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Tuesday, March 31, 2020

अब सियासत नहीं विज्ञान की बातें हों

अब सियासत नहीं विज्ञान की बातें हों 

वर्तमान में जो महामारी विश्व के सामने है उससे कठिनाइयां बढ़ रही हैं और यकीनन इसके बाद दुनिया वह नहीं रह जाएगी जो आज तक रही है। बड़ी संख्या में लोग मारे जा रहे हैं और संक्रमित हो रहे हैं। इसे रोकने के लिए दुनिया भर की सरकारों से जो कुछ बन पड़ा है वह किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे देश में लॉक डाउन करवा दिया। बेशक ऊपर से देखने में तो यह कुछ ज्यादा ही लग रहा है। खासकर ऐसे मौके पर जब देश की बहुत बड़ी आबादी रोज खाने कमाने वाली है । अर्थव्यवस्था की स्थिति सुस्ती में है तथा लॉक डाउन के बाद जब काम बंद हो जाएगा तो लोगों का बड़ी संख्या में पलायन होगा। पलायन के दबाव के लिए सरकार ने कोई तैयारी नहीं की है। फिर भी जो कुछ किया जा रहा है और सरकारों से जो कुछ बन पड़ा है वह हो रहा है। कोरोना वायरस के इस प्रसार में अगर कोई कहे कि इसमें कुछ सकारात्मक भी है तो हैरत होगी। लेकिन अगर उन सकारात्मक पहलुओं पर गौर करें तो इससे हमें अपने रीति-रिवाजों और परंपराओं पर सोचने मदद मिल सकती है। जिन रिवाजों को हमने अब तक पिछड़ापन कह कर किनारा कर दिया है कोरोना ने इस बात को स्पष्ट कर दिया है सामाजिक स्वास्थ्य और कल्याण के मामलों में हमारा खास करके एशियाई मॉडल पश्चिमी तौर-तरीकों से कहें बेहतर है। हमारे सामुदायिक स्वास्थ्य और सेवा प्रेरित नौकरशाही की अधिकतम ताकत का इस्तेमाल इस बीमारी के नियंत्रण में किया जा रहा है। जबकि दुनिया के अन्य देशों में ऐसा नहीं हो रहा है। इन दिनों एक कहावत निकल गई है, "कोरोनावायरस का जितना इलाज डॉक्टर नहीं कर पा रहे हैं उससे कहीं ज्यादा इलाज पुलिस कर रही है। कम से कम आपके दरवाजे पर खड़ा एक वर्दीधारी सिपाही यह आपको याद दिलाता है कि बाहर निकलना वर्जित है।  बाहर नहीं निकलने से जिन समस्याओं से हम बचे रहेंगे उसके बारे में सब जानते हैं।" कहते हैं कि शासन की त्वरित कार्रवाई में लोकतंत्र बाधक होता है, लेकिन हमारे देश भारत ने इसकी मिसाल कायम की है कि अगर उद्देश्य सही हो तो कहीं कोई बाधा नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से आह्वान किया कि जनता कर्फ्यू लगेगा और लोगों ने  इसे मान लिया। कर्फ्यू लग गया । लोग एहतियात बरतने लगे। शायद यूरोप और अमेरिका में ऐसा देखने को नहीं मिलेगा। अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रीय आपातकाल कानून और स्टेफर्ड कानून के प्रावधानों को ससमय लागू कर दिया होता तो अमेरिका आज के जैसे आर्थिक संकट से नहीं गुजर रहा होता। डोनाल्ड ट्रंप मैक्सिको सीमा पर दीवार बनाने के लिए आपातकाल की घोषणा करने के लिए तैयार थे लेकिन महामारी से लड़ने के वक्त वह ऐसा नहीं कर सके। पश्चिमी समाजशास्त्री और समाज वैज्ञानिक अक्सर यह कहते सुने जाते हैं कि छोटी आबादी वाले देशों में सामाजिक नीतियां प्रभावी ढंग से लागू की जा सकती हैं लेकिन भारत छोटी आबादी का देश नहीं है। यहां के एक राज्य या आबादी से दुनिया के कई देशों की आबादी कम है। अब समय आ गया है कि दावोस या इसकी तरह के अन्य शिखर सम्मेलनों पर ध्यान देना छोड़ें और इसके बजाय स्वास्थ्य और सामाजिक नीति विशेषज्ञों के शीर्ष स्तरीय सम्मेलन को प्रोत्साहित करें। सार्वजनिक स्थलों पर थूकना भारत में लंबे अरसे से चली आ रही एक सामाजिक बुराई है और इसके बारे में कई बार कहा सुना जा चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यापक पैमाने पर स्वच्छता अभियान की शुरुआत की लेकिन कोरोना वायरस के डर से अब यह  सफलता का क्षण हो सकता है। यह तो प्रमाणित है कि थूक से कैसे टीबी फैलती है। अब यह भी लोग जानने लगे हैं कि खासने और थूकने से कोरोना वायरस का संक्रमण हो सकता है और लोग अपनी इन आदतों को नियंत्रित करेंगे ।  उनके बाद आदतें संभवत सुधर जाएंगे इसलिए पल्ले व्यवहार का लाभ उठाते हुए भारत सरकार को थूकने के खिलाफ एक व्यापक अभियान चलाना चाहिए जैसा खुले में शौच के खिलाफ चलाया गया। यदि ऐसा किया जाता है तो हमें नाटकीय परिणाम मिलेंगे ।  इस समय तो लोग सहयोग के लिए तैयार हो जाएंगे। लोगों ने मास्क पहनना शुरू कर दिया है । वह थूक अवरोधक भी है। थूकने वाले को मास्क पहनकर मुंह से पिचकारी चलाने का आनंद नहीं मिल सकता है।
      कुल मिलाकर सब ने देखा होगा इस समय राजनीति समाचार का विषय नहीं है। सब जगह समाचार बनाने वालों और समाचारों का संकलन करने वालों के साथ-साथ संपूर्ण समाज के सोच में हो रहे एक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का संकेत मिल रहा है। इन दिनों आतंकवाद और राजनीतिक उथल-पुथल के बारे में नहीं सुनना या कम सुनना कितना राहत दिलाने वाला है यहां तक कि कश्मीर के रिपोर्टर आतंकवाद के बजाय घाटी के वीरान पार्कों और बागो पर ध्यान दे रहे हैं ।वे पर्यटकों की कमी की बात कर रहे हैं और शायद ही कभी हिंसा की बात करते हैं । नतीजतन जहां कभी नेता हावी रहते थे वहां अब वैज्ञानिकों और ज्ञानियों की बातों को महत्व दिया जा रहा है इस कारण वास्तविक विशेषज्ञों को अपनी बात सामने रखने के लिए एक मंच प्राप्त हो रहा है हम जिस पक्षपातपूर्ण राजनीतिक बयानबाजी को झेल रहे थे उससे अब शायद लंबे समय तक सामना नहीं हो पाएगा या हो सकता है ऐसी स्थिति में परिवर्तन दिया है हो सकता है कोरोनावायरस के बारे में ज्यादा जानने के लिए सभी को थोड़ा गंभीर अध्ययन करना पड़े किताबों पर ज्यादा ध्यान जाएगा ग्रामर पॉलिटिक्स की बजाए अर्थशास्त्र या रामचरितमानस ज्यादा ध्यान आकर्षित करेंगे एक और बड़ा सुधार आएगा और इसका श्रेय  कोरोनावायरस हो जाता है जिन फिरंगी ओं के साथ खड़े होकर हम अपने को गौरवान्वित महसूस करते थे उस से दूरी बनाने लगेंगे क्योंकि विदेशों से  आए यह लोग ही वायरस के वाहक हैं विदेश यात्रा से लौटने वाले लोग अब फॉरेन रिटर्न की ठसक नहीं दिखा पाएंगे हालात इतने बदल गए हैं की पानी जा पनीर भी संदेह के घेरे में है इससे हमारे डेयरी उद्योग को मजबूती मिल सकती है अगर हल्के-फुल्के अंदाज़ में करें तो इस वायरस नहीं हैंड शेक जैसे चलन को बंद करना शुरू कर दिया है अब लोग नमस्ते तथा प्रणाम करने लगे हैं अभिवादन का यह स्वरूप लैंगिक रूप से निष्पक्ष और सार्वजनिक स्थानों पर स्त्री पुरुष संपर्क की हमारी संस्कृति के अनुरूप भी है। अर्थशास्त्र में चाणक्य ने कहा है कि मानवता की "अधिकांश समस्याएं अकेले में चुपचाप बैठ कर सोच पाने की हमारी अक्षमता के कारण पैदा हो रही हैं। " इसलिए स्वयं घर में बंद रहें और दूसरों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करें।


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