगी वरना अंतरराष्ट्रीय समुदाय से दबाव पड़ने लगेगा। यहां एक सवाल है कि क्या कश्मीर  राष्ट्रीय गीत गाने की उतनी ही मजबूत उपस्थिति कायम रखेगा जैसा देश के अन्य भाग में है या सामूहिक असुरक्षा को भड़काता रहेगा।
          कश्मीर के नए हालात से ऊपजी चुनौती यह नहीं है कि इसका अंतरराष्ट्रीय होगा बल्कि यह है कि इससे पहले यह इतना बड़ा आंतरिक मामला नहीं बना था। कश्मीर में समस्या का मतलब है पाकिस्तान ,इस्लामाबाद, पांचवां खंभा, जिहादी आतंकवाद वगैरह ।  1972 से 2014 के बीच के वक्त में भारतीय राष्ट्रवाद तनाव मुक्त सुरक्षित एहसास के साथ आगे बढ़ रहा था लेकिन अचानक कुछ ऐसी स्थिति पैदा कर दी गई हमें उसी भय से मुकाबले के लिए कहा जा रहा है जिसे 50 साल पहले दफनाया जा  चुका है। एक तो है झंडे को उतारा जहां  एक तरफ जश्न बन जाता है वहीं इसकी मांग को मानना  सुविधाजनक मजबूरी हो जा रही है। हमें इस मानसिकता से उबरना होगा वरना हम पीछे लौटने के लिए बाध्य हो जाएंगे।


Friday, November 1, 2019

कश्मीर में बाहरी दखल मंजूर नहीं

कश्मीर में  बाहरी दखल मंजूर नहीं 

भारत ने कश्मीर मामले पर चीन के बयान पर पलटवार करते हुए की पुनर्गठन पूरी तरह भारत का आंतरिक मामला है, इसमें किसी भी देश की दखलंदाजी मंजूर नहीं है । जबकि चीन ने गुरुवार को कहा था यह गैरकानूनी और अमान्य है। भारत ने उसके क्षेत्र को अपने अधिकार में शामिल कर उसकी संप्रभुता को चुनौती दी है। भारत सरकार ने चीन के दावे को खारिज करते हुए कहा कि 1963 के तथाकथित चीन पाकिस्तान सीमा समझौते के तहत पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के भारतीय क्षेत्र पर चीन ने अवैध कब्जा कर रखा है। कश्मीर जब से भारत में शामिल हुआ और उसके टुकड़े पर पाकिस्तान ने गैरकानूनी ढंग से कब्जा किया तब से आज तक वहां किसी न किसी देश की दखलंदाजी से खून खराबा होता रहा है।  विगत तीन दशकों से राज्य में सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के बावजूद कश्मीरी आतंकी पूरी तरह काबू में नहीं हैं और ना वहां के प्रदर्शनों को दबाया जा सका ।  ऐसे में देश एक ,संविधान एक का विचार लागू करने का फैसला किया गया और जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर दिया गया। साथ  ही उसका विशेष झंडा भी निरस्त कर दिया गया। पाकिस्तान और दूसरे पड़ोसी देश  चीन  इसे गैर कानूनी बताकर वहां फिर बगावत को हवा देने की तैयारी में है। कश्मीरी झंडे को निरस्त किए जाने यह बारे में यह अफवाह फैलाई जा रही है झंडे के कारण कश्मीरी जनता की भावनाओं को आघात लगा है। इसी आघात की भावना को प्रतिबिंबित करने के लिए पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने दक्षिण कश्मीर में 2 हफ्ते से कम वक्त में 11 लोगों की हत्या कर दी। हालांकि  यह नया नहीं है।  लेकिन ,रणनीति बदल गई है  और पाकिस्तान के  आई एस आई की शह पर  आतंकी गैर कश्मीरियों को मार रहे हैं । वे साथ ही अल्पसंख्यकों को भी मार रहे हैं। कश्मीर में दो अल्पसंख्यक जातियां हैं। एक तो कश्मीरी हिंदू और दूसरे सिख।  यह दोनों जातियां कश्मीर के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में छोटे-छोटे मोहल्लों में रहते हैं। शहरी क्षेत्र तुलनात्मक रूप से थोड़े सुरक्षित हैं लेकिन ग्रामीण क्षेत्र खतरनाक और  जोखिम भरे हैं । हालांकि 1990 में कश्मीर में हिंदुओं का पलायन हो गया। यह भी  अभी पाकिस्तान की एक रणनीति थी लेकिन इसमें से कुछ लोग वहां रुक गए। अब समय-समय पर यही लोग पाकिस्तान के आतंकवादी समूहों के निशाने पर रहते हैं।
प्रवासी कश्मीरियों की हाल में  हो रही हत्या फिलहाल सबसे खतरनाक हैं। वहां रहने वाले लगभग 20 हजार प्रवासियों को गंभीर खतरा है। हथियारबंद और प्रशिक्षित आतंकी कश्मीर में विभिन्न स्थानों पर छिपे हुए हैं और उन्हें बाहरी कमांडरों से निर्देश मिलते हैं। इस समय सबसे ज्यादा ध्यान शोपियां कुलगांव पुलवामा और अनंतनाग पर है। क्योंकि यहीं सबसे ज्यादा प्रवासी रह रहे हैं। हाल में आई एस आई ने अपनी रणनीति में थोड़ा परिवर्तन किया है और उसने वहां विदेशी आतंकियों को तैनात कर दिया है, जो स्थानीय आतंकियों को निर्देश दे रहे हैं । क्योंकि ये पाकिस्तानी कमांडर आई एस आई के लिए ज्यादा विश्वसनीय तथा स्थानीय लोगों के लिए ज्यादा बर्बर और क्रूर हैं।
अब इस प्रवृत्ति का अगर सावधानीपूर्वक विश्लेषण किया जाए तो पता चलेगा कि पाकिस्तान समर्थित गिरोह ऐसा कर लोगों के मन में  जब बैठ जाए कि यहां  सुरक्षित नहीं है और सब कुछ होने के बावजूद कश्मीर में अभी सामान्य स्थिति नहीं कायम हो सकी है। भारत को सिर्फ आतंकियों का सफाया नहीं करना पड़ेगा बल्कि उससे कुछ कदम आगे भी जाना होगा। हमारे देश की सुरक्षा संस्थाओं को आतंकियों को यह समझाना होगा कि वे  जिस अल्पसंख्यक और बाहरी समुदायों  पर हमले कर रहे हैं उसका उन्हें दंड भी मिल सकता है।
    


Thursday, October 31, 2019

आधी रात से बंट गया एक राज्य

आधी रात से बंट गया एक राज्य 

कुछ साल पहले एक बहुत मशहूर किताब आई थी "फ्रीडम एट मिडनाइट।" उस किताब में भारत की आजादी की व्याख्या थी। उसके कुछ साल पहले सचमुच आधी रात को भारत आजाद हुआ था तो जवाहरलाल नेहरू ने एक भाषण दिया था उसकी सबसे मशहूर पंक्ति है "ट्राईस्ट विद डेस्टिनी" आज हम उसी डेस्टिनी से मुकाबिल हैं। अब 30 अक्टूबर की रात धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर 2 राज्यों में बंट गया। अब से कोई  कोई 72 वर्ष पहले कश्मीर के शासक महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ कश्मीर के विलय की संधि  जिसके बाद यह रियासत भारत का अभिन्न हिस्सा बन गई । बंटवारे का यह समां इतिहास में दर्ज हो गया। 5 अगस्त को जम्मू और कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने के बाद उसे दो हिस्से में बांटने का फैसला भी किया गया था। एक हिस्सा था लद्दाख और दूसरा जम्मू कश्मीर। साथ ही दोनों को केंद्र शासित राज्य भी घोषित कर दिया गया था। जम्मू कश्मीर को मिला राज्य का दर्जा गुरुवार को खत्म हो गया और उसके साथ ही उसे 2 केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया। इसके साथ ही  राज्यों के उपराज्यपाल भी अपना पदभार संभाल लेंगे। जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल होंगे गिरीश चंद्र मुर्मू और लद्दाख का भार आरके माथुर को सौंपा गया है।
      भारत के इतिहास की यह पहली घटना है जब दो केंद्र शासित राज्य एक ही राज्य से निकले हैं। इसके साथ ही देश में राज्यों की संख्या 28 और केंद्र शासित प्रदेशों की संख्या नौ हो गई । दोनों केंद्र शासित प्रदेश देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती के दिन अस्तित्व में आ गए । सरदार पटेल को देश की 560 से ज्यादा रियासतों के भारत में विलय का श्रेय है । हमारे  देश में  31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है। कानूनन केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में पुडुचेरी की तरह ही विधानसभा होगी जबकि लद्दाख  चंडीगढ़ की तर्ज पर बगैर विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेशों होगा।
      हालांकि आगे क्या होगा इस बारे में कुछ भी कहना बहुत जल्दी बाजी होगी। किंतु केंद्र को उम्मीद है कि अब वार्ता आरंभ हो जाएगी और कश्मीर के सभी मशहूर नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जो राजनीतिक शून्य कायम हो गया है, वह भरना शुरू होगा। केंद्र सरकार एक नया राजनीतिक उत्प्रेरण शुरू कर रही है जो वहां के लोगों और नई दिल्ली के बीच बातचीत का आधार बनेगा। जम्मू और कश्मीर एक बहुत बड़े बदलाव से गुजर रहा है और यह बदलाव वे लोग ज्यादा महसूस कर रहे हैं जो कभी सत्ता में हुआ करते थे और इसलिए उनकी बेचैनी को समझा जा सकता है। कश्मीर में एक सबसे बड़ा तत्व है पाकिस्तान के बरअक्स वहां की सुरक्षा की स्थिति। क्योंकि पाकिस्तान  कश्मीर के राष्ट्र विरोधी तत्वों को लगातार और अबाध मदद करता है। अब कश्मीर में जो राजनीतिक मैदान बचा है उसमें नए खिलाड़ी प्रवेश कर रहे हैं लेकिन पुराने खिलाड़ियों को पछाड़ना आसान नहीं होगा। नए लोगों के कश्मीर में पैर जमाने की बहुत कम घटनाएं सामने हैं। पीपुल्स कांफ्रेंस के सज्जाद लोन ने एक व्यवहारिक राजनीतिक विकल्प तैयार करने की कोशिश की लेकिन कुछ नहीं कर पाए। थोड़ी सी सफलता उन्हें कुपवाड़ा में मिली । फिलहाल नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी के आधार डगमगा रहे हैं और उसके कई कारण हैं। पहला कि वे खुलकर पंचायत चुनाव लड़े और राज्य भर के पंचायतों के पंच और सरपंच दूसरी पार्टियों के हैं। दूसरी बात यह है कि शासन में  उनकी पकड़ नहीं है और कश्मीरी इसे अच्छी तरह समझते हैं। वहां की अवाम किसी विकल्प की तलाश में है। तीसरी बात है कि वहां का सरकारी तंत्र केंद्र की बात सुनता है। राज्य का उस तंत्र पर या अफसरशाही पर कोई पकड़ नहीं है । पुरानी अफसरशाही का पुराने राजनीतिज्ञों से जो भी तालमेल है उससे नए तंत्र का उभार जरूरी है ताकि नए लोगों के समर्थक बढ़ सकें। अब इन नए खिलाड़ियों से क्या उम्मीद हो सकती है यह आने वाला वक्त ही बताएगा । इसमें सबसे महत्वपूर्ण है पाकिस्तान की गुप्त दखलंदाजी। पाकिस्तान को किसी भी तरह से रोका नहीं गया तो वह यहां गड़बड़ी पैदा करेगा । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी को रोकने की योजना में जुटे हुए हैं।


Wednesday, October 30, 2019

लोकतंत्र संकट में

लोकतंत्र संकट में 

पिछले कुछ महीनों से शायद ही कोई ऐसा दिन होता हो जब दुनिया के किसी न किसी देश में  प्रदर्शन ना होते हों और उसके दौरान हिंसा या तोड़फोड़ नहीं होते हों।  यह सब उन देशों में होता है जहां स्थापित लोकतंत्र  है। 2018 की अक्टूबर में फ्रांस में पीले जैकेट पहनकर प्रदर्शन शुरू हुए। वहां पीले जैकेट एक तरह से इस बात के बिंब थे कि उस देश में जीवन यापन महंगा होता जा रहा है और तेल की कीमतें बढ़ती जा रही हैं। कुछ प्रदर्शनों के दौरान सड़कें अवरुद्ध कर दी जाती थीं। जो इस बात का संकेत था कि निम्न वर्ग और मध्यवर्ग सरकार के  सुधार का विरोध कर रहा है । हर रविवार को प्रदर्शन होता था। जिसमें  मांग की जाती थी कि राष्ट्रपति मैक्रों और उनकी सरकार इस्तीफा दें। यह कई महीने चला । हाल में लेबनान  की सड़कों पर भी  प्रदर्शन हुए। यहां भी कई जगह तोड़फोड़ हुए और प्रदर्शन करने वाले सरकार के इस्तीफे की मांग कर रहे थे । वहां के लोग   खाद्यान्न  की बढ़ती कीमतों और महंगाई, भ्रष्टाचार और  बुनियादी वस्तुओं की आपूर्ति में कमी से नाराज थे। इन्हीं मसलों के कारण  इराक में भी प्रदर्शन हुए और कई जगहों पर हिंसा हुई। जिसमें कई लोग मारे गए। इसी तरह के प्रदर्शन अर्जेंटीना से चिली तक फैल  रहे हैं।  बेशक कैटेलोनिया का मामला अलग है । यहां स्पेन से आजादी की मांग को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं। बर्सिलोना में प्रदर्शन के कारण कई बार जीवन ठप हो गया था। इक्वाडोर में और बोलीविया में भी कई बार प्रदर्शन और हिंसक घटनाओं के कारण जीवन ठप हो गया। बोलीविया में तो प्रदर्शन केवल इसलिए हुए कि वहां राष्ट्रपति इवो मोराल्स पर चुनाव धांधली करने  का आरोप था। सभी देशों में एक बात समान थी वह कि सब जगह स्थापित लोकतंत्र व्यावस्था थी।
  ऐसे में विश्लेषकों, बुद्धिजीवियों तथा राजनीतिज्ञों का यह  फर्ज बनता है कि दुनिया के विभिन्न देशों में लोकतंत्र में जो कमियां उत्पन्न हो गईं हैं उनके प्रति आम जनता को बताएं ।  लगभग सभी देशों में परिलक्षित हो रहा है कि नेताओं  और जनता की अपेक्षाओं में संबंध विघटित हो रहे हैं। बुद्मजीवी वर्ग भी वक्त की ज़रूरतों तथा लोगों की अपेक्षाओं को पूरा के लिए राजनीति के स्वरूप क्या हो इस तथ्य को समझने में कामयाब नहीं हो पा रहा है। दुख तो इस बात को लेकर भी है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष में जनकल्याण को लेकर  दूरियां बढ़ती जा रहीं हैं। यहां तक कि नीतियों और निर्णयों को  निर्देशित करने वाले  द्विपक्षीय सम्बन्ध भी  खत्म हो गए से प्रतीत हो रहे हैं। जो लोग सत्ता में हैं वह विपक्ष का दमन करने में लगे हैं। विपक्ष भी समझता है कि बस उसकी जिम्मेदारी केवल सत्ता पक्ष के हर फैसले का विरोध करना है। अब इस प्रवृत्ति से ऐसा महसूस हो रहा है कि निर्वाचित प्रतिनिधि सBVव्व   जिस पक्ष के भी हो जनता से दूर है उनसे उनका कोई संबंध नहीं है इसके फलस्वरूप जनता में क्रोध और कुंठा बढ़ती जा रही है और यह क्रोध और कुंठा तरह तरह के प्रदर्शनों आंदोलनों और हिंसक घटनाओं में बिम्बित हो रही है जनता को यह भी महसूस हो रहा है कि उनके अधिकार छीने जा रहे हैं घोर पूंजीवाद का विकास और उसमें सत्ता पक्ष की गुटबाजी के कारण जनता के लिए आवंटित संसाधनों का दूसरी तरफ  चला जाना आम जनता में अपने हक को मारे जाने जैसा महसूस होता है ।  इससे गुस्सा और बढ़ता है। हाल में मौसम परिवर्तन को लेकर ग्रेटर थुन बर्ग द्वारा किए गए आंदोलन ने सब जगह प्रशंसा पाई। खनिज तेल उसके आंदोलन के चार्टर में था  लेकिन  अभी भी खनिज तेल ही सबसे सुलभ इंधन है।  इसे रोके जाने की कोई व्यवस्था सरकारों की तरफ से नहीं दिखाई पड़ रही है। विश्व बैंक के एक अध्ययन के मुताबिक इस खनिज तेल पर 2017  में जितनी सब्सिडी दी गई है वह दुनिया भर के जीडीपी के 6.5% है जबकि यह राशि 2015 में 6.3% थी। यानी खनिज तेल पर सरकारी सब्सिडी क्रमानुसार बढ़ती जा रही है और यह सब्सिडी की रकम आम जनता के कल्याण की योजनाओं के लिए संग्रहित रकम में कटौती करके एकत्र की गई है। यही नहीं खनिज तेल से हवा में होने वाले प्रदूषण के कारण मरने वालों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। पर्यावरण प्रदूषण के कारण होने वाली गड़बड़ियों के प्रति पिछले कई वर्षों से लोगों को बताया जा रहा है लेकिन इससे कोई लाभ नहीं हो रहा है। क्योंकि, आम जनता को यह जब तक मालूम पड़ता है तब वह पिछली  बात भूल जाते हैं इससे  स्वार्थी तत्वों को लाभ मिलता है वह आय और संपत्ति के अनुपात को असंतुलित कर देता है।
         वर्तमान समस्या यह है कि नेता चाहे वो जिस भी दल के हों  वह खुद को विकल्प के रूप में देख रहे हैं और यह चिंतन खतरनाक हो सकता है तथा नई समस्याओं को जन्म दे सकता है ।  गांधीजी का मानना था कि पूंजी खुद में कोई गलत चीज नहीं है लेकिन पूंजी का गलत कामों के लिए प्रयोग किया जाना ही सबसे बड़ी समस्या है । जो लोग साम्यवाद या अति समाजवाद की शिक्षा देते हैं उन्हें यह समझना चाहिए अतीत में यह असफल हो चुका है ,अब दुबारा इससे चालू करने आवश्यकता क्या है ? दुनिया भर में मंदी फैल रही है और हो सकता आने वाले दिनों में आंदोलन और बढ़े जिससे हमारी संस्थाओं और लोकतंत्र को हानि पहुंचे।  सरकार और राजनीतिक दलों को इसके प्रति न केवल सावधान रहना चाहिए बल्कि इस स्थिति को सुधारने का प्रयास करना चाहिए।


Tuesday, October 29, 2019

अयोध्या मामले को लेकर मोदी और शाह की नींद हराम

अयोध्या मामले को लेकर मोदी और शाह की नींद हराम 

अयोध्या मामले के फैसले में महज एक पखवाड़े कुछ ही ज्यादा समय बचा  है। देश की आधुनिक राजनीति पर सबसे ज्यादा प्रभाव डालने वाला यह मसला किस करवट बैठेगा इसे लेकर मोदी ,अमित शाह और भाजपा की नींद हराम है। अयोध्या मामले से उम्मीद है इसलिए भी हैं कि अभी  हफ्ते भर  पहले जो चुनाव हुए उसमें भाजपा बैकफुट पर चली गई और अब अगर अयोध्या मामला उसके पक्ष में आता है तो उसके हर पहलू का वह उपयोग कर सकती है। एक तरफ तो गिरती अर्थव्यवस्था और दूसरी तरफ राजनीतिक लोकप्रियता में धीरे-धीरे होता ह्रास मोदी के अजेय होने पर सवाल उठाने लगा है। यही कारण है, अयोध्या फैसले पर अब मोदी अमित शाह और भाजपा की निगाहें टिकी हुई है। आशा है यह फैसला 17 नवंबर के पहले होगा। मोदी और शाह इस इसलिए भी बेचैन हैं कि कहीं इससे सियासत की धारा ना बदल जाए। फैसला चाहे जो हो इसका असर भाजपा को मदद ही पहुंचाएगा। क्योंकि अभी जो सत्ता है वह किसी भी स्थिति को अपने पक्ष में कर लेने में माहिर है। अमित शाह खुद इतने व्यवस्थित हैं कि वह किसी भी प्रतिफल को अपने पक्ष में करने की रणनीति बना लेते हैं। राम जन्मभूमि आंदोलन ने ही 1990 के दशक में लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा उभरने के लिए एक मंच दिया और पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित हो गई । अब सुप्रीम कोर्ट का फैसला लड़खड़ाती की अर्थव्यवस्था , बेरोजगारी  और  ग्रामीण   असंतोष का मुकाबला कर रही  सरकार  और पार्टी  को हिंदुत्व का एक नया मसाला दे सकता है। अगर पक्ष में फैसला जाता है तो इसका मतलब होगा की सरकार इसका श्रेय लेगी और बिगुल बजाएगी।  अगर बहुत ज्यादा पक्ष में बात नहीं हुई तो हो सकता है सांप्रदायिक भावनाओं को दुबारा हवा देने का मौका मिल जाए । चाहे जो हो सियासत ही जीतेगी।
            अगर यह सत्तारूढ़ दल के पक्ष में जाता है तो अयोध्या और राम मंदिर का मसला विपक्षी दलों को किनारा कर देगी और उसकी आवाज बंद हो जाएगी। सत्ता  के पक्ष में यदि फैसला होता है तो हिंदू पक्ष वही करेगा जो  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और समस्त हिंदुत्व समूह करने के लिए कहेंगे।  इसे अभूतपूर्व विजय की संज्ञा दी जाएगी तथा उम्मीद की जाएगी इस लहर के बल पर अगला चुनाव जीत जाएं। भाजपा बहुलता वादी सियासत को बढ़ावा देगी और सब कुछ राष्ट्रवाद के आधार पर होगा। इसमें एनआरसी ,नागरिकता संशोधन विधेयक, धारा 370 ,कल्याणकारी योजनाएं वगैरह इसके आधार को मजबूत बना देगी। बस जरा पीछे गौर करें जब 23 मई को भाजपा सत्ता में आई थी चुनाव के दौरान ऐसे संकेत मिल रहे थे भाजपा एनआरसी पर थोड़ी मुलायम होगी वरना  चुनाव में उसकी स्थिति  बिगड़ेगी। लेकिन इसने उसे और भी तीव्र किया। यहां तक कहा गया कि इसे पूरे देश में लागू किया जाएगा।  साथ ही पार्टी में हिंदू रिफ्यूजी और मुस्लिम रिफ्यूजी में एक विभाजन रेखा खींच दी और चुनाव में उसे ज्यादा मत मिले। मोदी जी ने तीन तलाक का मामला संसद में पेश किया और उसे भी पारित करा दिया। कश्मीर को मिला विशेष दर्जा वापस ले लिया गया ।
        अब सवाल उठता है कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई वह कैसी हुई? विशेषज्ञों का मानना है कि फैसला रामलला विराजमान के पक्ष में जाएगा और ऐसा होता है तो भाजपा चारों तरफ बिगुल बजाती चलेगी तथा लोगों से कहेगी कि बहुत दिन पुराना वादा पूरा कर दिया। अगर फैसला कुछ ऐसा होता है जिसमें  अयोध्या की विवादास्पद  पूरी जमीन राम को नहीं मिलती है तो कुछ लोग कहेंगे कि भाजपा को झटका लगा लेकिन मोदी और शाह हिंदू मोर्चा खोलकर सांप्रदायिक उन्माद को हवा दे सकते हैं जिससे बहुलवादी समाज की भावनाएं सभी मसलों से हट जाएं। यह भाजपा को अयोध्या मामले को जिलाए रखने का एक मौका दे सकता है। अयोध्या का फैसला चाहे जिस तरफ जाए यह नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए 'तुम्हारी भी जय जय और हमारी भी जय जय' की तरह होगी। यह विपक्ष के लिए गंभीर परीक्षा का समय होगा।


Monday, October 28, 2019

बगदादी का मारा जाना

बगदादी का मारा जाना 

इस्लामिक स्टेट के मुखिया अबू बकर अल बगदादी का मारा जाना इस आतंकी गिरोह के लिए एक नया मोड़ साबित होगा । क्योंकि यह समूह अपनी खिलाफत के सिकुड़ने के बाद अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। अब से कोई 6 महीने पहले अमेरिकी फौज ने घोषणा की थी कि बगदादी इस्लामिक स्टेट या खलीफा का इलाका अब भंग हो गया ह और इस तरह की कोई चीज नहीं रह गई। इस तरह से इस्लामिक स्टेट की ओर आकर्षित होने वाले लड़ाके अब नहीं रहेंगे । रविवार को बगदादी के मरने की खबर आई थी किसी को भरोसा नहीं हो रहा था । अंत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अधिकृत घोषणा की तो लोगों को भरोसा हुआ।
बगदादी के मारे जाने के बाद दुनिया भर के नेताओं ने गंभीर प्रतिक्रिया व्यक्त की । संयुक्त राष्ट्र में पूर्व राजदूत निक्की हेली ने कहा कि अमेरिका के लिए महान दिन था। उन्होंने ट्वीट किया कि हमारे बौद्धिक समुदाय और दुनिया में सबसे अधिक वांछित आतंकवादी को खत्म करने के लिए अमेरिका का बधाई । रिपब्लिकन सीनेटरों ने  कहा कि राष्ट्रपति को इसके लिए बधाई।
बगदादी ने जो खिलाफत तैयार की थी उसके खत्म होने की उम्मीद बहुत कम थी । बगदादी के खिलाफत का आकार लगभग ग्रेट ब्रिटेन के बराबर था। किसी को उम्मीद नहीं थी की यह साम्राज्य  नेस्तनाबूद हो जाएगा । बेशक अल बगदादी की मौत दुनिया में आतंकवाद विरोधियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन इसका मतलब नहीं है की आईएसआईएस  की मौत हो गई। इसके लड़ाके दुनिया भर में अनगिनत लोगों पर अपना प्रभाव रखते हैं और आतंक को फैलाने के इरादे से कायम हैं। दुनिया के नेताओं ने इसे आतंकवाद के खिलाफ इस लड़ाई में महत्वपूर्ण बताया है।
        व्हाइट हाउस के आतंकवाद विरोधी पूर्व निदेशक जावेद अली ने बगदादी की मौत पर कहा की आधुनिक आतंकवाद के अब तक के इतिहास में इस तरह के रणनीतिक विखंडन किसी आतंकवादी संगठन के सांगठनिक पराजय  की मिसाल नहीं है । रविवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आधिकारिक घोषणा के अनुसार अमेरिकी फौज से घिर जाने के बाद बगदादी से खुद को उड़ा लिया । लेकिन जहां तक अनुमान है कि इस्लामिक स्टेट अपने को फिर से  गठित कर लेगा और इराक तथा सिरिया में नए नेता की तलाश कर लेगा। इसके हजारों लड़ाके इराक और सीरिया में कैद हैं तथा हजारों समर्थक विभिन्न कैंप में पड़े हुए हैं । उस क्षेत्र में  रहने वाले ऐसे सुन्नी फिरके  के लोग हैं जिनका इसके यानी इस्लामिक स्टेट के चाल ढाल से उनके प्रति मोहभंग हो गया है और हुए उनकी तरफ रुख करना छोड़ चुके है। इस्लामिक स्टेट का संगठन कमजोर होता जा रहा है ।ऐसे में बगदादी का मारा जाना उसे और कमजोर कर देगा । यद्यपि उन्होंने इस पल के लिए तैयारी कर रखी होगी। लेकिन उनके लिए संगठन को अपनी तैयारी से मुतमईन करना बड़ा कठिन होगा।  आतंकवाद विशेषज्ञों को यह शक है की शायद ही आई एस आई एस अब खड़ा हो सकेगा। नाइजीरिया, फिलिपिंस और भारत में विभिन्न स्थानों पर सहयोगी संगठनों को एक वैश्विक नेटवर्क से जोड़ना बगदादी की स्थाई सफलता थी इन संगठनों को संचालित करने वाले स्थानीय नेता संभवतः बगदादी के मूल नेटवर्क आईएसआईएस से अलग भी हो सकते हैं। यह बगदादी की पूर्ववर्ती अपीलों पर विश्वास करने पर ही कायम रह सकता है। वरना विखंडन में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। यही नहीं ,बगदादी के मारे जाने के बाद इराक और सीरिया में काम करने के तरीकों पर भी तत्काल प्रभाव पड़ेगा। क्योंकि, बगदादी इन लड़ाकों को संचालित करने में सीधे तौर पर शामिल रहा करता था।
     बगदादी के मारे जाने के बाद एक नाम चारों तरफ फैला हुआ है वह है अलहज अब्दुल्ला। वह तुर्की मूल का  है और इराक के तल अफार का निवासी है। यह बगदादी के नजदीकी लोगों में से था। लेकिन सब कुछ के बावजूद इस घटना के बाद यह संगठन एक बार जरूर तितर-बितर हो जाएगा और उसे फिर से जमीन से शुरू करना पड़ेगा। कुछ लोग इसे छोड़ेंगे तो कुछ लोग इसमें शामिल होंगे। अभी कुछ भी कहना संभव नहीं है लेकिन यह है कि बगदादी का मारा जाना आईएसआईएस के लिए शुभ नहीं होगा। आतंकवाद का खात्मा करना इस लड़ाई में शामिल दुनिया के नेताओं के भौतिक विनाश की तुलना में ज्यादा कठिन काम है ,लेकिन यह भी अंजाम दिया गया। इसके लिए हर शांतिप्रिय आदमी को खुशी होगी।


Sunday, October 27, 2019

पुलिस और हमारा समाज

पुलिस और हमारा समाज 

अभी हाल में राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो कि रपट आई थी जिसमें तरह-तरह के अपराध आंकड़े और उनकी कोटियां संग्रहित हैं। समाजशास्त्र से लेकर अपराध शास्त्र  तक आंकड़ों की मदद से समाज व्यवस्था और शासन के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण करते हैं। विख्यात अपराध शास्त्री एडविन सदरलैंड ने अपराध की व्याख्या करते हुए कहा है कि अपराध और अपराधी को समझने के लिए पुलिस की व्यवस्था के मनोविज्ञान  और  उनके अंदर  पलट रही  भावनाओं को समझना सबसे ज्यादा जरूरी है।  अगर पुलिस और अपराध शास्त्री मिलकर काम करें तो समाज में अपराध पर प्रभावी रोकथाम हो सकती है।
       शोध इत्यादि के लिए जो नमूने तथा पृष्ठभूमि दी जाती है उसमें सबसे ज्यादा जोर पुलिस के चरित्र पर होता है। लेकिन सरकार और जनता के बीच सबसे पहली कड़ी पुलिस व्यवस्था को अगर निकट से देखें तो समझ में आएगा कि पुलिस की मजबूरियां क्या है और अपराध के समग्र नियंत्रण के लिए क्या-क्या जरूरी है। कोलकाता पुलिस के पूर्व पुलिस आयुक्त निरुपम सोम ने एक बार एक मुलाकात में कहा था कि छोटे-छोटे अपराध हमारे शहर में संपूर्ण अपराध रोकथाम के लिए सेफ्टी वाल्व का काम करते हैं।  नौजवान आईपीएस अफसरों और  छोटे स्तर  के अफसरों से अक्सर मुलाकात होती है। पुलिस में आने का मुख्य कारण वे वर्दी पहनने की दीवानगी बताते हैं। अभी हाल में एक फिल्म आई थी सिंघम। उसने पुलिस की जो भूमिका दिखाई गई थी और पुलिस फोर्स को जिस तरह काम करते दिखाया गया था वैसा हकीकत में कुछ नहीं होता। दरअसल, पुलिस को बहुत ज्यादा काम करना होता है और वो अक्सर तनाव में रहते हैं। इसके अलावा उसे कई तरह के बाहरी दबावों को झेलना पड़ता है। यही नहीं पुलिस व्यवस्था के भीतर की खामियों को भी उन्हें उजागर करने की अनुमति नहीं है। लंबे काम के घंटे और कम छुट्टियां उनसे जिंदगी का हिस्सा  है। स्टेट ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट 2019 में साफ कहा गया है इस देश के लगभग एक चौथाई पुलिस गर्मी 16 घंटे से ज्यादा काम करते हैं 44% से ज्यादा पुलिसकर्मी 12 घंटे से अधिक काम करते हैं। औसतन उन्हें एक दिन में 14 घंटे काम करने होते हैं।
        कुछ दिनों पहले दिल्ली की संस्था कॉमन कॉज और लोक नीति सेंटर फॉर द स्टडी आफ डेवलपिंग सोसाइटीज ने एक अध्ययन में पाया है कि  73% पुलिसकर्मी काम के बोझ से दबे रहते हैं और उनके शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य पर इसका गंभीर असर पड़ता है। वे अपने बच्चों को पुलिस में भर्ती नहीं होने देना चाहते। बेशक बड़े पुलिस अफसरों को सुविधाएं ज्यादा मिलती हैं लेकिन किसी को भी ओवर टाइम नहीं मिलता। यही नहीं, छुट्टियां भी बेहद कम मिलती हैं। अपराध नियंत्रण जिस देश में एक प्रमुख समस्या है उस देश के ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट एक रिपोर्ट में  कहा गया है कि जनवरी 2017 में कम से कम 22 प्रतिशत पुलिस के पद खाली थे। यह रिक्ति 2016 के बाद भरे गए पदों के पश्चात हुई है। आंकड़े बताते हैं कि 2011 से 2016 के बीच हमारे देश में पुलिस फोर्स में खाली पदों की संख्या लगभग 25.4% थी और पुलिस तथा जनसंख्या का अनुपात प्रति एक लाख लोगों में 148 का था। जबकि राष्ट्र संघ की सिफारिश के मुताबिक आदर्श संख्या 222 है । 7 अक्टूबर 2019 को जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 29.7% पुलिस अफसरों के   पास आधिकारिक आवास नहीं है। ऐसी दयनीय अवस्था में हम पुलिस वालों से सहयोग तथा ईमानदारी की कल्पना करते हैं तो यह कल्पना बेहद अव्यवहारिक है।
हमारे समाज में बढ़ते तरह-तरह के अपराध का एक अंधियारा पक्ष यह भी है कि हमारी पुलिस उन अपराधों के  रोकथाम में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाती और नए नए तरह के अपराध बढ़ते जा रहे हैं अपराध के रोकथाम के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि नियंत्रण व्यवस्था सुदृढ़ एवं सक्षम हो तथा उनके भीतर अपराध रोकने की भावना हो।


Friday, October 25, 2019

मोदी है तब भी हर बार मुमकिन नहीं

मोदी है तब भी हर बार मुमकिन नहीं 

अगर किसी फिल्म में डायलॉग की तरह चुनाव के परिणामों की स्क्रिप्ट लिखी जाए देश में सबसे महत्वपूर्ण होगा कि विपक्ष कहेगा मेरे पास देश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति, बेरोजगारी किसानों की दुरावस्था जैसे मुद्दे हैं। तो सत्तापक्ष ताल ठोक कर कहेगा मेरे पास मोदी है । अभी हाल में एक नारा आया था "मोदी है तो मुमकिन है ",लेकिन इस बार के चुनाव परिणाम खासकर हरियाणा और  महाराष्ट्र के चुनाव के परिणाम तो यही  बता रहे हैं हर बार मोदी है तब भी मुमकिन नहीं है । चुनाव परिणाम के बाद मोदी जी ने टेलीविजन पर जो कहा और उससे साफ जाहिर होता है कि उन्हें पराजय खल गई। महाराष्ट्र में भाजपा  और शिवसेना  का पिछला टारगेट पार करने का टारगेट लिया  था । उसी तरह हरियाणा में  भी 75 के पार का टारगेट था लेकिन दोनों लक्ष्य हासिल नहीं हो सके। पिछली बार महाराष्ट्र में भाजपा को 122 सीटें मिली थी जो इस बार  हासिल नहीं हो सका और शिवसेना का भी नंबर  पहले से कम रहा। यहां सरकार बनाने के लिए 146 सीटों की जरूरत है पिछली बार सरकार 185 सीटों के साथ बने थे। इस बार का जादुई आंकड़ा पिछली बार से कुछ सीट ज्यादा है। महाराष्ट्र और हरियाणा में संभवत भाजपा की सरकार बनेगी और वही मुख्यमंत्री होंगे जो पहले थे क्योंकि मोदी और शाह दोनों ने इनके कार्यकाल की प्रशंसा की है और आगे के लिए बधाई दी है । इससे साफ जाहिर होता है कि उन्होंने इन्हीं दोनों नेताओं को मुख्यमंत्री बनाने की विचार किया है। इस चुनाव में सबसे दिलचस्प बात है कि इस बार जनता ने विपक्ष को भी मजबूत किया है। बेशक उसे सत्ता नहीं दी। क्योंकि वहां लड़ाई राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और जननायक जनता पार्टी के बीच ही थी। कांग्रेस के उम्मीदवार तो बस लड़ रहे थे। लेकिन पार्टी कहीं नहीं दिख रही थी। महाराष्ट्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिवाजी के मेकअप में चुनाव प्रचार किया। कुछ ऐसा आईकॉनिक प्रचार था लगता है जादू हो जाएगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं है कुछ खास नहीं हुआ । आईकॉनिक जादू नहीं चल सका। अब प्रश्न उठता है यहां शिवसेना की भूमिका क्या होगी ?उद्धव ठाकरे तो आधी आधी की बात कर रहे हैं यानी एक बार यह  उत्तर प्रदेश में हुआ था। ढाई साल भाजपा और ढाई साल से शिवसेना का मुख्यमंत्री का फॉर्मूला । लेकिन यह ना यूपी में चला और ना ही कश्मीर में। इस बार शिवसेना को 63 सीट नहीं मिली। मजे की बात है यह कांग्रेस ने अच्छा किया है।

       हरियाणा में भाजपा पिछली बार 47 पर थी इस बार सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद उसके सारे मंत्री हार गए । ऐसी जीत का होगा भी क्या? किसी तरह से इज्जत बची लेकिन इज्जत का बचना बेइज्जती के साथ निकल जाने के अलावा कुछ नहीं था। दोनों राज्यों में कांग्रेस को थोड़ी ज्यादा सीट हासिल हुई और एनसीपी  की टैली भी आगे बढ़ी।
          देशभर में 51 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए उनमें से 20 सीटों पर भाजपा पहले से काबिज थी और अब जो परिणाम आए हैं उसे पता चलता है कि उसे केवल 17 सीटों पर विजय मिली है। यानी 3 सीटें घट गईं। अब चूंकि यह सारी सीटें देश भर में फैली हैं इसलिए सिर्फ महाराष्ट्र और हरियाणा नहीं बल्कि पूरा देश यह इशारा कर रहा है कि बीजेपी से आशाएं पूरी नहीं हुई । दिल्ली और झारखंड में चुनाव होने वाले हैं दिल्ली में अवैध कॉलोनियों का मरहम तो थोड़ा राहत पहुंचा दे लेकिन झारखंड का क्या होगा?
       समग्र रूप से चुनाव परिणाम को देखें तो एक बात सामने आती है कि भाजपा को  अपने भीतर झांकना होगा तथा उन कारकों को समझना होगा जिनके चलते वह इन चुनावों में सफलता हासिल नहीं कर सकी। अगर ऐसा नहीं करती है तो धीरे धीरे राष्ट्रीय स्तर पर भी घटने लगेगी जो आगे चलकर खतरनाक हो सकता है।
          
         


Thursday, October 24, 2019

अन्न की बर्बादी रोकिए सब का पेट भरेगा

अन्न की बर्बादी रोकिए सब का पेट भरेगा 

दो दिनों के बाद दिवाली आएगी चारों तरफ खुशियों का माहौल होगा। दिए जलेंगे और लाखों खर्च होगा। इसमें बहुत बड़ा हिस्सा खाने वाली चीजों की बर्बादी का भी होगा। इसके पहले शादी ब्याह के मौसम में भी खाने वाली चीजों की बर्बादी देखी गई है।  इसी बीच पसलियों से फूट कर बहते मवाद की तरह एक रिपोर्ट भी आई कि भारत भुखमरी के पैमाने पर बहुत ज्यादा गिर गया है यानि यहां बहुत ज्यादा लोग ठीक से खा नहीं पाते। पेट नहीं भर पाते हैं।  आंकड़े बताते हैं भारत बहुत तेजी से तरक्की कर रहा है लेकिन इस भारत के बच्चे भूखे रहने की आदत डाल रहे हैं। यहां की नई  पीढ़ी में असमानता और मानव व्याधियों को सहने की ताकत बढ़ती जा रही है। भारत तकनीकी क्षेत्र में लंबी छलांग लगा रहा है और भूख से मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहा है। अगर नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी के मॉडल पर भारत की आबादी के भूख का समग्र विश्लेषण करें तो यहां एक साथ कुपोषण , जरूरत से ज्यादा पोषण तथा कुपोषण के कारण व्याप्त अक्षमता कायम है।  तीनों का अलग अलग समाधान संभव नहीं है। वैश्विक भूख सूची में भारत का स्थान 2019 में 102 हो गया  जबकि 2010 में यह पंचानवे था तथा सन 2000 में यह 83 वें स्थान पर था यानी 19 वर्षों में हमारा स्थान 19 सीढ़ियों के नीचे आ गया । जिस पाकिस्तान को लगातार भूखों और नंगों का देश कहा जा रहा है उसका स्थान 94 है । भारत में 10 बच्चों में से तीन अविकसित हैं और इसका मुख्य कारण है बढ़िया भोजन नहीं प्राप्त होना।  कुपोषण देश के विकास के लिए एक तरह से अभिशाप है। क्योंकि कुपोषण का सीधा असर शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ता है ।
अध्ययन से पता चला है कि कुपोषण और भूख बच्चों की सीखने की क्षमता को खत्म कर देते हैं। यहां तक कि वे बहुत बुनियादी चीजें भी ठीक से समझ नहीं पाते और इससे उनका विकास रुक जाता है।
      यद्यपि देश में भूख से मुकाबले के लिए कई योजनाएं हैं लेकिन सही रूप में उन्हें अमल में नहीं लाया जाता। सरकार प्रतिवर्ष लाखों टन अनाज किसानों से खरीदती  है ताकि कम कीमत पर लोगों को खाद्यान्न उपलब्ध हो सके ।साथ ही आपात स्थिति में भी कमी ना हो । लेकिन क्रूर सत्य है कि जो अनाज सरकार खरीदती है उसका बहुत बड़ा हिस्सा सही भंडारण नहीं हो पाने के कारण बर्बाद जाता है ।जयही नहीं हमारे पास जो संसाधन हैं उसका भी सही उपयोग नहीं हो पाता या वह सही ढंग से बने नहीं होते हैं। राष्ट्र संघ के अध्ययन के मुताबिक भारत अनाज उपजाने के लिए प्रतिवर्ष 230 क्यूबिक किलोमीटर ताजे पानी का उपयोग करता है और अंततोगत्वा यह बर्बाद हो जाता है। इस पानी को 10 करोड़ लोगों को हर साल पीने के पानी के रूप में काम में लाया जा सकता है यही नहीं इस पानी के लिए जो 30 लाख बैरल तेल का उपयोग होता है वह भी बर्बाद हो जाता है । सरकार विकास के लिए रात दिन एक करती है लेकिन हमारे देश के नौजवानों को , किशोरों को, बच्चों को सही खाना नहीं मिल पाता और उनका मानसिक विकास अवरुद्ध हो जाता है ।सोचने की क्रिया प्रक्रिया धीमी हो जाती है।
जिस देश के नौजवान ठीक से सोच नहीं सकेंगे और मजबूती से अपना काम नहीं कर पाएंगे वो देश कैसे विकसित होगा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास का जो चिंतन है उसकी पृष्ठभूमि में इसी पोषण का दर्शन है। वह चाहते हैं देश की जनता राजनीतिक आंकड़े बाजी और जोर आजमाइश से अलग कुछ ऐसा करे जिससे कम से कम अच्छा खाना भरपेट मिल सके। मेक इन इंडिया तथा इस तरह की अन्य परियोजनाएं इसी प्रयास का अंग हैं। वह क्रियाशील है तो देश को एक दिशा में सोचने और उस पर काम करने के पायलट प्रोजेक्ट के रूप में प्रधानमंत्री ने सबसे पहले स्वच्छता सुविधाओं को उपलब्ध कराने की योजना बनाई। ताकि बच्चे अस्वच्छता के कारण होने वाली बीमारियों से मुक्त तो हो। सरकार ने इसके बाद वाला कदम  स्कूलों में मिड डे मील स्कीम , इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विसेज और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुधारने की कोशिश आरंभ की है जिसके तहत सबसे पहला कदम अफसरशाही में भ्रष्टाचार को खत्म करना है ताकि लालफीताशाही उसी ढंग से सोचे और क्रियाशील हो जिस ढंग से  प्रधानमंत्री सोचते हैं । क्योंकि दुनिया का कोई देश गरीबी को तब तक नहीं मिटा सकता है जब तक लोगों के लिए  सही अवसर नहीं उत्पन्न हो और उस अवसर में सरकारी अफसरशाही की ईमानदारी पूर्ण भूमिका ना हो।


Wednesday, October 23, 2019

अभिजीत मिले नरेंद्र मोदी से

अभिजीत मिले नरेंद्र मोदी से 

नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मंगलवार को मुलाकात हुई । इस मुलाकात से कई तरह के भ्रम दूर हो गए। खास तौर पर यह कि लोगों का कहना था अभिजीत बनर्जी मोदी की आर्थिक नीतियों की विरोधी हैं। मुलाकात के बाद पता चला ऐसा कुछ नहीं है। कुछ नकारात्मक सोच वाले लोगों ने कुछ बातों का तोड़ मरोड़ कर अर्थ निकाला था।
     प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुलाकात के बाद ट्वीट किया , "अभिजीत बनर्जी से मिलना बड़ा अच्छा लगा। यह बेहतरीन मुलाकात थी खास करके अभिजीत बनर्जी में मनुष्य के सशक्तिकरण के लिए जो भावनाएं हैं उसे देख कर बहुत भला लगा। अभिजीत बनर्जी से कई विषयों पर बहुत ही अच्छी बातचीत हुई। " इस मुलाकात के बाद अभिजीत बनर्जी ने एक बयान में कहा कि "प्रधानमंत्री से मुलाकात और भारत के बारे में उनके चिंतन पर लंबी बातचीत हुई। अभिजीत बनर्जी ने कहा लोग केवल राजनीति के बारे में सोचते हैं। बहुत कम लोग ऐसे हैं जो इस राजनीति के पीछे के चिंतन के बारे में बातें करते हों। अभिजीत बनर्जी ने कहा  कि प्रधान मंत्री शासन के बारे में सोचते हैं, यह बात समझ में नहीं आती कि लोग रंगो के आधार पर शासन की आलोचना क्यों करते हैं। वे इस माध्यम से शासन पर या कहें शासन प्रक्रिया पर बड़े लोगों का कब्जा चाहते हैं। वे नहीं चाहते यह ऐसी सरकार हो जो जनता के सुख दुख में साथ है।" अभिजीत बनर्जी ने कहा कि "प्रधानमंत्री अफसरशाही को सुधारने में लगे हैं।" अभिजीत बनर्जी ने अपने बयान में कहा नरेंद्र मोदी जो देश के बारे में सोचते हैं वह बिल्कुल अलग है। प्रधानमंत्री ने उनसे अपनी नीतियों को लेकर बात की और बताया कि वह चीजों को कैसे लागू कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि जमीनी प्रशासन में उच्च वर्ग का नियंत्रण था। प्रधानमंत्री की नीतियों की प्रशंसा करते हुए अभिजीत बनर्जी ने अपने बयान में कहा कि "वह जो कर रहे हैं वह भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। सबसे महत्वपूर्ण है कि अफसर जिम्मेदार बने।" अभिजीत बनर्जी ने कहा कि मुलाकात की शुरुआत में मोदी जी ने मजाकिया लहजे में मीडिया की ओर से एंटी मोदी बयानों के लिए उठाए जाने को लेकर सावधान किया।
          हैरत तो तब होती है जब भारत के लोग अभिजीत बनर्जी को मोदी विरोधी बिंब के रूप में गढ़ने में लगे हैं और इसका मुख्य कारण है कि वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं और उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला है। कुछ लोग तो यह समझते हैं कि बनर्जी धर्मनिरपेक्ष हैं और उनकी नीतियां भारत के गरीबों के लिए बेहतर है। अब जबकि मोदी और अभिजीत बनर्जी में मुलाकात हुई है और उस मुलाकात के बारे में लोगों को जानकारी मिली तो वैसे नकारात्मक सोच के लोगों पर क्या गुजरती होगी? सबसे ज्यादा हैरत तो तब होती है जब खुद को निष्पक्ष कहे जाने वाले अखबारों में लिखा जाता है कि नोबेल प्राइज पाने का मतलब होता है व्यवस्था विरोधी स्वतंत्र चिंतन। अभिजीत बनर्जी को नोबेल प्राइज विकास मूलक अर्थव्यवस्था में प्रयोगी विधि को अपनाने के लिए मिला है उदाहरण के लिए अभिजीत बनर्जी के प्रयोग में गरीबी को खंडित कर अलग अलग परीक्षण करना प्रमुख है ,मसलन समाज के कुछ हिस्से के लोगों का खराब स्वास्थ्य अब इसके कई कारण हो सकते हैं ,जैसे स्वास्थ्य कर्मियों का काम पर नहीं आना ,अच्छी दवाएं उपलब्ध न होना, बचाव के लिए टीकाकरण नहीं होना इत्यादि। अब हर टुकड़े का प्रयोगी तौर पर परीक्षण जैसे कार्य अभिजीत बनर्जी के कामों में शामिल है।
          प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अभिजीत बनर्जी की मुलाकात देश के एक बड़े वर्ग को अचंभित कर देने वाली है इस वर्ग को यह महसूस हो रहा था कि अभिजीत वामपंथी है और मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना करेंगे । लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उल्टे प्रधानमंत्री ने उनसे मुलाकात की गर्मजोशी दिखाई  और अभिजीत प्रधानमंत्री की प्रशंसा करते सुने गए। अनोखा था एक दूसरे के प्रति आदर भाव।  कई वर्ष पहले मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूरी भूरी प्रशंसा की थी। यहां प्रश्न उठता है कि एक दक्षिणपंथी विचारधारा वाली पार्टी के सबसे बड़े चेहरे नरेंद्र मोदी ने आखिर एक घोषित वामपंथी अर्थशास्त्री को अपने साथ कैसे जोड़ लिया या यह कहें कि उन्होंने जोड़ना कबूल किया।  नरेंद्र मोदी की एक खासियत है ही है वे अपने आलोचकों के साथ मिलकर भी काम कर लेते हैं या कहिए वे अपने आलोचकों को भी निभा ले जाते हैं।
      जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तो उन्होंने दो परियोजनाओं को जोड़ा था। दोनों परियोजनाएं पर्यावरण और प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए थी। पूरे देश में गुजरात ऐसा पहला राज्य था जिसने दशक भर पहले जलवायु परिवर्तन को लेकर अलग विभाग बनाया था। जलवायु परिवर्तन पर्यावरण से जुड़ा है और प्रदूषण जलवायु परिवर्तन की मुख्य समस्या है। मोदी ने इसी समस्या का हल ढूंढते -ढूंढते अभिजीत बनर्जी और उनकी पत्नी  से मदद मांगी थी। इन दोनों ने "अब्दुल लतीफ जमील पॉवर्टी एक्शन लैब" की स्थापना 2003 में की थी। उसी संस्था को मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने एनवायरमेंटल ऑडिट को मजबूत करने के लिए एमिशन ट्रेंडिंग स्कीम को लॉन्च करने के लिए छोड़ा था नोबेल पुरस्कार पाने के बाद हमारे देश के लोगों ने अभिजीत को जाना लेकिन नरेंद्र मोदी  उनकी प्रतिभा को बहुत पहले से जानने लगे थे और उन्हें उचित सम्मान देने लगे थे। इन दोनों की मुलाकात से यह साबित हुआ प्रतिभा के आगे विचारधारा के रोड़े नहीं आते हैं।


Tuesday, October 22, 2019

भारत में अपराध

भारत में अपराध 

2 दिन पहले हिंदू नेता कमलेश तिवारी की उनके घर में ही हत्या कर दी गई अभी खबर आई है कि मुजफ्फरनगर जिले के पुरकाजी शहर के  समीप एक गांव में  एक दलित महिला की हत्या कर दी गई। इसी पृष्ठभूमि में सोमवार को भारत सरकार ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़े  "क्राईम इन इंडिया 2017" जारी किया। लेकिन इस आंकड़े में कहीं भी लिंचिंग का जिक्र नहीं है जबकि हमारे समाज में  इस पर सबसे ज्यादा बहस होती है  और  इसे लेकर  सियासत गर्म हो जाती है। लेकिन अलग खंड है जिसमें राष्ट्र विरोधियों द्वारा किए गए अपराधों का ब्यौरा है। इस बात का कहीं भी विश्लेषण नहीं है राष्ट्र विरोध क्या है उनकी परिभाषा क्या है। किन लोगों या समुदायों को उस संवर्ग में रखा जाएगा  अफवाह  रखा गया है। एक तरफ देशद्रोह कानून को कमजोर करने या उसे समाप्त करने पर बहस चल रही है दूसरी तरफ अपराध  रिकॉर्ड्स में यह एक अलग कालम बनता जा रहा है।
    यह रिपोर्ट इस वर्ष के शुरू में आनी चाहिए थी जिसमें लिंचिंग इत्यादि का भी  ब्योरा प्रस्तुत किया जाना चाहिए था इसमें पत्रकारों की हत्या का भी जिक्र होना चाहिए था लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है । इस बीच एक नया खंड जोड़ा गया है। वह है हत्या का कारण जिसमें सांप्रदायिक या धार्मिक लिखा गया है । ऐसा महसूस होता है  कालांतर में  सांप्रदायिक कारणों को  धार्मिक कारणों से जोड़ दिया जाएगा और फिर उसकी व्याख्या  राष्ट्र विरोध या राष्ट्र द्रोह के संदर्भ में किया जाने लगेगा। यह 2017 की रिपोर्ट है। इस वर्ष लगभग पचास लाख संज्ञेय अपराध रिकॉर्ड किए गए थे जो पिछले वर्ष यानी 2016 से 3.6 प्रतिशत ज्यादा थे। एनसीआरबी के आंकड़े ही बताते हैं के 2016 में 48 लाख एफ आई आर दर्ज किए गए थे। एनसीआरबी का यह कथित तौर पर ताजा आंकड़ा लगभग 1 वर्ष विलंब से जारी किया गया है। आंकड़े बताते हैं कि 2017 में महिलाओं के खिलाफ 3 लाख 59 हजार 849 मामले देशभर में दर्ज किए गए। यह प्रवृत्ति लगातार तीन वर्षों से बढ़ती देखी जा रही है । महिलाओं के खिलाफ जो अपराध हैं उनमें हत्या, बलात्कार, दहेज हत्या, आत्महत्या के लिए उकसाया जाना, हमले, महिलाओं के प्रति क्रूरता और अपहरण जैसे अपराध शामिल हैं। 2017 के आंकड़ों के अनुसार महिलाओं के प्रति सबसे ज्यादा अपराध उत्तर प्रदेश में हुए। देश के सबसे अधिक जन संकुल इस राज्य में महिलाओं के प्रति अपराध की संख्या 56011 है। इसके बाद 31979 अपराधों के साथ महाराष्ट्र का नंबर आता है। पश्चिम बंगाल थोड़ा ही पीछे है। यहां आलोच्य वर्ष में 30,992 ,मध्यप्रदेश में 29,778, राजस्थान में 25,993 और असम में 23,082 मामले दर्ज किए गए । दिल्ली में महिलाओं के प्रति अपराध की संख्या लगातार तीसरे वर्ष भी घटी है।  जबकि अरुणाचल, गोवा , हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम ,नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा इत्यादि राज्यों में महिलाओं के प्रति अपराधों की संख्या तीन अंकों में है जो राष्ट्रीय आंकड़ों की तुलना में 1% भी नहीं है ।
बच्चों के प्रति अपराध की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। 2017 में 63,349 बच्चे लापता हुए। जिनमें 20,555 बच्चे लड़के थे, 22,691 लड़कियां तथा 103 ट्रांसजेंडर थे।
अगर आंकड़ों का विश्लेषण करें तो एक अजीब निष्कर्ष सामने आता है। इसके अनुसार आलोच्य  वर्ष में हत्या के मामले 5.9 प्रतिशत घटे हैं । 2017 में हत्या के 28,653 मामले दर्ज हुए जबकि 2016 में यह आंकड़ा 30450 था। हत्या के मामले में  झगड़े सबसे प्रमुख कारण थे। आंकड़े के मुताबिक झगड़ों के कारण हत्या के 7898 मामले दर्ज हुए, जबकि व्यक्तिगत कारणों से या व्यक्तिगत दुश्मनी से 4660 और लाभ के चलते हत्या के 2103 मामले दर्ज हुए। दूसरी तरफ अपहरण की घटनाओं में 9% की वृद्धि हुई । 2016 में जहां 88008 अपहरण की घटनाएं हुई थी वही 2017 में यह बढ़कर 95893 हो गई हैं।
        अगर इन इन आंकड़ों के आधार पर विक्टिमोलॉजी के सिद्धांत पर क्राइम प्रोफाइलिंग की जाए तो उस खास इलाके के आचरण संबंधी पैटर्न को समझा जा सकता है और उसकी व्याख्या की जा सकती है। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं उत्तर प्रदेश में महिलाओं के प्रति अपराध की घटनाएं बढ़  रही हैं। इसका स्पष्ट अर्थ है कि वहां महिलाओं के प्रति  कोमल भाव या उनका सम्मान नहीं है। यह एक बहुत ही खतरनाक प्रवृत्ति है जो आगे चलकर महिला दमन का रूप ले सकती है । एक समाज का यह स्वरूप बहुत ही खतरनाक हो सकता है। जिसमें सुधार के लिए सख्त कानून का नहीं कानून का सख्ती से पालन जरूरी है। शुरू में ही चर्चा की गई उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के एक शहर के किनारे एक किशोरी का अपहरण के बाद हत्या कर दी गई इस पर भी कोई चर्चा नहीं हुई। जबकि एक हिंदूवादी नेता की हत्या में पूरे देश को सन्न कर दिया यह एक मनोभाव है और इस मनोभाव को बदलना जरूरी है। आंकड़े केवल संख्या बताते हैं संख्या के पीछे के मनोभाव को समझना और उसे आवश्यकतानुसार बदलना हमारे समाज और हमारे नेताओं का काम है।


Monday, October 21, 2019

पाकिस्तान को करारा जवाब

पाकिस्तान को करारा जवाब 

जब से कश्मीर में धारा 370 खत्म की गई है तब से पाकिस्तान में छटपटाहट है संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से देखकर इस्लामाबाद के वार रूम तक पाकिस्तान की छटपटाहट देखी जा सकती है। कभी वहां के रक्षा मंत्री 200 - 250 ग्राम के परमाणु बम दिखाते हैं तो कभी वहां की सेना नियंत्रण रेखा पर कवर फायर देकर आतंकवादियों को भारत में घुसाने का प्रयास करती है। अभी रविवार को समाप्त हुए सप्ताह की ही बात है कि पाकिस्तानी सेना ने कई बार नियंत्रण रेखा पर भयंकर फायरिंग की उसका इरादा था इस फायरिंग के पर्दे में आतंकवादियों को कश्मीर में घुसा दिया जाए। परंतु ऐसा नहीं हुआ भारतीय सेना सतर्क थी।  उसने पाकिस्तानी कार्रवाई का करारा जवाब दिया। रविवार को भारतीय फौज ने लगभग 10 पाकिस्तानी फौजियों को मार गिराया और तीन आतंकी शिविरों को नेस्तनाबूद कर दिया। सेना के अनुसार प्रत्येक शिविर में 15 से 20 आतंकवादी भारत में घुसने के लिए तैयार थे। भारत की इस कार्रवाई से पाकिस्तान के आतंकी संगठनों ढांचे को भारी बर्बादी झेलनी पड़ी है। पाकिस्तान की कार्रवाई से दो भारतीय सैनिक तथा उत्तरी कश्मीर में एक असैनिक मारा गया। नियंत्रण रेखा पर बेतुकी हरकतें करने और युद्ध विराम का उल्लंघन करने की पाकिस्तान की पुरानी आदत है। अब से कोई 16 वर्ष पहले भारत और पाकिस्तान में युद्ध विराम संधि हुई थी और तब से अब तक वह इस संधि का उल्लंघन करता रहा है । आंकड़े बताते हैं कि इसी वर्ष जुलाई में पाकिस्तान ने युद्ध विराम के 296 बार उल्लंघन किए, अगस्त में 307 बार ,सितंबर में 293 बार उसने ऐसा किया। 2018 में पाकिस्तान ने  13 लाख 44 हजार 102 बार ऐसा किया है।
     भारतीय सेना अध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने बताया है कि पाकिस्तान ने गुरेज ,तंगधार, उरी और मैक हिल क्षेत्रों में हाल में आतंकवादियों को प्रवेश कराने की कोशिश की है पाकिस्तान की इस हरकत से परेशान होकर भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई की। इस कार्रवाई में 155 मिलीमीटर की तोपों का इस्तेमाल किया गया।
       पाकिस्तानियों द्वारा जब लगातार फायरिंग की जाने लगी तो भारतीय सेना ने उसके इरादे को भांप लिया और फायरिंग का करारा जवाब दिया। पाकिस्तान की  एक-एक गोली का एक-एक गोले से जवाब दिया गया। उधर पाकिस्तान ने भारतीय सेना के बयान का जवाब देते हुए कहा है कि भारत ने बिना किसी उकसावे के पाकिस्तान की जनता पर गोलियां बरसाई है। पाकिस्तान से आई एस आई के जनसंपर्क अधिकारी ने ट्वीट किया है कि भारत ने बिना किसी उकसावे के जोरा शाहकोट और नोशेरी क्षेत्रों पर हमले किए और उन हमलों से सिविलियंस की जानमाल की क्षति हुई।
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा है कि पाकिस्तान के महानिदेशक ने भारतीय उच्चायुक्त को बुलाकर  आधिकारिक विरोध दर्ज किया है। जिसमें कहा गया है कि पाकिस्तान स्पष्ट रूप से किसी भी आतंकी शिविर की मौजूदगी से इनकार करता है भारत का यह कथन बिल्कुल गलत है। पाकिस्तान ने कहा है कि भारत उस कथित आतंकी शिविर के बारे में सबूत प्रस्तुत करे। साथ ही पाकिस्तान ने कहा है कि वह भारतीय मिथ्या का पर्दाफाश करने के लिए विदेशी राजनयिकों को उस क्षेत्र का दौरा करने के लिए आमंत्रित करेगा। यही नहीं पाकिस्तान विदेश मंत्रालय द्वारा जारी एक अन्य बयान में  कहा गया है कि "महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं इसीलिए भाजपा पाकिस्तान पर यह झूठे आरोप थोप कर इलेक्शन जीतना चाहती है।"

भारतीय सेना प्रमुख जनरल रावत ने कहा ,इस कार्रवाई के बाद पाकिस्तान यकीनन बौखला जाएगा और वह बदला लेने फिराक में रहेगा। भारत को इसके लिए सतर्क रहना होगा। उन्होंने एक तरह से पाकिस्तानी हुकूमत को सलाह दी कि किसी भी तरह ही कार्रवाई भारत के खिलाफ यदि होती है तो उसका कठोर जवाब दिया जाएगा। भारत किसी भी मुकाबले में उससे 20 पड़ता है। पाकिस्तान को अब तक की घटनाओं से यह समझ में तो आ ही गया होगा।
       पाकिस्तान को एफ ए टी एफ फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि किसी भी आतंकी शिविर को आर्थिक मदद नहीं दी जाएगी और ऐसा कुछ भी नहीं किया जाएगा जिससे नियंत्रण रेखा पर या नियंत्रण रेखा के आर-पार के क्षेत्रों में हालात बिगड़े। पिछले कुछ दिनों में कई बार पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा पर लागू युद्ध विराम संधि को भंग किया है। लेकिन इस बार वह फंस गया । भारत सरकार ने और भारत की सेना ने उसकी इस कार्रवाई को लेकर  स्पष्ट चेतावनी दी है की वह इस तरह की हरकतों से बाज आ जाए वरना मिटा दिया जाएगा।


Sunday, October 20, 2019

सोनिया राहुल की कांग्रेस दुविधा में है

सोनिया राहुल की कांग्रेस दुविधा में है

वीर सावरकर को लेकर कांग्रेस भ्रमित है और उसकी इस दुविधा से एक बार फिर कांग्रेस के मन में राष्ट्रवाद के प्रति आस्था पर संदेह प्रकट हो रहा है। उसे इंदिरा जी से राजनीति की सीख लेनी चाहिए सावरकर को भारत रत्न दिए जाने की भाजपा की कोशिशों के प्रति जो विवाद पैदा हुआ है उसमें सबसे महत्वपूर्ण है कि इसने कैसे कांग्रेस को बदहवास कर दिया है। कांग्रेस खेमे से वीर सावरकर पर कई आरोप लगाए गए हैं । जिनमें यह भी है कि वह महात्मा गांधी की हत्या के षड्यंत्र कारी थे। कांग्रेस ने वीर सावरकर को पूर्णतः खारिज कर दिया है। कांग्रेस खेमे से इस मामले में सबसे संयमित टिप्पणी मनमोहन सिंह की है। जिसमें उन्होंने कहा है कि हम सावरकर जी का सम्मान करते हैं लेकिन उनकी विचारधारा से सहमत नहीं हैं। यानी कुल मिलाकर कांग्रेस का इस मामले में कोई औपचारिक रूप स्पष्ट नहीं है । जबकि आज महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हो रहा है। सत्ता के संदर्भ में भी सोचें तो कांग्रेस के खेमे से सबसे समझदारी भरा बयान मनमोहन सिंह का है और जब उसे मनमोहन सिंह ने यह कहा है तब से कांग्रेस बयान से दूरी बनाने लगी है।इस काम के लिए कांग्रेस ने अपने प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला को नियुक्त किया है। मनमोहन सिंह के बयान को अगर मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से परखे तो उसमें हताशा और दयनीयता साफ दिखाई पड़ेगी। उस बयान में कोई कुतर्क नहीं था और ना ही कोई अस्पष्टता।  खास करके ऐसे मौकों में जब सावरकर के प्रशंसकों ने इंदिरा गांधी द्वारा 1970 में जारी की गई डाक टिकट और उनके बारे में बोले गए कुछ शब्दों की प्रतियां निकालनी शुरू की तो यह भी कहा जा रहा था कि इंदिरा जी ने वीर सावरकर पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म लो अनुमति दी थी साथ ही सावरकर निधि में उस समय ₹11000 दिए थे जो आज के मूल्य में 5 लाख के बराबर हैं। ऐसे में कांग्रेसी अपने मौजूदा रुख का उन के रुख से तालमेल कैसे बिठाते? इंदिरा गांधी की नीतियों से कांग्रेस को किनारा करना मुश्किल है। इसलिए कांग्रेस पार्टी में पुरानी शैली की धर्मनिरपेक्षता वापस लाने की मांग उठ रही है। इंदिरा गांधी किसी बात पर नरम नहीं थी और इस बात के सबूत इतिहास और भूगोल में बिखरे पड़े हैं। भूगोल में कहें तो पूर्वी पाकिस्तान को दो टुकड़े कर देना है और यदि इतिहास में कहें तो आपातकाल। सबके सामने है इंदिरा जी का यह रुख वर्तमान संदर्भ में कांग्रेस द्वारा दोहराए जाने की जरूरत है। सबसे बड़ी बात है इंदिरा जी सारी स्थितियों से ऊपर राजनीति को अधिक महत्व देती थीं। इस बात को पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि आर एस एस और तत्कालीन जनसंघ से बुरी तरह चिढ़ने वाली इंदिरा जी ने सावरकर के बारे में ऐसा क्यों कहा या किया ?अगर इंदिरा जी के मनोविज्ञान को जो भी कोई थोड़ा समझता है तो यह समझने में देर नहीं लगेगी इंदिरा जी किसी भी ऐसे व्यक्ति को दूसरी जगह या दूसरी पार्टी के पाले में नहीं जाने देना चाहती थीं जो किसी भी तरह से स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा हो। हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर को सदा आरोप लगाती थी यह संगठन अंग्रेजों से मिला हुआ था।
         सावरकर के बारे में कोई भी चाहे जो कहे लेकिन यह तो माना ही जा सकता था पीआरएसएस की जमात में सावरकर। ही ऐसे प्रगल्भ नेता थे जिन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों की कतार में खड़ा किया जा सकता था और संभवत इंदिरा जी ऐसा होने नहीं देना चाहती थीं।  आज ठीक वही रवैया मोदी और शाह की सरकार में अपनाया जा रहा है । वह किसी भी तरह से कांग्रेस पार्टी के ऐतिहासिक विभूतियों को राष्ट्रहित में काम करते हुए नहीं दिखाना चाहते ।आज संघ और भाजपा एक बड़ी समस्या का मुकाबला कर रहे हैं। भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस जैसी गैर कांग्रेसी विभूतियां भी उनकी विचारधारा से दूर थी। यही कारण है कि संघ और भाजपा अपने मॉडल में कांग्रेस के विभूतियों का आयात करने क्यों उतावले में है । गांधी नेहरू खानदान के अलावा वे किसी को भी अपनाने के लिए तैयार हैं। पटेल पहले  से ही उनके साथ हैं और वे पटेल को नेहरू से भी बड़े भारतीय गणतंत्र के संस्थापक के रूप में स्थापित करना चाहते हैं । वे इस बात को ऐतिहासिक संदर्भों से मिटा देना चाहते हैं कि पटेल आर एस एस के प्रशंसकों में से नहीं थे और गांधी की हत्या के बाद उन्होंने ही संघ पर पाबंदियां लगाई थी। पटेल के संघ विरोधी रुख के पक्ष में कई दस्तावेज उपलब्ध है लेकिन इसलिए कि  नेहरू से उनके गंभीर मतभेद थे। इसलिए सबसे पहले भाजपा  पटेल को अपने खेमे में ले आई । लेकिन अब जमाना बदल चुका है सोनिया राहुल की कांग्रेस  बदले हुए वक्त का कैसे मुकाबला करती है यह किसी को मालूम नहीं है । क्योंकि उन्हें खुद इस युद्ध का ओर छोर का पता नहीं । उन्हें नहीं मालूम है कि अयोध्या पर क्या करें, सबरीमाला पर क्या करें या तीन तलाक पर क्या प्रतिक्रिया दें। यही कारण है वे दुविधा में दिखाई पड़ रहे हैं। मनमोहन सिंह जैसे गैर पेशेवर राजनीतिज्ञ इस बारीकी को समझते हैं लेकिन सावन की अंधी कांग्रेस पार्टी में मनमोहन सिंह की पूछ क्या है?


Friday, October 18, 2019

इतिहास का पुनर्लेखन

इतिहास का पुनर्लेखन

इतिहास सदा से समय सापेक्ष रहा है यह कभी निरपेक्ष नहीं रह सकता और वैचारिक दृष्टिकोण से इसमें  लेखन काल के  विचारों का आधार होता है चाहे वह गीता  या मानस की व्याख्या हो अथवा भारतीय स्वतंत्रता का संघर्ष हो । भारत का आधुनिक इतिहास लेखन जब आरंभ हुआ तो उस समय वैचारिक दृष्टि से सारे लेखक कम्युनिज्म से प्रभावित थे या फिर शासन के विचारों से आबद्ध थे। गुरुवार को गृह मंत्री अमित शाह ने सावरकर का संदर्भ उठाते हुए कहा  कि आधुनिक दृष्टिकोण से और विचारों से इतिहास का पुनर्लेखन हो। यह कोई नई बात नहीं है। शासन अपने आदर्शों के अनुरूप इतिहास की दिशा तय करता है। अमित शाह ने कहा कि सावरकर हिंदू राष्ट्र के तरफदार थे और आधुनिक शासन के नजरिए से सावरकर के विचारों की व्याख्या की जानी आवश्यक है। देसी इतिहासकारों को सामने आना चाहिए तथा इसमें अपनी भूमिका का निर्वाह करना चाहिए।
   शाह  के इस कथन में स्पष्ट रूप में यह दिखता है कि हमारे इतिहासकारों में इतिहास की दुबारा व्याख्या करने में हिचकिचाहट है। वर्तमान शासन का मानना है कि अगर सावरकर नहीं होते तो 1857 का इतिहास कुछ दूसरा होता लेकिन उन्हें पृष्ठभूमि में रखा गया है । अमित शाह ने इसी को मसला बनाकर कहा कि आधुनिक इतिहासकारों को सिपाही विद्रोह में सावरकर के विचारों की भूमिका और उनकी हैसियत के बारे में शोध करना चाहिए। यही नहीं ,शोध की वह प्रक्रिया आधुनिक विचारों तथा आदर्शों पर आधारित होनी चाहिए । सावरकर ने 18 57 पर लिखी अपनी पुस्तक में उसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रारंभ बताया है। सावरकर को महात्मा गांधी की हत्या के षड्यंत्र के आरोप में 1948 में गिरफ्तार किया गया था , लेकिन सबूतों के अभाव में उन्हें रिहा कर दिया गया। भाजपा ने उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित करने की कोशिश आरंभ कर दी है। जहां तक इतिहास को दोबारा लिखे जाने का प्रश्न है तो कई मामलों में यह उचित भी लग रहा है। क्योंकि भारतीय इतिहास दिल्ली या बहुत ज्यादा हुआ तो उत्तरी भारत को सामने रखकर लिखा गया है। मानो अन्य प्रांत हैं ही नहीं । हमारे देश में, उदाहरण के लिए ,भारतीय छात्रों को सातवाहन, विजयनगर और चोल साम्राज्य के बारे में या तो मालूम नहीं होगा या मालूम भी होगा तो बहुत कम मालूम होगा। यही नहीं औसत उत्तर भारतीय छात्र अहोम राजाओं के बारे में या तो बिल्कुल शून्य होगा अथवा बहुत मामूली जानकारी होगी। जबकि इन राजाओ ने 600 वर्षों तक शासन किया। यहां तक कि मुगलों को भी पराजित कर दिया था। इस असंतुलन को ठीक किया जाना जरूरी है। इतिहास केवल राज्यों के उठने गिरने की कहानी नहीं है। इसमें समाज की तत्कालीन धारा को बदलने के विभिन्न कारक तत्वों का विश्लेषण भी आवश्यक है । उदाहरण के लिए भारतीय इतिहास का छात्र कभी भी भारत के सामुद्रिक व्यापार के बारे में नहीं पढ़ता होगा।    चोल साम्राज्य के दुश्मनों ने दक्षिण पूर्व एशिया से उन पर हमला किया था। हमारे   भारतीय रोमन व्यापार के बारे में या प्राचीन उड़िया व्यापारियों के शोषण के बारे में बहुत कम पढ़ा होगा । दक्षिण पूर्वी एशिया पर भारतीय सभ्यता के प्रभाव के बारे में भी उन्हें कम जानकारी होगी। भारतीय विज्ञान का असाधारण इतिहास भी उसी तरह नजरअंदाज किया गया है। इस बात के कई सबूत हैं कि प्राचीन भारत मैं औषधि विज्ञान ,गणित और धातु विज्ञान के बारे में बहुत जानकारी थी लेकिन हमारे इतिहास के पाठ्य पुस्तकों में इसका जिक्र नहीं हुआ है । कई बार यह जानकर आश्चर्य होता है कि भारतीय  इतिहास की बहुत मशहूर घटनाएं या चरित्र की समीक्षा बहुत ही मामूली तथ्य के आलोक में की गई है। उदाहरण के लिए अशोक कलिंग युद्ध के बाद शांति के पुजारी हो गए थे लेकिन अशोक वंदना में जैन धर्म के अनुयायियों व्यापक हत्या का जिक्र है। अशोक के महान बनने के बाद भी उनका साम्राज्य क्षय होने लगा था। यहां तक कि कलिंग युद्ध पर उनका अफसोस जाहिर करना कुछ इस तरह वर्णित है कि  लगता है कुछ प्रचारित किया जा रहा है।
       दरअसल सदियों से हमारे यहां विदेशी मूल के विचारों और आदर्शों को स्थापित किया गया। इसमें उनके खानपान रहन-सहन और अभियांत्रिकी भी शामिल है। मसलन पुर्तगाली नहीं आए होते तो मिर्च और और टमाटर के बगैर हमारी जिंदगी कैसी होती या क्रिकेट और रेल अंग्रेजों ने हमें दिया, ताजमहल को एक तुर्क मंगोल राजा ने बनवाया  हालांकि यह भी सही है इन्हीं आक्रांताओं ने हमले और अकाल में हजारों लोगों को मारा। भारतीय छात्रों को अच्छा और बुरा दोनों के बारे में बताया जाना चाहिए।
              बेशक भारतीय इतिहास को दोबारा देखे जाने की जरूरत है। हो सकता है, विपक्षी दल कह सकता है कि  दक्षिणपंथी विचारों को इसमें जगह देने के लिए सरकार यह सब कर रही है। लेकिन, यह कोई बहाना नहीं है। औपनिवेशिक तथा मार्क्सवादी इतिहासकारों के पक्षपात पूर्ण विचारों से बेहतर है हमारा अपना एक इतिहास हो जिसने हमारी अपनी सोच हो। यह भी कहा जाता है कि भारतीय इतिहासकार वास्तविकता में अपने विचारों को मिला देते हैं। यह कोई नई बात नहीं है। ऐसा सब जगह होता है। दुनिया के हर भाग में इतिहास लेखन में यह दोष दिखाई पड़ता है, क्योंकि इतिहास का लेखन एक उद्देश्य के साथ होता है।
           


आखिर यह आलोचना क्यों ?

आखिर यह आलोचना क्यों ?

अभिजीत बनर्जी को  अर्थशास्त्र में इस वर्ष का नोबेल पुरस्कार दिया गया। लेकिन उनकी विधि की तीव्र आलोचना हो रही है। आखिर क्यों? इसका क्या कारण है? बनर्जी की विधि के बारे में पहला सवाल  है कि क्या विकास मूलक अर्थशास्त्र और औषधि के संबंध में इंसानी आचरण समान होता है? नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी ,एस्टर डुफ्लो तथा माइकल क्रैमर की विधि के मूल में यह प्रश्न शामिल है और यही कारण है कि अर्थशास्त्र में उनकी विधि की आलोचना हो रही है। वैसे अगर शास्त्रीय रूप से देखें तो महज 2 वर्षों में इनकी  विकास मूलक अर्थव्यवस्था ने रूप बदल दिया है। खास करके शोध के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार कमेटी ने अपनी प्रशस्ति में कहा है कि "इनकी विधि  विकास मूलक अर्थशास्त्र पर हावी हो रही है।" कमेटी ने पॉपुलर साइंस बैकग्राउंड के उदाहरणों को भी अपनी बात में शामिल किया है।
          इस विधि में जो सबसे महत्वपूर्ण है वह है "रेंडमाइज कंट्रोल्ड ट्रायल्स" अथवा आरसीटी। औषधि के क्षेत्र में नई दवा  के असर को  जानने के लिए इस तरह की विधि स्वीकृत है। इस तरह की विधि में दो तरह के लोगों के समूह को उपयोग में लाया जाता है। एक समूह जो दवा का इस्तेमाल कर रहा है और दूसरा जो नहीं कर रहा है। अब दवा के  इस्तेमाल के बाद दोनों में क्या अंतर आया इसका अध्ययन किया जाता है अभिजीत बनर्जी ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र में इसी विधि को अपनाया है। कई क्षेत्रों में इसकी प्रशंसा की गई है। लेकिन प्रश्न उठता है यदि यह आदर्श है तो इसकी आलोचना क्यों हो रही है? यहां जो सबसे महत्वपूर्ण है वह है कि अभिजीत बनर्जी की विधि में गरीबी को बातचीत के स्तर पर लाया गया है और जिसे समाप्त करने के लिए खास व्यक्ति या समूह के आचरण में परिवर्तन को आधार बनाया गया है। पहली दृष्टि में यह विचार तर्कसंगत लग सकता है। लेकिन इस विचार में जो कमी है वह है कि यह व्यापक माइक्रो इकोनॉमिक्स राजनीतिक और इंस्टीट्यूशनल उत्प्रेरण  को नजरअंदाज करता है। क्योंकि  मनुष्य  एक अत्यंत जटिल आचरण की इकाई होता है। यही कारण है कुछ विद्वानों ने इस विधि को सिरे से नकार दिया है । अर्थशास्त्री पारवा सियाल और कैरोलिना अल्वेस ने गार्जियन में अपने लेख में लिखा है की गरीबी मिटाना बहुत ही जटिल कार्य है।  क्योंकि इसका एक सिरा संस्थानों, स्वास्थ्य ,शासन से मिलता है तो दूसरा सिरा सामाजिक बनावट तथा बाजार के डायनामिक्स से मिलता है। इसके बीच में सामाजिक वर्ग के क्रियाकलाप, माइक्रो इकोनॉमिक्स पॉलिसी, वितरण तथा अन्य मामले भी जुड़े रहते हैं। इतनी विसंगतियों को किसी एक विधि से विकसित कर पाना संभव नहीं है । अब जैसे गरीबी की व्याख्या लें तो इसका विश्लेषण प्रक्रिया की परीक्षा और उस समूह में शामिल लोगों पर निर्भर है। अब इनको कैसे नियंत्रित किया जाए। आरसीटी में इसका कोई समाधान नहीं बताया गया है। यही नहीं , जिस आबादी का परीक्षण होता है वह अक्सर व्यापक तथा मशहूर होती है। एक अन्य नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अंगस डेटन का मानना है कि एक ही उपचार जो एक व्यवस्था में कारगर है वह दूसरे ने भी होगा ऐसा सोचना बिल्कुल सही नहीं है। एक की  विधि  को दूसरे समाज तक पहुंचाना बिल्कुल असंभव है।
         भारत में चुनाव के लगभग 3 महीने पहले अभिजीत बनर्जी ने भारतीय मतदाताओं के आचरण के बारे में लिखा था।  ऐसे मामले  आर्थिक हितों से नियंत्रित होते हैं और उसके बाद जाति और संस्कृति की प्राथमिकता आती है। उनके इस आलेख में स्पष्ट रूप से 1962 और 2014 के बीच मतदाताओं के आचरण में फर्क दिखाई पड़ता है। 2019 के चुनाव में यह स्पष्ट हो गया की मतदाताओं ने आर्थिक प्राथमिकताओं पर वोट नहीं डाले हैं बल्कि उन्होंने शौचालय तथा पक्का घर  या फिर बालाकोट जैसे मामले को दिमाग में रखकर वोट डाले हैं। उन्हें किसी प्रकार के आंकड़े की जरूरत नहीं है। यहीं आकर अभिजीत बनर्जी की विधि व्यवहारिक नहीं रह जाती है तथा आलोचना का विषय बन जाती है।