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Monday, December 26, 2016

यह नयी युक्ति है

यह  नयी युक्ति है  
ढाई साल से ज्यादा हो गए और इतनी अवधि  किसी भी आदमी या नेता के मानस को समझने के लिए यथेष्ट होता है. किसी भी देश का प्रधानमंत्री उस देश की जनता का मुकद्दर और मुस्तकबिल दोनों उसके हाथ होप्ता है. ऐसे में अपने नेता को खास कर उसके मानस को जानना जरूरी है. क्योंकि ई वी एम मशीन का बटन दबा कर एक तरह से देश की जनता उस नेता के हाथ में अपना भविष्य सौंप देती है. यदि प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के ग्राफ को देखे तो उनके मानस को पढ़ना कठिन नहीं होगा. जबसे उन्होंने 2014 के लिए चुनाव प्रचार शुरू किया मतदाताओं से उनकी एकमात्र अपील थी कि विगत 60 सालों के अन्य दलों के कुशासन से देश को मुक्त कराने के लिए बी जे पी और उन्हें एक मौक़ा दें. चुनाव जीतने के बाद भी उनकी पार्टी और खुद उनकी ओर से जनता को यह समझाने  की कोशिश की जाती रही कि आज़ादी के बाद से देश में कुछ नहीं हुआ वे सब कुछ ठीक कर देंगे. जब उनपर  वायदों को पूरा नहीं करने के सम्बन्ध में पूछा जाता है तो वे और उनके समर्थक इसी दलील की आड़ में छिपने की कोशिश करते नज़र आते हैं . अक्सर यह कहा जाता है कि पिछली सरकारों को साठ साल दिया और इसे पांच साल नहीं दे सकते. यह बचकाना दलील है. अभी हाल में नोट बंदी पर जब टीका टिपण्णी होने लगी तो कहने लगे कि एक पूर्व प्रधानमंत्री ने ऐसा करना चाहा था पर करने का सहस नहीं जुटा पाए थे. यह अपना दोष दूसरी सरकारों पर मढने जैसा है. वैसे दूसरों पर दोष मढने का मतलब आधा दोष या गलतकारी को कबूल करना है. ऐसा कह कर मोदी कबूल कर रहे हैं कि गलती हो गयी. वे इस स्वीकारोक्ति को इस तर्क की आड़ में छिपाना चाहते हैं कि चूँकि पिछले प्रधान मंत्री नहीं कर सके और हम कर के दिखा रहे हैं. मजे कि बात है कि यह दलील तब उछाली गयी जब पार्टी के कई सांसदों ने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से कहा कि नोट बंदी का दाँव उलटा पद गया और नगदी के लगातार आभाव से लोग क्रोधित होने लगे हैं. 

आपमें से बहुतों को याद होगा कि मई 2015 में अपनी सरकार के पहले वर्ष का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि जो लोग कहते हैं कि अच्छे दिन का जो वादा किया गया था वे कहाँ आये. उन्होंने कहा कि यह पूछने वाले वही लोग हैं जो साथ साल तक दिल्ली की सत्ता पर काबिज थे. 

मोदी जी ने कहा कि देश के किसानों को सुरक्षा चाहिए और 60 साल में इस ओर ध्यान ही नहीं दिया गया. उन्होंने लाल किले से 20 15 में अपने दूसरे भाषण में कहा की, हम इस नजरिये को बदलना चाहते हैं . लेकिन अगर आंकड़े देखें तो पता  चलेगा कि किसानो की विपदा कयाम है. यहाँ तक कि ख़ुदकुशी की तादाद भी घटी नहीं है. कोई सुधार दिख नहीं रहा है. यहाँ तक कि नोट बंदी का बहुत बड़ा आघात किसानो पर लगा है. असली दुष्प्रभाव तो महीने दो महीने के बाद दिखेगा. सर्जिकल स्ट्राइक  पर डींग मारते हुए मोदी जी ने कहा कि   उन्होंने एक रैंक एक योजना लागू कर डी है लेकिन आज भी वह केवल कागजों पर है उसे अमल में नहीं लाया गया है. 

उत्तर प्रदेश में चुनाव हने वाले हैं और मोदी, अखिलेश और राहुल के लिए या मैदाने जंग बना हुआ है. पिछली सरकारों के कुछ नेता यहाँ बिम्ब बन चुके हैं और मोदी जी उन्हने सामने रख कर वर्तमान नेताओं की खिल्ली उड़ाते हैं. उत्तर प्रदेश में नेहरू जयंती पर एक समारोह में मोदी जी ने कहा कि किसी ने भी “ लोक विकास सम्बन्धी नेहरु जी कि आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया.” किसी ने उन्हें ऐसी श्रधांजलि नहीं डी जैसी यूपी के इस सांसद ने दी है. 

यही नहीं गोधरा कांड के लिए भी वे कहा करते थे कि इसके लिए कांग्रेस , मुसलमान और पकिस्तान जिम्मेदार है. प्रश्न यहाँ यह कि आखिर कबतक दूसरों पर दोष मढ़ते रहेंगे और उसकी आड़ में छिपते रहेंगे. भाषणों और सभाओं के अलावा कुछ ठोस करें भी तो. हालत जिस तरह बेकाबू हो रहे हैं और सत्ता के गलियारों में जो सरगोशिया चल रहीं हैं उनसे पता चलता है कि जनता का ध्यान भटकाने के लिए गर्मियों से पहले कहीं जंग ना शुरू कर दें. 

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